व्यंग्य: गंगा गूंगी है

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

नमामि गंगे, नमामि नर्मदे, नमामि राजनीति। नदियाँ पूजनीय हैं क्योंकि उनमें हमारी लाशें, धार्मिक आस्थाएँ और गंदगी बेरोकटोक बहती है। हम उनमें स्नान कर पाप धोते हैं, कितने चतुर हैं हम कि शरीर के पसीने और मैल को पाप मानते हैं और गंगा में डाल आते हैं। हम नदियों में गंदगी डालने का उत्सव कुम्भ सामूहिक श्रद्धा के साथ मनाते हैं, नागा साधु उनमें डुबकी लगा कर मोक्ष ढूँढते हैं, और राजनेता अपने वोटरों के लिए धर्म का चारा। धन्य हो गंगे, आपमें डुबकी लगा कर हम स्वच्छ हो जाते हैं, आपका क्या होता है महादेव जाने। हम गंगा को माँ मानते है। "माँ" कहने भर से उसके अंक में मलमूत्र त्यागने का लाइसेंस मिल जाता है। हम इधर अपवित्र त्यागते हैं, वह पवित्रतर हो जाती है। नदियों के प्रति हमारी धार्मिक भावनाएँ बाढ़ के उफान की तरह अंधी हैं। जो फेंकना है, स्वाहा कर के नदी में डाल दो, मूर्तियाँ, अस्थियाँ, राख, फूल-पत्तियाँ, रसायन, पॉलिथीन, स्वर्गीय पशु आदि। हम भोग लगा रहे हैं, सतकर्म कर रहे हैं, नदी नहीं पचा पाए तो हमारा क्या दोष! हमारा अर्पण, शास्त्र और पुराण सम्मत है।

सरकार अपने राजशाही दिमाग़ से पार्टी हिताय सोचती है, चंदा लुभाय सोचती है। वह गंगा किनारे सार्वजनिक मूत्रालय नहीं बना सकती पर दिल्ली में मंत्रालय ज़रूर बना सकती है। इसलिए गंगा मंत्रालय बन गया है, वह गंगा की आरती करवा रहा है। पास ही में भारी उद्योग मंत्रालय है, वह आँखे बंद कर भारी मन से परमिट दे रहा है। इस परमिट का दामन थाम कर उद्योगपति नदियों में विषैले रसायन छोड़ सकते हैं। इन दोनों के बीच पर्यावरण मंत्रालय है, गाँधीजी का तीसरा बंदर। भोलाभाला है बेचारा, कहता है - तुम गंदा करो हम साफ़ करेंगे, तुम पेड़ काटो हम पौधे रोपेंगे, तुम पाप धोओ हम वोटों का पुण्य कमाएँगे और बुद्धिजीवियों तुम विरोध करो हम उपकृत करेंगे, पुरस्कृत करेंगे।

पिछली सदी तक आदमी गुपचुप, आदमियों और जानवरों को ज़हर देता था। अब वह खुलेआम जल, जंगल और ज़मीन को जहरीला बनाता है और इसके जश्न में पर्यावरण दिवस मनाता है। घाटों से फूलमालाएँ और प्लास्टिक की बोतलें साफ़ हो रही हैं, घाट सुंदर दिख रहे हैं, पर पानी का जहरीलापन बढ़ रहा है। सफाई का कड़वा सच है उद्योगों की सीवर लाइनें।  उद्योग मालिक रसायनों का उपचार कराए बिना विषैले पानी को बेधड़क नदी में छोड़ देते हैं, वे जानते हैं नदी गूंगी है। उद्योग निरीक्षक वेतन सरकार से पाते हैं और उद्योग मालिकों से क्या मालूम क्या पाते हैं कि वे उनका मलमूत्र सब पचा जाते हैं।

खरी-खोटी पीएमओ जाने, वैज्ञानिक कहते हैं कि गंगा किनारे जो जल शोधन प्लांट लगे हैं वे अफसरशाही जैसे अक्षम हैं। जो विष और रसायन छँटना चाहिए वे पकड़ में ही नहीं आते, बिना रिश्वत दिए ही गंगा में मिल जाते हैं। कुछ ही प्लांट ईमानदारी से प्रोसेस करते हैं पर वे इतने छोटे हैं कि इतनी बड़ी गंगा को ठीक नहीं कर सकते। सच कहूँ तो उद्योगपति सरकार को दुधारू गाय समझते हैं, सरकार को चारा डालते हैं और सब दूध समेट लेते हैं, जो बचता है वह गोबर और गौमूत्र सरकार सम्हाले। गंगा सफाई मामले का यह पहला कड़वा सच है।

दूसरा कड़वा सच व्यंग्य नहीं, तथ्य बयानी है। गंगा बहुत बड़ी नदी है, सारे साल सरकारी गति से सफाई चलती है, बारिश होती है, बाढ़ आती है। अधिकांश पानी बह कर समुद्र में चला जाता है। जो बच जाता है वह है सहायक नदी-नालों से बाढ़ में बह कर आये पशु तथा गंदगी से युक्त पानी। साल के शेष महीनों में फिर से इकठ्ठा होता है उद्योगों द्वारा छोड़ा गया दूषित जल। इस तरह राम, तेरी गंगा फिर मैली हो जाती है। 

मैं नदियों को ले कर उनसे मिला। वे बड़े और जिम्मेदार राजनेता हैं, देश के नीचे बात ही नहीं करते। मैंने सारे देश की व्यथा उनके सामने रखी। वे बोले “जनता ने सिर्फ मांगना ही सीखा है, पहले रोटी, कपडा और मकान माँगती थी, अब साफ़ हवा और पानी माँगती है, स्वच्छ सरकार माँगती है। माँगने की भी सीमा होनी चाहिए। हम एक-दो पैसे की छूट पेट्रोल में दे सकते हैं, आपका वोट पाने की लालच में पंद्रह लाख का वादा कर सकते हैं, और कितना झूठ बुलवाना चाहते हैं आप।” फिर वे समझाने लगे “यह संतुलित विकास का युग है। आपको विकास चाहिए तो जंगल काट-काट कर उद्योग लगाना होंगे।  रोज़गार चाहिए तो अंधाधुंध शहर बनाने होंगे। भले धुएँदार ठीकरा गाड़ियाँ हों, बम्पर टू बम्पर ट्राफिक हो, सड़कों पर गाड़ियाँ तो दौड़ाना होंगी। विकास बलि माँगता है हवा की, पानी की, प्रकृति की। विकास, विकास है; गंगा, गंगा है। मैं आज ही बयान दूँगा, बड़ा बयान दूँगा, गंगा तत्काल साफ़ हो।” बड़े-बड़े शीर्षकों के साथ उनका बयान छपा। लोग उनका बयान गंगा में डाल गए। बयान ने गंगा को और गंदा कर दिया। उनको भी मालूम था, उनका बयान नासमझ आशावादियों को बहकाने का एक तरीका है। यदि राजनीति इतनी उज्जवल होती तो बैंकों की बजाय नदी-नाले साफ़ हो गए होते।

जब भी देश को ले कर, प्रशासन को ले कर कोई बड़ी चिंता हो, बड़े बाबू से आप अंदर-बाहर की सटीक जानकारी पा सकते हैं। वे भले आयएएस न हुए हों पर अपने जीवनकाल में दस-बीस आयएएस को चरा चुके होते हैं। वे योजना विभाग के बड़े बाबू हैं, सरकार से सुसंगत ऐसी योजना बनाते हैं कि कोई माई का लाल उस योजना को अंजाम नहीं दे सकता। वे कहने लगे "हम योजनाकार हैं, मज़दूर नहीं कि सीधे नदी में उतर जाएँ। हमारा काम करदाताओं के पैसों को योजनाबद्ध तरीके से ठिकाने लगाना है। हमने सफाई के लिए बहुत बड़ा सालाना बजट दिया है। सभी विभागीय लोग ख़ुश हैं, सफाई ठेकेदार ख़ुश हैं। एमए-बीए पास बेरोज़गार ख़ुश हैं कि नई सरकारी नौकरियाँ निकलने वाली हैं, भले ओहदा सफाई निरीक्षक का ही क्यों न हो, सरकारी नौकरी में माल है!”

“और भईये सुन, हज़ारों-लाखों सालों की गंदगी गंगाजी-यमुनाजी में पड़ी है, उसे प्रशासन बस पाँच साल में साफ़ करा दे! क्यों भाई? सफाई करा दी तो खाने-पीने का यह अक्षय स्रोत ही सफ़ा हो जाएगा! गंगा-यमुना साफ़ हो गई तो राजनीतिज्ञ क्या करेंगे, उनका तो एक जीवंत मुद्दा ही ख़तम हो जाएगा।  हमको क्या कालिदास समझ रखा है कि हम उसी डाल को काट दें, जिस पर हम बैठे हैं। तुम बुद्धिजीवी लोग फालतू में गुटरगूँ करते हो, अरे गंगा को शिकायत है तो गंगा बोले।” वे जानते हैं गंगा हमारी आस्था है, हमारी माँ है पर गंगा गूंगी है।
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