लघुकथा: खेती

- यशपाल शर्मा 'यशस्वी'


वसुधा को वह दिन याद आया जब उसने अपने सबसे प्रिय पुत्रों को अपनी गोद में दुलारते हुए यह वादा किया था कि वह उन्हें उनकी जरूरत की हर चीज उपलब्ध कराएगी। पवन और नीर ने भी वसुधा बहन के इस वादे को पूरा करने में सहायक बनने का वचन दिया था।

अभागे नादान वसुधानन्दन सोने के अंडे देने वाली मुर्गी का पेट काटने पर उतारू थे। जरूरतों को धकेल कर हृदय में लोभ ने निवास बना लिया। वसुधा से अधिकाधिक प्राप्त करने के लिए उसके पुत्र आपस में संघर्ष करने लगे।

पवन व नीर अब अग्नि से आक्रांत रहने लगे। लज्जा व करुणा रूपी जल तो नयनों से वर्षों पहले नदारद हो चुका था। विजातीय पदार्थों ने पवन के मूलभूत गुणों को भी नष्ट कर दिया था। वसुधा की देह को दहकती देखकर गगन रो पड़ा। वसुधा के एक हिस्से में जलप्लावन विभीषिका बन रहा था।

वसुधा आज भी पुकार पुकार कर कह रही थी, "तुम्हारे बोए गए हर बीज को शत एवं सहस्र गुना कर देने का मेरा वचन है, द्वेष, लोभ व स्वार्थ की खेती से मुझे बंजर मत बनाओ।"

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