काव्य: रूपाली सिन्हा

प्रतीक्षा -1

तुम्हारा प्यार
समुद्र की उफनती वेगवती लहर है
तेज़ी से आकर कर देती है मुझे सराबोर
सर से पाँव तक
विस्मित-चकित मैं जब तक कुछ सोचूँ
लौट चुकी होती है उसी गति से
तट पर नहीं छोड़ती कोई भी निशान
हर बार
छोड़ती है मेरे दिल पर पहले से गहरा
कई बार सोचा बह चलूँ
मैं भी उसके साथ
खो जाऊँ उसके अंतस्थल में
लेकिन मेरा वजूद
मिटने से इनकार कर देता है
वैसे क्या बुरा है तट पर खड़े-खड़े ही सराबोर होना?
मैं खड़ी हूँ प्रतीक्षा में
अगली लहर की।
.-=<>=-.

प्रतीक्षा-2

चलना होगा कितना और
कितनी यात्रा बची है अभी
न जाने कितने मोड़ पार करने हैं अभी
कितनी चढ़ाइयां चढ़नी होंगीं
कितने ढलानों से उतरना होगा
संभल-संभल कर
कितनी धाराएँ करनी होंगी पार
बस तैरकर ही
नहीं होगी कोई डोंगी भी
कितनी घाटियों से गुजरना होगा चुपचाप
कितनी शामें बितानी होंगीं उदास
कितनी रातें अँधेरी और दिन उजले
बिना किसी रंग के
करुँगी मैं यात्रा कर रही हूँ
भटकूंगी नहीं रुकूँगी नहीं
क्योकि इस यात्रा के अंतिम पड़ाव पर
खड़ी है मेरी ज़िन्दगी
मेरी प्रतीक्षा में।
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प्रतीक्षा-3

यह उदासी का मौसम है
वीरानगी का भी बेशक
यूँ कहे कि वीरानगी ही बायस है
इस उदासी का
पेड़ नंगे बदन झेल रहे हैं मौसम की मार
फिर भी खड़े हैं
कभी तो लगता है अब गिरे तब गिरे
लेकिन फिर-फिर उठ खड़े होते हैं
धूप को कोई छीन ले गया जबरन
कभी-कभी अपनी झलक दिखा
बता देती है कि उसने घुटने नहीं टेके हैं
लड़ रही है वह भी पूरी बहादुरी से
भला कोई कैद कर सका है उसे
बर्फ की मार से झुक गए हैं कुछ पहाड़ के कंधे
लेकिन सहेज कर रखी है ऊष्मा
उसने इन कठिन दिनों के लिए
नीचे कुछ उदास मंथर सी नदी से कहता है
रुकना मत
सब जूझ रहे हैं अपने-अपने मोर्चों पर
एक दिन लौटेंगे सब एक साथ
और बदल देंगे वक़्त के मिजाज़ को ।
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प्रतीक्षा-4

धरती के बहुत से हिस्से
प्रतीक्षा में हैं हमारी
बहुत से रंग बैठे हैं चुपचाप
मेरी कविताओं के बादल
हवा, पहाड़ और नदियाँ
ज़िंदा हो उठने को बेताब हैं।
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डॉ. रूपाली सिन्हा ने गोरखपुर विश्वविद्यालय से त्रिलोचन के काव्य पर पीएचडी की है। लगभग बीस वर्षों तक दिल्ली में अध्यापन करने के बाद पिछले दो वर्षों से बाकू, अज़रबैजान की एक यूनिवर्सिटी में अध्यापन कर रही हैं। सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों से हमेशा ही गहरा सरोकार रहा है। इनकी कविताएँ, लेख, समीक्षाएँ और अनुवाद विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में प्रकाशित होते रहते हैं। डॉ सिन्हा का मानना है कि कविता मन की अभिव्यक्ति के साथ-साथ दुनिया को बदलने और उसे बेहतर बनाने की कोशिश का एक हिस्सा है।

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