कविता: समय की अंगुली पर

शशि बाला


समय की अंगुली पर
अनवरत घूमता यह ब्रह्मांड
ग्रह नक्षत्र सारे
साथ साथ घूम रहे हैं
कितनी ही पृथ्वी चंद्रमा
कितने कितने तारे
कितने ही बोधिवृक्ष
कितने ही कल्प तरु
और न जाने कितने ही सवाल
उत्पन्न होते
छिटकते बिखरते
लुप्त होते और फिर से जन्म लेते हैं
कोई भी हृदय
जो बिंध जाएगा
इन सवालों के तीक्ष्ण प्रहार से
ढूंढ लेगा कोई बोधिवृक्ष
या कि कोई भी वृक्ष
जो अपनी पनाह में रख लेगा
उस कातर हृदय को
बन जाएगा बोधिवृक्ष
हाँ, सवाल उठने चाहिए
भावनाओं के उसी प्रवाह के साथ
तरंगों की उतनी ही तीव्रता के साथ
जिनके जबाब ढूंढने आवश्यक हो जाएं
जो लेने न दें चैन की साँस
जो पल पल बेधते रहें शूल बनकर
फिर इसी ब्रह्मांड में मिल जाएगी
कोई राजकुमारी यशोधरा भी
बाँट लेने को जिम्मेदारियों के बोझ
आधा-आधा
संभाल लेने को उसके हिस्से के कर्तव्य
पूरे के पूरे
और मुक्त कर देने को
हर प्रेम पाश से देवी बन कर
तभी होगी  कोई साधना पूरी
तभी कोई वृक्ष बन पाएगा बोधिवृक्ष
तभी अमर होगा पृथ्वी का वह टुकड़ा
तभी बन पाएगी कोई आत्मा
महात्मा और
कोई बुद्ध महात्मा बुद्ध...

अवकाश प्राप्त भारतीय स्टेट बैंक अधिकारी, 104, जुलू पार्क हजारीबाग झारखण्ड 835301

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