सातत्य के लिए अहिंसक सोच आवश्यक है

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


जीवन में सातत्य और स्थायित्व के लिए आजकल बहुत शोर हो रहा है। यह शोर मानवमात्र के लिए ही नहीं अपितु पूरी सभ्यता और सार्वभौम में उद्भूत उन समस्त भूतों के लिए है जिनसे इस ब्रह्माण्ड की खूबसूरती कायम रह सकती है। इनमें कुछ चीजें दृश्य हैं और कुछ अदृश्य। अदृश्य से हमारा साक्षात्कार नहीं हुआ है, अन्यथा उसके सातत्य के लिए भी हम विचार करते। लेकिन जो दृश्य है उसके सातत्य के लिए हमारे भीतर चेतना रहेगी तो हम उसकी भी रक्षा कर सकेंगे जो दृष्टिगोचर नहीं है। अधिकाँश जन खगोलीय घटनाओं से अनभिज्ञ होते हैं। केवल वैज्ञानिक वर्ग उनके बारे में कुछ रहस्य ज्ञात करके हमें बता सका है परन्तु जब वे समस्त ग्रह, नक्षत्र और अपनी जैवविविधता के संरक्षण की चिंता व्यक्त करते हैं तो उसे हमें समझना चाहिए। उनकी इच्छा केवल इस चिंता से अपने पृथ्वी को बचाने की नहीं होती दरअसल वे तो ब्रह्मांडीय चरित्र को मनुष्य के अनुकूल और मनुष्य को प्रकृति के अनुकूल बनाने की कोशिश करते हैं।

अध्यात्मिक स्तर पर भी हमारे शास्त्र वेदवाणी में इसकी पुष्टि करते हैं। वहाँ तो बहुत सुन्दर ढंग से इस बात का प्रमाण है कि हम टिकाऊ विकास को किस स्तर से अपने मन, कर्म और वचन में शामिल करते हुए आगे बढ़ने की ओर प्रवृत्त होते रहे हैं। यजुर्वेद के एक शान्ति पाठ मंत्र द्वारा ईश्वर से शान्ति बनाए रखने की प्रार्थना की जाती है। यजुर्वेद के इस मंत्र द्वारा भगवान से आशीर्वाद पाया जा सकता है। शान्ति मंत्र शान्ति के लिए की जाने वाली हिंदू प्रार्थना है। प्रायः धार्मिक पूजा, अनुष्ठानों और प्रवचनों के अंत में यजुर्वेद के इस मंत्र का प्रयोग किया जाता है-
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,
पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,
सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

अर्थात
हे प्रभु! त्रिभुवन में, जल में, थल में और अन्तरिक्ष में, अग्नि-पवन में, औषधि-वनस्पति, वन-उपवन में सकल विश्व में अवचेतन में! शान्ति: कीजिये। ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:।
यजुर्वेद में यह कल्पना कि आकाश में शान्ति हो, अन्तरिक्ष में शान्ति हो, पृथ्वी में शान्ति हो, वायु में शान्ति हो, औषधियों में शान्ति हो, वनस्पतियों में शान्ति हो,  विश्व में देवों की शान्ति हो।, ब्रह्म की शान्ति हो, सभी में शान्ति व्याप्त हो, ऐसी संकल्पना की प्राच्यता वास्तव में हमारी उत्कृष्ट सोच का और चिंतन का भी उत्कृष्ट उदाहरण है। विज्ञान और आध्यात्म का अवलोकन करें तो यह पायेंगे कि आज जो विश्वव्यापी चिंता है, हमारे पूर्वजों ने उसे दूर करने हेतु बहुत पहले से उद्घोष करके समस्त विश्व और ब्रह्माण्ड को सुरक्षित और संवर्धित करने की संकल्पना की थी। यानी हमने तो सातत्य की बात बहुत पहले की है। टिकाऊ विकास (एसडीजी) पर दुनिया में चल रही बहस की आज आवश्यकता औचित्य ही न होता अगर हम अपने स्थायी शान्ति के लिए पहले से चैतन्य रहते।

इससे यह पता चलता है कि समस्त दुनिया में जो सोच और चिंतन की धारा चल रही है उसका सातत्य मनुष्य और जीवों में समझ की और संवेदना के विकास  की पहले से विद्यमान है। वह ब्रह्माण्ड में कहीं न कहीं पहले भी ऐसा चिंतन मनन रहा है। अन्यथा कल्पना में जो बातें मस्तिष्क में आती हैं वह न आतीं। वह कहीं न कहीं हमारे चौदहों भुवनों में संचारित है। ब्रह्माण्ड में पहले से व्याप्त है। इसलिए आज जीव-जगत के उद्भट विद्वान यह कहते हैं कि हम जो भी कर रहे हैं वह नया नहीं है। वह तो पहले से हमारे चिरंतन प्रकृति में विद्यमान था, विद्यमान है और विद्यमान रहेगा। कहन की शैली में नवीनता हो सकती है। उसे स्वीकारने की नवीनता हो सकती है। उसे आचरण में लाने में नवीनता हो सकती है परन्तु वह विद्यमान पहले से है और चिरंतन है। सोच की और चिन्तन की व्यापक अनुभूति और उसके सातत्य की संकल्पना अपने आपमें अहिंसक संकल्पना है। विध्वंसक सभ्यताएँ तो नष्ट होती रही हैं, विध्वंसक सोच का विलोपन भी होता रहा है। और इसीलिए क्रूर और हिंसक सभ्यता के व्याप्ति का इतिहास तो बना लेकिन वह हमारे लिए मूल्य जैसा स्थापित नहीं हो सका, और न ही हमारी प्रेरणा का माध्यम बन सका। इस प्रकार यह स्वतः सिद्ध है कि अहिंसक प्रकृति ही इस ब्रह्माण्ड के मूल में है। उसके आधार पर ही जीवन-जगत और ब्रह्माण्ड का सातत्य है। शायद इसीलिये हमारे प्राच्य दर्शन, चिंतन और शास्त्र हमें सातत्य की तरफ अपने सुख की संवेदना केन्द्रित करते हुए पाए जाते हैं।

अहिंसा के सातत्य की संवेदना के बावजूद हम इतने हिंसक क्यों हो गए? हमें लोभ और लालच ने क्यों जकड़ लिया? हम आज इतने परेशान क्यों हो रहे हैं कि हमारे तापमान और वातावरण को खतरा पैदा हो गया है और हमें उस सातत्य के लिए कोशिश करने की क्या जरूरत है? हम उस आने वाले समय से भयभीत क्यों हैं? यदि चिंता है तो आने वाली पीढ़ी के लिए हम कौन सी चिंता करने और उससे निपटने की स्थिति विरासत में देकर जा रहे हैं? आखिर आने वाली सभ्यता में जी रही पीढ़ी का भविष्य क्या है? यदि हम इन प्रश्नों पर विचार कर लें तो प्रकृति के प्रति छूट चुके अपने अनुराग की आवश्यकता हमारी समझ में आ जायेगी। उस प्रार्थना का महत्व समझ में आ जायेगा। यह भी समझ आयेगा कि दुनिया की सभ्यताएँ सातत्य के लिए अपने-अपने शास्त्रों में हमारे नभ, जल, थल, नक्षत्रों, हवाओं और समस्त जीव-जगत में शान्ति की संकल्पना क्यों करती रहीं।

बाइबिल में कहा गया है कि परमेश्वर की इच्छा यह है, कि तुम पवित्र बनो। यह पवित्रता का व्यापक सन्दर्भ है। मिशनरियाँ वहाँ शुचिता का अर्थ केवल व्यभिचार से बचना बताती रही हैं, पर इसका अर्थ बहुत व्यापक है। पवित्रता तो अहिंसक होने की एक विधा है। पवित्रता इस पूरे ब्रह्माण्ड के प्रति अनन्य होने की विधा है। यानी मन, कर्म और वचन की पवित्रता। यजुर्वेद में जिस शान्ति की बात की गई है वह तो इस पवित्रता से संभव है। इस पवित्रता से अखिल शान्ति और सातत्य की साधना प्रत्येक व्यक्ति के लिये संभव है। उस पवित्रता के माध्यम से कोई भी व्यक्ति एकाग्र चिन्तन में समस्त शान्ति की संभावनाओं को अंगीकृत कर सकता है।

पश्चिम में, एनलाइटेनमेंट पर काफी बहस हुई है। एनलाइटेनमेंट का चाहे जो अर्थ लगाया जाता रहा हो, हम उसे आत्मज्ञान के रूप में भी स्वीकारते हैं। कांट कहता है कि मनुष्य को अपनी समझ के उपयोग का साहस करना चाहिए। लेकिन चिंतन की परम्परा में मनुष्य ने अपनी समझ को ऐसी दिशा में विकसित करने का साहस किया जिसमें वह प्रकृति से दूर होकर नवोन्मेष के नाम पर पर्यावरण के प्रति हानिकारक सिद्ध हुआ। उसकी समझ हानिकारक परिस्थितियों के निर्माण का मूल कारण न भी हों, तो भी एक महत्त्वपूर्ण वजह तो हैं ही। यांत्रिक विकास के प्रयोजन और अवदान की सोचें तो यही लगता है कि वह उदरपूर्ति का माध्यम - यानी पेट भरने का साधन - मात्र है। यह निजी सुख के लिए तो सहयोगी बन सकता है लेकिन आध्यात्मिक और प्राकृतिक दृष्टि से हानिप्रद ही है। निजी सुख मनुष्य व अन्य जीवों के लिए आवश्यक हैं पर इसकी लालसा में प्राकृतिक क्षरण भी नहीं होना चाहिये। इसलिए सभ्यता विकसित करने हेतु हमारे वेद, पुराण और दुनिया के अन्य ग्रन्थ आह्वान करते हैं कि शून्य या अनंत के लिए भी सोचो। जो भी हो पर यदि कांट के ‘साहसपूर्ण समझ’ के उपयोग की गहराई में जायेंगे तो उसका भी यही आह्वान हैं। ऐसी समझ के साहसपूर्ण कदम से निःसंदेह टिकाऊ विकास का मार्ग प्रशस्त होता है जो वैश्विक सर्वहितकारी विकास है। विश्व को और ब्रह्माण्ड को एक सतत विकासमान प्रक्रिया के रूप में देखने के अपने दृष्टिकोण हैं। यांत्रिकता के सन्दर्भ में स्पेंसर-हेगल या मार्क्स के बीच वैचारिक मतैक्य न होने के बावजूद इस बात पर सहमति थी की यंत्रवत विकास मनुष्य के लिए उपयोगी या हितकारी नहीं होते। उन चिंतकों का इस बात पर एकमत होना यूँ ही नहीं था। आज की सभ्यता और आज की समस्याओं का आँकलन करके उनके एकमत होने के कारणों का अनुमान लगाना कठिन नहीं है।

मनुष्य, वनस्पति और पशुओं के बीच सबसे बड़ा अंतर तो समझ का ही है। जड़ और चेतन का भेद भी हम उसी समझ से कर पाये हैं। समझ की, दृष्टि की सबसे ज्यादा क्षमता मनुष्य के पास होने के कारण समझ के उपयोग का साहस उसे ही करना होगा। इसलिए उसकी जिम्मेदारियाँ भी केवल मनुष्य तक सीमित नहीं रहनी चाहिये। उसे तो समस्त भुवनों में व्याप्त जड़, चेतन, चर-अचर सबके बारे में सोचना है। ब्रह्मांडीय घटनाओं पर भी विचार करना है और इससे हो रहे परिवर्तन को समझ कर उसमें अपने हिस्से का अवदान देना है जिससे जीवन का नैरंतर्य बना रहे।

शाश्वत सुख की संकल्पना पर विचार करें तो भ्रम होता है कि यह सृष्टि के उपभोक्ताओं के हित में हैं। हिंसक भोग और अहिंसक जीवन आचरण में इसीलिए हमारे शास्त्र भेद करते हैं। दुनिया के तमाम धर्म, दर्शन में नैतिकी के रूप में में अहिंसा समादृत है और हमारे भारतीय वाङ्मय- वामन पुराण, मत्स्य पुराण, विष्णु पुराण, अग्निपुराण और भागवत पुराण में अहिंसा की अलग-अलग व्याख्याएँ मिलती हैं। वामन पुराण (दशांग-धर्म-14-1-2) में अहिंसा को सर्वोपरि बताया गया है तथा अन्य मूल्यों की अभिव्यक्तियाँ भी अहिंसा के रूप में ही मिलती हैं। मत्स्य पुराण का अध्ययन करते हुए यह पता चलता है कि अक्रोध, क्षमा और धैर्य को सनातन धर्म का मूल माना गया है। ब्राह्मण पुराण अहिंसा को धर्म का मुख्य द्वार कहता है। इसी तरह अन्य पुराणों में भी अहिंसा को सर्वोच्च धर्म और सुख का मूल माना गया है। इस प्रकार संसार की चिंतन परम्परा में अहिंसा की अभिव्यक्ति मिलती है। स्पष्ट है कि अहिंसा की स्वीकृति ही जीवों के सातत्य हेतु सहायक सतत और सार्वभौम मूल्य है। वह केवल जीवों के लिए नहीं अपितु इस पूरे ब्रह्मांडीय सृष्टि के सातत्य के लिए अनिवार्य है क्योंकि हमारे चिंतन के क्षेत्र-विस्तार के लिए अहिंसक सोच आवश्यक है। इससे हम सृष्टि के अस्तित्व की सम्पूर्णता के सभी पक्षों के बारे में विचार कर सकेंगे ।

पर्यावरणीय और खगोलीय पिंडों का सातत्य बना रहे। पृथ्वी के सिकुड़ने और उसके तापक्रम को लेकर की जा रही चिंता तो बहुत मामूली है। पूर्व में जिस श्लोक का ज़िक्र किया गया है उसके अर्थ-गाम्भीर्य पर यदि विचार करें तो सारी चीजें स्पष्ट हो जाती हैं कि हम अहिंसक होकर किसके लिए प्रार्थी होते हैं। इसलिए हिंसक भोग को माया से आबद्ध भोग कहा गया जिसमें मोह और तृष्णा व्यक्ति के जीवन को स्वकेंद्रित कर देती है उसे जीव-जगत का बोध नहीं होने देती। इससे मनुष्य उन आविष्कारों को अपना उद्यम मानता है जिससे उसके पास धन संपदा का असीम संचय हो सके और वह विलासिता से बंध जाता है जबकि अहिंसक जीवन-आचरण तो हिंसा की कोई भी प्रवृत्ति सहन नहीं कर सकता किन्तु यह सत्य है कि अहिंसक जीवन आचरण न होने से निरंतर विकास में बाधाएँ आई हैं। दुनिया में ग्लेशियर, पहाड़, पठार और हिम-खण्डों तक को इस कारण समस्याएँ हो रही हैं। पशु-पक्षियों की अनेक प्रजातियों के लुप्त होने और बहुत से ग्रह-नक्षत्रों में अकल्पनीय परिवर्तन होने का कारण यही है कि हम हिंसक भोग में शामिल होकर अपने प्रकृति और अपनी सृष्टि के साथ ही छल करने लगे। व्यक्ति के भीतर आये ये बदलाव संयम से नियंत्रित किए जा सकते हैं। पूरी धरती पर बंद वातानुकूलित भवनों में जिस तरह से सतत और धारणीय विकास का शोर हो रहा है उससे तो हम पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। हमारी रणनीतियाँ जिन मूल्यों के साथ बननी चाहिए उन्हें साथ लेकर उपाय नहीं किये जायेंगे तो वे रणनीतियाँ भी हमारे लिए मिथ्या ही सिद्ध होंगी।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।