समीक्षा: प्रवासी कवि का कविता संग्रह

संवेदनशील नागरिक और मनुष्य के दृष्टि बोध की कविताएँ

समीक्षक: ब्रजेश कानूनगो

पुस्तक: इस समय तक
विधा: काव्य
लेखक: धर्मपाल महेंद्र जैन
प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, सीहोर
मूल्य: ₹250.00 रूपये
पृष्ठ: 160

समीक्षक: ब्रजेश क़ानूनगो
‘जब कोई भाषा नहीं थी हमारे बीच/मेरे बच्चे/तुम्हारी आँखें सब कह देती थीं/मैं आदमी का चेहरा बन/बार बार डालता रहा कुछ शब्द/तुम्हारे कानों में/सिखाने लगा स्वार्थ की भाषा/तिकड़म की भाषा/जरूरत के हिसाब से बदलती भाषा/अब तुम्हें अपनी जबान बोलते देख/मैं खुश हूँ।’

ये काव्य पंक्तियाँ हैं कनाडा निवासी श्री धर्मपाल महेंद्र जैन की। जिन्हें मैं अब तक एक व्यंग्यकार के रूप में जानता रहा था। सन 1981 में इंदौर से प्रकाशित लेकिन पूरी हिन्दी पत्रकारिता में प्रतिष्ठित  नईदुनिया (सम्पादक: श्री राहुल बारपुते, श्री राजेन्द्र माथुर) समाचार पत्र में ‘अधबीच’ नाम से एक दैनिक कॉलम शुरू हुआ जिसमें आम पाठक कलम भांजते हुए धीरे-धीरे व्यंग्यकार के रूप में प्रतिष्ठित होते गए। इस स्तम्भ में जो पचास-साठ लोग लगातार बेहतरीन लिख रहे थे उनमें श्री धर्मपाल महेंद्र जैन भी एक उल्लेखनीय और लोकप्रिय नाम था। मैं भी उसमें लगातार लिख-छप रहा था। इसी तरह लिखते हुए मेरा व्यंग्य संग्रह ‘पुनः पधारें’ सन 1995 में आया। श्री धर्मपाल महेंद्र जैन का पहला व्यंग्य संग्रह ‘सर, क्यों दांत फाड़ रहा है?’ सन 1984 में ही प्रकाशित होकर चर्चित हो गया था। ये भी एक संयोग ही है कि मेरी तरह धर्म जी भी पूर्व में एक बैंकर रहे हैं, हालांकि उनके अनुभव का दायरा बहुत विस्तृत है। पत्रकारिता और सम्पादन के साथ देश-विदेश के लोक जीवन से भी वे बराबर बावस्ता रहे जो उनकी रचनाओं के फलक को भी व्यापकता देता है।

धर्मपाल महेंद्र जैन
बहरहाल, कवि के रूप में जो बीज संवेदनाओं के रूप में सबको मिलते हैं वे ही धर्मपाल महेंद्र जैन जी की कविताओं का आधार बने हैं। परिवार, प्रकृति, परिवेश, प्रेम के अलावा एक सचेत नागरिक की तरह भी उन्होंने अपने कविता संसार को कागज़ पर अभिव्यक्त किया है।

उनकी कविताओं में किसी ख़ास विचारधारा या वाद का आग्रह सामान्यतः दिखाई नहीं देता लेकिन एक सभ्य समाज के संवेदनशील नागरिक और मनुष्य की दृष्टि का बोध उनकी कविताओं में जरूर नजर आता है।

‘बहुत सिकुड़े खांचे थे/ कि मुटठी बंध पाती/ पैर उठाने की जगह नहीं थी/
कि वह चल पाता/ काश, खुद के लिए लड़ना सिखाती/ कोई वर्णमाला-
‘अ’ – अधिकार का/ आ- आग का/ इ- इन्साफ का/ ई – ईंट का
ऐसी पाठशाला नहीं मिली उसे।’

धर्मपाल महेद्र जैन की कविताओं को किसी एक मुहावरे में नहीं बांधा जा सकता। वे समकालीन छंद मुक्त शैली में भी आती हैं तो गजल अथवा गीत, नवगीत की तरह कुछ लय में भी बहुत असरदार होकर प्रभावित करती हैं।

‘इस भीड़ में तो दम घुटा जाता है। यहाँ आदमी से आदमी लुटा जाता है।
मनाने के लिए किसे बुलायेंगे आप। ये आदमी है खुद से रूठा जाता है।’

दरअसल, धर्मपाल महेंद्र जैन की पहला कविता संग्रह ‘इस समय तक’ के अनुक्रम को  माँ, प्यार, बेटी, शब्द, मेरा गाँव, प्रकृति, सत्ता और आदमी जैसे आठ उपवर्गों में विभाजित कर पाठकों के मूड के अनुसार कविताओं से गुजरने की सुविधा उपलब्ध है किन्तु ऐसा न भी किया जाता तब भी इन सब कविताओं में संवेदनाएं और उनकी अभिव्यक्ति इतनी ख़ूबसूरत है कि पाठक इनके साथ बहने लगता है। बहुत सी कविताओं और गजलों में कवि का व्यंग्यकार मुखरित होता है। जो जरूरी भी है।

माँ, बेटी और प्यार के साथ-साथ प्रकृति, मेरा गाँव खण्डों की कविताएँ भी बहुत भिगो देती हैं। कवि समुद्र और धुंध से गुजरता है। प्रकृति से बात करता है धूप से संवाद करता है। चिड़ियों और पत्तियों की आवाज को सुनता है। शिवना प्रकाशन, सीहोर, (म. प्र.) से प्रकाशित इस संग्रह का आवरण और आकार भी बहुत आकर्षक है। कवर पर छपी ‘पत्ती’ कवि के प्रवासी भारतीय होने और कनाडा से प्रेम की संभवतः अभिव्यक्ति है। डॉ. कमल किशोर गोयनका जी ने संग्रह की भूमिका पूरे मन से और कविताओं के मर्म तक जाकर लिखी है। इसे पढ़ना भी बहुत उपयोगी और महत्वपूर्ण है।


निश्चित ही ‘इस समय तक’ की कविताओं को पढ़ना अपने समय और संवेदनाओं को अनुभूत करना है। इस पुस्तक के लिए श्री धर्मपाल महेंद्र जैन को बहुत बधाई और स्वागत।

समीक्षक का पता
ब्रजेश कानूनगो
503, गोयल रिजेंसी, चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर 452018
मो 9893944294  bskanungo@gmail.com   
लेखक का पता -
1512-17 Anndale Drive, Toronto M2N2W7, Canada
फ़ोन : + 416 225 2415
ईमेल : dharmtoronto@gmail.com


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