कमलन के रवि एक... रैदास जयंती, 19 फ़रवरी 2019 विशेष

मुरलीधर वैष्णव

मुरलीधर वैष्णव

पूर्व न्यायाधीश व वरिष्ठ साहित्यकार
चलभाष: +91 946 077 6100
'गोकुल' ए-77, रामेश्वर नगर, बासनी प्रथम, जोधपुर-342005 

सहज संत-शिरोमणि रैदास (रविदास) केवल उनकी जयंती (माघ पूर्णिमा) पर याद किए जाने वाले संत मात्र नहीं है। जैसे सूर्योदय पर रवि की ऊष्मा और प्रकाश से करोड़ों कमल खिल उठते हैं, ठीक वैसे ही रैदास जैसे संत-रवि, अपने ज्ञान-प्रकाश और आध्यात्म की ऊष्मा से करोड़ों लोगों को प्रेरित-पल्लवित करते हैं। उनके लिए कहा गया है ‘रवि के कमलन कोटि हैं, कमलन के रवि एक...‘। इसीलिए संत रैदास चिर-स्मरणीय हैं।

आम लोग चमत्कारों से अधिक प्रभावित होते हैं और चमत्कार दर्शाने वाले व्यक्ति को पूजने लगते हैं। चमत्कार तो कोई जादूगर भी दिखा सकता है। लेकिन जो भीतर गहराई से दिव्य संत होते हैं, जो समाज में प्रेम, सद्भाव व शांति के लिए ही साधनारत व कर्मरत रहते हैं उनका आशय कभी चमत्कार दिखाना नहीं होता है। वस्तुतः उनके भीतर स्वतः दैवीय शक्ति का स्त्रोत फूट पड़ता है। उनकी दिव्यता करुणा के अतिरेक रुप में उनके जगत कल्याण के कार्यों में नैर्सिर्गक रुप से चमत्कार सी प्रकट होती है। संत रैदास ऐसे ही महान संत थे।

भक्तियुग के मुख्य प्रणेता रामानंदाचार्य जी थे जिनके अनेक शिष्यों में निर्गुण साधना के प्रवर्तक वाराणसी के संत कबीर व रैदास जैसे महान संत भी हुए। उनके गुरु रामानंदाचार्य जी पहले ऐसे संत थे जिन्होंने ईश भक्ति के लिए प्रत्येक जाति, चाहे वे अछूत हो या उच्च जाति के सभी को अपनाया। उनके गुरु मंत्र “जात पात पूछे नहि कोई, हरि को भजे सो हरि का होई” ने उक्त भक्ति-काल में एक क्रांति उत्पन्न कर दी थी। स्वयं रामानंदाचार्य जी सगुण भक्ति के उपासक थे लेकिन वे भक्ति के निर्गुण-सगुण रूपों की तात्त्विक समानता को भलीभाँति जानते थे। वे भगवद्गीता में (12/1,3,4 व 11/54) में श्रीकृष्ण के उपदेशों में सगुण-निर्गुण उपासना की दिव्य किन्तु सरल व्याख्या को न केवल जानते थे वरन् उसे उन्होंने आत्मसात् भी किया। उसे जीया भी। श्रीकृष्ण ने गीता के उपरोक्त श्लोकों में स्पष्ट कहा कि यद्यपि उनकी दृष्टि में सगुण उपासना सरल एवं अधिक श्रेष्ठ है लेकिन जो भक्त उनके निर्गुण निराकार ब्रह्म की उपासना करते हैं उनमें कही कोई बुद्धि-भेद नहीं है। वे भी परमात्मा को अनन्य भक्ति भाव से व तत्व से जानकर उन्हें प्राप्त करते हैं। श्रीकृष्ण के अनुसार ब्रह्म उनसे भिन्न नहीं और वे ब्रह्म से भिन्न नहीं है। इसी बात को रैदास जी ने सरल रूप में इस प्रकार कहा कि आदमी की भीतर से आत्मशुद्धि आवश्यक है। उनके अनुसार मनुष्य का मन शुद्ध सरल है तब अन्य अनुष्ठानिक क्रियाएँ महत्वपूर्ण नहीं हैं। उन्होंने जोर दे कर कहा ‘मन ही पूजा मन ही धूप, मन ही सेऊं सहज सरूप... ‘मन चंगा तो कठौति में गंगा’। पाखंड व कट्टरता का बोलबाला केवल उस चौदहवीं-पन्द्रहवीं शताब्दी काल की बात नहीं है, आज भी एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो बगुला भगत किस्म के होते हैं। तिलक छापा, माला-पूजा, पाठ आदि में दो-तीन घण्टे लगाते हैं लेकिन नौकरी पर या धंधे पर जाते हैं तब रिश्वत या कालेधन से जेब या थैला भर कर नहीं लाते तब तक घर में पैर नहीं रखते हैं। हाँ, ऐसे काले धन से वे मंदिर में कुछ चढ़ावा जरूर चढ़ा देंगे। दूसरी ओर विलासिता में डूबे ऐसे बाबाओं की संख्या भी खूब है, जिनका मन कत्तई शुद्ध नहीं है और इतना ही नहीं गंभीर अपराधों में लिप्त होने से अनेकों को जेल की हवा खानी पड़ रही है।

रैदास जी ने मूर्ति-पूजा, छुआछूत, भेदभाव आदि शोषण का विरोध तत्कालीन हालात देखते हुए ही किया। यही कारण था कि समाज का एक बड़ा तबका, विशेष रूप से दलित वर्ग उनका शिष्य बना जब कि कट्टर पंथी ब्राह्मण/सवर्ण उनके विरोधी बन गये।

आज स्थितियाँ चिंताजनक हैं। एक ओर जहाँ छूतछात कम हुई है वहीं राजनीति की अधमता के कारण जातिवाद व  जातिगत समीकरण को अत्यधिक हवा दी जाने लगी है। आज रैदास जी होते तो मतों की ऐसी गंदी राजनीति को देख कर अत्यंत दुखी होते। दूसरी ओर रैदास जी ऐसी प्रति-चरमावस्था अर्थात् एंटिक्लाइमेक्स को देख करके भी दुखद आश्चर्य में पड़ जाते कि क्रीमीलेयर वाले पिछड़े वर्ग को भी आरक्षण दिया जा कर वास्तवीक गरीब पिछड़े वर्ग के साथ भारी अन्याय हो रहा है। पिछड़े वर्ग के नाम पर उन्हीं में एक नया अभिजात्य वर्ग पैदा हो गया है। साथ ही संविधान के अनुच्छेद 335 की भावना, जिसमें योग्यता की कीमत पर आरक्षण की मनाही अंकित है फिर भी योग्यता को भाड़ में डालकर केवल सत्ता हथियाने की ओछी राजनीति के तहत पद्दोन्नति आदि में आरक्षण दिया जा रहा है। इससे न दलितों को लाभ होता है न देश का। इसके बजाय दलित वर्ग को उच्च शिक्षा, कोचिंग, प्रशिक्षण व उनके रहन-सहन के स्तर में निःशुल्क वृद्धि योजना को ईमानदारी से लागू किया जाता तो अधिक बेहतर होता। रैदास जी ने ऐसे कालखंड की भी कभी कल्पना नहीं की होगी। 

संवत् 1433 की माघ पूर्णिमा को वाराणसी (काशी) में चमार जाति के पिता संतोखदास व माता कलसा देवी के यहां जन्मे रैदास बचपन से ही ईश्वर भक्त, दैवीय शक्तियों के धनी, व अद्भुत प्रतिभाशाली बालक थे। उनके पिता अपने नगर सीर-गोवर्धन के सरपंच एवं जूते बनाने के व्यवसाय में निपुण थे। वाराणसी में तत्कालीन ब्राह्मणों की जातिवादी कट्टरता, अस्पृश्यता और पाखंड से स्वयं तुलसीदास, रामानंदाचार्य और रैदास जैसे अनेक संत त्रस्त रहे हैं। रैदास पिछड़ी जाति के होने से उन्हें पंडित शारदानन्द द्वारा पाठशाला में प्रवेश को लेकर वहाँ के ब्राह्मणों ने जब विरोध किया तब पंडित शारदानंद ने अपनी प्राइवेट पाठशाला में उन्हें प्रवेश देकर शिक्षा दी। शीघ्र ही रैदास की प्रतिभा और दैवीय शक्ति से वे व अन्य लोग बचपन से ही उन्हें दिव्य बालक मानने लगे थे।

एक बार रैदास ब्राह्मण जाति के अपने बाल सखा के साथ छुपा-छुप्पी खेल रहे थे। दोनों एक-एक बाजी जीत गये। तीसरी निर्णायक बाजी खेलते उससे पहले अंधेरा हो गया। दोनों ने तय किया कि तीसरी बार कल सुबह खेलेंगे। अगले दिन जब मित्र खेलने नहीं आया तो बालक रैदास उसके घर पहुँचे। वहाँ हृदय विदारक दृश्य था। उनके मित्र का शव पड़ा था। उसके माता-पिता, परिजन आदि रो रहे थे। यह देखकर रैदास का बालमन करुणा से भर गया। वे मित्र के शव के पास गये। उसके कंधे को थपथपा कर बोले “यह भी कोई सोने का समय है। यह तो खेलने का समय है, उठ!’’ मित्र तुरन्त उठ खड़ा हुआ।  लोग रैदास को उस बाल अवस्था के प्रसंग से ही भगवान मानने लगे। बड़े होने पर उन्होंने अपने कमंडल जल से अनेक कुष्ठरोगियों का रोग भी मिटाया। वे सचमुच करुणानिधान थे।
रैदास के पिता जूतों के बड़े व्यवसायी थे। लेकिन रैदास को उनके कारोबार को बढ़ाने में कोई रुचि नहीं थी। सोलह साल की उम्र में पिता ने उनका विवाह एक सुयोग्य कन्या लोना देवी से कर दिया, जिससे उनके एक पुत्र विजयदास हुआ। पिता ने उनके वैराग्य और भक्ति भाव को देखकर उन्हें परिवार से अलग कर दिया। रैदास अलग मकान लेकर जूते बनाने व मरम्मत का कार्य करने के साथ अधिकांश समय भक्ति साधना, उपदेश व सामाजिक कार्यों में बिताने लगे। आज के सैकड़ों अरबपति ढोंगी बाबाओं के विपरीत उनका जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण था। जूते बनाने से उन्हें जो मामूली आय होती थी उसी से वे संतुष्ट थे। लोभ तो उन्हें कभी छू भी नहीं पाया। कहते हैं कि एक बार एक रहस्यमय व्यक्ति सेठ की वेशभूषा में उनके पास पारस पत्थर लेकर आया और रैदास जी को देना चाहा। वह उनसे बोला कि आप इससे स्वर्ण बना कर वैभवपूर्ण जीवन यापन कर सकते हो। उन्होंने विनम्रतापूर्वक इस आग्रह को यह कह कर ठुकरा दिया कि उन्हें मुफ्त के वैभव की आवश्यकता नहीं है। तब उस सेठ ने कहा कि वह दूसरे गाँव जाकर आ रहा है तब तक वे उस पारस पत्थर को अपने झोंपड़े में रख ले। रैदास जी ने उस पारस पत्थर को एक कोने में पटक दिया। सेठ दूसरे दिन लौट कर आया तो उस पारस पत्थर को झोंपड़े में उसी कोने में पड़ा देख कर दंग रह गया। कहा जाता है कि वह सेठ उस पारस पत्थर को लेकर झोंपड़े से बाहर आया और रैदास के देखते देखते ही एकदम अदृश्य हो गया। शायद ईश्वर उनकी परीक्षा लेने आये थे। 

रैदास जी ने जीवन में अपने भक्तों से कभी भी कोई बहुमूल्य भेंट स्वीकार नहीं की। उन्होंने सादा जीवन उच्च विचार की अपने सपनों की बेगमपुरा नामक बस्ती बसाई। रैदास जी ने अछूतेां के साथ अस्पृश्यता, उन्हें पाठशाला, मंदिर में प्रवेश न करने देने, गाँव के बाहर अलग कच्चे झोंपड़े में रहने के लिए विवश करने व अनेकानेक तरीके से सवर्णों व विशेषतः कट्टर ब्राह्मणों द्वारा प्रताड़ित किये जाने का विरोध किया। उनका कहना था कि जब ईश्वर ने सभी मनुष्यों को बनाया तब क्या अछूत व क्या सवर्ण सभी उनकी प्रिय संतान हैं। ईश्वर सभी से बराबर प्रेम करते हैं तब मनुष्य को भी सभी मनुष्यों से प्रेम करना चाहिये। ईसा मसीह की तरह व प्रेम के इस संदेश से व अपने दिव्य व्यक्तित्व के कारण अछूत व गरीबों के मसीहा कहलाने लगे। वे स्वयं तिलक व जनेऊ धारण करने लगे। इस पर कुछ कट्टर ब्राह्मणों ने काशी नरेश से शिकायत की। नरेश ने रैदास जी को अपने दरबार में बुलाया। वहाँ रैदास जी ने अपनी छाती में चीरा लगाकर सभी के सामने तीन जनेऊ- एक सोने की, दूसरी चांदी की व तीसरी कपास की निकाली। इस पर काशी नरेश सहित अनेक विवेकशील पंडित भी उनके शिष्य बन गये। 

रैदास जी ने अपने दोहे में कहा ‘बिरामन मत पूजिए जो हौवे गुणहीन, पूजै चरण चंडाल के जो हो गुण प्रवीण’। यही बात श्रीकृष्ण ने गीता (4/14) में स्पष्ट रुप से कही है कि वर्णभेद जन्मगत नहीं अपितु गुण-कर्मानुसार है। आज शबरी के नाम से सबरीमाला मंदिर में छूतछात (स्त्री-पुरुष) के भेदभाव की बात की जाती है जबकि भगवान राम ने भील जाति की उसी शबरी के झूठे बेर खाए थे।श्रीकृष्ण ने छगन-कसाई, गणिका वेश्या, व कुब्जा जैसे पिछड़े वर्ग के लोगों की भक्ति को गरिमा दी। धर्म का मर्म जाने बिना आज जिस कदर कट्टरता का बोलबाला है, वह अत्यंत निंदनीय है। धर्म का निचोड़,  सत्य और जीवन के शाश्वत मूल्यों से हैं जो देशकाल से परे रहे हैं। धर्म से अभिप्राय सत्य, अहिंसा, प्रेम, अनीष् र्या, धैर्य, सहनशीलता आदि गुणों से हैं जिन्हें गीता, रामायण, कुरान, बाईबिल आदि सभी धर्मशास्त्रों ने मान्यता दी है। मनुष्यता के उन्नयन संबंधी ये उपदेश ही रैदास जैसे सच्चे संतों की वाणी व जीवन से हमें मिलते हैं।

गुरु नानक भी रैदास जी के समकालीन थे। गुरु ग्रंथ साहब में रैदास जी के विभिन्न शास्त्रीय रागों में गाये जाने वाले कुल इकतालीस पद हैं। मीरांबाई मेड़ता राजघराने की पुत्री थी। रावदूदा जी की पौत्री थी। बचपन में ही उनकी माँ का स्वर्गवास हो जाने से स्वयं राव दूदाजी, जो रैदास जी के भक्त थे, मीरां को उनके पास आशीर्वाद दिलाने ले गये। बाद में मीरां जो चितौड़ राजघराने की महारानी थी, ने सम्पूर्ण विरोध के बावजूद भी रैदास जी को अपना गुरु गनाया। “गुरु मिल्या रैदास जी, दीनी ज्ञान की गुटकी। चोट लगी निज नाम हरि की म्हारै हिवड़ै खटकी”।

रैदास जी करीब 120 वर्ष तक जिये। उनकी जयंती पर यदि हम मानव मात्र के प्रति प्रेम, सद्भाव और सादगी-शांति से जीने का वसुदेव कुटुंबकम् का संकल्प ले कर उसे जीवन में उतारें तभी उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।  

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