कहानी: कुछ मीठा हो जाये

निशान्त

(निवास लखनऊ; यूट्यूब चैनल: कहानी कैफ़े)


नवम्बर का महीना था और सर्दी का मौसम अपने शबाब पर आने को था। चूँकि शुक्रवार की शाम थी और अगले दिन दफ़्तर नहीं जाना था इसलिए तारा रिलैक्स्ड थी। वैसे वीकेंड वाला मूड घर में पहले ही था। बस अभी-अभी तारा के भाई-भौजाई, और उनके दोनों बच्चे, अपना वीकेंड एन्जॉय करने के इरादे से घर से निकले थे और वो गेट बन्द कर घर के अन्दर आयी थी। अपने कमरे की ओर बढ़ ही रही थी कि मन में ख़याल आया कि एक बढ़िया सी चाय पी जाए।

अब घर में क्योंकि अकेली थी तो चाय तो खुद ही बनानी थी। लेकिन घर में यूँ अकेले रहने में कुछ नया नहीं था इसलिए तारा के क़दम किचन की ओर खुद-ब-खुद बढ़ गए। फिर चाय बनाने के बाद कप को दोनों हथेलियों में दबा कर तारा बालकनी की ओर चल दी। बालकनी पर कदम रखते ही साँसों में सर्दी की शामों वाली वो चितवन के फूलों की महक घुल गयी और चेहरे पर उस एहसास के साथ आयी मुस्कुराहट बिखर गई। एक गहरी साँस लेते हुए उसने चाय का कप बालकनी की मुंडेर पर रख अपनी शॉल जल्दी से शरीर पर ठीक से लपेटी और फिर वापस कप उठा कर बालकनी में रखे झूले पर बैठ गयी।

चाय की चुस्की लेने के लिए दोनों हथेलियों में दबे कप को अपने होंठों के पास लायी तो गर्म चाय से निकलती भाँप को अपनी नाक पर महसूस कर तारा को पूरे शरीर में गर्मी का एहसास हुआ। सर्दियों की शाम चाय की शायद यही भूमिका होती है। चाय को अपना काम करता देख तारा के चेहरे पर अनायास ही फिर एक मुस्कुराहट आ गयी और वह सामने सड़क पर गुज़रते लोगों को देखने लगी। सड़क के उस पार पार्क था।

आज वीकेंड था इसलिए पार्क में कम और सड़क पर ज़्यादा भीड़ थी। शायद परिवार के साथ आउटिंग पर जाने वालों की भीड़। आउटिंग शब्द दिमाग़ में आते ही पचास साल की तारा की मुस्कुराहट कहीं खो गयी। सोचने लगी कि आखिरी बार कब गयी थी किसी आउटिंग पर। शायद कॉलेज के दिनों में... लगभग पच्चीस साल हो गए जब किसी प्रॉपर आउटिंग पर वह आख़िरी बार गयी होगी। खुद से बुदबुदा कर बोली, "बस वह एमएससी के बाद शिखा की शादी से पहले शायद गयी थी... हाँ... बस उसी के बाद तो पापा को हार्टअटैक हुआ था और फिर मम्मी को पैरालिसिस..."

पापा-मम्मी के यूँ अचानक बीमार हो जाने के कारण तारा पर पूरे घर की ज़िम्मेदारी आ गयी थी। भाई दोनों बाहर थे। एक शादी के बाद विदेश में सेटल हो गया था और दूसरा शहर के बाहर कॉलेज में पढ़ाई कर रहा था। बूढ़े और बीमार माँ-बाप के साथ सिर्फ़ तारा थी।
अरविंद भैया ख़बर मिलते ही देश वापस आये और अनिल भी अगले ही दिन आ गया। कुछ दिन तीनों साथ रह कर स्तिथि को संभालने में लगे और हफ्ते भर बाद ही भगवान की कृपा से मम्मी-पापा घर वापस आने की स्तिथि में आ गए। लेकिन डॉक्टर ने घर वापसी की इजाज़त तमाम हिदायतों को मानने की शर्त पर ही दी। दरअसल अरविंद ने अपने कुछ कॉन्टैक्ट्स की मदद से जल्दी डिस्चार्ज करवा लिया था। तारा ने मना भी किया था, लेकिन तब दोनों ही भाई बोले, "अरे घर पर मैनिज करना आसान होगा तुम्हारे लिए।"
भाइयों के मुँह से 'तुम्हारे लिए' सुन उस वक़्त कुछ अटपटा सा लगा ज़रूर, मगर तारा ने उस बात को तरजीह न देना ही ठीक समझा।
ख़ैर, माँ-बाप की तबियत में मामूली सुधार हुआ भी था और उसके चलते तारा को कुछ तसल्ली भी मिली। लेकिन उनके घर आते ही अरविंद को विदेश में अपनी नौकरी और पत्नी की फ़िक्र सताने लगी और इधर अनिल को आने वाले एग्ज़ाम दिखने लगे।
"तारा, मुझे फ़िलहाल वापस जाना होगा। मैं वहाँ पहुँच कर सिचुएशन देखते हुए फिर वापस आऊँगा...दफ़्तर में भी कुछ ठीक से बता नहीं पाया हूँ...और प्रिया भी वहाँ अकेली होगी...," अरविंद ने उस शाम चाय का कप उठाते हुए कहा। और अनिल मानो बड़े भाई की इस बात का इंतज़ार ही कर रहा हो कि उसने बोला, "भैया जाना तो मुझे भी पड़ेगा। फाइनल एग्ज़ाम सिर पर हैं और मम्मी-पापा की बीमारी के चलते इधर पढ़ाई बड़ी डिस्टर्ब हो गयी है...."
तारा, ने एक नज़र दोनों भाइयों को देखा और फिर चाय का कप उठा कर चाय पीने लगी। कुछ पल की ख़ामोशी के बाद बोली, "आप जाइये भैया...मैं मैनिज कर लूंगी।"
तारा का जवाब सुन दोनों ही भाई बेहद ख़ुश हुए। अरविंद ने फौरन उसके कन्धे पर हाथ रख कहा, "अरे हमें पता है तारा तू सब मैनिज कर लेगी। तुम यहाँ हो इसी बात से तसल्ली है मुझे मम्मी-पापा को लेकर।" बड़े भाई की हाँ में हाँ मिलाते हुए अनिल ने भी कहा, "वी ट्रस्ट यु तारा।"
जल्द ही दोनों भाई वापस चले गए और तारा घर बाहर सब अकेले संभालने लगी। शुक्र था कि पड़ोसी बड़े भले लोग थे और शहर में कुछ रिश्तेदार भी थे। तारा ने सब मैनिज कर ही लिया।
और जब तारा सब मैनिज कर ही रही थी तो एक रोज़ अरविंद ने फोन कर मम्मी-पापा के हाल लेते हुए कहा, "तारा तुम सब मैनिज कर ही ले रही....बताओ मेरे आने की ज़रूरत है क्या? यहाँ छुट्टी की बड़ी समस्या है और ख़र्चा तो ख़ैर है ही खूब आने में...अब जैसा बताओ..." भाई की बात सुन तारा को कुछ समझ आया लेकिन नासमझ बनना ही बेहतर मानते हुए बोली, "कोई बात नहीं भैया...मैं मैनिज कर लूंगी। जब कनविनिएंट हो आना।" अनिल भी अपनी कनवीनियेन्स तलाशते हुए एक दिन फोन पर बोला, "कोई अर्जेंसी हो तो बताना...वैसे मैंने तो अब होली पर ही आने की सोची है।"
जवाब में तारा बोली, "जैसा ठीक लगे तुम्हें। अब पापा-मम्मी पहले से काफ़ी बेहतर हैं। कमज़ोर ज़रूर हो गए हैं काफ़ी लेकिन हाथ पकड़ कर थोड़ा बहुत चल लेते हैं।"

मम्मी-पापा की बीमारी ने अचानक तारा के जीवन की दशा और दिशा बदल दी थी। कल तक वह पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद कम्पटीशन की तैयारी में लगी किसी आम लड़की की तरह थी जो साथ कि लड़कियों की शादी में ज़ोर शोर से शिरकत भी करती और शादियों की मस्ती के बाद अपनी पढ़ाई में लग जाती। लेकिन अब सब बदल गया था। जो मम्मी-पापा कल तक एक दम स्वस्थ और इंडिपेंडेंट थे, अब अचानक डिपेंडेंट बन गए थे। और जो भाई कल तक दूर होते हुए  भी इतने क़रीब लगते थे, वे अचानक क़रीब होते हुए भी बहुत दूर से जाते लगे। इस बीच मम्मी-पापा के पास तारा के सिवा कोई नहीं था जिसका हाथ थाम वे ज़िन्दगी गुजारें। दोनों चलते फिरते ज़रूर थे लेकिन शरीर से बेहद कमज़ोर हो गए थे। और शरीर की कमज़ोरी से ज़्यादा दुःखद था उनके हौसलों का कमज़ोर होना। बीमारी के झटके ने दोनों को डरा कर रख दिया था। हर वक़्त अपनी सेहत को लेकर घबराए रहते थे दोनों और किसी बुरे को टालने की उम्मीद में तारा को अपने आस पास ही चाहते थे।

तारा की पढ़ाई लिखाई और दोस्तों का सर्कल सब अस्त-व्यस्त हो गया। धीरे धीरे पढ़ाई तो रुक ही गयी और साथ वाले भी सब शादी कर-करा कर अपने-अपने जीवन में रमने लगे। कोई कुछ समझ भी न पाया और घर को मैनिज करते करते तारा तीस के पार हो गयी और भाई अपनी-अपनी ज़िन्दगी में और रम गए।

अनिल ने अपनी पढ़ाई पूरी कर नौकरी शुरू कर दी थी। एक रोज़ अचानक वीकेंड पर घर आया तो मम्मी-पापा को बताया कि उसने लड़की पसन्द कर ली है और शादी करना चाहता है।  उसकी शादी की बात सुन मम्मी-पापा और तारा सब बेहद ख़ुश हुए। फ़ौरन सब ने हामी भर दी और घर में बेहद खुशनुमा माहौल बन गया। तारा फौरन कुछ मीठा लाने घर से निकली लेकिन कुछ ही पल बाद उसे अनिल की शादी की बात याद कर एहसास हुआ कि वो अब तीस पार हो चुकी है... शादी तो उसकी भी हो जानी चाहिए थी अब तक... लेकिन हुई नहीं।
होती भी भला कैसे? जब वह घर मैनेज कर रही थी, घर वाले उसके मैनेजमेंट को एन्जॉय कर रहे थे। और कौन भला एन्जॉयमेंट में ब्रेक चाहेगा? मध्यम वर्गीय परिवार में अमूमन लड़की की शादी घरवालों की ज़िम्मेदारी होती है। लेकिन तारा ने घर की ज़िम्मेदारी क्या सम्भाल ली, घरवाले शायद अपनी ज़िम्मेदारी भूल चुके थे।

ख़्यालों की दुनिया में खोई तारा बोझिल कदमों से घर की ओर हाथ में मिठाई का डब्बा लिए बढ़ रही थी। घर में कदम रखते ही अपनी मायूसी छिपाने की कोशिश में मम्मी-पापा के कमरे में दाख़िल होने से पहले एक पल को ठिठक कर रुक गयी और अपने चेहरे पर नकली खुशी की लहर लाते हुए बढ़ी। अंदर घुसते ही उसने फ़ौरन डब्बे से बर्फी निकाल अनिल के मुँह में रखी। अनिल ने तपाक से पलट कर एक बर्फी तारा के मुँह में ठूँस दी और हँसते हुए बोला, "मेरी तो हो रही है...तुम्हारा क्या इरादा है शादी का?"

अनिल के मुँह से ये बात सुन तारा ने गले में बर्फी कुछ अटकती सी महसूस करी। लगा मानो भाई ने पल्ला झाड़ लिया हो उससे। आँख में कुछ आँसू छलक आये जिन्हें छिपाने की कोशिश में वह किचन की ओर पानी पीने की बहाने से बढ़ी। वह जा ही रही थी कि मम्मी ने फ़ौरन अनिल को बोला, "अरे अभी तुम्हारी शादी से निपटें तब इसकी देखेंगे। जल्दी नहीं करनी है तारा की शादी में। पूरा घर संभाले है बेचारी यहाँ। यूँ ही कहीं नहीं कर देंगे इसकी शादी।"

मम्मी की ये बात सुन तारा किचन की जगह वाश बेसिन की ओर बढ़ गयी। आँसुओं की उस धार को छिपाने के लिए मुँह धोना ज़रूरी लगा। मम्मी की बात में एक स्वार्थ की गंध मिली थी आज तारा को। ऐसी गंध जो आये दिन अब उसकी आँखों में आंसुओं की धार बनाने का कारण बनती।

लेकिन माँ तो माँ होती है। अगर स्वार्थ की गंध उनके शब्दों में मिली थी तो प्यार और दुआओं की महक भी उन्हीं के शब्दों में तारा को मिलती। दरअसल मम्मी और पापा के इरादे ग़लत नहीं थे। हालात शायद गलत थे।
दोनों इतने आदी हो चुके थे तारा की सेवा के कि सोच भी नहीं सकते थे कि अगर तारा कहीं चली गयी तो उनका ख़याल कौन रखेगा। मम्मी पापा को एक गिलास पानी भी अगर चाहिए हो तो तारा की कोशिश यही रहती थी कि वह फौरन उठा कर ले आये उनके लिए।

तो कुल मिलाकर हालात ऐसे थे कि बुढ़ापे के उस दौर में मम्मी-पापा के पास तारा के सिवा कोई नहीं था। बेटे पहले ही घर से दूर, या ये कहा जाए कि ज़िम्मेदारियों से दूर, हो चुके थे और बूढ़े माँ-बाप अपने शरीर और इच्छा शक्ति से भी इतने सक्षम नहीं थे कि बेटी की शादी कर अकेले रह पाते। ऐसा नहीं था कि अरविंद और अनिल बेहद कमज़र्फ थे। लेकिन जब उनके अन्दर का ज़िम्मेदार बेटा जागता, तब "अरे तारा है न..." वाला आलस उन्हें फिर सुला देता। तो जब उनके अन्दर का बेटा ही आलस करता, तब उनके अन्दर के भाई के जागने की उम्मीद करना निरर्थक ही था। इस बात का एहसास तारा को भी था। लेकिन ज़िम्मेदारियाँ निभाते-निभाते वह इतनी मज़बूत सी हो चुकी थी कि उसे स्वार्थ वाली गन्ध और रिश्तों वाला आलस अखरता नहीं था।

इस बीच ऐसा नहीं था कि उसके अन्दर की लड़की कहीं मर चुकी थी या ढल चुकी थी। एक दिन नहाने के बाद कपड़े चेंज कर आईने के सामने अपने बाल बनाते-बनाते खुद को निहारने लगी। मन ही मन मुस्कुरा कर खुद से बोली, "उम्र तीस के पार भले ही हो गयी हो, लगती अब भी मैं पच्चीस की हूँ..." ऐसे ही कुछ सवाल मन ही मन आईने में देखते अपने बाल संवारते करती जा रही थी कि तभी दरवाज़े पर कोई आहट हुई। मुड़ कर देखा तो पड़ोस वाले वर्मा जी का बेटा रवि हाथ में बीपी मशीन लिए ड्राइंग रूम में खड़ा था। एक दिन पहले ही तारा ने उससे मशीन मंगवाई थी और वो पड़ोसी धर्म निभाते हुए ले आया था।

बहरहाल, अपनी उस ख़्यालों की दुनिया से तारा निकल पाती की उससे पहले ही उसके होंठों पर एक दिलकश मुस्कान बिखर गई और होंठों पर अनायास ही "लगती हूँ न पच्चीस की?"
तारा बस नहा कर बाहर आई ही थी और उसके बाल अभी सूखे भी नहीं थे। सलवार कुर्ता पहने थी लेकिन दुपट्टा नहीं लिए थी। और इस सब के साथ तारा का वह चौंकाने वाला सवाल रवि की नज़रों को मजबूर कर गया कि वह तारा के शरीर को उसके पूरे शबाब पर देखे। रवि उम्र में तारा से पाँच-छह साल छोटा था। लेकिन न दीदी कहने वाली किसी औपचारिकता में था, न तारा कहने वाले किसी दोस्ताना रिश्ते में। पड़ोसी होने के नाते कभी-कभार अपने पेरेंट्स की वजह से मदद कर देता था।

उधर तारा भी कभी रवि में कोई संभावनाएँ नहीं देख पाई। इरादा भी कभी नहीं था उसका। मगर उस दिन न जाने क्या हुआ कि वह ग़फ़लत में रवि से अपने मन में उठ रहे सवाल को पूछ बैठी। वैसे रवि की जगह वहाँ कोई भी हो सकता था। यह सब बस अनायास ही हो गया। बहरहाल, गले में थूक निगलते हुए रवि ने भी न जाने क्या सोच उसे ऊपर से नीचे निहारते हुए मुस्कुरा कर बोल दिया, "हमें उम्र से क्या लेना देना।"

ये सुनते ही मानो तारा की नींद टूटी हो। उसने फ़ौरन लपक कर बिस्तर पर पड़ा अपना दुपट्टा उठाया और अपने अन्दर की जीवित लड़की के जिस्म और रूह को फ़ौरन ढाँक-लपेट लिया। साथ ही जैसे ही एहसास हुआ कि पिछले कुछ पलों में क्या हुआ, उसके आँसू छलक आये। कुछ समझ न आया तो रवि की ओर एक हाथ बढ़ा कर मशीन देने का इशारा किया और फिर मशीन लेते ही दूसरे हाथ से आँसू पोंछते हुए मम्मी-पापा के कमरे में चली गयी।
रवि पहले से ही हैरान था तारा के रवैय्ये से। उसे अब यूँ रोता देख वह घबरा गया और जब कुछ समझ नहीं आया तो फ़ौरन घर से बाहर चला गया।

कुछ देर बाद तारा अपने कमरे में वापस आयी और फिर से आईने में अपने आप को देखने लगी।लेकिन इस बार उसे कोई आकर्षक सी लड़की नहीं दिखी। इस बार उसे दिखी एक अधेड़ होती औरत जिसकी आँखें रो-रो कर सूज चुकी थीं और बालों में सफेदी चाँदी के तार बन उम्र साफ़ छलक रही थी।चेहरे की सारी रँगत, चमक, और चिकनाई जा चुकी थी। चेहरे पर कुछ रूखी झाइयाँ थी, कुछ दानों के दाग़ थे। होंठों के ऊपर और ठोढ़ी पर कुछ बाल उग आये थे। आँखों के नीचे कुछ झुर्रियाँ सी थीं जिनका रँग अब काला होता जा रहा था। फिर कुछ सोच तारा ने अपना दुपट्टा हटा कर बगल में कुर्सी पर डाल दिया। शरीर पर नज़र डाली तो एहसास हुआ कि अब सलवार सूट जहाँ ढीला होना चाहिए था वहाँ टाइट है और जहाँ टाइट होना चाहिए वहाँ लूज़ है। इस एहसास के साथ ही तारा की आँखें भर आयीं और आईने में छवि धुंधली होने लगी।

मुड़ कर तारा ने वापस अपना दुपट्टा उठाया और पहले उसे ओढ़ा और फिर उसके किनारे से अपनी आँखें पोंछीं। फिर कुछ न समझ आया तो बिस्तर पर औंधे मुँह ढेर हो गयी। आँसू बह रहे थे और इस बार तारा ने उन्हें पोछा नहीं। बहने दिया। तकिया तारा के आँसू सोखता रहा। तारा का दिल कर रहा था कि वह चीख-चीख कर दहाड़ें मार कर रोये और पूरी दुनिया को दिखाए कि सब के लिए जीते-जीते क्या हाल हो गया है उसका और वह कहाँ से कहाँ आ चुकी है। तारा का दिल कर रहा था कि कोई तो आये और उसे सीने से कस  चिपटा ले और सर सहलाये। लेकिन कोई नहीं था वहाँ। अगर कोई था तो वे बूढ़े माँ-बाप जो दूसरे कमरे में लेटे टीवी देख रहे थे।
तारा के आँसू कुछ थमे ही थे कि मम्मी ने आवाज़ लगायी, "अरे तारा कहाँ हो...? आज बेटा खाना बनाओगी कि नहीं? दोपहर होने को आयी है..."

मम्मी की आवाज़ सुन तारा पहले तो फौरन उठ बैठी लेकिन फिर उसने झुंझुला कर मुट्ठी बाँध ली। फिर न जाने क्या सोच मम्मी-पापा के कमरे में जा कर उनके सामने खड़ी हो गयी। दोनों ने तारा की उस बदहवास रोती सूरत देख अंदाज़ लगा लिया की कुछ गड़बड़ है। इसलिए सिर्फ इतना बोल पाए, "क्या हुआ?"

जवाब में तारा ने कहा, "मैं अब जॉब करूंगी। घर पर बैठे-बैठे मैं पक गयी  हूँ। मेरा दिमाग़ फटता है, मैं पगला जाउंगी अगर यूँ ही घर में पड़ी रही।" इससे पहले की कोई कुछ कहता तारा पलट कर कमरे से निकलने लगी। उसे रोकते हुए पापा बोले, "ठीक है जाओ... लेकिन बेटा हम दोनों की तमाम... " इससे पहले की पापा अपनी बात पूरी करते, तारा फुँफकारती हुई बोली, "आप दोनों की तमाम ज़रूरतें कोई कामवाली बाई भी पूरी कर सकती है... फ़िक्र न करिये... आपको अधर में नहीं छोडूंगी।"

तारा ने तय तो कर लिया कि अब दफ़्तर जाएगी लेकिन आज के समय में नौकरी मिलना इतना आसान नहीं होता कि अभी सोचा और कल से दफ़्तर जॉइन कर लिया। सालों बाद नौकरी और करियर की सोचने बैठी तो तारा को एहसास हुआ कि वह स्किल्स के नाम पर काफ़ी पिछड़ चुकी है। साथ ही जिस उम्र में वो किसी दफ़्तर के मिडल मैनिजमेंट में हो सकती थी, उस उम्र में वो नौकरी की शुरुआत करेगी। महीने-दो महीने के मंथन के बाद नौकरी पाने की छटपटाहट भी होने लगी थी, तारा ने तय कर लिया की नौकरी तो अब करनी ही है। कुछ पुराने दोस्तों से बात की, नए विकल्प तलाशे और जल्द ही तारा को एक एच आर फर्म में कंसल्टेंट की नौकरी मिल गयी।
सरल शब्दों में उसका काम नौकरी की तलाश करते लोगों के डेटाबेस को मैनिज करना, उनके लिए सही नौकरियाँ तलाशना और उनके इंटरव्यू फिक्स करना था। कुल मिलाकर एक दम नया काम था और तारा को दिन भर व्यस्त भी रखता था। अच्छी बात ये थी कि तारा काम एन्जॉय कर रही थी इसलिए व्यस्त होने के बावजूद वह त्रस्त नहीं थी। तारा मस्त थी।

दफ़्तर में रोज़ नए लोग मिलते, नए चेहरे दिखते, और तमाम लोगों से बात होती। मतलब तारा वह सब अनुभव कर रही थी जो वह अपने मम्मी-पापा के कमरे और घर के किचन में नहीं कर पा रही थी। लेकिन ऐसा नहीं था कि तारा की घर वाली ज़िम्मेदारी कम हो गयी हो। सुबह सबका नाश्ता-खाना बना के जाती और शाम को वापस आ कर खाना बनाती। बल्कि शाम की चाय भी। शाम को घर आती तो मम्मी या पापा अमूमन रोज़ ही अपने कमरे से ही आवाज़ लगाते, "बेटा तारा, आओ जल्दी से मुँह हाथ धो कर आओ फिर साथ चाय पी जाये। और पापा की चाय में चीनी कम डालना।"
वैसे कभी-कभी उसे चाय मिल भी जाती थी। मम्मी का अगर दिल होता जल्दी चाय पीने का तो वह अपने लिए बनातीं और साथ में एक कप एक्स्ट्रा तारा के लिए बना कर थर्मस में रख देतीं।

ऐसे ही रोज़ तारा थक कर घर आयी और मम्मी के कमरे में कुर्सी पर निढाल बैठ गयी। मम्मी ने रिमोट से चैनल बदलते हुए कहा, "क्या हुआ तारा काफी थक गयी हो क्या? थर्मस में चाय होगी, पी लो."
तारा खीजते हुए लेकिन बड़ी उम्मीद से बोली, "मम्मी, ताज़ी चाय पिला पायें तो बताइये। बहुत थक गयी हूँ और सर अलग दर्द कर रहा है।" जवाब में मम्मी टीवी देखते हुए बोलीं, "अरे बेटा मेरे पैरों में आज बड़ा दर्द है वरना बना देती। तुम ऐसा करो, जा कर गर्म पानी से नहा लो...मैंने अपनी सिकाई के लिए  पानी गर्म किया था...गीज़र में होगा अभी गर्म पानी...तुम नहा लो तो हल्का महसूस करोगी।"

मम्मी की बात पर कैसे रिएक्ट करें ये सोचते हुए तारा झल्लाते हुए बोली, "थैंक्स फॉर द सजेशन मम्मी।" फिर कुछ देर छत ताकते हुए बोली, "मम्मी, अरोड़ा आंटी से बोल कर एक हेल्पिंग हैंड तलाशिये। मेरे लिए घर और ऑफिस सब एक साथ मैनिज करना आसान नहीं।" ये सुन तारा के मम्मी-पापा फ़ौरन टीवी स्क्रीन से मुँह फेर उसे देखने लगे और इससे पहले कि वे कुछ कहते, तारा वहाँ से उठ कर किचन की ओर बढ़ चली।
तीन-चार दिन बाद ही एक फुल टाइम अटेंडेंट, माला, मिल गयी और जल्द ही उसने घर संभाल लिया।
अटेंडेंट ने घर तो संभाल लिया, लेकिन तारा को अन्दर-ही-अन्दर लगा कि कहीं वह अपनी ज़िम्मेदारी से भाग तो नहीं रही? अपनी ज़िम्मेदारियों में उसने खुद भी काफ़ी कमी महसूस की। मम्मी-पापा उसके इस फ़ैसले और घर की नयी व्यवस्था से शायद नाराज़ होंगे, यह सोचकर उसने तय किया कि वह  उनके साथ ज़्यादा समय बिताएगी।

लेकिन तारा कुछ गलत सोच रही थी। उसके पेरेंट्स दरअसल बेहद खुश थे इस नयी व्यवस्था से। घर में हर वक़्त बस 'माला' के नाम की ही आवाज़ सुनाई देती। और माला भी दौड़-दौड़ कर सब काम करती। शुरू में तो तारा को समझ नहीं आया की कैसे रिएक्ट करे, लेकिन जल्द ही उसे ये सब अच्छा नहीं लगा। पहली बार अपने माँ-बाप को खुश देख उसे दुःख हुआ। उसे एहसास हुआ कि उसके माँ-बाप को बेटी नहीं एक अटेंडेंट की ज़्यादा ज़रुरत थी। जिसे वह माँ-बाप के लिए अपनी ज़िम्मेदारी समझ रही थी वह ज़िम्मेदारी कम एक अनपेड नौकरी अधिक थी। जिस ज़िम्मेदारी और सेवा भाव को वह सालों से अपने तमाम अरमानों की क़ुर्बानी की वजह मान बैठी थी, वह तो दरअसल एक धोखा और रिश्तों की ख़ुदगर्ज़ी निकली।

इन अनुभूति के साथ ही उस दिन तारा ने अपने अन्दर कुछ मरता हुआ सा महसूस किया। और जब अन्दर की उस मौत का एहसास हुआ तो आँखों से आँसुओं का सैलाब बह निकला। लेकिन तारा के हालात देखने और समझने की किसी के पास न तो वजह थी न फ़ुरसत। मम्मी पापा के पास अब अपनी तीमारदारी के लिए माला थी और भाईयों के पास अपनी-अपनी दुनिया। तारा की दुनिया भी बसाई जानी चाहिए इस बात की किसी को ज़रूरत नहीं महसूस हुई। जब तारा सबकी दुनिया सँवार रही थी, उसकी खुद की दुनिया बिगड़ रही थी और किसी को उसकी फ़िक़्र नहीं थी।

खैर, तारा के दिमाग़ में हालात की ऐसी आँधी चली की रिश्तों के तमाम चेहरे और पहलू दिखाई देने लगे। और उन नज़ारों का ऐसा असर हुआ कि तारा को तमाम कड़वे घूँट पीने पड़े। उन कड़वे घूँटों का असर यह हुआ कि तारा को एक मीठी बीमारी हो गयी। स्ट्रेस और डिप्रेशन के चलते तारा डायबिटीज की मरीज़ बन गयी। अपने पर ध्यान दे नहीं पाती थी इसलिए मरीज़ भी ऐसी बनी कि जल्द ही इन्सुलिन के इंजेक्शन रोज़ लेने लगी।

इस सब के बीच एक ख़ासा अरसा बीत गया। और उस अरसे में साल भर के भीतर मम्मी और पापा दोनों चल बसे। पहले पापा गए फिर मम्मी। भाइयों के भी चेहरे अब साफ दिखने लगे थे। पापा की मौत के बाद दोनों आये लेकिन मम्मी की मौत पर बड़े भाई अरविंद ने परदेस से तारा को फोन कर कहा, "काश मैं वहाँ पहुँच पाता। लेकिन इतनी जल्दी-जल्दी आना आसान नहीं। आठ महीने पहले ही पापा की डेथ पर आया था...अब मम्मी की। तारा मैं मम्मी की बरसी पर आने की कोशिश करूंगा। प्लीज़ मुझे डेट बताना।" और अनिल, जो अब तक पास के शहर में अपनी नौकरी में इतना व्यस्त रहता था कि मम्मी-पापा से मिलने तक सिर्फ त्योहारों में आता, उस रोज़ मम्मी की तेहरवीं में अपने किसी दोस्त से कह रहा था, "यहीं ट्रान्सफर करा लिया है। अब अपने शहर से ही रिटायर करूंगा। अरविन्द भैया को तो यहाँ आना नहीं है। अकेले तारा कहाँ इतना बड़ा घर मैनेज कर पायेगी..."
जब अनिल ये सब कह रहा था, तारा वहीं पीछे खड़ी थी। भाई की बात सुन तारा को वह दिन याद आया जब पापा को चेकअप के लिए अस्पताल ले जाना था और उसने अनिल को फोन कर कहा था, "भैया सैटरडे को दिन भर के लिए आ जाओ। पापा को चेकअप के लिए ले जाना है। मेरी भी छुट्टी है लेकिन उस दिन बैंक का एक ज़रूरी काम है।" जवाब में अनिल ने कुछ मायूसी से कहा, "अरे यार मैंने कुछ प्लान बनाया हुआ था। कोई सीरियस मैटर हो तो बताओ प्लान कैंसिल करूँ... वैसे तुम इतने अच्छे से सब करती हो कि पापा-मम्मी को ले कर मैं बड़ा बेफ़िक्र रहता हूँ...देख लो...मैनेज कर लो।" तारा ने उस रोज़ सिर्फ "ठीक है" कह कर फ़ोन काट दिया था और हमेशा की तरह खुद को कोसा की जवाब मालूम होते हुए भी मदद माँगी ही क्यों भाई से।

ख़ैर, मम्मी की तेहरवीं वाले दिन भी अनिल की बात तारा को अखर गयी लेकिन इस बार बुरा ये लगा कि उसका भाई वाक़ई कितना बेफ़िक्र है रिश्तों के लिए और  कितना फ़िक्रमंद है उस 'बड़े घर' के लिए। कुछ समय बाद अनिल सपरिवार शिफ़्ट हो गया उस 'बड़े घर' में। तारा को अच्छा तो लगा लेकिन जल्द ही एहसास हो गया कि वो भाई-भाभी और उनके बच्चों के लिए एक क़रीबी पड़ोसी से ज़्यादा कुछ नहीं है। हालांकि तारा को बड़ी उम्मीद जगी थी कि घर में अब रौनक़ रहेगी और वह उन सबकी दुनिया का हिस्सा बनेगी। लेकिन अनिल की दुनिया एकदम अलग सी थी जिसमें तारा होते हुए भी नहीं थी। अनिल की दुनिया में तारा थी इसलिए क्योंकि वह डिपेंडेंट नहीं थी और नहीं इसलिए थी क्योंकि वो अनिल की एक ज़िम्मेेदारी सी थी।

बड़े भाई के साथ होने से तारा अन्दर ही अन्दर सोचती की इतने साल तो ख़याल रखा मम्मी पापा का, अब चलो कोई ख़याल रखने वाला साथ है। मगर अनिल अपनी अधेड़ होती बिनब्याही बहन से एक सेफ डिस्टेंस बना कर रखता। तारा की ज़िंदगी में ज़रा भी छेड़छाड़ उसने करने की नहीं सोची, क्योंकि अगर वैसा कुछ करता तो तारा की ज़िम्मेदारी उठाने का नैतिक और सामाजिक दबाव बनता।
एक बार किसी रिश्तेदार के घर जब अनिल पहुँचा तो उन्होंने पूछा, "अरे तारा को भी साथ ले आते... बड़े दिनों से आई नहीं..." तो जवाब में अनिल ने झेंपते हुए कहा, "अरे अब उसकी अलग लाइफ़ है... मैं डिस्टर्ब नहीं करता। बेचारी वैसे ही बड़ी बिज़ी रहती है। मैं अपने चक्कर में उसकी पीस ऑफ माइन्ड नहीं अफेक्ट करता।" अब रिश्तेदार को कौन बताए कि तारा ने तो अब साथ चलने की बात करना ही बन्द कर दिया था क्योंकि कभी "कार में जगह" नहीं होती, कभी "और भी काम हैं रास्ते में", कभी "अपने किसी फ्रेंड के घर भी जाना है तुम बोर हो जाओगी" जैसे जवाब सुनने को मिलते।

मगर तारा ने अपनी ख्वाहिशें मारने के साथ अनिल के परिवार के लिए अपनी प्रायोरिटीज़ तक बदल लीं थीं। अनिल के बड़े होते बच्चों की हंसती खेलती दुनिया को तारा ने अपने अकेलेपन की दवा मान लिया। उन पर अपनी जान न्यौछावर करती और भाई के बच्चों की हर इच्छा पूरी करने में लगी रहती। काश, भाई भी बहन की तमाम इच्छाएँ पूरी करने की कभी सोचता। लेकिन अनिल को भी तारा एक केयरटेकर की भूमिका में बेहतर लगती। उसकी शादी हो जाती तो भला घर में कौन रहता जब अनिल को सपरिवार आउटिंग पर जाना होता? और इस सब के बीच न अनिल और अरविन्द ने सोचा और न तारा को सोचने की ज़रूरत लगी कि तारा तो उस घर की बेटी से उस घर के बच्चों की बस बुआ बन गयी है। तारा इस सबको अपनी नियति मानने लगी थी। इस बात से संतोष कर लिया था कि भगवान ने जीवन में शादी का सुख नहीं दिया अब तक तो भतीजे भतीजियों के रूप में बच्चों का ही सुख दे दिया। वह उस सब में जीवन की सम्पूर्णता का एहसास करने लगी थी।

बहरहाल, चाय ख़त्म हुई ही थी कि गेट पर बेल बजी और तारा ख़्यालों के दौर से बाहर आयी। सामने नज़र दौड़ाई तो तारा को एहसास हुआ कि अंधेरा ढल चुका है। बालकनी से नीचे झाँका तो देखा नीचे अनिल की पत्नी और बच्चे हाथ में तमाम पैकिट लिए खड़े हैं और अनिल कार में बैठा बेसब्री से गेट खुलने का इंतज़ार कर रहा है। तारा को देखते ही अनिल की बेटी ज़ोर से बोली, "बुआ जल्दी गेट खोलिये आपको अपनी ड्रेस दिखाऊँ..."
ये सुन तारा ने फौरन उसे हाथ से इशारा करते हुए गेट का रुख किया। दरअसल अनिल के बेटे की जल्द ही इंगेजमेंट थी और पूरा परिवार उसी की शॉपिंग के लिए गया था।

तारा को देखते ही भतीजी फौरन उसका हाथ पकड़ ड्राइंग रूम में ले आयी और कपड़े दिखाने लगी। फिर अनिल और पूरा परिवार भी वहीं बैठ कर खरीदारी पर चर्चा करने लगा और तारा उठ कर किचन की ओर चल दी। फौरन खाना लगाया और जल्द ही सबने खाना खाया। डिनर के बाद अनिल ने तारा से कहा, "अरे तारा वह खोए वाली मिठाई बची हो तो प्लीज़ ज़रा दो सबको। कुछ मीठा हो जाये।" तारा तपाक से उठ कर फ्रिज की ओर बढ़ी।

सबको मिठाई देने के बाद तारा को एहसास हुआ कि उसके इन्सुलिन इंजेक्शन का समय हो गया है। इन्सुलिन इंजेक्शन में कोई कोताही बरतना जानलेवा होता है। इसलिए तारा मिठाई की प्लेट लिए सीधे पहले अपने कमरे में चली आयी। सोचा पहले इंजेक्शन ले लिया जाए फिर मिठाई फ्रिज में रख देगी। बाहर अभी सब डिनर के बाद वाला हँसी मज़ाक कर रहे थे।

इधर अपने कमरे में साइड टेबल पर मिठाई रख तारा ने सिरिंज उठाई और इंजेक्शन तैयार करने लगी।
इसी बीच बाहर की बातचीत पर तारा का ध्यान गया। अनिल की बेटी कह रही थी, "पापा, बुआ की शादी में मैं इससे हेवी वाला लहँगा लूंगी।" उसकी बात सुन अनिल ने हँसते हुए कहा, "अरे पागल, अब बुआ तुम लोगों की शादी की मिठाई खाएँगी कि भला खुद शादी करेंगी।" ये सुन अनिल का बेटा हँसते हुए बोला, "अरे मगर बुआ तो डायबेटिक हैं। न अपनी शादी का लड्डू खा पाएंगी न मेरी।" ये सब सुन सभी हँसने लगे।

अपने कमरे में बेड के कोने पर बैठी तारा की आँखें ये सुन डबडबा गयीं। फिर आँसू धार बन बहने लगे और अपनी लाचारी के एहसास से उसने अपनी मुट्ठी में इंजेक्शन भींच लिया। टेबल पर रखी मिठाई देखते हुए फिर खुद से बुदबुदाते हुए बोली, "सही तो कह रहे हैं सब। न मेरी शादी होगी न मैं बच्चों की शादी की मिठाई खा पाऊंगी।"

कुछ सोच तारा न जाने क्यों मुस्कुराई। अपने आँसू पोंछे और इन्सुलिन के इंजेक्शन को बगल में रख दिया। फिर सामने रखी मिठाई मुँह में रखते  हुए बुदबुदाई "कुछ मीठा हो जाये"। मिठाई खा कर तारा चुपचाप बिस्तर पर लेट गयी।

उस घर से तारा की डोली भले न निकली हो, अर्थी ज़रूर अगले दिन निकली।

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