वीरकाव्य की परंपरा और भूषण

- गुड्डू कुमार

पी एचडी शोधार्थी, अ.मु.वि, अलीगढ़

      भूषण वीरकाव्य के श्रेष्ठ कवि हैं। इनके काव्य में कल्पना और पुराण की तुलना में इतिहास से अधिक सहायता ली गई है। कल्पना का प्रयोग कवि ने उतना ही किया गया है जिससे किसी तथ्य को प्रकाश में लाया जा सके। पौराणिक काव्य का प्रयोग कवि ने उपमाओं के रूप में किया है। इनके काव्य-नायक छत्रपति शिवाजी और छत्रसाल बुंदेला हैं। ये इतिहास प्रसिद्ध वीर नायक हैं। कवि ने इन्हीं वीर नायकों की वीरता का जयगान और इनके कर्मो की व्याख्या की हैं।

                 प्राय: वीरकाव्यों में वीर रस के साथ-साथ श्रृंगार रस भी अंगी रस बनकर आया है, किन्तु भूषण के वीर काव्य में यह अनुपलब्ध है। उनका नायक किसी से प्रेम करता हुआ नहीं दिखाया गया है। वह सदैव अन्याय के दमन आदि में तत्पर दिखाया गया है। उनके काव्य में वीर भावना की व्यापक अभिव्यक्ति हुई है। यह अभिव्यक्ति उस युग की वीरता का आदर्श और उदात्त रूप है। डॉ. राजमल बोरा ने ‘भूषण और उनका साहित्य’ में वीरकाव्य एवं वीरनायक के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए लिखा है –

                  “प्राय: वीर नायक उन्हें कहा गया है जिन्होंने किसी राज्य की स्थापना की हो, जो किसी युग की सभ्यता और संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाले महापुरूष हैं, जिन्होंने मानवता का सन्देश दिया है  या मानवता की रक्षार्थ अपना जीवन लगा दिया है।[1]”

                  भूषण ने भी अपने काव्य-नायक छत्रपति शिवाजी में भारत के प्राचीन वीर नायकों की परिकल्पना की है। उन्होंने अपने काव्य में यह व्यक्त किया है कि शिवाजी प्राचीन भारतीय संस्कृति के समर्थक और रक्षक रहे हैं –

                         उदित होत सिवराज के मुदित भये द्विज देव।
                         कलिजुग हट्यौ मिट्यौ सकल मलेच्छ्न कौ अहमेव।[2]

कवि भूषण ने शिवाजी की तुलना भारत के प्राचीन वीर नायकों से की है। उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि प्राचीन काल में धर्म की रक्षा हेतु जो कार्य राम और कृष्ण ने किया वही कार्य इस युग में शिवाजी कर रहे  हैं। राम और कृष्ण का युद्ध धर्म रक्षार्थ क्रमश: रावण और कंस से था, उसी प्रकार शिवाजी का युद्ध भी औरंगजेब से है –

                      भूषण भनत त्यौं ही रावण के मारीबै को,
                              रामचंद्र भयौ रधुकुल सरदार है।
                       कंस के कुटिल बल बंसन विधसिवौ कौं’
                              भयो जदुराय बसुदेव को कुमार है।
                       पृथ्वी पुहूत साहि के सपूत सिवराज,
                             म्लेच्छन के मारिबे कौं तेरो अवतार है।[3]

राम की तरह शिवाजी भी सामाजिक और धार्मिक भाव से मर्यादित रहे हैं। उनका व्यक्तिगत शौर्य, व्यक्तिगत स्वार्थ की तुलना में अन्याय दमन में अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है। जैसे राम ने राक्षसों का वध करके धर्म की रक्षा की, उसी प्रकार शिवाजी ने भी मुगलों और बीजापुर के अनेक सेनानायकों का घमंड चूर किया था।

             भूषण के काव्य नायक ‘शिवाजी’ में महाभारत युग की वीरता के गुण मिलते हैं। यद्यपि  उनकी नीति परिस्थिति के अनुरूप बदलती रही है; फिर भी शारीरिक शौर्य, चरित्रगत वीरता और अदम्य साहस का परिचय स्थान-स्थान पर मिलता है। भूषण ने अपने काव्य- नायक के युग की घटनाओं को प्रकाशित किया है। उदहारणस्वरूप ‘अफजलखां वध’ संबंधी घटनाओं को लिया जा सकता है। अफजलखां ने प्रण किया था कि वह शिवाजी को पकड़ कर लायेगा। शिवाजी भी कूटनीति से काम लेते हुए अपने साहस का पूर्ण परिचय दिया। अफजलखां के वास्तविक इरादे को उन्होंने पहले ही पता कर लिया था। गौण रूप से अपनी सुरक्षा का प्रबंध करके, वे अफजलखां से उसी रूप में मिलने गये, जिस रूप में उन्हें बुलाया गया था। जब उनके साथ शत्रु पक्ष से धोखा हुआ तो उन्होंने भी उसी रूप में प्रतिकार किया और उसी स्थल पर अफजलखां को मार दिया। इस वध का वर्णन करते हुए भूषण ने महाभारत के पात्रों से शिवाजी और अफजलखां की तुलना की है –

                      वहै है सिवाजी जिहि भीम लौं अकेले मारयो,
                      अफजल-कीचक सुन कीच घमसान कै।[4]

           भीम और कीचक का द्वंद्व युद्ध हुआ था। उसी तरह अफजलखां और शिवाजी का भी द्वंद्व युद्ध हुआ था। इसी तरह हम अन्य प्रसंग में भी हम देखते हैं कि शिवाजी युद्ध के क्षेत्र में स्वयं आगे-आगे रहते है। शाइस्तखां पर आक्रमण करते समय शिवाजी रात के समय उनके डेरे के भीतर गये, और शत्रु के पास पहुँचकर अपनी तलवार से भागते हुए अवस्था में भी उसकी अंगुली काट डाली।

                औरंगजेब के दरबार में उपस्थित होने पर जब उन्हें उचित सम्मान नहीं मिला तो शत्रु के घर में ही उसका अपमान करने में बिलकुल नहीं हिचकिचाए , यह उनके अदम्य साहस का ही उदहारण है। महाभारत काल की वीरता की तरह शिवाजी की वीरता भी चरित्रगत है। महाभारत काल की तरह ही ‘भूषण-युग’ में भी सेनाओं की संख्या पर नहीं, बल्कि सेनानायक के बल वैभव पर विश्वास किया जाता था। भूषण ने अपने वीरकाव्य में शत्रु पक्ष के सेनानायकों के नाम दिए हैं, किन्तु शिवाजी के पक्ष में उनकी दृष्टि केवल अपने काव्य नायक शिवाजी पर ही केन्द्रित रही है। ‘महाभारत काल’ और ‘भूषण काल’ के वीर काव्य की कई विशेषता समान होने पर भी, उनमें अंतर है। यह ‘अंतर’ युग विशेष का अंतर है।

                  ‘रामायण’ और ‘महाभारत काल’ के पात्रों  की वीरता में सामाजिक मर्यादा की अभिव्यक्ति है, उसमें धार्मिक आदर्शो का भी उल्लेख है। आगामी वीर काव्यों में भी यह प्रवृति कमोबेश मिलती है। महाभारत काल के बाद जो वीर काव्य लिखे गये उनमें ऐतिहासिक व्यक्ति को केंद्र में रखा गया है। इन वीरकाव्यों में युद्ध और प्रेम की प्रधानता है। संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश में जो वीर चरित लिखे गये, उनमें कोई-न-कोई  प्रेम-कथा जरूर मिलती है। पौराणिक काव्यों में रामायण में ‘सीता’ तो महाभारत में ‘द्रोपदी’ युद्ध का कारण रहीं हैं। ठीक उसी प्रकार इन वीर काव्यों में भी वीर और श्रृंगार का मिश्रण है। पर भूषण का वीर काव्य इससे वंचित है। उनके नायक कर्म में रत दिखाये गये हैं। इस कर्म का उद्देश्य अन्याय और अत्याचार का दमन करना है।

                 आदिकालीन हिंदी रासो काव्य की वीरता भिन्न कोटि की है। इस काव्य में वीरता का अभाव नहीं है, पर उस वीरता का ऊँचा आदर्श नहीं है। इन काव्यों में भी युद्ध और श्रृंगार की प्रधानता है। इसमें विवाह जैसे मंगल कार्य भी युद्ध के बिना संभव नहीं है। इनके काव्य में जन्म और मृत्यु को विशेष महत्त्व नहीं दिया गया है। अपने प्राणों की बलि देना, साधारण बातों के लिए मारना और मरना तथा इसके लिए आक्रमण कर देना आदि  इस काव्य का मुख्य लक्ष्य है। भूषण का वीरकाव्य इससे अलग है।

                भूषण के काव्य नायक किसी लक्ष्य को सामने रख कर कार्य करते हैं। उनका चरित्र सद्गुणों से भरा है। उनकी मातृभक्ति, संतानप्रीति, इन्द्रिय-निग्रह, धर्मानुराग, साधु-संतों के प्रति उदार भाव आदि उस युग के अन्य किसी राजवंश में ही नहीं अनेक गृहस्थ घरों में भी अतुलनीय थे। वे अपने राज्य की सारी शक्ति लगाकर स्त्रियों की सतीत्व के रक्षा करते, अपनी फौज की उदंडता का दमन करके, सभी धर्मो के उपासना-घरों और शास्त्रों के प्रति सम्मान भाव रखते थे तथा साधु-संतों का पालन  पोषण करते थे। वे स्वंय निष्ठावान भक्त हिन्दू थे, भजन और कीर्तन सुनने के लिए अधीर रहते थे, साधु-सन्यासियों की पद सेवा करते थे और गो- ब्राह्मण प्रतिपालक थे। युद्ध यात्रा में कहीं ‘कुरान’ मिलने से उसे नष्ट या अपवित्र न करते, बल्कि बड़े यत्न से रख देते और पीछे किसी मुसलमान को दान कर देते थे। मस्जिद और इस्लामी मठ पर वे कभी आक्रमण न करते थे। शिवा जी के उपयुक्त सद्गुणों की चर्चा भूषण ने भी अपने काव्य में किया है –

                        1 वेद राखे विदित पुराण परसिद्ध राखे
                            राम-नाम राख्यो अति रसना सुघर में।[5]
                        2  राखी राजपूती राजधानी राखी राजन की ,
                            धरा में धरम राख्यो राख्यो गुण गुनी में।[6]
                        3  वेद पुरानन की चरचा  अरचा दूज – देवन की फिर फैली।
                        4  राज-लाज राजत आज है महाराज श्री सिवराज में।[7]

          निष्कर्ष यह है कि छत्रपति शिवाजी की वीर-भाव के पीछे सामाजिक और धार्मिक आदर्श था। जबकि रासो काव्य की वीरता के पीछे कोई व्यापक आदर्श नहीं था। दूसरी बात भूषण के युग में ऐसे वीरों की आवश्यकता थी, जो विरोधी शक्ति का सामना उनके छल-छंदों को समझकर, उसी रूप में कूटनीति को अपनाते हुए करने में सक्षम हो। शिवाजी ने भी यही किया।  उनका लक्ष्य ऊँचा था, किन्तु उसको प्राप्त करने में उन्होंने साम, दाम, दण्ड और भेद आदि  सभी प्रकार की नीतियों को अपनाया। उन्होंने नए राज्य की स्थापना भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए किया। राज्य की मूल सांस्कृतिक भावना में उन्होंने अपना जीवन लगा दिया। यही कार्य छत्रसाल बुंदेला ने भी किया। शारीरिक वीरता के साथ-साथ कूटनीति और दूरदर्शिता को अपनाने वाले वीर ही इस युग में सफल हो सकते थे। शिवाजी की सफलता का राज भी यही कूटनीति और दूरदर्शिता रही है।

संदर्भ
[1] भूषण और उनका साहित्य, डॉ. राजमल बोरा, पृष्ठ – 172
[2] भूषण ग्रंथावली, आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, पृष्ठ – 130
[3] भूषण ग्रंथावली, आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, पृष्ठ – 202
[4] भूषण; आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, पृष्ठ – 315
[5] भूषण; आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, पृष्ठ- 420
[6] वही, पृष्ठ- 421
[7] वही, पृष्ठ- 216

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