व्यंग्य: परेड का आँखों देखा हाल

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

राजपथ जैसा राजमार्ग दुनिया में कहीं नहीं है। गणतंत्र दिवस के दिन तो यह मार्ग स्वर्ग की अप्सराओं और इंद्र को भी मात देता है। सारा देश सलामी दे रहा होता है। यहाँ देश की सुंदरता और साहस की झाँकियाँ निकलती हैं जो अभूतपूर्व सुख देती हैं। सड़क के इस ओर हम हैं, उस ओर प्रधानमंत्री तथा विदेशी मेहमान हैं। भारत से विदेश भागने की योजना बना रहे वीवीआयपी भी उधर ही हैं। झाँकी कलाकार जो हमारी तरफ हैं हाथ हिला रहे हैं, जो उनकी तरफ हैं उन्हें साष्टांग नमन कर रहे हैं। हमारी तरफ खड़े प्रेस वाले सरकार का कच्चा चिट्ठा खोल रहे हैं, उन्हें कुछ खोने का डर नहीं है, उन्हें सरकारी विज्ञापन नहीं मिलते। उस ओर खड़ा मीडिया हमारे समय की महानतम सरकार की यशोगाथा बखान रहा है। सड़क के इस ओर प्रजा है, उस ओर तंत्र है। जो सड़क के किसी ओर नहीं हैं और झाँकियों के पीछे भाग रहे हैं, वे अभी भी अपना मूल्य तलाश रहे हैं। उन्हें नहीं पता भागने से मूल्य नहीं मिलता, सरकारी खूंटे से जबरदस्ती जा कर बंध जाने से मूल्य मिलता है। 

मैं असंतोषी जीव रह गया हूँ, जितना संतोष मिलता है खा-पी जाता हूँ और फिर सच बोलने लगता हूँ। हरे-भरे लोगों को सब हरा-भरा दिखता है, मेरे पास चश्मा नहीं है इसलिए सब सूखा-सूखा दिखता है। मेरे तरफ से राजपथ की झाँकियाँ कैसी दिखाई दे रही हैं, उसका आँखों देखा हाल आपको सुना रहा हूँ।
पहली झाँकी अर्ध नग्न जनजातियों की है। आदिम काल में सारी भूमि इनकी थी, इनके कबीले थे। जैसे-जैसे हम सभ्य होते गए, इनकी भूमि और धन हड़पते गए। हमारी शिक्षा पद्धति हमें शोषक बनना सिखाती रही। हमने इनको बेदखल कर दिया और हथियाए माल को अपना बना लिया। आज ये अपनी झाँकी में अपनी परंपरा, नृत्य, संगीत आदि दिखा रहे हैं। आइए हम इनके लिए तालियाँ बजाएँ, हमारे पुरखों ने इनके पुरखों को लूटा और इन्हें हमारे मनोरंजन का साधन बना दिया।

दूसरी झाँकी किसानों की है। एक ट्रॉली पर बंजर भूमि को किसान हल-बक्खर से जोत रहे हैं, इससे जुड़ी ट्रॉली पर फसल लहलहा रही है जिसके चारों ओर सबका साथ, सबका विकास के बोर्ड मुख्यमंत्री के आदमकद फोटो के साथ लगे हैं। किसानों की ऐसी माली हालत देख कर लोग खुश हैं। हम सब जानते हैं, ये भाड़े के किसान हैं, आयोजक इन्हें मुस्कुराने और झंडा फहराने के लिए प्रथम श्रेणी के टीवी कलाकारों को देय फीस अदा कर रहे हैं। पास में खड़ा खबरखोजी टीवी वाला गला फाड़-फाड़ कर चिल्ला रहा है, देखिए विकास के पट्ट के नीचे लाश पड़ी है, किसी किसान ने फिर आत्महत्या की है।

अगली झाँकी बिहार के लोकनर्तकों की है। गुजराती उन्हें डाँडियों से पीट रहे हैं। पार्श्व में खड़ी ठसाठस भरी ट्रेन काँप रही है। गोधरा स्टेशन पर हर ट्रेन थरथराने लगती है। गमछा लटकाए बिहारी लोकनर्तक जान हथेली पर ले कर इधर-उधर भाग रहे हैं, डिब्बे की छत पर चढ़ रहे हैं। उनके हाथ में सामान है, सिर पर सामान लदा है, काँख में बच्चा है। ट्रेन में लटकने की जगह नहीं है। उनके चेहरे से भय टपक रहा है, वे लोग अपने देश लौटना चाहते हैं। हमारी तरफ के लोग स्तब्ध हैं, सड़क के उस पार से सीटियाँ बज रही हैं, तालियाँ बज रही हैं, वे इस शानदार नृत्य का मज़ा ले रहे हैं और बिहारी अपने देश खोज रहे हैं।

अगली झाँकी जम्मू-कश्मीर के युवाओं की है। पार्श्व में डल झील है, शिकारे हैं, सुदूर पार्श्व में शालीमार के गुलाबी बाग हैं। एक ओर बन्दूकें ताने बख्तर बंद फौज खड़ी है। काली बंदर टोपियों में छुपे कुछ युवक उन पर पत्थर बरसा रहे हैं। फौज पानी के फव्वारे छोड़ रही है पर सड़कों पर खून बह रहा है। लोग कह रहे हैं, अदृश्य पड़ोसी पीठ में छुरा भौंक रहा है।

अगली झाँकी वायु सेना की है। इस शानदार झाँकी में पार्श्व में राफेल लड़ाकू विमान खड़ा है। एक बेचने वाला है, एक खरीदने वाला है, बीच में बिचौलिया है। विक्रेता छः सौ करोड़ में एक खिलौना बेच रहा है, खरीदने वाला सोलह सौ करोड़ में खरीद रहा है। बिचौलिया एक खिलौना दिलाने के एक हज़ार करोड़ जेब में रख रहा है। छत्तीस खिलौनों की डील हो गयी है। सेना खुश है, उसे दस सालों के इंतज़ार के बाद खिलौने मिल रहे हैं। जनता खुश है कि देश ताकतवर बन रहा है। सरकार खुश है कि वह पार्टी कोष को मजबूत बना रही है। नामुराद विपक्षी नेता नाखुश हैं, इतने बड़े घोटाले में खुश होने की उन्हें कोई भूमिका नहीं मिली है।

यह थल सेना की झाँकी है। मुस्तैद युवा सैनिक शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं। उनके पीछे तीस साल पुरानी बूढ़ी तोप चल रही है, इसका नाम है बोफोर्स। यह ऐतिहासिक तोप है, इसके बाद सेना ने तोपें लेना ही बंद कर दिया है। दलाली दलाल खाएँ और गालियाँ सेना सुनें! बोफोर्स ने दलाली के मानदंड स्थापित कर दिए हैं, इतना माल हो तो बिचौलिए हाथ डालें।

अगली झाँकी रिज़र्व बैंक की है। बैंक नए-नए नोट छापे जा रही है और अर्थतंत्र की विशाल पाइप लाइन में डाले जा रही है। लोगों ने पाइपलाइन को कई जगह से तोड़ रखा है, वहाँ से ट्रॉलियाँ भर-भर कर वे स्वच्छ धन को अपने कोठारों में जमा कर रहे हैं। पाइपलाइन के अंतिम छोर पर जनता की विशाल लाइन लगी है, वहाँ थोड़ा-थोड़ा धन टपक रहा है।

यह गाँव के जन-स्वास्थ्य विभाग की झाँकी है। पार्श्व में शानदार सरकारी अस्पताल के अहाते में कर्मचारीगण धूप सेंक रहे हैं और गप्पें मार रहे हैं। डॉक्टरों के सरकारी आवासों के सामने मरीज़ों और उनके परिजनों की भीड़ लगी है। डॉक्टर द्रुतगति से घर आए मरीज़ों को निबटा रहे हैं। उनकी डस्टबिन नोटों से भर रही है। लोग कह रहे हैं, डॉक्टर साहब, आपका दिमाग घर पर ही रखा है, फीस ले लो पर घर पर ही देख लो। वे उन्हें अस्पताल जाने ही नहीं दे रहे।

अगली झाँकी भी गाँव से है। गाँव के स्कूल का दृश्य है, यहाँ सरकार दोपहर का भोजन देती है। दस-पंद्रह लड़के आये हैं पर उपस्थिति पत्रक पर पूरे दौ सौ लड़के भोजन खाते हैं। जनतंत्र का प्राथमिक वोट बैंक इसी कमाई से बनता है। बच्चे बिना परीक्षा दिए साल-दर-साल पास हो जाते हैं। बुनियादी शाला से निकल कर कस्बे की स्कूल में पढ़ने ये ही दस-पंद्रह लड़के जाते हैं। शेष बच्चे देश की दौलत बन जाते हैं। वित्त मंत्री इन्हें एनपीए कहते हैं, नॉन प्रॉडक्टिव असेट। कागजों पर साक्षरता उम्दा है, पर ग्रामीण बैंकों में बड़ी आबादी अँगूठे लगा रही है।

यह झाँकी बीएसएफ की महिला सैनिकों की है। यह भवानी टीम मोटरसाइकलों पर हैरत अंगेज़ करतब दिखा रही है। दर्शक दंग है, अब सारा देश मीटू से बाहर निकल आया है। राजनेता माँग कर रहे हैं कि ऐसी सशक्त बॉर्डर सिक्युरिटी फोर्स को दिल्ली में तैनात कर देना चाहिए ताकि यहाँ आम लोग सुरक्षित महसूस करें। झाँकियाँ और भी हैं, सलामी लेने वाले थकने लगे हैं, वे खड़े-खड़े सो नहीं सकते, उनके लिए आराम कुर्सियाँ लगाई जा रही हैं। मेरी तरफ अचार-पराठों की जानलेवा गंध फैल रही है। भूख लगी हो तो झाँकियों का संदेश किसको समझना है। बाकी झाँकियों को भूख खा गयी है। जय
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