बच्चों के सर्वांगीण विकास में बाल-रंगमंच का योगदान

- नितप्रिया प्रलय

विशेष संदर्भ थिएटर इन एडुकेशन (TIE)

मानव जीवन में साहित्य का स्थान बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि साहित्य मानव जीवन का प्रभावित मुखरित रूप है। वह हमारे अव्यक्त भावों को व्यक्त करते हुए हमें एक संस्कृति और एक जाति के सूत्र में बांधता है। साहित्य और बाल साहित्य के अनुबंध का विचार भी इसी संदर्भ में किया जाना चाहिए। बाल साहित्य में बच्चों की रुचि, उनकी कल्पना, उनकी अनुभूति तथा उनकी मानसिकता आदि केन्द्रित होते हैं। अत: इसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि बाल साहित्य का संबंध बालकों के मानसिक तथा बौद्धिक विकास से होता है। बालकों के बौद्धिक तथा मानसिक विकास प्रक्रिया बाल मनोविज्ञान के माध्यम से समझी जा सकती है। इस विचारधारा के अनुकूल बाल साहित्य का लेखन और प्रकाशन होता रहा है। अध्ययन की दृष्टि से बाल साहित्य, बाल कहानी, बाल उपन्यास, बाल जीवनी, बाल गीत, बाल नाटक, बाल रंगमंच आदि विधाओं में लिखा जाता है।

इन सभी विधाओं के अतिरिक्त बाल नाटक विधा बच्चों के सर्वांगीण विकास हेतु बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह समझ तथा सम्प्रेषण की दृष्टि से सबसे अधिक प्रभावशाली विधा है।

अन्य सभी विधाओं में नाटक ही एक महत्वपूर्ण विधा रूप है। जिसका रंगमंच एक महत्वपूर्ण  अनिवार्य आयाम है। बाल रंगमंच बुनियादी रंगमंच है। बाल नाटकों की सफलता का रहस्य बाल रंगमंच है। बच्चों के संतुलित शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास के लिए रंगमंच की परंपरा के इतिहास में पहला चरण बाल साहित्य है तो दूसरा चरण बाल रंगमंच है। वास्तव में बाल रंगमंच बाल साहित्य के अनुप्रयोग का सर्वेक्षण क्षेत्र है। शिक्षा पद्धति की दृष्टि से भी बाल रंगमंच का महत्वपूर्ण स्थान है। बाल रंगमंच एक तरह से बच्चों का संस्कार रंगशाला है। बाल नाटकों की प्रस्तुतिकरण में दृश्यबंध, प्रकाश योजना, ध्वनि योजना, अभिनय (आंगिक, वाचिक, आहार्य, सात्विक) आदि विभिन्न पक्षों के साथ ही बाल दर्शक भी महावतापूर्ण है।

नई दिल्ली स्थित ‘राष्ट्रिय नाट्य विद्यालय’ (NSD) ने बाल रंगमंच के महत्व को पहचान कर 16 अक्टूबर, 1989 ई. में थिएटर इन एडुकेशन (TIE- संस्कार रंग टोली) नामक एक नई रंग मंडली की स्थापना की। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली के अनुसार बच्चों के लिए ‘थिएटर इन एडुकेशन’ दो चरणों में लागू हो सकता है-

1. छुट्टियों में ऐच्छिक गतिविधियों के रूप में 
2. शालेय पाठ्यक्रम में शामिल करके

पहले चरण को ध्यान में रखते हुए NSD ने TIE विंग के माध्यम से बच्चों की वार्षिक परीक्षा के बाद छूटियों में  बच्चों के लिए नाट्य प्रशिक्षण शिविर आयोजित करते हैं,ये शिविर पंद्रह दिन से लेकर एक या दो महीने का होता है। शिविर में प्राय: एक निश्चित आयु-वर्ग के विभिन्न बच्चों के साथ-साथ उनकी शारीरिक-मानसिक क्षमताओं के विकास के अनेक प्रकार के थिएटर खेल और अभ्यास करवाए जाते हैं। जिससे शारीरिक स्फूर्ति, शरीर के विभिन्न अंगों का उपयोग, विभिन्न मुद्राओं से व्यक्त होने वाले भाव आदि का परिचय बच्चों को कराया जाता है। साथ ही स्वयं कहानी या कविता गढ़ना, लिखना, कहानी या कविता का पठन, आलेख के संवादों या गीतों में व्यक्त भावों को अपनी आवाज, शरीर और मुद्राओं को सही- सही अभिव्यक्त करना, शब्दों के पीछे छुपे अर्थ को ढूँढने की क्षमता का विकास, व्यक्तियों के परस्पर सम्बन्धों के समझ कर समूहिक गतियों, मुद्राओं, कार्यों की समझ पैदा होना, स्वनियंत्रण, संयम, अनुशासन, आत्माभिव्यक्ति, दूसरों को भी सुनने देखने, समझने की क्षमता का विकास आदि बातें नाट्य प्रशिक्षण के माध्यम से बच्चे सीखते हैं। 

आज जो बच्चे सिर्फ स्कूल जाते हैं, सिर्फ स्कूल पाठ्यक्रम की किताबें ही पढ़ते हैं और सिर्फ टीवी देखते हैं, उनका व्यक्तित्व एक निष्क्रिय दर्शक और नीरस ग्राहक में बदल जाते हैं, वे उपभोक्तावाद के चंगुल में पड़ जाते हैं। परंतु जिन बच्चों को उपर्युक्त सृजनात्मकता ( बाल नाटक/ रंगमंच) का चस्का लग जाता है, वे जीवन के विविध रचनात्मक पक्षों को जानने-समझने और सीखने के लिए उत्सुक रहते हैं और एक बेहतर व्यक्ति के रूप में ढलने लगते हैं।

ऊपर वर्णित नाट्य प्रशिक्षण शिविर/कार्यशाला के अंतर्गत करवाए जाने वाले अभ्यासों को ‘थिएटर गेम्स’ कहा जाता है। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि बहुत सारे थिएटर गेम्स उन्हीं खेलों का परिवर्तित और विकसित रूप है जिन्हें बच्चे जानते हैं या जाने अनजाने में खेलते भी हैं। यहाँ कुछ थिएटर गेम्स की चर्चा करना प्रासंगिक होगा।

फॉलो द लीडर (नकलची बंदर) - यह कार्यशाला वैसे बच्चे को ध्यान में रखकर कराया जाता है जो आमतौर पर आगे आ कर बातचीत करने या किसी भी प्रकार के एक्स्ट्रा क्यूरिक्युलर एक्टिविटी करने से घबराते हैं। अभ्यास के अंतर्गत बच्चों के समूह से किसी एक बच्चे को लीडर बना दिया जाता है और बाकी बच्चों को हिदायत दिया जाता है कि लीडर जो गतिविधि करेगा उसे वे फॉलो करें। अर्थात लीडर जैसे शारीरिक मुद्रा बनाए या ध्वनि निकाले उसे बाँकी बच्चे फॉलो करें।

शुरुआत में होता यह है कि शरारती बच्चे रोजाना पहले लीडर बनने की कोशिश में रहता है फिर उनसे प्रेरणा पाकर वैसे बच्चे भी एक्टिव हो जाते हैं जो आमतौर पर सामने आकार परफ़ोर्म करने से घबराते हैं।

अभिव्यक्ति के लिए अभ्यास - इस अभ्यास के अंतर्गत बच्चों के ग्रुप को किसी एक विषय देकर उस पर बोलने को कहा जाता है, कुछ बच्चे बहुत तेजी से विषय पर अपनी राय देते हैं लेकिन कुछ बच्चे कुछ भी नहीं बोलते। बाद में इस ग्रुप के आधे-आधे बच्चों को दो ग्रुप में बांटकर एक विषय दिया जाता है और एक खास समयान्तराल देकर उन्हें अलग-अलग बातचीत करने को छोड़ दिया जाता है। ग्रुप बांटते समय कुछ नहीं बोलने वाले बच्चों को यह आजादी दी जाती है कि वह अपनी पसंद के ग्रुप को खुद चुनें। समयान्तराल (20-25 मिनट) में अभ्यास कराने वाले व्यक्ति इस बात पर खास तौर पर नजर रखता है कि शुरू में कुछ भी नहीं बोलने वाला बच्चा अपने साथियों से बातचीत कर रहा है कि नहीं? जब दुबारा दोनों ग्रुप के बच्चे को एक विषय देकर उस पर और प्रतिपक्ष में बोलने को कहा जाता है तो प्रत्येक बच्चे को सख्त हिदायत दी जाती है कि वे आवश्य अपनी राय दे चाहे वह एक लाइन ही बोले। इससे शुरू में कुछ भी न बोलने वाला बच्चा एक लाइन बोलता है और फिर उसका आत्मविश्वास बढ़ता जाता है और उस वाद-विवाद में उसकी भागीदारी दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाता है।

सुख व दुख के पल - इस अभ्यास के अंतर्गत बच्चों को छोटे-छोटे ग्रुप में बाँट दिया जाता है और हर बच्चे को मौका दिया जाता है कि वो अपने सुख या दुख के पलों को पुन: सृजन करे अपने ग्रुप के बच्चों को लेकर इस इंप्रोवाइजेशन में अपने सुख या दुख के पल को बताने वाला बच्चा वही भूमिका (अपना दुख का रोल) ही करेगा। बाँकी बच्चों को अपनी सिचुएशन के हिसाब से भिमिकाएँ देगा, अर्थात घटना के समय उपस्थित प्रमुख लोगों की भूमिकाएँ फिर उन्हें बताएगा कि उन्हें कब, क्या, कहाँ, कैसे करना है। ऐसे करने से बच्चे की विज्वलाइजेशन क्षमता बढ़ती है, पुन: याद करने की क्षमता बढ़ती है, विश्लेषण करने की आदत भी पड़ती है और निर्देश देने के गुण का भी विकास होता है।

स्टोरी टेलिंग - इस अभ्यास के अंतर्गत सभी भागीदारों को एक सर्कल में खड़ाकर दिया जाता है। फिर टीचर एक ऐसी कहानी चुनता है। जो सब ने पढ़ी या सुनी हो फिर उस कहानी को कहना शुरू करता है। चार-पाँच पंक्तियाँ कहने के बाद कुछ भागीदारों को इशारा करता है और वे सर्कल के अंदर आकार कहानी की उन पंक्तियों के अनुसार मिल-जुलकर एक दृश्य तैयार करते हैं। उदाहरण के लिए जैसे ही टीचर ने कहानी शुरू की- “नदी के किनारे एक चरवाहा भेड़ चरा रहा था” तो बच्चों में से कोई नदी बनेगा, तो कोई चरवाहा, तो कोई भेड़, तो कोई पेड़ आदि। जब दृश्य बन जाता है और टीचर को लगता है कि सब ठीक है तो वह ज्यादा समय न लेते हुए हुशssssssss… कहता है। भाग लेनेवाले वापस सर्कल में आकर खड़ा हो जाते हैं। अब टीचर कहानी की अगली कुछ पंक्तियाँ कहता है और दूसरे कुछ भागीदारों को इशारा करता है। वे सर्कल के अंदर आकर आगे कही गई कहानी के अनुसार दृश्य बनाते हैं। या यूं कहें कि अभिनय करते हैं। इस तरह कहानी आगे बढ़ती जाएगी और भाग लेने वाले अंदर आ कर अभिनय का हिस्सा बनते जाएंगे ये सब इतनी जल्दी-जल्दी होता है कि ज्यादा सोचने का समय नहीं मिलता है फिर भी सभी भागीदार कुछ न कुछ अभिनय कर रहे होते हैं, इसमें अभिनय करने से कुछ डरने वाले बच्चे भी होते हैं इसमें एक अच्छी बात ये है कि उन्हें कोई निर्देश नहीं देता। बच्चे अपने हिसाब से अभिनय करते हैं। बच्चों को यह एहसास बहुत सुखद अनुभव देता है। वे धीरे-धीरे अभिनय की ओर आकर्षित होते हैं और इसका प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर पड़ता है।

इस कार्यशाला या नाट्य प्रशिक्षण शिविर में कराए जाने वाले अभ्यास/थिएटर गेम्स के बाद बच्चों की समझ और रुचियों में एक व्यापक परिवर्तन देखने को मिलता है जिसके बाद ‘थिएटर इन एडुकेशन’ के दूसरे चरण की आवश्यकता सामने आ जाती है, जहां शालेय पाठ्यक्रम में शामिल विविध विषय भी थिएटर के माध्यम से आत्मसात करने की स्थितियाँ निर्मित की जा सकती है। भूगोल, इतिहास, गणित, साहित्य, विज्ञान और भाषा के कई नीरस पाठ सरस शैलियों में सुलभ किए जा सकते हैं। इस क्षेत्र में थोड़ा-बहुत प्रयास आरंभ हो चुके हैं। साहित्य के पाठ्यक्रम में छोटे-छोटे नाटक सम्मिलित किए गए हैं किन्तु व्यावहारिक रूप से ये भी कक्षा में अभिनीत करने की बजाय सामान्य पाठों की तरह पढ़ा दिए जाते हैं। ‘थिएटर इन एडुकेशन’ के इस चरण के लिए शिक्षकों का स्वयं का थिएटर से जुड़ा होना या उसमें परंपरागत होना आवश्यक है अन्यथा नाटक सिर्फ पठनीय रहेगा, अभिनय नहीं हो पाएगा और इससे ‘थिएटर इन एडुकेशन’ का लक्ष्य पूरा नहीं होगा। वर्तमान में पाठ्यक्रम में लागू नाटकों के नीचे टीप दी होती है कि शिक्षक इस बच्चों की भूमिकाएँ बांटकर कक्षा  में अभिनीत करवाएँ परंतु व्यवहार में यह संभव नहीं हो पाता है।

‘थिएटर इन एडुकेशन’ के इस चरण में किसी विषय, पाठ या समस्या विशेष पर नाटक का मंचन किसी नाट्य संस्था को आमंत्रित कर उससे करवाया जाए और उस पर बच्चों से चर्चा कारवाई जाए। परंतु इससे सिर्फ विषयवस्तु और पात्रों का आकलन ही हो पाएगा, बच्चों की खुद की सृजनात्मकता को अवसर नहीं मिलेगा।

उपरोक्त विश्लेषण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि बाल-रंगमंच बच्चों के व्यक्तित्व के बहुमुखी विकास के लिए एक शक्तिशाली माध्यम है। रंगमंच बच्चों का मुक्ति स्थल है, और यह तन और मन के लिए खेल का मैदान है। बाल रंगमंच बच्चों में छिपी शक्ति, ऊर्जा, प्रतिभा और रचनाशीलता को जानने पहचानने और प्रस्फुटित एवं उत्प्रेरित करने का जबर्दस्त साधन है। बच्चों को खेलना सबसे ज्यादा पसंद है और रंगमंच इस खेल-खेल में ही बच्चों के शारीरिक, मानसिक और आत्मिक विकास का सबसे सशक्त माध्यम है। रंगमंच एक ऐसा माध्यम है जहां सभी वर्गों के बच्चे मिलकर एक साथ सीखने, समझने, जानने के उद्देश्य से मजे-मजे में खेलते हुए उपरोक्त गुणों को अपने अंदर विकसित करते हैं। अलग-अलग आयु वर्ग के बच्चे अपनी जिंदगी, परिवार, समाज और संसार के विषयों पर रंगमंच से जुड़े माध्यमों (अभिनय, कविता, कहानी, गीत-संगीत, क्राफ्ट, पेंटिंग और नाट्य-रचना जिसमें इतिहास, भूगोल, विज्ञान आदि सभी कुछ समाहित है।) का समूह में उपयोग करते हैं। इस क्रियाकलाप का बच्चों के अवचेतन मन पर सीधा और गहरा असर होता है जो पूरी जिंदगी उनके साथ चलता है और उन्हें एक अच्छा नागरिक बनाए रखने में सहायक साबित होता है। इसी बात को मद्देनजर रखते हुए NSD, नई दिल्ली ने ‘थिएटर इन एडुकेशन’ (TIE) की स्थापना की थी जो लगातार अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्ति की ओर अग्रसर है।

संदर्भ ग्रंथ सूची:  
  • छाबड़ा, सुंदर लाल, कुछ थिएटर गेम्स मेरी पसंद के, रंग प्रसंग, 2015
  • आठले, उषा वैरागकर, बच्चों के लिए ‘थिएटर इन एडुकेशन’, बालरंग, 2006
  • बोरसे, नेहा राकेश, ‘हिन्दी बाल-नाटक एवं रंगमंच एक अध्ययन’ (स्वातंत्र्योतर काल के विशेष संदर्भ में), शोध प्रबंध, पुणे विश्वविद्यालय, 2009
  • सिंह, वागीश कुमार, अतिथि संपादक, रंग प्रसंग 2015

1 comment :

  1. अत्यंत सारगर्भित शोध जिसे पढ़कर मुझे बच्चों के रंग मंच द्वारा हिंदी भाषा और अन्य भाषा के अध्ययन में काफी सहायता में मिली इसके लिए आपका आभार

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