काव्य: मयंक शुक्ला 'मुसाफ़िर'

गीत-1

दर्द जीवन की निशानी, चैन तो मरकर मिलेगा
छाँव में जो ढूंढते हो, वो सुकूँ जलकर मिलेगा

कौन है जिसने ना झेले दर्द इस जीवन समर में
कौन है जो पा गया अमृत यहाँ पहले गरल से
कौन जिसने सत्य पहचाना भला रहकर महल में
तेरा असली रंग तुझको आग में तपकर मिलेगा
दर्द जीवन की निशानी, चैन तो मरकर मिलेगा...

धूप की ताबीज़ पहनो, छतरियाँ सारी हटा दो
ढूंढनी है ज़िन्दगी तो, फूल राहों से मिटा दो
जब उठे तूफ़ान तो झुकने की आदत छोड़ दो तुम
अपनी ताकत का पता तुमको सदा तनकर मिलेगा
दर्द जीवन की निशानी, चैन तो मरकर मिलेगा...



गीत-2

कभी जीत ज़रूरी है, कभी हार ज़रूरी है

इस बहार की नूतनता में पतझर का अहसान छिपा है
इन कलियों की सुन्दरता में फूलों का अवसान छिपा है
मंज़िल तब अच्छी लगती है, राह परखती जब पग-पग पर
पानी की इस आतुरता में तृष्णा का गुणगान छिपा है
जीवन रसमय बना रहे बस इसीलिए
कभी फूल ज़रूरी है कभी खार ज़रूरी है
कभी जीत ज़रूरी है, कभी हार ज़रूरी है

आसमान से हाथ छुड़ाकर धरती पर बारिश आती है
सूरज को भट्ठी में रखकर, रात ये चाँद पका लाती है
जी-जी कर इस दुनिया में इंसान पुराना हो जाता है
मृत्यु सृजन नव करने को बस हौले-हौले मुस्काती है
चिर नूतनता बनी रहे बस इसीलिए
शृंगार कहीं तो कहीं-कहीं संहार ज़रूरी है
कभी जीत ज़रूरी है, कभी हार ज़रूरी है


निवास: बिल्हौर (कानपुर), उत्तरप्रदेश, भारत
संपर्क: +91 700 782 1082

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