कविताएँ: शशि बाला

शशि बाला


कुरुक्षेत्र

मधुर आवाज में उद्घोषणा हुई
हम कुरुक्षेत्र पहुँचने वाले हैं
यह भी कि
गाड़ी यहाँ मात्र दो मिनट रुकेगी
हम दिल्ली कालका शताब्दी एक्सप्रेस में
यात्रा कर रहे थे
कुरुक्षेत्र का नाम सुनकर चौकन्ने हो गए
खिड़की के शीशों से झाँककर
देखने की कोशिश करने लगे
कहीं कोई निशानी
बीते भयावह युग की दिख पड़े शायद
इन स्थूल आँखों से क्या दिखता
पर धरती और आसमान के बीच की
खाली जगह में अनगिनत ध्वनियों की
अनुगूंज सूक्ष्मातिसूक्ष्म कणों में
घुली मिली महसूस हुई
रोम रोम में एक सिहरन की अनुभूति हुई
दो मिनट वैसे तो बहुत कम हैं
बीते युग की त्रासदी के वर्णन को
पर यही दो मिनट बहुत हैं
समय के पन्नों को
फर्र फर्र पलट कर सूक्ष्म नयनों से
देखने और महसूस करने को
हमने देखा चक्रधारी चतुर्भुज श्री हरि को
शांति स्थापना के अनेक प्रयास करते
विफल होते और
फिर विवश होकर महासमर का उद्घोष करते
हमने सुना लाखों स्त्रियों के क्रंदन
हजारों परिवारों का उजड़ना देखा
जीवन की विभीषिका को प्रत्यक्ष देखा
गाड़ी चली तो दूर तक वन प्रदेश
गुमसुम से लगे
पत्तों पर अंकित महाभारत के असंख्य दृश्य
हवा में गूंजती शंखध्वनि
जय पराजय के अच्छे बुरे परिणाम से
अलग बहुत बहुत विचलित
महा विध्वंस की धमक.
किताबों में पढ़ी और सुनी सुनाई बातें
दिल में इतने गहरे समाई हुई हैं कि

वे दो मिनट स्मृतियों को झंझोड़ने में
पूरी तरह कामयाब रहे.
आभास हुआ हम भी कहीं न कहीं थे
किसी न किसी रुप में उस काल में
तभी तो हृदय कांप गया कुरुक्षेत्र का
नाम ही सुनकर
यह शाम का वक्त था
उतरते धुंध में बहुत कुछ अनदेखा रह गया

लौटती यात्रा प्रथम प्रहर की थी
पुनः उद्घोषणा हुई
हम पुनः रोम रोम को आँखें बनाकर
हर तरफ निहारने लगे
इसी मैदान में  नारायण ने अपने दिव्य रुप
के दर्शन दिए थे
उनके चरण रज से पावन हुई धरा
उनकी दीप्ति से जगमगाई दिशाएँ
और आलोकित प्रकाशित कण कण को
महसूस करने की कोशिश करने लगे।

दूर तक फैली हुई हरियाली
अनाज के लहलहाते खेत
हवा में झूमती बालियाँ
सुकून देती हुई समृद्धि दिख पड़ी
निर्भय आते जाते निवासी
सभी तो वंशज ही होंगे
युद्ध में खेत रहे पूर्वजों के
लेकिन प्रकृति खिलती मुस्कुराती सी लगी
जन मानस सुखी सम्पन्न
किसी समय भयानक रक्तपात झेल चुकी धरती आज नई कोंपलों से
नए अंकुर से भरी पूरी है
मानों कह रहा हो सृष्टि का कण कण
धर्म की स्थापना सदा कल्याणकारी होती है
और अधर्म का विनाश भी...



ब्रह्मांड का सत्य प्रतिरुप

जब जब यह अनुभूति हुई
कि हृदय में बसी आत्मा
उस परम पिता परमात्मा का ही अंश है
उसके सभी गुणों से युक्त
तब तब महसूस हुआ
यह काया भी ब्रह्मांड का छोटा सा
स्वरूप  ही है
ये आँखें सूरज चाँद जैसे प्रकाशवान
ये पलकें उनपर छाए घनेरे बादल
नाड़ियों में सागर का प्रवाह
भीतर ज्वालामुखी सी अग्नि
रोम रोम में प्रवाहित पवन
असंख्य उगते डूबते ग्रह नक्षत्रों की तरह
मस्तिष्क में लगातार जन्मते और
गुम होते विचार
दिल में  मचलती उमंगें
मानों पंख फड़फड़ाती हुई तितलियाँ
होठों पर ठहरी हुई मुस्कान जैसे
तट पर आकर ठहर गई हों चंचल लहरें
पलकों की सीपी में छुपे हुए
कितने कितने मोती
छलक कर चमक उठते हैं
जैसे नरम दूब पर ओस की बूंदें
इतना ही नहीं
आह्लाद से आलोड़ित चित्त
मानों कायनात की हलचल
नृत्य को उद्धृत पाँव
जैसे नृत्यरत सारी सृष्टि
ये मेरे भाव मेरी सोच मेरे कर्म
उस अनंत की छवि ही तो हैं
उस विराट का ही सूक्ष्म स्वरुप हूँ मैं भी
पूरा ब्रह्मांड है मुझमें
मैं ही नहीं
संसार का हर जीव है
ब्रह्मांड का सत्य प्रतिरुप...


ऐ स्त्री!

ऐ स्त्री
कब तक बेलती रहोगी
अपने सपनों को
आटे की लोई में मिलाकर
और आँच पर सेंककर
जलाती रहोगी रेशा रेशा

कब तक देखती रहोगी
अपनी आँखों में
दुनिया भर के रंगों के इंद्र धनुष
और भूलती रहोगी अपनी
छोटी बड़ी किसी भी
कल्पना में रंग भरना

तहाते हुए चादर और तौलिए
कहाँ रख दिया तहा कर
छोटे छोटे अरमान अपने
अलमारी के किसी कोने में या
दीवान के किसी गुप्त तहखाने में

सहेज कर रखते हुए
मसाले की डिब्बी में
या आटे के कनस्तर में
कहाँ छोड़ आई
मन में उगती उमंगों को

पूजते हुए देव पितर
कभी अपने मन के द्वार पर भी
रखो न दीपक जलाकर
थोड़ा छंटे अंधेरा
भीतर का
अंदर की सीलन कम हो थोड़ी
और जमी हुई बर्फ
पिघल कर निकले
नहीं मिलने वाला जन्म दोबारा
इन सबके लिए
भूलभुलैया में रहती हो क्यों
कब चलोगी अपने कदमों पर
अपनी मनचाही राह
कब चलोगी नापने
धरती की परिधि
हौसलों का फीता लेकर...

अवकाश प्राप्त भारतीय स्टेट बैंक अधिकारी, 104, जुलू पार्क हजारीबाग झारखण्ड 835301

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