व्यंग्य: एक व्यंग्यकार का शोधपत्र

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

भूमिका: एक लब्ध प्रतिष्ठित पत्रिका के सम्पादक ने मुझसे एक शोधपत्र लिखने का आग्रह किया। मैं क्या, कोई भी रचनाकार संपादक के गच्चे में फँस जाए, और माँग के अनुसार लिख डाले। सो, मैंने अपने जीवन का पहला शोधपत्र गालियों पर लिखा। ज़रा आप पढ़ लें, फिर मैं 'विष विद्यालय' के संपादक को भेज देता हूँ।

प्राक्कथन: भारतीय संस्कृति कबाड़ की दुकान है। तमाम जंग लगी संस्कृतियाँ यहाँ मौजूद हैं। हम मोहन जोदड़ो के बहाने पुरानी सभ्यताएँ खोदते हैं और वर्तमान को कालपात्र में गाड़ देते हैं। पिछले दिनों अपने अतीत की खुदाई करते हुए मुझे लगा, हमारे जीन्स में गालियों के डीएनए स्वतः आ जाते हैं। अक्षर ज्ञान हो न हो गाली-ज्ञान बचपन में ही आ जाता है। बिना गुरू के और बिना पाठ्य पुस्तकों के ही गालियाँ आ जाती हैं। गाली-ज्ञान सहज ज्ञान है। निश्चित ही गाली साहित्य के पहले प्रतिष्ठित हुई होगी। इसलिए मैं गाली पर शोध प्रबंध लिख रहा हूँ। यह शोधपत्र इसी महत् कार्य का सारांश है।

गाली का उद्भव: मुझे गालियाँ खाने और खिलाने का पैंसठ साल लम्बा अनुभव है। इस आधार पर मैं गाली के उद्भव को समझाने के लिए मौलिक कथा प्रस्तुत कर रहा हूँ। बात आदम-हव्वा याकि मनु और श्रद्धा के जमाने की है। तब संसार सागर हो गया था। न मैं था, न चार्ल्स डार्विन थे, न बंदर थे। मनु और श्रद्धा थे। रहने के लिए उन्होंने एक मकान बनाया। पशु बाँधने के लिए बाड़ा बनाया। बाड़े और घर को जोड़ने के लिए गली बनाई, वह गली जो दो प्रेमियों का जमा-उधार आज भी निपटाती है। मनु उन दिनों फिदा हुसैन थे। वे अपनी बाड़े वाली इड़ा बाई पर फिदा थे। वे उससे गली में गले मिलते थे। एक सुप्रसंग में इड़ा बाई के कान की बजाय गाल लाल हो गए। तब लजाते हुए इड़ा बाई ने कहा - 'मैं वह हल्की-सी मसलन हूँ जो बनती गालों की लाली।' रसानुभूति से ओत-प्रोत मनु कभी इड़ा बाई में तो कभी शब्दों के सौंदर्य में खो जाते। उनका कवि मन हिलोरें लेने लगा। वे गली में थे, सामने गाल थे, उन पर लाली थी। उनके अंतर से तत्क्षण एक शब्द निकला 'गाली'। वे जोर-जोर से आर्किमिडीज़ की तरह चिल्लाने लगे - गाली, आह गाली, वाह गाली । उनकी पत्नी श्रद्धा भागी आईं, उन्होंने मनु और इड़ा बाई को बँधे हाथों पकड़ लिया। आग्नेय मनु ने अपनी पत्नी श्रद्धा को घूरा और पहली गाली दे डाली। तबसे गाली सजती-धजती और घूंघरू की तरह बजती रही है। कालान्तर में मनु ने अपनी प्रिया का नाम इसी तर्ज पर साली रखा। वे जन्म-जन्मान्तर के लिए मानव जाति को रास्ता दिखा गए। इसलिए वे आज भी याद किये जाते हैं।

गाली की विकास यात्रा: विद्वानों ने अपने प्रबंधों में उत्पत्ति कथा के बाद विकास कथा कही है। यहाँ मैं उनका अनुकरण कर रहा हूँ। गाली से गालियों की विकास यात्रा बैलगाड़ी से रॉकेट तक की विकास कथा जैसी है। तब बैठे-ठाले मनु और श्रद्धा ने उत्पादन शुरू किया। उन दिनों आदमी कुटीर उद्योग में बनता था, इसलिए उत्पादन कम था। कुछ शताब्दियों बाद यह कार्य लघु उद्योग में वर्गीकृत हुआ। अपने युग में तो यह वृहद उद्योग है, बड़े-बड़े शहरों की छोटी-छोटी जगहों में मानवीय कारखाने लगे हैं। प्रारम्भ में एक ही गाली थी। आबादी के विस्तार के साथ हर तरह के रोष को एक ही गाली से व्यक्त करना कठिन हो गया। अप्रतिभाशाली लोग राज-दरबार में प्रशस्ति गान रच रहे थे तब प्रतिभाशाली लोगों ने सड़कों पर गालियों की रचना की। जैसे-जैसे साहित्य बढ़ा, गालियाँ बढ़ीं। कारोबार बढ़ा, तो गालियों का लेन-देन बढ़ा। भारत से चली गालियों का संसार की तमाम भाषाओं और बोलियों में अनुवाद होने लगा।

गालियाँ पराक्रम की अभिव्यक्ति हैं, इसलिए इनका स्थायी भाव लड़ाई है। इतिहास गवाह है, द्रौपदी का शब्द-बाण पहले चला, फिर महाभारत युद्ध हुआ। सदियों से शब्द युद्ध पहले घर में लड़े जाते हैं तद्न्तर सड़क पर आते हैं। हमारी आर्थिक करंसी रुपया और सामाजिक करंसी गाली है। करंसी को भला कोई हेय दृष्टि से देखता है! ग़रीब हो या अमीर, गाली तो सभी की जीभ पर बैठती है। साहित्यरथी इसे शब्द बाण, शब्द युद्ध, कटाक्ष, तीखे बोल, अपशब्द जैसे कितने ही चमकदार नाम दे दें, जो धार और मार गाली में है वह इसके परिष्कार में नहीं। कुछ भी कहें,  लोगों को गालियाँ बहुत अच्छी लगती हैं। इनके भारतीय मूल के कारण ये अहिंसक हैं पर जुझारू हैं। मुझे लगता है भारत को जगतगुरू का दर्जा वेद-पुराणों के लिए नहीं बल्कि गाली और शून्य के लिए मिला है।

गाली और साहित्य दो समानांतर विधाएँ हैं। साहित्य के नवरस की तरह मैं गालियों को भी नौ भागों में विभक्त करूँगा। समालोचक बंधु इस पर वाद-विवाद कर सकें इसलिए इन भागों को वाद कहना ठीक रहेगा। सीमित उदाहरण मूल शब्दों में हैं। इनमें उपसर्ग और प्रत्यय आवश्यकतानुसार लगते रहते हैं। यह प्रयोगवादी धारा है, आप कैसे भी संयोजन के लिए स्वतंत्र हैं। गालियों के प्रयोग से समझाए गए व्याकरण के कठिन नियम सहज ही दिमाग़ में घुस जाते हैं। इसके लिए आपको मेरी थीसिस पढ़नी होगी। प्रत्येक वाद के कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं।
पुश्तैनीवाद: पीढ़ी दर पीढ़ी और खास रिश्तेदारों को लपेटती हुई गालियाँ। यथा - बाप-दादा, माँ-बहन-भाई, साला-साली। इनमें आप आगे वर्णित अन्य किसी भी वाद की गाली को जोड़ कर अधिक धारदार गाली बना सकते हैं। उदाहरण के लिए,  तेरा भाई + जानवरवाद (गिरगिट), या तेरा भाई + कर्मवाद (डाकू)।

जानवरवाद: चार्ल्स डार्विन के सिद्धांत को आगे बढ़ाती हुई गालियाँ। यथा - ढोर, गधा-गधी, सुअर, कुत्ता-कुतिया। उल्लू, कौआ जैसे पक्षी। गिरगिट, मेंढक जैसे प्राणी और मच्छर, मकोड़े जैसे कीड़े। अपने दस दोस्तों को याद करिये, इनमें से बहुत-सी गालियाँ उनकी उपमा बन जाएगी और आपको गुदगुदाएगी।

जातिवाद: इन गालियों का उपयोग साम्प्रदायिकता भड़काने के लिए होता है। यथा - बामण, बनिया जैसी सूचित जातियाँ, कुछ अनुसूचित जातियों के नाम, कुछ जनजातियों के नाम। आप किसी सूचित जाति वाले को जनजातीय नाम से बुला कर देखिये, अपनी शव यात्रा की तैयारी करनी पड़ेगी। यह बहुत संवेदनशील वाद है। इस गाली का उपयोग वे ही लोग कर सकते हैं जो भीमराव अम्बेडकर और मंडल आयोग का नाम उछाल सकते हैं। इस वाद का नर्म स्वरूप व्यापक है। आम लोग पाकिस्तानी, बिहारी, बंगाली, गुजराती जैसे शब्दों से अपनी भड़ास निकाल लेते हैं।

माया-मृषा वाद: आप ग़लत समझ रहे हैं, यह बहनजी द्वारा चलाया गया वाद नहीं है। इस समूह में कंजूस, मक्खीचूस, बेईमान, बदमाश, पाजी जैसी शताब्दियों से प्रचलित गालियों ने मान्यता पायी है। इक्कीसवीं सदी में माल्या, दाऊद, भाई जैसी नई गालियों ने इस समूह की ऊपरी पायदान पर जगह बनायी है।

कर्मवाद: यह गाली एकदम निजी प्रवृत्ति पर चलाया गया तीर है। कुछ में हल्का उलाहना है तो कुछ में भारी आरोप। पहली पाँच गालियाँ तो मुझे पड़ती रहती हैं, पुलिस वालों के तरह मैं भी इन्हें चुपचाप पचा जाता हूँ। उदाहरण देखिए - बेवकूफ, मूर्ख, आलसी, डरपोक, हरामखोर। अन्य उदाहरण हैं - चोर-उचक्का, डाकू, नशेड़ी, जुआँरी, चुड़ैल, छिनाल आदि। आप कहीं इनका वाक्यों में प्रयोग कर रहे हों तो सामने वाले से दो हाथ दूर रहने की सलाह दी जाती है।

विकृतिवाद: इनमें गाली-तत्व कम, उपहास अधिक है। शारीरिक विकृतियों का उपहास। इन गालियों का उपयोग कमजोर लोग, खुद से अधिक कमजोर पर करते हैं। यथा - काणा, बाड़ा, ढेरा, लूला, लंगड़ा, अंधा, कुबड़ा आदि।

प्रगतिवाद: आधुनिकता से प्रभावित गालियाँ ढेरों हैं। इनमें गालियों जैसा कुछ नहीं है। कवि को कवि कह दो तो सम्मान है, पर कविराज कह दो तो गाली है। पागल, कंडील, मास्टर, किंगकांग, खब्ती, सूरदास, गाँवड़ेल, असभ्य, आलू, टमाटर, गुलाब जामुन आदि इसी श्रेणी की गालियाँ हैं। जिसमें कविता जैसा कुछ नहीं हो, वह प्रगतिशील अकविता है। वैसे ही जिसमें गाली जैसा कुछ न हो पर कोई चिढ़ जाए तो वह प्रगतिशील गाली है। आप इसे अ-गाली भी कह सकते हैं।

राजनीतिवाद: रात-दिन रंग बदलती गालियाँ। ट्विटर पर ट्वीट होती गालियाँ। ये गालियाँ ब्रेकिंग न्यूज़ बन कर टीवी चैनलों पर छाई रहती हैं। मैं व्यंग्यकार हूँ, राजनीति की प्रवृत्तियों पर व्यंग्य करता हूँ, व्यक्ति पर नहीं। पर राजनैतिक गालियाँ बहुत व्यक्तिगत होती हैं। यहाँ प्रधानमंत्री को नीच कहने और उनके समकक्ष अप्रधानमंत्री को युवराज कहने में विसंगति है या गाली, मैं अभी तय नहीं कर पाया हूँ।  पप्पू, दलाल, चमचा, आयाराम, गयाराम, दलबदलू, नेता, बोगस, चकाचक, शातिर आदि गालियों का राजनैतिक गलियारों में बड़ा महत्त्व है। आजकल संविधान, कानून, असहिष्णु, दलित, अगड़ा, पिछड़ा आदि शब्द भी गाली बनते जा रहे हैं।

अंगवाद: यह स्व-विवेचित वाद है। इस वाद की गालियाँ बच्चों से बूढ़ों तक में समान रूप से लोकप्रिय हैं। सेंसर बोर्ड ने इसे 'ए' सर्टिफिकेट दे रखा है। रेलगाड़ी के शौचालयों व सार्वजनिक शंकालयों में इनका सचित्र वर्णन रहता है। इन्हें मैं कैसे लिखूँ? मैं लिख भी दूँगा तो सम्पादक छापेंगे नहीं, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उन्होंने छाप भी दिया तो ये गालियाँ आप खुलेआम बकेंगे नहीं। असभ्य समाज को कुछ सभ्य बनाने का थोड़ा-सा जिम्मा आपका भी बनता है।

इस प्रबंध के द्वारा मैंने यह सिद्ध किया है कि गाली और आदमी चोली-दामन जैसे साथी हैं। गाली चाय-सी गर्म और लोकप्रिय है और गालियों का समुचित अध्ययन मनुष्य और मानव-समाज को समझने में सहायक होगा। सबसे बड़ी बात, भारत उनतीस राज्यों और सात केंद्र शासित प्रदेशों वाला महादेश है। इन सबकी संस्कृतियाँ अलग और बहुरंगी हैं पर गालियाँ एक जैसी हैं। अनेकता में एकता की मिसाल है गाली। भारत को एकसूत्र में बाँधने का श्रेय हिंदी और गालियों को जाता है।

विश्वविद्यालयों से:
यह शोधपत्र गालियों में मेरी अनुपम विद्वत्ता का प्रमाण है। मेरे कौशल को आँकने के लिए विश्वविद्यालयों से मुहरबंद टेंडर आमंत्रित हैं। डॉक्टरेट की मानद डिग्री, सम्मानजनक स्वर्ण पदक, शाल-दुशाला और नकदी प्रकाशन ग्रांट वांछनीय है। स्वनाम धन्य विश्वविद्यालयों से निवेदन है कि जब भी वे डॉक्टरेट की खैरात बाँटे मुझे याद कर लें, गालियों से मैं उनका स्तर बढ़ा दूँगा। विज्ञ पाठक जानते हैं, विश्वविद्यालय लोगों को पकड़-पकड़ कर मानद डॉक्टरेट की रेवड़ी अर्पित करते हैं। मैं तो मेहनत कर रहा हूँ। लोगों ने हिंदी में स्नातकोत्तर करने के बाद विश्वविद्यालय को विश विद्यालय और विष विद्यालय लिख कर डॉक्टरेट प्राप्त की है। मैं तो मेहनत कर रहा हूँ, गालियों के उद्भव, विकास और अवदान पर शोध प्रबंध लिख रहा हूँ। इस शोध को मान्यता दे कर विश्वविद्यालय हिंदी साहित्य को समृद्ध करें।
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