लघुकथाएँ: मार्टिन जॉन

मार्टिन जॉन

1. हमदर्दी


जैसी, अखबारों में रोज़ छपती हैं, वैसी ही एक ख़बर थी। शहर के व्यस्त चौराहे पर एक बाइक और एक कार आपस में टकरा गई। टक्कर इतनी ज़ोरदार थी कि बाइक वाले की तत्काल मौत हो गई और पीछे बैठी उसकी पत्नी बुरी तरह ज़ख़्मी हो गई।
ख़बर पढने के बाद वह कुछ ज़्यादा ही ज़ज्बाती होकर पिघलने लगा। बार–बार उसकी आँखों के सामने बाइक वाले की पत्नी की दहाडें मारकर रोती-कलपती तस्वीर आ जाती और वह बेचैन हो जाता।

अब क्या होगा? अगर उनके बच्चे हैं तो बिन बाप के बच्चों की परवरिश कैसे होगी? शायद पत्नी पढ़ी-लिखी हो, … तब तो नौकरी मिल जायेगी। अगर नौकरी नहीं मिली तो? ... शायद कुछ बैंक बैलेंस हो! अगर बैंक बैलेंस भी न हो तो ... कुछ ज़मीन जायदाद तो होगी। ... लेकिन, अगर वह भी न हुई तो?

उद्वेग की अवस्था में वह ऑफिस गया। काम में मन नहीं लगा पाया। यहाँ भी उसकी मनोदशा यथावत रही। कई सहकर्मियों से उसने इस घटना का ज़िक्र किया। सब ने मुँह बिचका दिए। वह सोचने लगा – लोग कितने ग़ैर ज़ज्बाती और बेदर्द हो गए हैं। सब के सब ‘स्व’ के संसार में जी रहे हैं। कोई किसी का दुःख समझने और महसूस करने को तैयार नहीं। काश, अखबार वाले हादसे के शिकार उस बदनसीब व्यक्ति का नाम-पता छाप देते तो वह वहाँ ज़रूर जाता। हमदर्दी के दो बोल बोलने से क्या फर्क पड़ता है। आखिर इंसानियत भी कोई चीज़ होती है। 
                             
रात को जब वह अखबार में छपी इस ख़बर पर दुबारा नज़र फिरा रहा था उसके घरेलू सेवक श्यामू ने उसे टोका, “आप गए नहीं?”

“कहाँ?”

आपको मालूम नहीं, कल रात नवेन्दु बाबू का एक्सीडेंट हो गया। बचे नहीं। उनकी पत्नी अभी भी अस्पताल में भर्ती है।”

“कौन नवेन्दु बाबू?”

“अपने ब्लॉक में ही तो रहते हैं। शायद रेलवे में हेड क्लर्क हैं। सुबह से लोग-बाग आ-जा रहे हैं,  पडोस का मामला है!”

“ओह... तो उसी की ख़बर है ये। अब तो रात हो गई, कल सुबह देखते हैं।”

सुबह हुई। श्यामू ने याद दिलाया तो वह झुंझला गया, “अरे भई , कैसे जाऊँ बिना जान-पहचान के?”
श्यामू उसे अवाक् देखता रह गया।


2. ख़िताब


“...जो भी हो, सुदेश बाबू जैसे निहायत शरीफ़ रेलकर्मी रेल महकमे में बहुत कम ही देखने को मिलते हैं।”

“यकीनन।”  दूसरे यात्री ने उसकी बात का समर्थन कर अपनी बात को आगे बढ़ाया, “ अरे, मैं तो लगभग पाँच महीने से इसी ट्रेन से ‘अप एंड डाउन’ कर रहा हूँ लेकिन कभी भी उन्होंने मुझसे ‘टिकट प्लीज’ नहीं कहा।”

“यह तो कुछ भी नहीं। एक बार तो...” तीसरा यात्री सुदेश बाबू को शरीफ़ साबित करने के लिए एक वाक़या सुनाने लगा।
दूसरा दिन, वही ट्रेन, वही कम्पार्टमेंट, बिना टिकट यात्री। बदले चेहरे, लेकिन जाने-पहचाने। बातचीत का सिलसिला इस तरह शुरू हुआ, “... लगता है, सुदेश बाबू बहुत कामचोर हैं।”

“कामचोर ही नहीं, अपनी ड्यूटी के मामले में गैरजिम्मेदार भी हैं। ऐसे ही गैरजिम्मेदार कर्मचारियों की वजह से रेल महकमे को नुकसान उठाना पड़ता है।”

“हाँ भाई, आपने सही फरमाया। एक बार तो ...” और वह सुदेश बाबू को गैरजिम्मेदार साबित करने के लिए एक वाक़या सुनाने लगा।
तीसरा दिन, वही लोकल ट्रेन। टिकट चेकर सुदेश बाबू ने कुल तीस बिना टिकट यात्रियों से ‘फाइन’ वसूले। फाइन देने वाले बिना टिकट यात्रियों में आधे से अधिक उसके परिचित ही थे।

इसी बीच एक स्टेशन पर ट्रेन रुकी। टिकट चेकिंग के लिए दूसरे कम्पार्टमेंट में जाने को जैसे ही सुदेश बाबू उद्धत हुए किसी ने फ़िकरा कसा, “स्साला बड़ा वफादार चेकर बनता है। ... नौकरी क्या पा ली, दिमाग सातवें आसमान पर चढ़ गया। जान-पहचान, अपना-पराया सब भूल गया।”


3. ऊँची तालीम


वह एक सपना देखा करता था और उसे लोगों को बताने में संकोच नहीं करता, “देखना, हम अपने बेटवा को खूब पढ़ायेंगे... उसे बड़ा आदमी बनायेंगे!”

गाँव वाले उसकी हैसियत से वाकिफ़ थे। सो, उसकी इस इच्छा पर हँसने से बाज नहीं आते। लेकिन वह था धुन का पक्का। चार साल की उम्र में उसने अपने बेटे का क़रीब के गाँव के स्कूल में दाख़िला दिलवा दिया। ख़ुशकिस्मती से बेटे ने भी तेज़ बुद्धि पाई थी। उसने बेहतर अंकों से कक्षा-दर-कक्षा उतीर्ण करते हुए स्कूली पढ़ाई ख़त्म कर डाली। बाप का उत्साह बढ़ा। उसने अपनी ज़मीन गिरवी रख दी और बेटे को भेज दिया शहर ऊँची पढ़ाई के लिए।

अब वह सीना तान कर चलता। शान से कहता, “देखो बबुआ कॉलेज में पढ़ रहा है।”

उसकी बातों से गाँव वालों के सीने में साँप लोटने लगता।

दिन, महीने और साल गुज़रे। बेटे की ऊँची पढ़ाई ख़त्म हुई। नौकरी की तलाश का सिलसिला शुरू हुआ। उसका करियर संवरने वाला ही था कि इसी बीच उसका गाँव आना हुआ। वह आया और साथ में लाया ऊँची बातें,ऊँचे विचार। हालाँकि उसने गाँव और शहर दोनों को जिया था, एक लम्बे अंतराल के बाद जब वह इस बार गाँव आया तो पाया कि सरकारी योजनाओं से गाँव का चेहरा तो बदल गया है परन्तु बदलते वक़्त के साथ गाँव की ज़िंदगी में जो आंतरिक बदलाव आना चाहिए था वह कहीं नहीं है। वही भेद-भाव, ऊँच-नीच, छुआ-छूत, कुप्रथाएँ, बचकानी रीति-रिवाज, अंधविश्वास वगैरह-वगैरह।

उसे लगा उसकी ऊँची तालीम का सही इस्तेमाल का माकूल अवसर आया है। उसने इस मामले पर काफी सोच-विचार कर बदलाव का बीड़ा उठा ही लिया। बदलाव की दिशा में अपने कदम सबसे पहले अपने घर की ओर बढ़ाए। विरोध और बाधाओं के काँटे बिछाए गए उसकी राह पर। लेकिन वह मजबूती से बढ़ता गया।
बूढा बाप माथा पीटने लगा।  सपनों को बर्फ की तरह पिघलते और पानी की शक्ल में बहते देख वह बुझ सा गया। ऊँची पढ़ाई को लेकर बेटे की नज़र में जो मायने थे उसे समझने की कोशिश में सर पटकता रहा।
अब वह किसी से नहीं कहता है, “मेरा बेटवा कॉलेज का पढ़ाई किया है।“

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