लघुकथा: भेदनाशक अँधेरा

गिरिजा कुलश्रेष्ठ
"बिजिन्दर, तूने सुना कुछ?"
कान्तिलाल ने, जबकि बिजिन्दर तखत पर ठीक से बैठ भी नहीं पाया था कि, यह घोर जिज्ञासा वाला सवाल कर ही दिया।

वैसे छोटे भाई के लिये कान्तिलाल के मन में खासी कटुता है। ईर्ष्या भरे कई सवाल रहते हैं। मन होता है, मिलते ही तीर जैसे सवाल पूछ डाले कि, 'क्यों रे बिज्जू! आजकल तो बड़े भाव बढ़े हुए हैं तेरे। जो बिना पूछे किसी के यहाँ पचास रुपए का व्यवहार नहीं करता था वह पाँच-पाँच सौ के नोट रखता है लिफाफे में। क्या टकसाल खोल ली है? हाँ भाई, अब क्यों बात करेगा! लडकी भी इंजीनियरी की परीक्षा में पास हो गई है। अब तो वारे-न्यारे हैं। पर भूल गया कि इसी बड़े भाई की बदौलत तुम सबके ब्याह-गौने हो गए और आज हैं कि सूरत दिखाने तक नहीं आते।

उधर बिजिन्दर के मन में भी उतने ही सवाल और मलाल भरे हैं। वह भी मौका मिलते ही कहना चाहता है कि, ‘सूरत दिखा कर क्या करेंगे भाई साहब। कभी पूछते हो कि छोटा भाई कहाँ है? भतीजे की सगाई अकेले-अकेले चढ़वा ली। पड़ोसियों को बुला लिया पर भाई को नहीं। भाभी ने माँ के गहनों का सही हिसाब आज तक नहीं दिया। सारे के सारे अपने 'बकस' में भर कर रख लिये। गाँव में इमली का पेड़ कब चुपचाप कटवा कर बेच दिया बताया भी नहीं। हजारों रुपए खुद रख लिये।' 

कुल मिला कर बिजिन्दर और कान्तिलाल के बीच मतभेदों की गहरी खाई है। अगर वे केवल अपनी बातें करें तो बहुत संभावना होती है कि उनकी बातचीत बहस में, फिर झगड़े में बदल जाए और अन्ततः एक घोर हिंसक युद्ध में रूपान्तरित हो जाए। पर ऐसा प्रायः होता नहीं हैं। उनका मिलन अक्सर बड़ा आत्मीयता भरा और सुखान्त होता है। खासतौर पर कान्तिलाल के पास कोई न कोई सुरक्षात्मक  प्रसंग होता है, जैसा कि आज था।

बिजिन्दर ने भाई की ओर उदासीनता के साथ देखा। वह दुनियादारी के लिहाज से भाई की बीमारी की खबर सुनकर बेमन ही आ गया था। पर कान्तिलाल ने कुछ इस तरह पूछा मानो वह कोई ब्रेकिंग न्यूज सुनाने वाला हो,
" देख आज मैं तुझे याद कर ही रहा था और तू आ गया। इसे कहते हैं दिल की दिल से राह होती है।"
"आप कुछ कहने वाले थे।" बिजिन्दर को जैसे भाई की इन बातों में कोई रुचि नहीं थी।
"हाँ... हाँ। वो नरेश है न! अरे वही जो हमारे साथ बगल वाले घर में किराये से रहता था उसकी लड़की ने किसी गैरबिरादरी के लड़के के साथ भागकर शादी कर ली है।"
"अरे नहीं!" बिजिन्‍दर जो भाई के विगत व्यवहार को याद कर कुछ निरपेक्ष सा था एकदम उत्सुक और पुलकित हो उठा और काफी चकित भी।
"भाई साब यह तो गजब ही हो गया। नरेश अपनी नाक पर मक्खी नहीं बैठने देता था, अब?"  बिजिन्दर को ऐसा लगा जैसे उसके कूपन पर कोई इनाम निकल आया हो।
"अब क्या। धुल गई सारी कलई। बड़ा फिरता था मूँछों पर ताव देते हुए। नरेश ने कसर नहीं छोड़ी भाई-भाई को अलग करवाने में।"
"ये दुनिया तो चाहती ही नहीं है कि दो लोग चैन से रहें।"
और फिर तो चर्चाओं का दौर चल पड़ा।
"शर्मा जी के बेटे की बारात बिना बहू के लौट आई। दस लाख मांग रहे थे। अब पैसा भी गया और इज्जत भी। लड़के वालों का तो मरना समझो। लड़के को सारी जमापूँजी लगा कर पढ़ाओ। शादी में दहेज भी नहीं और शादी के बाद सब कुछ बहू का। टापते रहो माँ-बाप। ... भाई मित्तल जी के यहाँ जैसी सजावट और दावत देखी वैसी हमने तो आज तक नहीं देखी। भई पैसा है, उसे आदमी कैसे भी तो ठिकाने लगाए। आजकल हनुमान जी और दुर्गा जी से ज्यादा मान्यता सांई बाबा की हो रही है। देखा नहीं गुरुवार को रोड पर जाम लग जाता है। भक्तों में नए लड़के-लड़कियाँ ज्यादा देखने मिलेंगे। आजकल देखो कैसे-कैसे कानून बनाए जा रहे हैं। सब नेताओं की चाल है अपने कुकरम छुपाने के लिये..."
"अरे भाई साहब। बातों में कब दस बज गए पता नहीं चला। चलता हूँ। बच्चे खाने के लिये बैठे होंगे।"
"अरे मैं फोन कर देता हूँ सब लोग यहीं आ जाएँगे। खाना मिल ही कर खा लेंगे।"
"नहीं भाई साहब, खाना तैयार होगा। वहाँ भी आपका ही है। आप अपनी तबियत का ध्यान रखना। समय का कोई भरोसा नहीं..."
"तू भी चक्कर लगाता रहा कर। मन अच्छा हो जाता है।"
भाइयों के बीच आत्मीयता की बाढ़ सी उमड़ पड़ी थी।
विदा लेते समय बिजिन्दर का मन भी हल्का था।
पर-चर्चा के बाद उनके बीच के सारे मतभेद मिट गए थे।

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