राजस्थानी लोक साहित्य में लोकगीत

- पिंकी पारीक

असिस्टेन्ट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, वनस्थली विद्यापीठ (राजस्थान)


सारांश: लोक-साहित्य वस्तुतः लोक की मौखिक अभिव्यक्ति है। यह साहित्य अभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता और पाण्डित्य की चेतना से परे होता है। इसमें समूचे लोक-मानस की प्रवृत्ति समाई हुई रहती है। राजस्थानी लोक-साहित्य भारतीय लोक वाङ्मय की विशिष्ट सम्पदा है। इसी राजस्थानी लोक-साहित्य के समग्र सामाजिक महत्व और उसके साहित्यिक सौन्दर्य को समझने के लिए लोकगीत बड़े सहायक है।

लोकगीतों की दृष्टि से यद्यपि भारत के प्रायः सभी राज्य सम्पन्न है तथापि राजस्थानी लोकगीतों में जो भावुकता, संवेदनशीलता, प्रेम, करूणा तथा भाषाई लालित्य है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। यहाँ के लोकगीतों में सामाजिक संबंधों, लोकोत्सवों तथा लोक जीवन के विश्वासों को अत्यनत सजीव अभिव्यक्ति मिलती है। कल्पना और भावुकता के साथ-साथ इसमें यथार्थ का भी दिग्दर्शन कराया गया है। इसमें गेय तत्व भी है और संदेश भी। हम राजस्थानी लोक गीतों को सुनकर संयोग और वियोग का हृदय-स्पर्शी भावो-मेष गहराई तक अनुभव कर सकते हैं। यही कारण है कि जहाँ राजस्थानी गीत भारत के अन्य प्रांतों के गीतों से भिन्न रखे जाते हैं।

 लोक-साहित्य वस्तुतः लोक की मौखिक अभिव्यक्ति है। यह साहित्य अभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता और पाण्डित्य की चेतना से परे होता है। यह किसी व्यक्ति विशेष की कृति ना होकर परम्परागत मौखिक क्रम से अतीत से वर्तमान और वर्तमान से भविष्य में संचरित होता रहता है। लोक साहित्य में समूचे लोक-मानस की प्रवृत्ति समाई हुई रहती है।

 राजस्थानी लोक-साहित्य भारतीय लोक वाङ्मय की विशिष्ट सम्पदा है। राजस्थानी भाषा की मारवाड़ी, ढूँढाडी, मालवी, मेवाती, बागड़ी बोलियों में रचित यह साहित्य राजस्थान प्रदेश के निवासियों के कण्ठ-कण्ठ में विराजमान है। समय-समय पर इसको लिपिबद्ध भी किया जाता रहा है। राजस्थान लोक-साहित्य की विधाओं यथा- लोकगीतों, लोक-कथाओं, लोक-गाथाओं, लोक नाट्यों (ख्याल), कहावतों, पहेलियों, सलोकां, पड़ो, तन्त्र-मंत्र आदि का लोक वार्ताशास्त्र की आधुनिक दृष्टि से समीक्षण एवं आंकलन भी किया गया है, यही कारण है कि आज हमें इनका वैज्ञानिक-विश्लेषण- विवेचन उपलब्ध है।

 राजस्थान लोक-साहित्य के समग्र सामाजिक महत्त्व और उसके साहित्यिक सौन्दर्य को समझने के लिए उसकी विभिन्न विधाओं में से राजस्थानी लोकगीतों को लेते हैं।

 लोकगीत लोककण्ठ की धरोहर है। एक कण्ठ से दूसरे कण्ठ, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचने वाले लोकगीत शब्द और स्वर के दोहराव से संचरित होते हैं।

 लोकगीतों के मूल में समष्टीगत अभिव्यक्ति होती है। लोकगीतों में हृदय की स्पष्ट, सच्ची , बेलाग वाणी उच्चरित होती है। लोकगीत किसी एक व्यक्ति की रचना ना होकर, समूहगत रचनाशीलता का परिणाम है। जीवन को अखण्डित रूप से देखने की दृष्टि लोकगीतों में जबरदस्त होती है। डॉ. सत्येन्द्र लोकगीत की परिभाषा देते हुए लिखते हैं– "वह गीत जो लोकमानस की अभिव्यक्ति हो अथवा जिसमें लोक मानसाभास भी हो, लोकगीत के अन्तर्गत आयेगा। " 1

 लोक गीतों में जनता के हृदय की सहज भावनाएँ अत्यन्त सरल रूप में प्रकट होती है। उनमें किसी प्रकार की कृत्रिमता नहीं मिलती। यही कारण है कि जहाँ राजस्थान लोक साहित्य का रत्नाकर है वहीं यहाँ के लोकगीत उसका एक परिपुष्ट अंग है। "लोकगीत उन लोगों के जीवन की अनायास प्रवाहात्मक अभिव्यक्ति है , जो सुसंस्कृत तथा सुसभ्य प्रभावों से बाहर रहकर कम या अधिक रूप से आदिम अवस्था में निवास करते हैं।" 2

 यहाँ का लोकमानस और लोक जीवन राजस्थानी लोकगीतों की पृष्ठभूमि है। यहाँ के सामाजिक, पारिवारिक और लौकिक जीवन का कोई पहलू ऐसा नहीं है जो लोकगीतों की स्वर लहरी से अछूता रह गया हो। जीवन का आनंद, उत्साह और मानवीय संबंधों का अनंत प्रवाह इन गीतों में मुखर हुआ है। प्रकृति और पुरूष के संबंधों, हास्य व रूदन की भावपूर्ण अभिव्यक्ति तथा लोक जीवन के सभी रसों को हम राजस्थानी लोकगीतों में देख सकते हैं।

 राजस्थान के लोकगीतों में कुरजाँ, कौआ, हँस, पपीहा, मोर, सूआ (तोता), सारस और सोन चिरैया जैसे पक्षी प्रेमी-प्रेमिकाओं, प्रियतमों, विरहणियों आदि के सुख-दुःख की स्थितियों में संदेशवाहक बने हैं। पारिवारिक जीवन के साथ-साथ काम और शृंगार भी इन गीतों का आधार रहे हैं। इन गीतों में स्वच्छन्दता है किन्तु उच्छृंखलता नहीं है।

युवा दम्पत्ति के बीच भी निर्मल प्रेम की धारा सर्वत्र प्रवाहित होती दिखाई देती है। जैसे-
उड़ उड़ रे म्हारा काळा रे कागला,
जद म्हारा पीऊजी घर आवै।
खीर खांडरो जीमण जिमाँऊ,
सोने सँ थारी चोंच मढ़ाऊ। जद म्हारा . . . .
उड़ उड़ रे म्हारा काळा रे कागला
जनम जनम थारा गुण गाऊँ। जद म्हारा . . . .

राजस्थानी लोकगीतों के वर्गीकरण का आधार इस प्रकार है -
 1. उत्सव व त्यौहार के गीत
 2. लोक देवी-देवताओं के गीत
 3. परिवार के गीत
 4. संस्कारों के गीत
 5. विविध गीत

 राजस्थानी लोकगीतों की भावभूमि बड़ी व्यापक है। जीवन का ऐसा कोई पहलू या पक्ष नहीं, जिस पर राजस्थानी लोकगीत ना मिलते हो। प्रकृति की सुकुमारता और कठोरता, संगीत और रूदन दोनों उसके जीवन में है।

राजस्थान के किसान ने बादल के गीत गाये हैं - पुरवा और सूरया पवन के गीत गाये हैं। बिजलियों के सौन्दर्य को अपनी गीतों में बाँधा है। सूरज, चाँद तारे उसके गीतों के मुख्य उपकरण हैं, जीवन की प्रेरणायें हैं। वे लोकजीवन की करूणा और सरस अभिव्यक्ति के सबल माध्यम बन कर लोकगीतों में अवतरित हुए हैं। भारतीय जनता के प्रत्येक मांगलिक कार्य के प्रारम्भ में उसकी निर्विघ्न सम्पन्नता के लिए विनायक का स्मरण करती है। यहाँ सभी कार्य गणेश-पूजा से प्रारम्भ होते हैं। राजस्थान का विनायक लोकगीत यहाँ के वैवाहिक गीतों में सर्वप्रथम है -
"गढ़ रणतभँवर से आवो विनायक
करो एक न चीती बिडदडी
बिडद विनायक दीनँ जी आया
आय पवाया सील्लै बड़ तल्लै।

ऊँची सी मैड़ी लाल किवाड़ी
 केल्ल झबर कै लाडेला रे बारणे। "3
राजस्थानी लोकगीत में ‘पील्लो ’ भी शामिल है। जिसका शाब्दिक अर्थ पीले रंग का अै। ‘पिल्लो राजस्थान महिलाओं के ओढ़ने के उस वस्त्र का नाम है जिसे केवल पुत्रवती स्त्रियाँ ही ओढ़ती है।
दिल्ली ए सहर सै साबा पोत मँगावो जी,
तो हाथ इकीसी गज बीसी गडमारू जी
पील्ला रंगाद्यो जी। " 4

विवाह के गीतों में ही एक विशिष्ट वर्ग ‘भात ’ के गीतों का है। भात की परम्परा भी गीत गाकर पूर्ण की जाती है। ये गीत बड़े ही सरस तथा मार्मिक है।
सूती ओ बीरा निस भर नींद ज ओ,
देवर मसलो बीरा राल्लिजो जी।
करती ए भावज बीराँ रो गुमान ज ए,
वीर बत्तीसी थारा ले रया जी।
मनडै़ में ओ बीरा आई ऊँची नीची पाल्ल ज ओ,
ले घड़लो सरवर गई जी।

 इसी के साथ विरह के गीत भी राजस्थानी लोकगीत में शामिल है। पतिव्रत्य और निर्मल प्रेम का वर्णन सर्वत्र है। विरहिणी प्रिय की प्रतीक्षा में नैशजागरण कर रही है - पलक पावड़े बिछाये -
 चांदड्लो गयो भंवरजी गढ़ गिरनार और रसीला
 कोई किरत्थां तो झुक आई रे गढ़ कांगरे।
राजस्थानी लोकगीतों में स्थानीय वनस्पति का भी अच्छा वर्णन हुआ है -

खेजड़ी, पीपल, बड़, नीम आदि को उपमा और कहीं-कहीं रूपक के रूप में भी लोकगीतों में बाँधा गया है। चमेली, मोगरा, हजारा, गुलाब आदि फूल उपमान और उद्दीपन बनकर इन लोकगीतों में आये है। केला, अनार, नींबू, नारंगी, दाख आदि फल शृंगार वर्णन के उपमान बने हैं।
‘ल्यावो रंग रंसीया गहरो जी फूल गुलाब को ’

राजस्थानी लोकगीतों में वात्सल्य और शृंगार का वर्णन अधिकता से हुआ है। लोरियाँ, हालरे, वात्सल्य रस प्रधान है। इनमें माँ ने अपने शिशु को अच्छा नागरिक बनने का उदबोधन भी दिया है। वीर लोरियों में माँ अपने शिशु का वीर योद्धा के रूप में स्वप्न देखती है। तलवार की टंकार और पायल की झंकार दोनों को ही राजस्थानी गीतों में समुचित स्थान मिला है।

राजस्थान के लोकगीतों का परिवेश बड़ा व्यापक है। इतना ही व्यापक जितना हमारे सामाजिक तथा धार्मिक जीवन का। श्रम तथा प्रतिष्ठा को लेकर भी अनेक लोकगीत रचे गये हैं। मानव जाति के श्रम जनित कार्य संगीत पर टिके हुए हैं। उसका सम्पूर्ण जीवन ही संगीत की झंकार है।
देवन ने भौजाई बावलनी दांतलियो
दुधांरा पियाकड, देरवजी, आवण दो दांतलियो
छाछांरी पियाकड, भावज आवण दो दांतलियो
सासू रा चूग्योड़ा, देवर आवण दो दांतलियो

उपर्युक्त गीत अंश राजस्थानी लोक-जीवन के श्रममय पक्ष को प्रकट करता है। राजस्थानी लोकगीतों को लेकर डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी का कथन द्रष्टव्य है "लोकगीतों की एक-एक बहु के चित्रण पर रीतिकाल की सौ सौ मुग्धायें खण्डितायें और धीरायें निछावर की जा सकती है क्योंकि ये निरलंकार होने पर भी प्राणमयी है और वे अलंकार से जड़ी होने पर भी निष्प्राण है। " 5

अतः कहा जा सकता है कि राजस्थानी लोकगीतों में धार्मिक आस्था भी है और परम्परा के प्रति समर्पण भाव भी। श्रम की प्रतिष्ठा भी हुई है और धार्मिक मान्यताएँ शकुन-अपशगुन का विचार भी। सुख-दुःख में लोक मानस के आधार पर देवी-देवताओं यथा-विनायक गौरी, शीतला माता और भैरूजी आदि की प्रार्थना और गुणगान भी लोकगीतों में हुआ है। विशेष बात यह है कि यह प्रार्थना व्यक्तिगत ना होकर समूचे समाज की होती है। उत्सव व त्योहारों के गीतों में भी यह समूह के जीवन का हर्ष और उल्लास व्यक्त होता है।

संदर्भ ग्रंथ: 
 1 . लोक साहित्य विज्ञान - डॉ. सत्येन्द्र, पृ.सं. 390
 2. Dr. Kunj Bihari Das, A Study of Orission Folk
 3. राजस्थान के लोकगीत - प्रथम भाग से
 4. लोक साहित्य की सांस्कृतिक परम्परा - डॉ. मनोहर शर्मा
 5. राजस्थान की सांस्कृतिक परम्परा - डॉ. जयसिंह नीरज, डॉ. भवगती लाल शर्मा 

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