समीक्षा: मेरे प्रिय व्यंग्य लेख: विवेक श्रीवास्तव

पुस्तक 'मेरे प्रिय व्यंग्य लेख'; लेखक: विवेक श्रीवास्तव; समीक्षक: समीर लाल ’समीर’
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मेरे प्रिय व्यंग्य लेख
लेखक: विवेक श्रीवास्तव
प्रकाशक: विमल बुक सेन्टर, जयपुर
मूल्य: ₹  70.00
ईमेल: vivekranjan.vinamra@gmail.com
दूरभाष: +91 94258 06252
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विवेक रंजन श्रीवास्तव जी जबलपुर में मेरे घर के पास ही रहा करते थे। मगर उनसे परिचय का दायरा बढ़ा जब मैने ब्लॉग लिखना शुरु किया। तब भारत यात्रा के दौरान उन्होंने अपना व्यंग्य संग्रह दिया था। पढ़ कर आनन्द आया था। संग्रह का नाम था ’कौआ कान ले गया’।

फिर ब्लॉग के माध्यम से, अखबारों और पत्रिकाओं से नियमित उनको पढ़ते रहे। हाल ही मेरे एक मित्र जो यहाँ से भारत गये हुए थे, उनके माध्यम से उन्होंने अपनी कुछ पुस्तकें भिजवाईं। आज उन्हीं में से एक पुस्तक ’मेरे प्रिय व्यंग्य लेख’ के बारे में। एक बैठक में पढ़ ली जाने वाली पतली सी पुस्तक, जिसमें मात्र 36 पन्ने हैं और 13 व्यंग्य आलेख। 2 से 3 पन्नों के छोटे-छोटे व्यंग्य, जब आप पढ़ेंगे तो आपको भी बिहारी पर लिखा दोहा याद हो आयेगा:
सतसइया के दोहरा ज्यों नावक के तीर।
देखन में छोटे लगैं घाव करैं गम्भीर।।

एकदम आस पास बिखरे विषय, जिस पर शायद एक आमजन का ध्यान भी न जायें, उसमें से विसंगतियाँ खोज कर उन पर अपने व्यंग्य बाण चलाने की अद्भुत कला के धनी हैं विवेक रंजन श्रीवास्तव।
विषयों की बानगी देखें:
ब्राण्डेड वर वधु,
विदेशी शराब की सरकारी दुकान,
मोबाइल प्लान की प्लानिंग,
आज कितने बार मरे!

ऐसे-ऐसे विषय हैं जिनसे हम नित दो चार होते हैं मगर कभी उस नजरिये से नहीं आँकते जिससे कि एक सक्षम व्यंग्यकार ने अपनी कलम चलाई है।

ब्राण्डेड-वर-वधू:
हर लड़की अपने उपलब्ध विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ घर-वर देखकर शादी करती है, पर जल्दी ही, वह कहने लगती हैं- तुमसे शादी करके तो मेरी किस्मत ही फूट गई है। या फिर तुमने आज तक मुझे दिया ही क्या है। इसी तरह प्रत्येक पति को अपनी पत्नी `सुमुखी` से जल्दी ही सूरजमुखी लगने लगती है। लड़के के घर वालों को तो बारात के वापस लौटते-लौटते ही अपने ठगे जाने का अहसास होने लगता है।

इसी में आगे लिखते हैं कि
यहां आकर मेरा व्यंग्य लेख भी व्यंग्य से ज्यादा एक सीरियस निबंध बनता जा रहा है। मेरे व्यंग्यकार मन में विवाह की इस समस्या का समाधान ढूँढने का यत्न किया। मैंने पाया कि यदि दामाद को दसवाँ ग्रह
मानने वाले इस समाज में, यदि वर-वधू की मार्केटिंग सुधारी जावें, तो स्थिति सुधर सकती है।

मोबाइल प्लान की प्लानिंग:
मैं सदा से परिवर्तन का समर्थक रहा हूँ। मेरा विश्वास है कि समय से तालमेल बैठा कर चलना प्रगतिशील होने की पहचान है। अपने इसी ध्येय की प्राप्ति हेतु और कुछ बीबी, बच्चों की फरमाईश पर, नितांत अनावश्यक होते हुये भी मैंने एक मोबाइल फोन खरीद लिया। अब यह आवश्यक हो गया कि मैं किसी कंपनी की एक सिम खरीद कर, किसी प्लान विशेष को चुनकर, मोबाइल हो जाऊँ। ‘जागो ग्राहक जागो’ की अलख सुन, अपने पढ़े लिखे होने का परिचय देते हुये एक जागरूक उपभोक्ता की तरह, मैं किस कंपनी का कौन सा प्लान चुनूँ इस अनुसंधान में जुट गया।

आगे देखें:
इतनी अधिक विविधताओं के बीच चयन करके आज तक मैंने कभी भी कुछ नहीं लिया था। बचपन में परीक्षा में सभी प्रश्न अनिवार्य होते थे। च्वाइस होती भी थी तो एक ही चैप्टर के दो प्रश्नों के बीच, मुझसे ऊपर वाला प्रश्न ही बन जाता था अतः कभी चुनने की आवश्यकता नहीं पड़ी, हाँ चार वैकल्पिक उत्तरों वाले सवालों में जरूर जब कुछ नहीं सूझता था, तो राम राम भजते हुये किसी एक पर सही का निशान लगा देता था।

भगवान कृष्ण का अपहरण:
हाईजैकिंग का जमाना है। जिसकी लाठी उसकी भैंस। मैं चिल्लाता रह ही गया ’मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’। और भगवान कृष्ण जो वैश्विक हैं, वे इन दिनों मेरे मोहल्ले के यादव समाज के द्वारा धर लिये गये। अंग्रेजी माध्यम के इस प्रगतिशील जमाने में भगवान कृष्ण, बलदाऊ, मानो के.बी. यादव के रुप में मेरे दूधवाले और उसके समाज के द्वारा अपृहत हो रहे हैं।

आप पुस्तक उठाते हैं और ऐसे ही महीन महीन सूक्ष्म चोटों को देखते देखते कब किताब खत्म कर जाते हैं, पता ही नहीं चलता। असर बड़ी देर तक रहता और लगातार बना रहता। अब विदेशी शराब की सरकारी दुकान अलग सी नजर आती और रेलवे फाटक पर रुकते ही विवेक रंजन की याद आती।

निश्चित ही एक सशक्त लेखनी, बहुत गहरी सोच और पैनी दृष्टि। साधुवाद इस लेखन को। मुझे पूरी उम्मीद है कि हर पाठक जब इस पुस्तक से गुजरेगा तो उसका मत भी कुछ ऐसा ही होगा। मुझे पुस्तक और लेखन शैली बहुत पसंद आई। लेखक को अनेक शुभकामनायें। पुस्तक प्राप्ति के लिए लेखक से संपर्क करें।

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