विवेकी राय की कहानियाँ और ग्रामीण शिक्षा का यथार्थ

शिंगाडे सचिन सदाशिव


शोधछात्र, हिंदी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद
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          शिक्षा मानव उन्नति का एक सशक्त उपकरण है। शिक्षा ही एकमात्र ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य अपने जीवन को सुखी-समृद्ध, संपन्न तथा सफल बना सकता है। “शिक्षा मनुष्य को अंधेरे से उजाले की ओर ले जाती है। मानव जीवन में सभ्यता का प्रवेश केवल शिक्षा द्वारा ही हुआ।”[1] शिक्षा की इसी महता को ध्यान में रखकर प्रत्येक राष्ट्र सफल भविष्य निर्माण के लिए शिक्षा के विकास पर विशेष रूप से ध्यान दे रहा है। शिक्षा प्रणाली में अनेक सुधार और नये प्रयोग किये जा रहे हैं। इसके पीछे मुख्य उद्देश्य यही है कि शिक्षा के माध्यम से सशक्त तथा प्रबल राष्ट्र और समाज का निर्माण। शिक्षा और उसके सामर्थ्य पर मानव का पूर्ण विश्वास है। सुव्यवस्थित और सार्थक जीवन व्यतीत करने के लिए मानव का शिक्षित होना अनिवार्य है। शिक्षा ही एकमात्र ऐसा माध्यम है जो मानव के विचार एवं चिंतन प्रणाली को शक्ति प्रदान करने का महत्वपूर्ण कार्य करती है।

राष्ट्र, गाँव तथा परिवार के उन्नति का अस्त्र है शिक्षा। शिक्षा के अभाव में मनुष्य आँख होने के बावजूद नेत्रहीन है और जिह्वा होने पर भी गूँगा माना जाता है। समग्र विकास एवं उन्नति के द्वार शिक्षा रूपी कुंजी से ही खुलते हैं। भारत में भी शिक्षा की महता को ध्यान में रखकर शिक्षा के प्रचार-प्रसार के अनेक प्रयास किये गये। विविध योजनाओं के माध्यम से सभी को शिक्षा से लाभान्वित करने की भरसक कोशिश की गयी। ग्रामीण समाज में भी शिक्षा की गंगा प्रवाहित की गयी। साक्षरता अभियानों जैसी योजनाओं के अंतर्गत गाँवों के बुजुर्ग अनपढ़ लोगों को भी शिक्षित करने को आरंभ किया। लेकिन इन सबके बावजूद ग्रामीण शिक्षा की स्थिति पर विचार करने के उपरांत यही प्रतीत होता है कि ग्रामीण समाज जीवन में शिक्षा की स्थिति बहुत दयनीय है। ग्रामीण समाज जीवन में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के बावजूद अपेक्षित सफलता नहीं मिली है।

विवेकी राय ने ग्रामीण समाज में शिक्षा की जो स्थिति और गति है उसे अपनी कहानियों में बहुत प्रामाणिकता के साथ उजागर किया है। विवेकी राय ग्रामीण समाज की शिक्षा के दुर्गति के साक्ष्य रहे हैं। उन्होंने उन्हीं अनुभूतियों को अपनी कहानियों में अभिव्यक्त किया है। ग्रामीण समाज में शिक्षा की स्थिति का रेखांकन करते हुए शिक्षा की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार कारकों को भी उन्होंने उजागर किया है। ग्रामीण समाज जीवन में शिक्षा के मार्ग को अवरूद्ध करने वाली जो समस्याएँ हैं वह इस प्रकार हैं- परिवेशगत समस्याएँ, प्राकृतिक समस्याएँ, सरकारी नीतियाँ, हस्तक्षेप करती राजनीति, शैक्षणिक उदासीनता, शिक्षा की महता का अभाव, आर्थिक समस्याएँ आदि। विवेकी राय ने इन्हीं बाधाओं को अपनी कहानियों में व्यक्त किया है।

गाँव में अर्थाभाव के कारण भी अनेक बच्चे शिक्षा से वंचित रहते हैं। गाँव में गरीबी का साम्राज्य है। अधिकतर लोग अभाव में ही अपना जीवन व्यतीत करते हैं। ऐसी स्थिति में वह अपने बच्चों को नहीं पढ़ा सकते। वह फ़ीस के पैसों की पूर्ति करने में भी असमर्थ होते हैं। परिणामतः उन्हें बीच में ही शिक्षा को त्यागना पड़ता है।  ग्रामीण समाज में आज भी अनेक ऐसे लोग है जो पैसों के अभाव के कारण अपने बच्चों को पढ़ने में असमर्थ हैं। यह गाँव की शिक्षा का यथार्थ है। इसी वास्तविकता को विवेकी राय ने अपनी ‘अतिथि’ कहानी में उजागर किया है। प्रस्तुत कहानी में लोकनाथ के घर आए हुए अतिथि पंडितजी लोकनाथ को लड़कों के पढ़ाई के संदर्भ में कहते हैं इन्हें खूब पढ़ाओं! मामूली मत मानना। इन्हीं में गांधी, जवाहर छिपे हैं। बस अजुकेशन मूलमंत्र है। साइंस जरूर पढ़ना। ओवरसियर, इंजीनियर और डॉक्टर बनाकर आजकल लोग रूपया झार रहे हैं। क्यों बेटा किस दर्जा में पढ़ते हो? कलुआ कुछ न बोल सका। लोकनाथ ने उत्तर दिया, “छह पास कर सात में गया। फीस नहीं जुट सकी। दो महीने बाद नाम कट गया, तो घर बैठ गया।”[2] इस प्रकार यहाँ शिक्षा की गाँवों में जो स्थिति है उसे बखूबी उजागर किया है। कलुआ जैसे अनेक लड़कों को फीस भरने के पैसों के अभाव में बीच में ही शिक्षा को त्यागना पड़ता है।

आज के समय में तो गरीबों को शिक्षा पाना और भी अधिक मुश्किल हुआ है। आज लाखों बच्चे फीस न भरने के कारण शिक्षा से वंचित हैं। ‘स्वयं मेले’ कहानी में भी अर्थाभाव के कारण शिक्षा लेने में आने वाली समस्याओं को अभिव्यक्त किया है। गाँव में आज भी अनेक लड़के-लड़कियाँ चाहकर भी गरीबी की स्थिति में पढ़ नहीं पाते हैं। प्रस्तुत कहानी में भी सनेही नाम का लड़का गरीबी के कारण शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकता। लेकिन वह पढ़ना चाहता है क्योंकि किसी पंडित ने उसके नशीब में पढ़ाई-लिखाई का योग बताया है। इसलिए वह अपने ननिहाल में पढ़ने जाने की तैयारी करते हुए कहता है, “एक पंडित जी आये थे। उन्होंने हमारा हाथ देखकर कहा कि तुम्हारे हाथ में विद्या-महारानी बसती है। खूब पढ़ों। इसलिए नानी के यहाँ जा रहा हूँ।”[3] यह सनेही अर्थाभाव का मारा है। इसलिए वह शिक्षा पाने के लिए स्वयं खेत-खलिहान में मेहनत कर पैसे इकठ्ठा करता है, स्वावलंबन से शिक्षा पाना चाहता है। वह फीस के पैसों के लिए बोझ ढोता है। आज भी सनेही जैसे अनेक लड़के हैं जो काम कर शिक्षा प्राप्त करने के लिए विवश हैं। इस प्रकार उपर्युक्त प्रसंग के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने में आने वाली अर्थ की समस्यओं को उजागर किया है।

गाँवों में शिक्षा की दयनीय स्थिति को ग्रामीणों की शिक्षा के प्रति की उदासीनता भी जिम्मेदार है। ग्रामीण समाज आज भी शिक्षा के महत्व तथा उसके लाभ को नहीं समझ पाया है। ग्राम जीवन में अनेकों की मानसिकता यह है कि शिक्षा लड़कों को बिघाड़ती है। आज भी अनेक लोग अपने लड़कों को पढ़ाने की अपेक्षा खेती-किसानी में जुटाना ही समझदारी समझते हैं। गाँवों में शिक्षा के प्रति लोगों की उदासीनता किस प्रकार है इसे लेखक ने अनेक कहानियों के माध्यम से उजागर किया है। उनकी कहानियाँ इस सच्चाई को बखूबी उजागर करती हैं कि गाँवों में शिक्षा के प्रति लोगों में कोई विशेष उत्सुकता नहीं है। उनके अनुसार पढ़ाई-लिखाई का काम मामूली है।

इस वास्तविकता को हम ‘स्वयं मेले’ कहानी में देख सकते हैं। प्रस्तुत कहानी में लतरी अपने भाई सनेही की पढ़ाई के संदर्भ में जो प्रतिक्रिया व्यक्त करती है, उससे ग्रामीणों की शिक्षा के प्रति की मानसिकता उजागर होती है। जब सनेही उससे पूछता है कि, “तुमको मालूम है कि ‘क’ की गरदन किधर होती है।...तब वह सनेही से कहती है- तुम्ही जानो। तुम्हारे ही करम में चिल्लर और चींटी बीनना लिखा है। बलिस्टर बनोगे!”[4] इससे स्पष्ट होता है कि ग्रामीणों के अनुसार पढ़ाई-लिखाई चिल्लर और चींटी बीनना है। उनका मानना है कि शिक्षा बहुत दुर्गति का काम है। इस प्रकार विवेकी राय ने ग्रामीणों की शिक्षा के प्रति जो उदासीनता है उसे प्रस्तुत कहानी के माध्यम से व्यक्त किया है।

ग्रामीण समाज में शिक्षा की दुर्गति का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण है शैक्षणिक साधन-सुविधाओं का अभाव। सरकार ग्रामीण शिक्षा के प्रति आज भी उदासीन है। गाँवों के स्कूलों में छात्रों को बैठने के लिए कमरों का नितांत अभाव है। एक-एक कमरे में दो-तीन कक्षाओं के छात्रों को ठूँस-ठूँस कर बिठाया जाता है। शिक्षकों का भी अभाव है। एक ही शिक्षक अनेक कक्षाओं को नियंत्रित करता है। इसी यथार्थ को विवेकी राय ने ‘पुराने गुलाब, नये गाँव’ कहानी में अभिव्यक्त किया है। प्रस्तुत कहानी में उजागर किया है कि असुविधा के कारण शिक्षा प्राप्त करने में किस प्रकार बाधाएँ निर्माण होती हैं। सरकार की ग्रामीण शिक्षा के प्रति जो उदासीनता है, उसकी आलोचना भी की है। ग्रामीण समाज में शिक्षा की दुर्गति को उजागर करते हुए विवेकी राय कहानी में लिखते हैं, “ठूँस दिया कमरों के गोदाम में बोरों की तरह, चले शिक्षा का व्यापार। पढ़ों बच्चों तुम्हारे आका यही चाहते हैं। फिर कहाँ से सुसफैल जगह मिले। घेर-भेड़ की तरह बढ़ते हैं डंडे से हाँके जाते हैं। सरकार सारा धन फूँककर जहरीले सत्यानाशी एटम आयुध, ब्रम्हाकिरण और ब्रम्हांडानक आदि बनाने लगी है। लड़के को बनाने की कहाँ फुरसत है। फिर लड़के गाँव में हैं कहाँ? ये तो कीड़े-मकोड़े हैं। लड़के महानगरों में हैं। वे पान-फूल की तरह सींचे जाते हैं।।”[5] यही है गाँव की शिक्षा की वास्तविकता। आज भी गाँवों में स्कूलों के कमरों की हालत बहुत खस्ता है। सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों की शिक्षा संबंधी अनेक योजनाएँ आरंभ की हैं लेकिन इसके बावजूद गाँव में आज भी अधिकांश लोग शिक्षा के लाभ से वंचित हैं।

दूर-दराज के एवं अति पिछड़े गाँवों में आज भी शिक्षा का कोई प्रबंध नहीं है। इसी वास्तविकता को विवेकी राय ने ‘दीप तले अँधेरा’ कहानी में व्यक्त किया है। प्रस्तुत कहानी में निरक्षर लोगों की समस्या को उजागर किया है। आज भी गाँवों में निरक्षर लोगों को चिट्टी पढ़ने के लिए पढ़े-लिखे व्यक्ति की प्रतिक्षा करनी पड़ती है। इस यथार्थ को प्रस्तुत कहानी में बहुत प्रामाणिक रूप में उजागर किया है। एक टोले के सुखिया नामक स्त्री को उसके पति की चिट्टी आती है लेकिन उस टोले में सभी लोग निरक्षर होने के कारण वह चिट्टी कोई पढ़ नहीं पाता। इसलिए एक वृद्ध व्यक्ति रास्ते से जाने वाले कथानायक को बुलाकर कहता है, “बाबूजी यहाँ सब मनई करिया अच्छर भँइसि बरोबर हैं। गरीबवन का पूरा है। दुखरा-धंधा में जीना पहार है। ...रउआ के दूर से देखकर सोचा गया कि जरूर कोई पढ़ुआ बाबू हाँ। तनी यह चिट्टी बाँचि दीजिये। बड़ा पुन्न होगा।”[6] यह स्थिति आज भी है। सरकार द्वारा साक्षरता अभियान चलाने के बावजूद आज भी अनेक लोग चिट्टी भी नहीं पढ़ सकते हैं। उन्हें इतने से कार्य के लिए पढ़े-लिखे लोगों को ढूँढना पड़ता है। इस उदाहरण से है ज्ञात होता है कि साक्षरता अभियान असफल रहा ह।

इस प्रकार विवेकी राय ने अपनी कहानियों के माध्यम से ग्रामीण समाज की शिक्षा की वास्तविकता को उजागर किया है। साथ-साथ ग्रामीण समाज में शिक्षा की दुर्गति के लिए जिम्मेदार कारणों को भी उजागर किया है। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों की शिक्षा में कोई भी बदलाव नहीं आया है। विवेकी राय ने सरकार की नीतियों की भी आलोचना अपनी कहानियों के माध्यम से की है। सरकार की गाँवों के शिक्षा के प्रति की उदासीनता भी उनकी कहानियों में देखने को मिलती है।

संदर्भ ग्रंथ सूची

1. शिक्षा समाज और भविष्य, प्रभुसिंह यादव, साहित्यशिला प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2003
2. कालातीत, विवेकी राय, अनुराग प्रकाशन वाराणसी, द्वितीय संस्करण 2005
3. बेटे की बिक्री, विवेकी राय, प्रभात प्रकाशन दिल्ली, प्रथम संस्करण 1981

संदर्भ 

[1] शिक्षा समाज और भविष्य, प्रभु सिंह यादव, पृ- 10
[2] अतिथि (कालालीत) विवेकी राय, पृ- 30
[3] स्वयं मेले (कालातीत) विवेकी राय, पृ- 44-45
[4] स्वयं मेले (कालातीत) विवेकी राय, पृ- 44
[5] पुराने गुलाब, नये गाँव (बेटे की बिक्री) विवेकी राय, पृ- 127
[6] पुराने गुलाब, नये गाँव (बेटे की बिक्री) विवेकी राय, पृ- 61

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