समीक्षा: गली तमाशे वाली (अर्चना चतुर्वेदी)

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 941 272 7361; ईमेल: drdinesh57@gmail.com


पुस्तक: गली तमाशे वाली (उपन्यास)
ISBN 978-81-7667-367-9
रचनाकार: श्रीमती अर्चना चतुर्वेदी
प्रकाशक: भावना प्रकाशन, नयी दिल्ली
पृष्ठ: 152, मूल्य: ₹ 175.00 रुपये, प्रकाशन वर्ष: 2019

श्रीमती अर्चना चतुर्वेदी का सद्यः प्रकाशित उपन्यास ‘गली तमाशे वाली’ मूलतः मथुरा की एक पुरानी गली में रहने वाले चौबेबे परिवारों को केन्द्र में रखकर लिखा गया है। चूंकि अर्चना जी स्वयं मथुरा में जन्मी, पलीं, बड़ी हैं अतः मथुरा की संस्कृति, बोल-चाल, पहनावे-उढ़ावे और रीति-रिवाजों से पूर्णतया भिज्ञ हैं। इतना ही नहीं चौबेबे परिवारों के मध्य बचपन गुजारने के कारण वह उनकी तुनक मिजाजी, लंपट व्यवहार, गाली-गलौच, भांग छानने और बैठकों पर होने वाली बातों, गली-मुहल्ले के नैन मटक्कों, छोरौं द्वारा छोरियों के छेड़ने, कुहनी मारने, उनकों नौंच लेने आदि क्रिया कलापों से पूर्णतया वाकिफ हैं और इन्हीं सब अनुभवों का अर्चना जी ने अपने इस उपन्यास में बहुतायत से लाभ उठाया है।

पूरे उपन्यास को अर्चना जी ने छोटे-छोटे पूरे 22 अध्यायों में विभक्त किया है। पहले अध्याय में मथुरा के होलीगेट के अन्दर छत्ता बाजार की वह गली जिसको केन्द्रित कर यह उपन्यास लिखा गया है। होलीगेट और उसके अन्दर की स्थिति, सुबह ही सुबह सभी दुकानों पर कचोंड़ी-जलेबी की बिक्री, स्कूल जाते बच्चों को छोड़ने वाले बहन-भाई, अथाई पर एक अखबार को बांचता एक आदमी और उसे सुनते दस-पन्द्रह लोग आदि का बड़ा ही सजीव चित्रण किया है।

मथुरा की लड़कियाँ जब तक अपने मुँह से शब्द उच्चारित नहीं करतीं, उनका सौन्दर्य स्वर्ग की किसी अप्सरा जैसा लगता है। इस बात की पुष्टि अर्चना जी ने पहले अध्याय में बड़े ही सटीक शब्दों में की है -
दिनेश पाठक ‘शशि’


“होली वाली गली के नुक्कड़ पर एक बहुत ही खूबसूरत लड़की अपने छोटे भाई का हाथ पकड़े खड़ी हुई किसी का इंतजार कर रही है... कुछ परदेशी लड़के जो शायद शहर घूमने आये हैं, एक कोने में खड़े हो उस लड़की को टुकुर-टुकुर देख रहे हैं... शायद इससे पहले उन्होने इतनी खूबसूरती नहीं देखी थी... लड़की का भाई शरारत कर रहा है... लड़की एक-दो बार उसे प्यार से टोक चुकी है... पर उस पर कोई असर नहीं हुआ... लड़के अभी भी खड़े हैं... अचानक लड़की गुस्से में चिल्लाई, “मानेगो नाय, हरामजादे जूता दूंगी खेंच के।“  लड़की की जुबान से यूँ फूल झरते देख लड़के वहाँ से खिसक लिए... यार चुपचाप कितनी सुन्दर लग रही थी।” (पृष्ठ-12)

दूसरे अध्याय में मथुरा के छत्ता बाजार की उस गली के बाबू गया प्रसाद की माँ, यानि उस डोकरी की कहानी है जो अपने पुत्र से भी चार कदम आगे बढ़कर, अपने घर के बर्तन-भाड़े बेचकर कुछ महीने बाहर घूम-फिर कर फिर वापस घर में आ जाती है।

तीसरे अध्याय में बाबू गया प्रसाद की निकृष्टता और उनके बड़े बेटे कैलासनाथ की मेहनत-ईमानदारी के साथ परिवार की गाड़ी को खींचने का उल्लेख है।

चौथा अध्याय उस मोहल्ले के मालिक मकान और किरायेदारों के सम्बन्धों से कहानी शुरू होकर दयाशंकर और उनके बेटों के कार्य कलापों से होते हुए पप्पू जी का ब्याह न होने पर खत्म होता है।

अक्सर गाँवों में जब किसी लड़के की शादी नहीं हो रही होती है तो एक फार्मूला अपनाया जाता है, उसे बाहर शहर में भेज दिया जाता है और प्रचारित कर दिया जाता है कि लड़का बड़ी नौकरी पर है या आई.ए.एस. की तैयारी कर रहा है आदि... अर्चना जी ने भी उपन्यास के पाँचवे अध्याय में पप्पू जी को बम्बई भेज दिया है जहाँ पप्पू जी ने लड़कियाँ पटाने का प्रयास किया पर असफल रहे और पिट-पिटा कर वापस मथुरा आ गये जहाँ प्रेमिका के साथ होली मनाने का सपना संजोकर एक प्रेमिका बनाई भी पर प्रमिका ने होली पर ऐसा धोबी पाट दिया कि बेचारे मन मसोस कर रह गये।

छठे अध्याय में विकलांग कोटा से सरकारी नौकरी प्राप्त नंदलाल द्वारा लाउडस्पीकर पर भजन-कीर्तन द्वारा मोहल्ले वालों की नींद खराब करने पर पप्पूजी द्वारा अटक लड़ाई मोल लेने से शुरू करके बाबू गया प्रसाद के घर की कलह पर समाप्त किया गया है।

सातवें अध्याय में मथुरा वासियों के गीत-संगीत के शौक और हर बात को गीतों में पिरोकर कहने की स्टाइल का जिक्र है तो नौकरी पर देश से बाहर चले जाने वाले लड़कों की ठसक का वर्णन भी, “जो लड़के दुबई से आते हैं वे दूर से ही पहचान में आ जाते हैं... इतनी चमक-दमक देख कोई न कोई लड़की की माँ तो आकर्षित हो ही जाती है और इनका रिश्ता भी झट से पक्का हो जाता है। (पृष्ठ-47)

आठवें अध्याय में मोहल्ले के उन बेशर्म मर्दों की रंगीन मिजाजी का जिक्र है जिन्हें न तो लड़कियों को छेड़ने में कोई संकोच है और न उन्हें नोच लेने में ही, “मुहल्ले के मर्द काफी रसिया किस्म के थे। ... ऐसे-ऐसे मर्द थे कि चलते-फिरते औरतों को नोंच लें... हर महिला को कोहनी मार कर ही निकलें।(पृष्ठ-52)

विमला काकी द्वारा घर पर आई हुई औरतों-लड़कियों को काम में लगाकर अपने काम निपटवाने से तंग आकर सभी ने सलाह-मशवरा किया और प्लान बनाकर उन्हें खूब पिदाया। इसी बात का उल्लेख है अध्याय-10 में।
अध्याय 11 में काकी के माध्यम से जमुना जी के प्रदूषण पर चिंता व्यक्त करने से शुरू करके भगीरथ द्वारा गंगा लाने की तरह ही जमुना जी को पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष नागर जी द्वारा लाये जाने की कहानी और फिर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मर्डर, उससे प्रारम्भ हिंसा-मारकाट और लूट पाट का वर्णन और इमरजेंसी लगते ही प्रारम्भ हुई परेशानियों का वर्णन इसमें किया गया है। पर महिलाओं की छेड़खानी के वर्णन से यह अध्याय भी अछूता नहीं है-
“... पिछली तीन पुश्तों से ये यही कर रहे हैं। इनके पिता... भाई और अब बेटे, मंदिर... बाजार जहाँ मौका मिलता है महिलाओं के पिछवाड़े पर नोंच कर या कोहनी मार कर निकल जाते हैं। आए दिन पिटते हैं...” (पृष्ठ-73)
अध्याय 12 में मोहल्ला के ही बिल्लू और बिरजू की पत्नी बसंती की प्रेम कहानी है जो श्रृंगार रस के संयोग पक्ष को क्लाइमेक्स तक ले जाती है। 

अध्याय 13 में दहेज और बेटी-पढ़ाओ की तर्ज पर कुछ बातें हैं तो अध्याय 14 में वर्षा के बहाने पर्यावरण, पेड़ों की कटाई और फिर नगरपालिका कर्मियों की हड़ताल, शहर में गंदगी की चर्चा के साथ पतियों द्वारा पत्नी की पिटाई का चलन, रबड़ी का चलन, रामलीला का मंचन में रावण द्वारा धनुष तोड़कर सीता जी से विवाह का मनोरंजक वर्णन किया गया है। अध्याय 15 में मथुरा में गाय, सांड़ और बंदरों के उत्पात पर चिंता के साथ एक भात देने का मनोरंजक किस्सा भी है। अध्याय-18 में मथुरा में टीवी का पदार्पण होने के बाद की स्थितियों का मनोरंजक वर्णन किया गया है। अध्याय 19  में पप्पू जी का ब्याह, बसंती का मोहल्ले के बिल्लू को छोड़ कुटिया के साधु बाबा के संग आँख मिचैली और अंत में माँ-बाप की धन दौलत पर बच्चों की निगाह तक जाकर अध्याय का समापन होता है।

अध्याय-20 में मोहल्ले में रह रहे एक किरायेदार की बेटी के किसी के साथ भाग जाने से प्रारम्भ करके एक पिता द्वारा अपने ही पुत्र की जमीन को हड़प लेने और उसके विरुद्ध छोटे भाइयों को भी भड़काने पर समापन होता है।
कुछ वर्षों से महिला लेखिकाओं में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को लेकर लिखने की होड़ सी प्रारम्भ हुई है। ‘गली तमाशे वाली’ उपन्यास को पूरा पढ़ने के बाद निष्कर्ष रूप में जो सामने आता है वह यह कि श्रीमती अर्चना जी ने भी इस उपन्यास में खूब बिंदास भाषा का प्रयोग किया है जिसे रसिक पाठक खूब चटखारे ले-लेकर पढ़ सकते हैं-
“बताऔ हमारे मोहल्ला की छोरी भजि गई और हमैई पतो नाँय... पूरे मोहल्ला की नाक कटि गई। “
‘अबे नाक तौ हमारी कटि गई, हमारे होते भये काई और के संग भाज गई।’- बिल्लू और नंदू एक संग बोले।’ (पृष्ठ-132)

 पूरे उपन्यास में लड़कों का रिश्ता पक्का होना, बहुत महत्वपूर्ण बात सिद्ध होती है। साथ ही लड़कों द्वारा लड़कियों को छेड़ना, लड़कियों का बन-ठन कर निकलना, मौका मिलते ही लड़कियों के निजी अंगों पर लड़कों व पुरुषों द्वारा नोंच लेना, लड़कियों को पटाने की स्पर्धा आदि का वर्णन पूरे उपन्यास में मुख्य रूप से चला है।

उपन्यास की भाषा न तो पूरी तरह खड़ी बोली ही है और न ब्रजभाषा ही बल्कि खिचड़ी भाषा हो गई है जिसमें बिना पढ़े-लिखे मुस्लिम वर्ग द्वारा बोली जाने वाली जैसी भाषा भी शामिल है। प्रूफ की अशुद्धियाँ भी उपन्यास में दृष्टिगोचर होती हैं। बाइंडिंग ऐसी कि पूरी पुस्तक पढ़ते-पढ़ते ही एक-एक पृष्ठ अलग-अलग हो गया है।
उपन्यास का आवरण नाम के अनुरूप ही है । प्रयुक्त कागज स्तरीय है। हिन्दी भाषा साहित्य में उपन्यास का स्वागत होगा, ऐसी आशा है।

1 comment :

  1. सेतु में मेरे द्वारा प्रेषित समीक्षा के प्रकाशन हेतु श्री अनुराग जी एवं सेतु परिवार का हार्दिक आभार।

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