सिक्किम की यात्रा

मनीष गोहिल

एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, आर्टस् एण्ड़ कोमर्स कॉलेज, धोलका-382225


मनुष्य जन्म एक प्रवासी का रहा है। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त वह एक सफर ही करता है। यह सफर ज़िन्दगी के साथ की होती है। मनुष्य अवतार मिला है, तो उसको व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। कुदरत ने इतना सारा वैविध्य इस पृथ्वी पर दे दिया है कि उसके खूबसूरत मंझर को देखने में भी शायद यह जन्म अधूरा रहे। मेरी जिज्ञासा यही रही है कि इस मनुष्य जन्म में जितना हो सके बस घूमता रहु। गुजराती के प्रसिद्ध साहित्यकार निरंजन भगत कहते हैं कि-"इस पृथ्वी पर मनुष्य गृहवासी बना, ग्रामवासी बना, नगरवासी बना उससे पहले वह गुफावासी था, वनवासी था और उससे पहले वह प्रवासी था, आज भी है। मनुष्य सतत प्रवासी रहा है और रहेगा। इस सदी के आरंभ में वह अवकाश यात्री बना है।... रवीन्द्रनाथ ने गाया है... आमि चंचल, आमिसुदूरेर पियासी..."1. सही में प्रवासी बनना मानो दुनिया को देखना।

जब से सिमला-मनाली की यात्रा की तब से लेकर लद्दाख की सफर तक पहाड ही पहाड देखे हैं। अत: पहाडियों पर घूमने का मेरा अनुभव अब विशेष हो गया है। हिमालय की पहाडियाँ को जो घूम लेता हैं, उसके लिए ओर पहाडियाँ घूमना आसान हो जाता है। एक बात है कि भौगोलिकता के हिसाब से हर पहाडी अपनी विशेष पहचान लिए हुए रहती हैं। जैसे लद्दाख की पहाडियाँ कोरे पत्थर और ऊपर बर्फ से सटी हैं, तो सिक्किम की पहाडियाँ पैड़ों से घीरी हुई हैं। यहाँ के पहाड़ पूरी तरह से हरेभरे दिख रहे हैं। पहाड है पर सारे के सारे घनी झाडियों से लदे हुए। इन पहाडियों को देखने पर मन तृप्त हो जाता है, आँखें हरीभरी हो जाती है। गुजराती के महान कवि उमाशंकर जोशी ने पहाडो को लेकर कविता लिखी है।-"भोमिया विना मारे भमवाता डुंगरा, जंगलनी कुंजकुंज जोवी हती, जोवी ती कोतरो ने जोवी ती कंदरा, रोता झरणांनी आंख ल्होवी हती... आखो अवतार मारे भमवा डुंगरिया, जंगलनी कुंजकुंज जोवी फरी, भोमियो भूले एवी भमवी रे कंदरा, अंतरनी आंखडी ल्होवी जरीऊँचाई"2 उमाशंकर की कविता व्यक्ति के घुमक्कड़पने को प्रस्तुत कर मनुष्य अवतार को व्यर्थ न गँवाने की बात करती है।

इस बार मैं भारत के सेवेन सिस्टर में जिसे गिना जाता है, ऐसे सिक्किम के सफर पर गया था। मेरा सफर बागडोगरा एयरपोर्ट से शुरू हुआ। हर बार की तरह मन में एक प्रकार की जिज्ञासा लिए मैं पश्चिम बंगाल के बागडोगरा एयरपोर्ट पर उतरा। सामान्य सा एयरपोर्ट है। जो हवाई सफर की ताज़गी पहली सफर में होती है, वह बाद की सफर में नहीं होती। मेरे लिए हवाई सफर अब एक रुटिन बन गया है। सो अब वो ताज़गी का एहसास नहीं रहता। बागडोगरा से करीबन चार घण्टे का रास्ता है गेंगटोक जाने का। दोनों के बीच की दूरी करीबन 123 कि.मी. की है। यह नेशनल हाइ-वे दस से जुडा है। गेंगटोक सिक्किम की राजधानी है और सिक्किम का सबसे बड़ा और आकर्षक शहर।

सिक्किम को सिखिम भी कहा जाता है। यह एक अंगूठे के आकार का राज्य है। सिक्किम पश्चिम में नेपाल उत्तर तथा पूर्व में तिब्बत जो अभी चीन के शासन में है और दक्षिण-पूर्व में भूटान से तथा पश्चिम बंगाल इसके दक्षिण में स्थित है। भौगौलिकता से यह राज्य तीनों ओर से देश की सीमा के लिए अत्यन्त संवेदनशील भू भाग में गिना जाएगा। मन में लम्बे समय से इच्छा थी कि कब पूर्वोत्तर भारत की यात्रा करूँ। जो अब पूरी हुई। मूलत: सिक्किम भारत के साथ आज़ादी के कई वर्षो बाद जुडा। तब तक सिक्किम में राजाशाही चल रही थी। सिक्किम पर नाम ग्याल वंश का राज था पर उनके ध्वारा प्रजा के साथ नाइन्साफी के चलते प्रजा में बगावत हुई और जनमत के द्वारा 1975 में भारत में विलीन कर दिया गया। तब से सिक्किम भारत का एक अभिन्न अंग बन गया है। सिक्किम को तिब्बती भाषा में चावल की घाटी से जाना जाता है। जबकि सामान्य लिम्बू भाषा के शब्द सु अर्थात् नवीन तथा ख्यिम अर्थात् महल या घर को जोडकर बना है। पूरा अर्थ होता है-नवीन महल या घर। यहाँ पर हिंदी, अंग्रेजी, भूटिया, नेपाली, लेप्चा, लिंबू प्रमुख भाषाएँ हैं। पर ज्यादातर व्यवहार अंग्रेजी में चलता है। यहाँ पर हिंदू और बौद्ध धर्म का प्रचलन विशेष है। पूरा सिक्किम बौद्ध मोनेस्टरी से भरा पडा है। सिक्किम का सुंदर नज़ारा रोड के किनारों पर लहराती रंगबिरंगी ध्वजाओं से खिल उठता है। ध्वजाओं ने मुझे याद दिला दी लद्दाख की। लद्दाख में भी बौद्ध धर्म के प्रतीक समान फरफराती ध्वजाएँ आँखों को एक प्रकार का सुकुन देती रहती थी।

बागडोगरा से हम भारत के नये घर की ओर प्रस्थान कर रहे थे। जैसे जैसे मेरी कार गेंगटोक की ओर पहाडी चढ़ रही थी वैसे वैसे वातावरण में एक ठंडक का एहेसास हो रहा था। मैं अहमदाबाद की पैंतालीस डिग्री गरमी से दौडता हुआ सिक्किम के ठंडे मौसम में पहुच रहा था। गेंगटोक में मई के महिने में भी करिबन चौदह से सोलह डिग्री तापमान रहता है। रास्ता घुमावदार था। हमारा ड्राइवर अनुभवी था सो ट्राफिक होने के बावजूद भी हमें पौने चार घण्टे में गेंगटोक हमारी होटल पर ले आया। रास्ते भर मैं ने मेरे टूर मैनेजर से कई बातों की जानकारी ले ली। उसके ध्वारा ज्ञात हुआ कि दुसरे दिन हमें नाथुला पास जाना है, पर नाथुला पास की परमिट मिलेगी तो ही हम वहाँ जा सकेंगे, परमिट नहीं मिली तो सिर्फ बाबा मंदिर तक ही जा सकेंगे। मैनेजर की बात ने मुझे थोड़ा निराश किया। पर एक अजीब आत्मविश्वास था कि हम नाथुला पास जाकर ही आयेंगे। सिक्किम गवर्मेण्ट ने कई स्थान पर जाने के लिए परमिट कम्पलसरी कर दी हैं। परमिट के बिना आप उन स्थानों पर नहीं जा सक्ते। होटल पर जाने के बाद मैनेजर मेरे कमरे में आया और दूसरे दिन के कार्यक्रम का ब्यौरा देकर मेरे पासपोर्ट फोटो और पहचान पत्र की प्रतिलिपि ले गया और कहता हुआ गया कि मैं नाथुला पास की परमिट के लिए प्रयत्न करता हूँ। मन में थोडी आशा बंधी जिससे खाने में थोडा मन लगा। अहमदाबाद से प्रात: चार बजे का निकला रात को पौने नौ के करीब गेंगटोक पहुचा था। होटल अच्छा साफ-सुथरा था।

भले हवाई सफर हो पर कनेक्टिविटी में समय काफी बर्बाद होता है। सिक्किम का अपना एयरपोर्ट नहीं है। पर अब सिक्किम का एयरपोर्ट तैयार हो चुका है, बस उसका उद्घाटन बाकी है। बाद में सिक्किम की सीधी फ्लाइट मिलेगी। हमारे देश में विकास के नाम पर सरकारे बन जाती है, पर जो प्रजा के साथ जुडी हुई बातें हो तो भी उद्घाटन नामक बिमारी को पकडकर रखना पडता है और विकास की धज्जियाँ उड जाती है। ड्राइवर से पता चला था कि एयरपोर्ट की टेस्टींग भी हो चुकी है। कुछ फ्लाइट लेण्ड और टेकऑफ भी हुई है। बस तैयार एयरपोर्ट उद्घाटन की राह देख रहा है। इधर मैं थका हुआ दूसरे दिन के सफर को मन में लिए सोने की तैयारी कर रहा था।

मेरे लिए सिक्किम की यात्रा महज़ एक यात्रा नहीं पर उससे कई गुना ज्यादा एक नये प्रदेश के बारे में जानना था। मैं कोई भी जगह मात्र घूमने के लिए नहीं जाता पर उस स्थान की भौगोलिकता तथा उस स्थान से जुड़ी सारी जानकारी को प्राप्त करना महत्वपूर्ण समझता हूँ। अत: यहाँ पर आने से पूर्व मैंने यहाँ की सारी जानकारी प्राप्त कर ली थी। प्रात: आठ बजे हमें तैयार रहने को कहा गया था। सो हम ब्रेकफास्ट करके होटल के लौन्ज में आ गये थे। आज गेंगटोक का मौसम बादलों से घिरा हुआ था। धूप अभी तक नहीं निकली थी। शरीर को ठंडी का एहसास हो रहा था। थोड़ी ही देर में हमारी कार आ गयी और हम लोग नाथुला के लिए रवाना हुए। कार गेंगटोक के संकरीले रास्तों पर धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी, पर मेरी आँखें तो शहर को देखने में पड़ी थी। पहलीबार सिक्किम की राजघानी को देख रहा था। संकरीले रास्तों से भरा हुआ शहर था। पूरा गेंगटोक रास्ते के किनारों पर पहाडियाँ काट काटकर बनाया गया था। घर का ऊपर का तल घर की छत भी हो सकता था या प्रवेश द्वार, बाद में नीचे ओर कमरे। ज्यादातर घर हों या होटल ऊपर से नीचे की ओर जाते हैं। मुझे पता चला कि यहाँ पर ट्राफिक के नियम बड़े कडे हैं, रखने पडे नहीं तो ट्राफिक जाम ही मिले। कोई भी गाडी ऑवरटेक नहीं कर सक्ती। आगेवाली गाडी के पीछे पीछे ही जाना है और बिना स्टेन्ड गाडी को रोका नहीं जा सकता। खासकर टैक्सीवालों को। पूरे शहर में पार्किंग की बहुत ही सीमित जगह है। प्राइवेट वाहन इसीलिए कम दिख रहे थे। शहर में ही कई जगह ऊँचे रास्तों से होकर मेरी कार नगर से बाहर आ गयी थी। अब मुझे दूर-दूर पहाडियाँ दिखायी देने लगी थी।

लगभग सत्तावन किलोमिटर की दूरी पर स्थित है नाथुला पास। पहाडियों में सफर लम्बा रहता है। सीधी-सी बात है कि गाडी की स्पीड औसतन पैंतीस-चालीस की ही रहेगी। सो सत्तावन किलोमीटर की दूरी तय करने में हमें करीबन पौने दो घण्टे लगे। ड्राइवर ने चांगु झील से पहले कार को रोक दिया। वहाँ पर कुछ दुकानें बनी हुई थी। जहाँ से हमें नाथुला के लिए हॉल बूट और जैकेट्स किराये पर लेने थे। क्योंकि नाथुला में बर्फ थी, सो बर्फ में चलने के लिए हॉल बूट की ज़रुरत पड सक्ती थी। मैं ने मात्र हॉल बूट ही लिए मेरे पास मेरा जैकेट था। हर पहाडी पर जहाँ ऊँचाई पर जाना होता है, बीच रास्ते में एसा स्थान आता ही है, जहाँ पर ये सारी चीज़ें मिलती है और साथ ही साथ ड्राइवर लोगो का कमीशन भी छूटता है। हम भी जानते हैं कि इन लोगों के लिए टूरिस्ट सिज़न ही कमाने के लिए होती है। मुझे मेरा पहला पहाडी सफर याद आ गया जो था रोहतांग का। वहाँ पर भी हमारे ड्राइवर ने हमें बर्फ के बूट और जैकेट्स किराये पर दिलवाये थे। अब हम नाथुला पास के नज़दिक आ गए थे। रास्ते में दो स्थान पर परमिट के हिसाब से कार और यात्रिओं को चेक किया गया। जैसे जैसे हम ऊपर जा रहे थे मौसम कोहरे से सटा मिल रहा था। कार के बाहर रास्ते के किनारे पर बर्फ दिखायी देने लगी थी। चारों ओर फैली पहाडियों पर बर्फ दिखायी देने लगी थी। रास्ता धुंध से सटा था। कार से उतरने से पहले ही मैंने जैकेट पहन लिया था।
मैं उस स्थान पर खड़ा था जो भारत का अंत्तिम उत्तर-पूर्वी हिस्सा था। यह भाग समद्र सपाटी से 14,140 फूट पर स्थित है। आगे चीन की सीमा शुरू हो रही थी। वास्तव में यह सीमा तिब्बत की है। पर चीन ने कुछ सालों से अपने साथ जोड दिया है। नाथुला पास को नाथुला दर्रा से भी जाना जाता है। यह भारत और चीन का ज़मीन से जुडा भाग है। यह दर्रा दक्षिण में तिब्बत की चुम्बी घाटी से जुडता है। सन् 1962 में भारत और चीन के बीच हुए युद्ध के बाद इसे बंद कर दिया गया था। पर बाद में दोनों देशों के बीच के सौहार्द भरे संबंधों को देखकर 5 जुलाइ 2006 में व्यापार हेतु खोल दिया गया। हमारे लिए यह रास्ता इसलिए भी महत्त्वपूर्ण रहा है, क्योंकि कैलाश मानसरोवर की यात्रा इस रास्ते से भी होती है। अत: हमारी श्रद्धा का मार्ग रहा है नाथुला दर्रा। इस बार कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए पुन: इस रास्ते को खोल दिया गया है। पिछली बार भारत-चीन के बीच दोकलाम विवाद के चलते चीन ने इस रास्ते को बंद कर दिया था। इस दर्रे को प्राचीन रेशम मार्ग की एक शाखा भी कहा जाता है। क्योंकि एक समय इसी रास्ते से भारत का दुनिया के अन्य देशों के साथ रेशम का व्यापार होता था। मैं एसे प्रचीनतम रेशमी मार्ग पर खडा था। वास्तव में आज यह रास्ता रेशमी बन गया था बर्फ की वजह से।

मैंने नज़र घुमाई तो चारों तरफ बर्फ ही बर्फ थी। साँय-साँय करती हवा चल रही थी। कार से नीचे उतरते समय शरीर को संतुलित करना ज़रूरी था। थोडे पल मैं रुका रहा। आर्मी जवानों के अलावा उस समय ओर कोई नहीं था। हम ही पहले आ गए थे। मुझे बताया गया कि सामने के टीले पर जाना है। टीला पूरी तरह से बर्फ से लदा हुआ था। अब मेरे हॉल बूट काम आ रहे थे। जैसे ही मैं ने चढ़ना शुरू किया तो क्षणभर लगा कि मुझे कुछ हो रहा है। शरीर में कुछ अजीब-सा लग रहा है। मैं रूक गया और अनुभव से सीखी बातों से आराम से लंबी सांसे लेने लगा। हाँ, अब ठीक लग रहा था। बस फिर तो बर्फ के टीले पर चढ़ना शुरू कर दिया। बर्फ इतनी थी कि पैर का पंजा पूरा बर्फ में धंस रहा था। धीरे धीरे करके मैं बीच में बने आर्मी के केफेटेरिया में जा पहुँचा। आर्मी ज़वान ने प्यार से कहा कि सा'ब गरमा गरम चाय कॉफ़ी लीजिए और फिर ऊपर जाइए। ठंड भरे मौसम में शरीर को कॉफ़ी की जरुरत थी, सो कॉफ़ी पीने के लिए ओर्डर दे दिया। कॉफ़ी बनानेवाली लडकी को मैं पहचान गया। वह मेरे साथ चेक पोस्ट से आर्मीं के अफ़सर के कहने पर हमारी कार में यहाँ आयी थी। पता चला कि वे रोज़ यहाँ आते हैं। बताया गया कि यहाँ से जो भी कुछ खरीदते हैं वह आर्मी के फंड में जमा होता है। खुशी हुई कि मैं जो कॉफ़ी पी रहा था उसके पैसे भी आर्मी फंड में जमा होंगे। लौटते वक्त मैं ने इसीलिए एक तैलचित्र खरीदा, जो नाथुला दर्रे का मानचित्र था, पर मैं उसे कार में ही भूल गया। कॉफ़ी ने थोडी राहत दी। अब मैं फिर से आगे बढ़ रहा था। थोडी ही ऊँचाई पर वह स्थान था, जो भारत का अंतिम ज़मीनी स्थान था। भारतीय सेना ने यहाँ पर अपनी चौकियाँ बनायी हैं। एक मात्र रस्सी से और छूटपूट तार की फ़ेंसिंग से दो देश, भारत और चीन सीमांकित खड़े थे। मैं जहाँ खड़ा था वहाँ से दो फ़ुट की दूरी पर चीन था। मैं उस धरती को छू भी सकता था पर भारतीय सैनिक की सूचना के कारण हम उससे दूर रहे। आर्मी के जवान हम लोगों को वहाँ की भौगोलिकता की जानकारी दे रहा था। कुछ दूरी पर एक पहाडी की ओर इशारा करते हुए बताया कि वह पहाड़ी भारत में है, जो इस स्थान से कुछ आगे थी। पहाडी पर हमारी चौकी थी जिसमें हमारे सैनिक डटे हुए थे। वह टीला बर्फ बारी की वजह से धुंधला दिखायी दे रहा था। पर हाँ तिरंगा लहराता दिखायी दे रहा था। यहाँ की सीमा एक लाइन में सीधी नहीं है, पर टेढ़ी-मेढ़ी है। शायद हमारी तरह चीन के लोग सीमाओं को देखने नहीं आते होंगे इसीलिए उनकी तरफ कोई नागरिक नहीं थे। यहाँ से करीबन 373 किमी तिबेट की राजधानी लाह्सा होती है। उनकी सीमा पर बस एक भवन था और वहाँ पर उनका ध्वज़ लहरा रहा था। उनके सैनिक भी कुछ पल के लिए भवन से बाहर आये और वापिस चले गये। कितना सुकून था कि भारत की इस सीमा पर हमारे सैनिकों को तंगदिली जैसा नहीं लग रहा था। जबकि पाकिस्तान की सरहद पर हमारे सैनिक हर क्षण तनाव में रहते हैं। मैं ने जवान से यही कहा कि सर, आपकी बदौलत हम हमारे घरों में चैन से सोते हैं। उस जवान की आँखों में एक चमक सी दौड़ गयी। उस चमक ने मुझे देश भक्ति के जज़्बे का एहसास करा दिया।

यहाँ पर ज्यादा समय रुकने नहीं दिया जाता। तुरन्त आर्मी ज़वान ने आदेश दे दिया कि अब आप लोग यहाँ से प्रस्थान करें। मेरे मन में खरदुंगला की सफर याद आ गयी। वहाँ पर भी ज्यादा समय रुक नहीं सक्ते थे। पतली सांय सांय करती हवा आपको कहीं उडा न ले जाए का खतरा रहता था। उतरते वक्त तो मुझे फिसलन से बचकर उतरना पडा। एक पल में मौसम ने करवट बदल ली। ऊपर चढते समय धूप के दर्शन हुए थे, जो अब अचानक कोहरे में बदल गया। धीरे धीरे छींटे पड़ने शुरू हो गये। इस स्थान पर फोटोग्राफी करना वर्जित है, सो इस स्थान के फोटो मैं नहीं ले सका। तभी मुझे चिंता हुई मेरे जैकेट की, क्योंकि मेरा जैकेट वॉटरप्रूफ नहीं था। पर अच्छा हुआ कि बारिश न होकर सिर्फ कोहरा छा गया। जहाँ पर हमारी कार खडी थी वह जगह भी धुंधली दिख रही थी। धीरे-धीरे मैं नीचे आ गया। बस हम उतर रहे थे तभी ओर टूरिस्ट आने लगे थे। अच्छा था कि हम जल्दी आ गये। नीचे रोड की साइड में बर्फ के ढेर के ढेर दिखायी दे रहे थे। हमने यहाँ पर कैमरे से कुछ तस्वीरें खींच ली। अब बारिश शुरू हो चुकी थी। ड्राइवर ने इशारा किया कि सा'ब, अब यहाँ से चलने में ही भलाई है। हमारी कार नाथुला से नीचे उतर रही थी। मन खुश था कि जो जगह देखने के लिए परमिट लेकर आना पडता है, उसे देखने का सौभाग्य मिल गया। मान लो हमें परमीट नहीं मिली होती तो?

मेरी कार अब जा रही थी उस स्थान पर जो इतिहास में एक मिस्ट्री बन गयी है। मैं बात कर रहा हूँ बाबा मंदिर की। जो इसी रास्ते में आता है। यह हमारे भारतीय आर्मी जवान की बात है। इतिहास कहता है कि बाबा मंदिर सीमा पर तैनात सुरक्षा जवानों ने बनाया है और यह कोई ईश्वर नहीं पर एक आम आर्मी जवान का मंदिर है। इनका पूरा नाम बाबा हरभजनसिंह है। हरभजन सिंह का जन्म 30 अगस्त 1946 को, जिला गुजराँवाला जो कि वर्तमान में पाकिस्तान में है, हुआ था। हरभजन सिंह 24 वी पंजाब रेजिमेंट के जवान थे। जो कि 1966 में आर्मी में भर्ती हुए थे। पर मात्र 2 साल की नौकरी करके 1968 में, सिक्किम में, एक दुर्घटना में मारे गए। हुआ यों कि एक दिन जब वो खच्चर पर बैठ कर नदी पार कर रहे थे, तो खच्चर सहित नदी में बह गए। नदी में बह कर उनका शव काफी आगे निकल गया। दो दिन की तलाशी के बाद भी जब उनका शव नहीं मिला तो उन्होंने खुद अपने एक साथी सैनिक के सपने में आकर अपने शव की जगह बताई। सवेरे सैनिकों ने बताई गई जगह से हरभजन का शव बरामद कर अंतिम संस्कार किया। हरभजन सिंह के इस चमत्कार के बाद साथी सैनिकों की उनमे आस्था बढ़ गई और उन्होंने उनके बंकर को एक मंदिर का रूप दे दिया। हालांकि जब बाद में उनके चमत्कार बढ़ने लगे और वो विशाल जन समूह की आस्था का केंद्र हो गए तो उनके लिए एक नए मंदिर का निर्माण किया गया जो कि ‘बाबा हरभजन सिंह मंदिर’ के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर गंगटोक में जेलेप्ला दर्रे और नाथुला दर्रे के बीच, 13,000 फ़ीट की ऊँचाई पर स्तिथ है। पुराना बंकर वाला मंदिर इससे 1,000 फ़ीट ज्यादा ऊँचाई पर स्थित है। मंदिर के अंदर बाबा हरभजन सिंह की एक फोटो और उनका सामान रखा है।

बाबा हरभजन सिंह अपनी मृत्यु के बाद से लगातार ही अपनी ड्यूटी देते आ रहे है। इनके लिए उन्हें बाकायदा तनख्वाह भी दी जाती है, उनकी सेना में एक रेंक है, नियमानुसार उनका प्रमोशन भी किया जाता है। यहाँ तक कि उन्हें कुछ साल पहले तक 2 महीने की छुट्टी पर गाँव भी भेजा जाता था। इसके लिए ट्रैन में सीट रिज़र्व की जाती थी, तीन सैनिको के साथ उनका सारा सामान उनके गाँव भेजा जाता था तथा दो महीने पूरे होने पर फिर वापस सिक्किम लाया जाता था। जिन दो महीने बाबा छुट्टी पर रहते थे उस बीच पूरा बॉर्डर हाई अलर्ट पर रहता था, क्योंकि तब सैनिकों को बाबा की मदद नहीं मिल पाती थी। लेकिन बाबा का सिक्किम से जाना और वापस आना एक धार्मिक आयोजन का रूप लेता जा रहा था, जिसमें बड़ी संख्या में जनता इकठ्ठी होने लगी थी। कुछ लोग इस आयोजन को अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाला मानते थे, इसलिए उन्होंने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया, क्योंकि सेना में किसी भी प्रकार के अंधविश्वास की मनाही होती है। लिहाज़ा सेना ने बाबा को छुट्टी पर भेजना बंद कर दिया। अब बाबा साल के बारह महीने ड्यूटी पर रहते हैं। मंदिर में बाबा का एक कमरा भी है। जिसमें प्रतिदिन सफाई करके बिस्तर लगाया जाता है। बाबा की सेना की वर्दी और जूते रखे जाते हैं। कहते हैं कि रोज़ पुनः सफाई करने पर उनके जूतों में कीचड़ और चद्दर पर सलवटें पाई जाती हैं।

बाबा हरभजन सिंह का मंदिर जन-गण दोनों की ही आस्थाओं का केंद्र है। इस इलाके में आने वाला हर नया सैनिक सबसे पहले बाबा को धोक लगाने आता है। इस मंदिर को लेकर यहाँ के लोगो में एक अजीब सी मान्यता यह है, कि यदि इस मंदिर में बोतल में भरकर पानी को तीन दिन के लिए रख दिया जाए तो उस पानी में चमत्कारिक औषधीय गुण आ जाते हैं। इस पानी को पीने से लोगो के रोग मिट जाते हैं। इसलिए इस मंदिर में नाम लिखी हुई बोतलों का अम्बार लगा रहता है। यह पानी 21 दिन के अंदर प्रयोग में लाया जाता है और इस दौरान मांसाहार और शराब का सेवन निषेध होता है। यह सब मैं रूबरू देखकर अचंभित रह गया। मन में कई प्रश्न उठे पर जहाँ आस्था का विषय आए वहाँ पर मन को ओर विचारों से अलिप्त कर देना चाहिए। मैं नतमस्तक बाबा की तस्वीर को नमन कर रहा था और साथ ही साथ उन बातों को याद कर रहा था, कि कितना महान इतिहास है कि एक जवान हमारे भारत-चीन की सीमा की रखवाली मृत्यु पश्चात् भी कर रहा है। मैं धन्य हो गया, क्योंकि बाबा हरभजन के बारे में मैने टीवी पर कितनी बार डोक्युमेन्ट्रीस देखी थी। तब से मन में तय कर लिया था कि जब भी सिक्किम जाने का मौका मिलेगा तो ज़रुर बाबा मंदिर की मुलाकात लूंगा। आज यह सपना सच सिद्ध हो रहा था। मुझे तो यहाँ पर मिल रहे किसमिस के प्रसाद की लालच अधिक थी। कारण था कि ठंडा महौल और ऐसे में किसमिस खाने को मिल जाए तो कौन बंदा है, जो ऐसे प्रसाद को लेने से इन्कार करें। मंदिर के चारो ओर ढ़ेर सारी भीड जमा हो गयी थी। जिन लोगों को नाथुला का परमिट नहीं मिलता वे भी यहाँ तक तो आ ही सक्ते हैं। मंदिर के सामने बने आर्मी केफेटेरिया के माइक पर से देश भक्ति के गीत बज रहे थे। मेरा रंग दे बसंती चोला... रंग दे... पूरा माहौल देश भक्ति से सराबोर था। मंदिर से दूर सुंदर और विशाल बाबा भोलेनाथ की समाधिस्थ प्रतीमा घ्यान खींच रही थी। उसके पीछे एक सुंदर झरना बह रहा था। मानो एसा लग रहा था कि बाबा भोलेनाथ की जटा से गंगा का अवतरण हो रहा हो। इतने सुंदर रम्य दृश्य को देखकर कैलाश तीर्थ की याद हो आना स्वाभाविक ही था।

अब मंदिर से थोडी दूरी पर ही स्थित छांगु या चांगु लेक की ओर जा रहे थे। कई लोग इस झील को छांगु लेक के नाम से पुकारते हैं, तो कई लोग चांगु के नाम से। जबकि अंग्रेजी में चांगु लेक को त्सोंगमो झील (TSONGMO LAKE) भी कहा जाता है। यह झील 3,780 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। आज मौसम में बार बार परिवर्तन हो रहा था। सो जब हम चांगु लेक पहुँचे बारिश हो रही थी और भारी मात्रा में कोहरा छाया हुआ था। पर जब हमारी कार रूकी तो बारिश भी रूक गयी। पहाड़ियों के मौसम का ऐसा ही है। मुझे 'राम तेरी गंगा मैली' के गीत की पंक्तियाँ याद आ गयी, "हुस्न पहाड़ों का क्या कहना के बारहों महीने यहाँ मौसम ज़ाड़ों का... " सही है कि पहाडियों के मौसम का कोई ठिकाना नहीं। चांगु लेक की गहराई औसतन पचास फ़ुट के करीब है। यह झील सर्दियों में पूरी तरह से बर्फ में परिवर्तित हो जाती है। आज बर्फ थी पर झील के सामने के पहाडों पर। अब मौसम सुहाना हो गया था। यह झील हर मौसम में रंग बदलती रहती है। झील के किनारे मैं ने तिब्बती पोशाक में कुछ फोटो खिंचवाए और झील के पास में ही बने रोप-वे में ऊपर जा कर बर्फ का आनंद लिया। रोप-वे ऊपर एक पहाडी पर ले जाता है। मुझे एसा था कि ऊपर से मैं पूरी झील को देख सकूंगा पर जब मैं उपर गया तो देखा चारों ओर बर्फ से सटे पहाड़ नज़र आ रहे थे। मौसम ने फिर अंगडाई ली, बारिश फिर से शुरू हो गयी। थोडी दूरी पर कुछ दिखायी नहीं दे रहा था। नीचे झील को देखने का मेरा अनुमान मौसम ने गलत सिद्ध कर दिया। हाँ, वहाँ पर कई कपल्स बर्फ की बारिश का आनंद उठा रहे थे। मैं भी बर्फ को हाथ में लेकर उसके गोले बनाकर साथी मित्रों पर फेंक रहा था। लग रहा था कि वहाँ ज्यादा समय ठहरना उचित नहीं था, सो मैं नीचे उतरने के लिए वापिस रोप-वे स्टेशन पर आ गया। नीचे आने पर हम लोगों ने जहाँ से हॉल बूट लिए थे उसकी दुकान पर आ गए। वहीं साथी मित्रों ने चाय-नाश्ता किया। दोपहर हो गयी थी। अब हमें गेंगटोक वापिस जाना था। हमारी कार नाथुला को बाय-बाय करके गेंगटोक के रास्ते पर जा रही थी। मन में खुशी थी कि चलो आज फिर एक भारतीय सीमा के दर्शन कर लिए। पता नहीं अब कब इस स्थान पर आयेंगे। ईश्वर ने चाहा तो इस रास्ते कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए जाना है। फिलहाल तो भोलेनाथ का स्मरण कर मेरी कार के बाहर दिखायी दे रही सुंदर पहाड़ियों को निहार रहा था। आगे का सफर शुरू होनेवाला था लाचुंग का। उसका वर्णन दुसरे भाग में रहेगा।

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1. निरंजन भगत, विदिशा बुक के फ्लैप से, प्रकाशक- आर. आर शेठनी
 कंपनी, अहमदाबाद।
2. समग्र कविता, उमाशंकर जोशी , ओगस्ट-1932

निवास - डॉ. मनीष गोहिल, 8, सुंदरम् बंगलोज़, आनंदनिकेतन स्कूल के पास, रामदेवनगर, सेटेलाइट, अहमदाबाद-3800015, गुजरात


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