लघुकथा: स्वप्न से सङ्कल्प तक

वागीशा शर्मा
वैभवी अपनी ही धुन में थी कि एकाएक हुई उद्घोषणा से वह चौंक उठी। उद्घोषिका बोल रही थी “क्योंकि वैभवी ने संस्थान की डायरेक्टर डा॰ पुरी के साथ काफ़ी लम्बे समय तक बहुत घनिष्ठता से कार्य किया है अतः उसे तो डा॰ पुरी के विदाई समारोह में अपने अनुभव साझे करने ही चाहिएँ”। वैभवी धर्मसंकट में है कि क्या साझा किया जाए? स्मृतियों के गहन महासागर में से चन्द मीठे अनुभव तलाशने का अनथक प्रयत्न विफल ही होता दिखाई दे रहा है क्योंकि अनुभवों में तो समय के साथ-साथ मिठास से कहीं ज़्यादा कड़वाहट व्याप्त हो चुकी थी। पर, बोलना तो पड़ेगा ही। क्या बोलूँ? झूठ कैसे बोलूँ? झूठ बोलूँ? अपनी स्पष्ट, ईमानदार और बेबाक़ छवि पर दाग़ कैसे लगने दूँ? विचार निमग्न वैभवी कब मञ्च पर जा खड़ी हुई, कुछ ख़्याल नहीं। तालियों की गूँज में छिपे उत्सुक चेहरों पर फैली व्यङ्ग्य रेखाएँ वैभवी की असहजता को गुणात्मक कर रहीं थीं।

एकाएक वैभवी बोल उठी...
डा॰ पुरी, जहाँ आपने अपने कार्यकाल में संस्थान के इनफ्रास्ट्रक्चर में चार चाँद लगा दिये हैं वहीं अन्तर्राष्ट्रीय मञ्च पर संस्थान को पहचान दिलाने का श्रेय भी, कुछ हद तक, आप ही को जाता है। पर ये इनफ्रास्ट्रक्चर तो भावहीन नश्वर ढाँचे मात्र ही हैं ना! कितने ही ऐसे पुराने ढाँचों को आप ही ने तोड़ कर उनके स्थान पर नए ढाँचे खड़े कर दिए और उनसे सम्बन्धित स्मृतियों और शख़्सियतों को अभिलेखागार का अङ्ग-मात्र बना कर छोड़ दिया। इन्हीं अल्पायु ढाँचों की निर्माण-प्रक्रिया के चलते कब हमारे और आपके भावनात्मक सम्बन्ध तार-तार हो कर ईंट-पत्थरों में दफ़न गए इसका आपको अल्पमात्र भी एहसास कभी शायद नहीं हो पाया या आपने करना ही नहीं चाहा। मानवीय-सम्बन्धों को इन ढाँचों की ही भाँति तोड़ तो आपने डाला पर जोड़ने का कोई भी सुविचार या तरीका आपके मन–मस्तिष्क में कभी प्रस्फुटित हुआ ही नहीं। स्पष्टतः और संक्षेपतः भावनात्मक रिश्तों को बरकरार रखने में आप पूरी तरह नाकामयाब ही रहीं। किसी को भी, कभी भी, कुछ भी कह देना, झूठी सूचना पर भी बिना जाने-समझे-विचारे ही संस्था-कर्मियों को रिमाण्ड पर ले लेना, पक्षपात पूर्ण रवैया रखना - ये सब क्या किसी भी संस्था के मुखिया को शोभा देता है? मुझे तो आज भी संस्थान में आपका पहला दिन याद है जब आप ने अपने इरादों का एहसास गाते हुए कराया था –
आ चल मैं तुझे कहीं लेके चलूँ इक ऐसे गगन के तले,
जहाँ ग़म भी न हों आँसू भी न हों, बस प्यार ही प्यार पले।

क्या तो सबकी मनःस्थिति थी! कुछ आपकी स्वर लहरियों में बह निकले थे क्योंकि पुराने डायरेक्टर के तौर-तरीकों से उबरने का सुकून जो था। कुछ ने आपको मित्र समझा तो कुछ ने फ़रिश्ता। सहकर्मियों में बहती हुई इस नई खुशबूदार हवा में भी कुछ अलग मानसिकता के कर्मियों के बीच आपके इस विचित्र व्यवहार की समीक्षा भी हुई थी। ख़ैर, नई शुरुआत में सभी ने सब कुछ भुला दिया था। पर कितने दिन? एक वर्ष होते-होते हर दिन पिछले दिन से अधिक दूरियाँ बनती गईं। धीरे-धीरे आप अपने ऑफिस में सिमट कर रह गईं और हम सब अपनी-अपनी मेजों पर लगे कम्पयूटरों में खोने में ही सुकून महसूस करने लगे। आपके द्वारा भेजी गई हर एक ईमेल या नोटिस में आपके स्वभाव के रूख़ेपन और असन्तोष को हर कर्मी ने बख़ूबी पहचाना। ऐसा लगा कि अतिव्यस्तता के बीच या तो आप आत्मविश्लेषण का समय ही नहीं निकाल पाईं या फ़िर यह आपकी कार्यशैली का अङ्ग ही नहीं है। नहीं तो निष्ठा, समर्पण, सच्चाई और भरपूर संजीदगी से सहयोग करने वाले सहकर्मियों का आपसे दिन-प्रतिदिन दूरियाँ बनाना आपके लिए विचारणीय विषय होना चाहिए था। पर फ़ासले बने तो बढ़ते ही गए। क्या इसे आप अपनी सफलता मानेंगी? सफल संस्था-प्रमुख तो सभी को साथ लेकर चलता है, सभी के गुणों को अपना गुण बना कर ...।

एकाएक घड़ी का अलार्म ज़ोर से बज उठा और वैभवी झटके से बिस्तर पर उठ बैठी। पसीने से नहाई हुए वह सोचने लगी - ये सब क्या था? ये कैसा सपना था? दिल में यत्नों से और वर्षों से छिपाकर रक्खी तपिश क्यों जुबां पर शब्द बनकर छाने लगी! इतनी कड़वी सच्चाई और वह भी विदाई समारोह में! रे मन, इतनी कड़वाहट क्यों? यदि मैं भी भरी सभा में ऐसा बोलने का विचार रखूँ तो मुझमें और डा॰ पुरी में क्या अन्तर रह जाएगा? यह मैं क्या बनती जा रही हूँ? थैंक गॉड, ये मात्र एक सपना ही था, हक़ीक़त नहीं। “सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् -यानि सत्य बोलो, प्रिय बोलो, अप्रिय सत्य कभी न बोलो”, वैभवी सातवीं कक्षा में पढ़े इस श्लोक को आचरण में लाने का दृढ़ सङ्कल्प करते हुए एक लम्बी साँस लेकर बिस्तर से उठी और अपने सङ्कल्प की दृढ़ता के परीक्षण हेतु उसी ऑफिस जाने की तैयारी करने लगी जिसकी डायरेक्टर सपने वाली डा॰ पुरी हैं और आज जिनका विदाई समारोह है।

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