पुस्तक समीक्षा: आखिरी साँस तक (उपन्यास)

समीक्षक:  दिनेश पाठक ‘शशि’ 

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पुस्तक: आखिरी साँस तक (उपन्यास)
रचनाकार: श्रीमती कमल कपूर
प्रकाशक: अयन प्रकाशन, महरौली, नयी दिल्ली
पृष्ठ: 168, मूल्य: ₹ 350.00 रुपये, प्रकाशन वर्ष: 2018

हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं में साधिकार लेखनी चलाने वाली विद्वान, साहित्यकार  सुश्री कमल कपूर की सद्यः प्रकाशित पुस्तक 'आखिरी साँस तक' एक ऐसा उपन्यास है जिसकी रचना, पूर्ण उर्जस्वित अविकल भाव से, गहनता के साथ की गई है।

सुश्री कमल कपूर ने साहित्य लेखन में बहुत से नये प्रयोग किए हैं और यही कारण है कि उनकी प्रत्येक पुस्तक एक विशिष्ट पहचान बनाती है। उनके पास शब्दों का और भावों का भी अपार भण्डार है और उन्हें अभिव्यक्त करने की सशक्त क्षमता भी।

 यद्यपि उपन्यास विधा में रचित 'आखिरी साँस तक' सुश्री कमल कपूर का पहला ही उपन्यास है किन्तु उपन्यास को पढ़ते-पढ़ते इस बात का कहीं भी अहसास नहीं होता कि यह लेखिका का प्रथम उपन्यास है।

दिनेश पाठक ‘शशि’
उपन्यास की मुख्य पात्र अनुराधा है जो अपनी सौतेली माँ एवं सौतेले भाई के दुर्व्यवहार से इतनी अधिक पीड़ित एवं भयभीत है कि वह यह ही भूल चुकी है कि वह भी उन्हीं की तरह हाड़-मांस की बनी एक नारी है और उसका भी कोई निजी अस्तित्व है।  शंकाओं के विषधर अनुराधा का पीछा करते रहते हैं। यहाँ तक कि अनुराधा के दफ्तर का उसका बॉस अखिल जो अनुराधा के साथ प्रणय के लिए तैयार है, अनुराधा में स्वाभिमान व आत्मनिर्भरता पैदा करने का प्रयास करता है किन्तु उसे भी कुछ न बताकर अंततः अनुराधा वह घर छोड़कर आत्महत्या करने का मन बनाकर घर से निकल पड़ती है। उपन्यास में एक नारी (सौतेली माँ) के द्वारा दूसरी नारी (सौतेली पुत्री अनुराधा) की प्रताड़ना की पराकाष्ठा  का वीभत्स रूप फ्लैशबैक में चला है जो अनुराधा के मन-प्राण पर पूर्णरूपेण हावी रहा है।  पढ़ते-पढ़ते पाठक का दिल अनुराधा के प्रति इतना सहानुभूति से भर उठता है कि बरबस ही उसकी आँखों से झर-झर आँसू बहने लगते हैं। तो वहीं सौतेली माँ एवं सौतेले भाई सुंदर के व्यवहार के प्रति आक्रोश से भर उठता है।

"माथे तक दुपट्टे से ढककर,  सिमट कर खड़ी हो गई। उसे डर था कि कोई जान पहचान वाला न मिल जाए। सारी तेज रफ्तार गाड़ियाँ यहीं से गुजरती थीं। अब उसे देखना है कि उसका अंत...? दिल में हूक उठी। अनाथों की तरह खड़ी वह सोच रही थी कि जिन्दगी ने कितना ठुकराया, कितना दुत्कारा हैं उम्रभर उसे और अब तो सारे द्वार ही बन्द कर दिए ..." (पृष्ठ-14)

बावजूद इसके अनुराधा आत्महत्या न कर सकी और अनजाने में अनचाहे ही रेलगाड़ी में बैठकर मधुपुर पहुँच गई। जहाँ उसकी बचपन की एक सहेली कल्पना रहती है किन्तु उसके मन ने अपनी सहेली कल्पना के घर जाना गवारा नहीं किया। मन में भय था कि कहीं कल्पना के माध्यम से सौतेली माँ, भाई को उसके यहाँ होने के बारे में न पता चल जाये। दैवयोग से वह एक ऐसे आश्रम में पहुँच गई जिसने अनुराधा के जीवन की धारा ही नहीं बदली बल्कि अनुराधा की सोच को ही बदल डाला।                                         

यहाँ मुझे कविवर श्री अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध जी की ये पंक्तियाँ सटीक लगती हैं-

ज्यों निकल कर बादलों की गोद से, थी चली एक बूंद कुछ आगे
.....................
.........................
किन्तु घर को छोड़ना अक्सर उन्हें, बूंद लौं कुछ और ही देता है कर।


अनुराधा के मानसिक द्वन्द्वों का अनुभूति के चरम तक पहुँच कर लेखिका ने उपन्यास में उल्लेख किया है। रास्तेभर रेलगाड़ी में भी अनुराधा के दुःस्वप्न पीछा नहीं छोड़ रहे थे-

"किन्तु अनुराधा के अन्तर का कोलाहल शांत नहीं हो पा रहा था। कैसे होता? नारकीय और अमानवीय यातनाओं के गैल-गलियारों से गुजरकर जो आई थी वह। एक लम्बे अरसे के बाद से गम उसके सीने में घुट रहे थे। ये पीड़ाएँ... ये दुःख, ये दर्द इतने निजी थे जो किसी के साथ बांटे नहीं जा सकते थे।"(पृष्ठ-26)

रास्ते में बनी मित्र और धर्म-बहन मीता के पति ने अनुराधा को मधूपुर में किसी आश्रम के बारे में बताया था। अनुराधा पहुँच जाती है उसी आश्रम में। और एक भद्र महिला आश्रम की संचालिका गुरुमाँ यानि माँश्री के पास पहुँचा देती है।

"बेहद सुथराई और सादगी से सजे उस बड़े से हॉल में श्री रामकृष्ण परमहंस और काली माँ की संग-संग खड़ी सुंदर एवं भव्य प्रतिमाओं के पार्श्व में बिछे एक उजले आसन पर नीले पाड़ वाली सफेद सूती बंगाली साड़ी पहने एक सौम्य एवं दिव्य व्यक्तित्व वाली गौरवर्णा वृद्ध महिला आसीन थीं जिनके चेहरे पर अद्भुत तेज और आँखों में अलौकिक चमक थी, जो सिद्ध कर रही थी कि वह कोई साधारण मानवी नहीं देवलोक से उतरी कोई देवी अथवा ज्ञान-विज्ञान से सम्पन्न कोई परम विदुषी हैं और यही थीं गुरुमाँ या माँश्री।"(पृष्ठ-51)

अनुराधा का अतीत सुनकर माँश्री अनुराधा को अखिल से विवाह कर गृहस्थी बसाने की सलाह देती हैं पर अनुराधा इसके लिए तैयार नहीं तो माँश्री उसे और सोचने का समय देते हुए कहती हैं-   "जल्दबाजी न करो बेटी। जब तक सोच विचार लो। तुम यहाँ रहो। जब तक जी चाहे। यहाँ की दिनचर्या देखो-गुनो। अभी मेहमान बनकर रहो... यहाँ के कार्यक्षेत्र देखो और सोचो कि तुम यहाँ रह पाओगी या नहीं। जो छूट जाता है बेटी वह फिर कभी नहीं मिलता, ऐसी बात तो नहीं, पर हाथ से निकला वक्त... अतीत बन जाता है।"

माँश्री अनुराधा का नया नामकरण कर देती हैं - "निवेदिता"

यद्यपि विगत को याद करने में कोई बुद्धिमानी नहीं पर अतीत का दंश जब मन प्राण पर हावी होता हैं तो मनुष्य विवश हो जाता है।

ऐसा ही हुआ अनुराधा के साथ। क्या करे अनुराधा? वह अखिल के साथ गुजारे वक्त, उसके व्यवहार, उसकी सीख और अखिल की माँ द्वारा दिए नारी सशक्तीकरण की सीख और  अपनत्व की मधुर यादों को विस्मृत नहीं कर पा रही। रात्रि को सोने से पहले और प्रातः जागते ही अखिल की याद उसे बरबस ही अपनी ओर खींचती है।

 धीरे-धीरे आश्रम की ही गायत्री, निवेदिता को आश्रम के सभी स्थल दिखाते हुए सबसे परिचय भी कराती जाती है- ‘यह "कन्या सदन" है निवेदिता बहन! यहाँ देश के भिन्न-भिन्न भागों से आई 80 लड़कियाँ रहती हैं। दरअसल देशभर में स्थित ‘पालना’,‘मुस्कान’,‘पहला कदम’,‘खुशी’,‘बालवाणी’ जैसी एन.जी.ओ. से 4 या 5 साल की उम्र में आती हैं वे यहाँ। फिर इनको पढ़ाना-लिखाना, और इनके व्यक्तित्व को गढ़ना हमारा दायित्व है।’

आश्रम में एक गौशाला है जिसका नाम "कामधेनु"है। उसमें बहुत सी गायें हैं जिनका नामकरण किया हुआ है। जिसका नाम पुकारा जाय वही गाय हाजिर होती है। दिनकर दुबे कामधेनु के प्रबन्धक हैं जो बाँसुरी भी बहुत अच्छी बजाते हैं।

 आश्रम में ही एक बगीची है जिसमें साग-सब्जी उगाई जाती हैं उसका नाम है- "हरी-भरी"। एक बगीचा है जिसमें मसालों की खेती की जाती है उसका नाम है- "संजीवनी"। फलों के बगीचे का नाम है- "सुरसम्-सुफलम्" । नृत्य-संगीत की शिक्षा प्रदान करने के लिए एक स्थान है जिसका नाम है-"कला मंदिर" जिसमें माँ सरस्वती की प्रतिमा भी है और नटराज जी की प्रतिमा भी साथ ही सभी वाद्ययंत्र भी। एक योग केन्द्र भी है। एक भोजन कक्ष है जिसका नामकरण किया गया है- "अन्नपूर्णा"। अन्नपूर्णा की समस्त व्यवस्था मुंबई से आई सुनंदा ताई और मलय दादा देखते हैं। अपने पुत्र के वियोग में दोनों इतने व्यथित हुए कि सब छोड़ छाड़ कर यहाँ आ गये । आश्रम में एक्यूपंक्चर संस्थान भी है तो सांध्य प्रार्थना हेतु साधना केन्द्र भी। एक बहुत ही सुव्यवस्थित पुस्तकालय भी है। सभी स्थानों पर सही समय पर सभी कार्य पूर्ण अनुशासन के साथ संपादित होते हैं यहाँ। आश्रम के निवासी हर पात्र एवं स्थान का चरित्र कुछ इस तरह गढ़ा है लेखिका ने जैसे वह सब कल्पित न होकर लेखिका ने स्वयं देखा हो। यानि कुल मिलाकर धरा पर स्वर्गलोक की अद्भुत कल्पना के लिए सुश्री कमल कपूर की कल्पनाशक्ति प्रणम्य है । आश्रम के विस्तृत वर्णन को पढ़ते-पढ़ते ही पाठक का मन इस अद्भुत आश्रम की मनोरमता में डूब-डूब जाता है। अनुराधा भी यहाँ आकर अपने को धन्य समझ रही है।

लगभग ढाई महीने परखने के बाद माँश्री अनुराधा यानि निवेदिता को सदस्यता प्रदान करते हुए उसे आश्रम का गणवेष एवं सवेतनिक मैनेजर का पद भी प्रदान करती हैं। जिसका निर्वहन निवेदिता प्रण-पण से करती है। अनन्त पंडित जी उसे बहन का सम्मान देते हैं तो गायत्री बहन हमजोली का। सुनंदा ताई और मलय दादा उसे अपनी बेटी सा प्यार देते हैं। वह भी आश्रम की उन्नति के लिए जी जान से सेवा में जुटी रहती है।

उपन्यास में बीच-बीच में अनन्त पंडित जी व आरती के अटूट प्रेम पराकाष्ठा की कहानी, गायत्री द्वारा घर छोड़ने का कारण, केसर का आश्रम में आना, आदि बहुत सी घटनाओं द्वारा कथा विस्तार किया गया है  जो औपन्यासिक दृष्टि से औचित्य रखता है।  रूढ़ियों का डटकर विरोध, निराशा से आशा की ओर उन्मुखता, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का पाठ, अंगदान और रक्तदान के अनुकरणीय उदाहरण, और ईश्वर पर अटूट विश्वास का होना,  क्षमाशीलता का पाठ और जीवन की सच्चाई आदि बातें उपन्यास में सहज रूप से पिरोई हुई हैं जो मनुष्य को एक नेक इंसान बनने की प्रेरणा प्रदान करती हैं।

एक दिन ‘जीवन-संध्या’ नाम के वृद्धाश्रम में मुख्य अतिथि बनकर गई निवेदिता के फोटो अखबारों में देखकर उसके बचपन की सहेली अपने पति कार्तिक को लेकर "राम कृष्ण शरणम्" आश्रम में आ धमकती है। अनेक गिले-शिकवों के बाद कल्पना चली गई पर अपनी बातों  का गहरा असर छोड़ गई। रह-रह कर अनुराधा के कानों में कल्पना के कहे शब्द- "अखिल को किस बात की सजा दी तूने?" अनुराधा के मन में हलचल मचा जाते हैं। वह अनन्त पंडित जी की पत्नी आरती से अपने मन की बात साझा करती है।

 "आरती भाभी की सकारात्मक सात्विकता से भरी सुलझी बातों ने उसे बहुत बल दिया। फिर भी कहीं कुछ ऐसा था जो दिल को साल रहा था और दिमाग में अजीव सी हलचल मचा रहा था। ...जिन्हें उसने माँश्री के आगे उड़ेला।" (पृष्ठ-147)

एक दृढ़, उदात्त चारित्रिक गुणों से युक्त माँश्री उसे सही राह दिखाती हैं- "किस-किस ने तुम्हारे साथ क्या-क्या बुरा किया, ये याद रखने से अच्छा है कि यह सोचो तुम्हारे साथ अच्छा किस-किस ने किया। ... आवेग को शान्त करो और क्षमाशील बनो पुत्री।" (पृष्ठ-147)

और अनुराधा ने अपना बुरा करने वालों को भुला दिया किन्तु अखिल... "उसे विश्वास हो गया था कि इंसान कभी जीते जी रिश्तों से कटकर नहीं रह सकता। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वह सदा स्नेह-सम्बन्धों से जुड़ा ही रहना चाहता है। तभी तो वह चाहती है कि अखिल की खबर उसे मिले।" (पृष्ठ-149)

उसे आरती भाभी के शब्द याद आते हैं... "नहीं तो जिस व्यक्ति से कोई वास्ता ही न हो उसके सुख-दुःख की परवाह भला कौन करेगा?" (पृष्ठ-149)

मन की उथल-पुथल और उद्विग्नता के बीच वह रात को स्वप्न देखती है और दूसरे दिन  कान्हा की मूर्ति के आगे हाथ जोड़ कर खड़ी हो गई आत्म स्वीकारोक्ति के लिए - "हे कुंज बिहारी कान्हा! ... तुम्हारे सामने मैं मन-प्राण से स्वीकार करती हूँ कि मैं अखिल से प्रेम करती हूँ...।"     ... ... "उसे लगा जैसे कान्हा के होठों की मुस्कान कुछ अधिक गहरी हो गई है और वह कह रहे हैं... प्रेम कभी अनुचित हो ही नहीं सकता। बस तुम कभी कर्तव्य-विमुख न होना।" (पृष्ठ-151)

अनुराधा अपने कार्यालय में आकर बैठी ही थी कि सिक्योरिटी गार्ड ने किसी के आगमन की सूचना दी। आगन्तुक को देखकर वह आश्चर्यचकित थी कि ... "कुछ घंटे पहले ही तो वह कान्हा के सामने मन खोलकर और विनती करके आई थी... नहीं जानती थी कि नटवर नागर इतनी जल्दी उसकी पुकार सुन लेंगे।" (पृष्ठ-152)

अखिल ने अनुराधा से मिलकर बहुत सारे गिले-शिकवे किए और साथ चलने की मनुहार भी। अपनी माँ द्वारा दी गई पाजेब भी अनुराधा को दीं। माँश्री से मिलवाया भी अखिल को अनुराधा ने । अनन्त पंडित जी, आरती भाभी, गायत्री दीदी  और माँश्री ने भी अनुराधा को अखिल के साथ चले जाने के लिए कहा किन्तु अनुराधा ने आश्रम के उपकारों के लिए उनके प्रति अपने कर्तव्यों का हवाला देकर जाने से साफ मना कर दिया।

अखिल सभी प्रयास करके हार गया तो उसने सब छोड़ कर स्वयं आश्रम में आकर रहने के लिए कहा किन्तु अनुराधा ने अपनी बात से उसे निरुत्तर कर दिया - "नहीं, तुम नहीं आओगे यहाँ। तुम्हें माँ के पास रहकर उनकी सेवा करनी है। जो अपनी माँ को त्यागकर दूसरों की सेवा के लिए घर से निकल जाता है, उसे तो ईश्वर भी क्षमा नहीं करते और वैसे भी सेवा धर्म परिहास नहीं... एक तप है... परीक्षा है, अखिल तुम्हें लौटना होगा।"

कहीं रामचरित मानस सा जीवन दर्शन तो कहीं श्रीमद्भागवत गीता का सा ज्ञान, पूरे उपन्यास में शब्द-शब्द से लेखिका के प्रखर ज्ञान की अनुभूति होती है।

"अनु! बेशक खाली हाथ लौट रहा हूँ मैं, लेकिन एक संतोष साथ लेकर जा रहा हूँ कि तुम खुश हो और सुरक्षित हाथों में हो। जिन्दगी भर दुःख ही दुःख सहे तुमने। आज मैं दिल से दुआएँ देकर जा रहा हूँ कि तुम सदा सुखी रहो।....।"(पृष्ठ-167)

पात्रों के मुख से निःसृत एक-एक वाक्य पाठक के दिल में उतरता जाता है। और प्रवाह ऐसा अद्भुत कि पाठक को आद्योपान्त पढ़ने पर मजबूर कर देती है। उपन्यास का अन्त दुखान्त और सुखान्त के बीच की सी अनुभूति कराता सा पाठक के मन में गहरे उतर कर देर तक टीस पैदा करते हुए उसके मन-प्राण पर हावी रहता है और यही उपन्यासकारा की लेखनी की सफलता है।

"अखिल गाड़ी का दरवाजा खोल रहा था। उसकी आँखों से आँसू झर रहे थे, जिन्हें पौछा नहीं उसने। पग धरा उसने गाड़ी में तो अनुराधा को लगा, जैसे उसके सीने से कोई दिल निकाल कर ले जा रहा है। तड़पकर पुकारा उसने -"अखिले..." तो आशा की एक दमकती किरण थामे वह उसकी ओर खिंचा आया।

भावावेश में अखिल के दोनों हाथ कसकर थाम लिए उसने - "अखिल! डर, कायरता, संकोच, लज्जा और अविश्वास के साये सदा लिपटे रहे मुझसे और कभी खुलकर अपने मन की बात न कह सकी मैं तुमसे, पर आज कहती हूँ- मैं तुम्हें चाहती थी तब भी और अब भी चाहती हूँ। अपनी आखिरी साँस तक चाहती रहूँगी और दूर रहकर भी सदा तुम्हारे पास बनी रहूँगी। एक ही साँस में कह गई वह।" (पृष्ठ-167)

अखिल फिर से साथ चलने का अनुरोध करता है किन्तु अनुराधा अपनी जिन्दगी को आश्रम की बच्चियों की धरोहर बता कर चलने से मना कर देती है तो अखिल भी अपने मनोभावों को रोक नहीं पाता,-" यूँ लग रहा है जैसे अपनी रूह यहीं छोड़कर बेजान शरीर लेकर जा रहा हूँ।  तुम पुनर्जन्म में यकीन रखती हो अनु!  क्योंकि तुम गीता पढ़ती हो और गीता का यही दर्शन है लेकिन बोध दर्शन कहता है कि अगला-पिछला कोई जन्म नहीं। जो है यहीं...इसी जन्म में है और मैं भी यही मानता हूँ इसलिए मैं शिद्दत से इंतजार करूँगा उस दिन का जब तुम मेरे पास लौट आओगी या मुझे यहाँ बुलाओगी... हाँ अनु, मैं तुम्हारा इंतजार करूँगा आखिरी साँस तक।" (पृष्ठ-168)

निःस्वार्थ प्रेम की पराकाष्ठा का ऐसा अद्भुत रूप बिरले ही अपनी लेखनी से उतार पाते हैं। उपन्यास की भाषा-शैली प्रवाहपूर्ण और मनोरम है। पात्रों का चरित्र चित्रण जीवंत है। पात्र योजना तथा उनके पारस्परिक व्यवहार एवं सम्बन्धों को जिस बारीकी से गढ़ा गया है प्रशंसनीय है। सौतेली माँ बीजी, सौतेला भाई सुन्दर, बचपन की सहेली कल्पना, अखिल और अचानक ही रास्ते में बन गई धर्म-बहन मीता के अलावा आश्रम की गायत्री, अनन्त पंडित जी, अनन्त पंडित जी की प्रेमिका और फिर पत्नी आरती, गूंगी-बहरी कन्या केसर, और सबसे ऊपर एक दृढ़, उदात्त चारित्रिक गुणों से युक्त आश्रम की संचालिका -‘माँश्री’, सीाी के चरित्रों का गठन ऐसा कि पाठक पढ़ते-पढ़ते भूल ही जाता है कि वह कोई उपन्यास पढ़ रहा है या स्वयं इसे जी रहा है।

लेखिका ने प्रत्यक्ष संवाद के अन्तर्गत उपन्यास को समाज की सर्वाधिक ज्वलंत समस्या ‘घरेलू हिंसा’ की कहानी बताया है। जिसे लेखिका ने निःस्वार्थ प्रेम की चाशनी में पाग कर अद्भुत प्रयोग किया है और उसमें वह पूर्णतः सफल हुई हैं। पूरे उपन्यास में एक ही कमी है जो खलती है वह है प्रूफ की अशुद्धियाँ। अयन प्रकाशन और उसकी प्रकाशन गुणवत्ता से मैं बहुत वर्ष से परिचित हूँ किन्तु इस पूरी पुस्तक में प्रूफ की लगभग 32 गलतियों का होना मुझे आश्चर्यचकित कर रहा है। साथ ही कृष्ण को कृष्णा और योग को योगा शब्द का प्रयोग भी खलता है। कथानक, कथावस्तु, भाषा-षैली, और चरित्र चित्रण आदि सभी दृष्टि से उपन्यास पूर्णतः उत्कृष्ट साहित्य की श्रेणी में गिना जा सकता है। सुश्री कमल कपूर इसके लिए साधुवाद की पात्र हैं। पुस्तक का हिन्दी साहित्य जगत में स्वागत होगा ऐसी आशा है।

3 comments :

  1. आदर्दीय शर्मा जी , आपकी पत्रिका 'सेतु'में प्रकाशित कहानी लेख व समीक्षा पढ़ी जो काफी प्रशंशनीय है जिस में श्रीमती कमल कपूर के उपन्यास 'अखिरी सांस तक' कि वरिष्ठ साहित्यकार डॉ दिनेश पाठक 'शशि' की समीक्षा बहुत कच्ची लगी उन्होंने सभी उपन्यास के सभी पत्रो का चरित्र एव स्थान आदि कक बहुत सुन्दर प्रस्तति किया है उनके द्वारा लिखी गयी समीक्षा पढ़ने के बाद पूरे उपन्यास का चित्र उपस्थिति हो जाता है । इसके लिये मेरी ओर से आपको एव समीक्षक डॉ दिनेश पाठक 'शशि' को हार्दिक सादुवाद मंगल कामनायें सहित आपका :-
    डॉ के उमराव 'विवेक निधि'
    निदेशक कलांजलि मथुरा

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  2. आदर्दीय शर्मा जी , आपकी पत्रिका 'सेतु'में प्रकाशित कहानी लेख व समीक्षा पढ़ी जो काफी प्रशंशनीय है जिस में श्रीमती कमल कपूर के उपन्यास 'अखिरी सांस तक' कि वरिष्ठ साहित्यकार डॉ दिनेश पाठक 'शशि' की समीक्षा बहुत कच्ची लगी उन्होंने सभी उपन्यास के सभी पत्रो का चरित्र एव स्थान आदि कक बहुत सुन्दर प्रस्तति किया है उनके द्वारा लिखी गयी समीक्षा पढ़ने के बाद पूरे उपन्यास का चित्र उपस्थिति हो जाता है । इसके लिये मेरी ओर से आपको एव समीक्षक डॉ दिनेश पाठक 'शशि' को हार्दिक सादुवाद मंगल कामनायें सहित आपका :-
    डॉ के उमराव 'विवेक निधि'
    निदेशक कलांजलि मथुरा

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  3. सुन्दर, सटीक और सार्थक समीक्षा के लिये समीक्षक डॉ0 दिनेश पाठक 'शशि' और पुस्तक 'आखिरी साँस तक' की रचनाकार श्रीमती कमल कपूर को हार्दिक बधाइयाँ.

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