आओ हिंदी सीखें - भाग 3

डॉ. सत्यवीर सिंह

सत्यवीर सिंह

सहायक आचार्य (हिंदी)
ला. ब. शा. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कोटपूतली (जयपुर) 303108, राजस्थान, भारत
चलभाष: +91 979 996 4305; ईमेल: drsatyavirsingh@gmail.com


देवनागरी लिपि : उद्भव और विकास

वाचिक, उच्चरित, मौखिक भाषा को स्थायी रूप देने के लिए भाषा के लिखित रूप का विकास हुआ। इसके लिए प्रत्येक ध्वनि या वर्ण के लिए लिखित चिह्न, संकेत या प्रतीक बनाए गए। वर्णों की इस संकेत या प्रतीक व्यवस्था को ही 'लिपि' कहा जाने लगा। लिपि एक तरह से उच्चरित ध्वनियों को लिखकर प्रस्तुत करने का ढंग है। इसे हम ऐसे भी कह सकते हैं कि "लिपि, भाषा के श्रव्य रूप को लिखित रूप में प्रस्तुत करने के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले प्रतीक चिह्नों या संकेत चिह्नों की व्यवस्था है।" विश्व में सभ्यताओं के विकास की कहानी के साथ भाषा और लिपि के विकास का इतिहास जुड़ा है। मानव के विकास के साथ मनुष्य के आपसी भावों और विचारों को स्थायित्व देने के लिए; एक-दूसरे को सुदूर तक संप्रेषित करने के लिए; लिपि की आवश्यकता महसूस हुई, परिणामस्वरूप लिपि का विकास हुआ। लिपि का जन्म भाषा के पश्चात हुआ। यह एक निर्विवादित सत्य होना चाहिए। साथ ही लिपि के जन्म को लेकर विश्व की सभी लिपियों के साथ लगभग जुड़ा हुआ है की लिपि के जन्मदाता ईश्वर है। धीरे-धीरे शोध, गवेषणा के पश्चात् कुछ बातें सुलझ पायी। ईश्वरीय धारणा के सवाल को न तो पूर्णतया नकारा जा सकता तथा न ही अपनाया जा सकता है।

भाषा और लिपि: साम्य-वैषम्य
 भाषा और लिपि दोनों का संबंध मानवीय विकास से रहा है। दोनों में ध्वनि संकेतों का व्यवहार होता है; दोनों ही विचार एवं भावों की अभिव्यक्ति के साधन है; दोनों ही मूल रूप से ध्वनियों पर आधारित होती है। दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों मानव विकास की कहानी कहते हैं। दोनों का अपने स्तर पर महत्वपूर्ण स्थान है। जहाँ लिपि के बिना भाषा का मूल्य नहीं तो वहाँ भाषा के बिना लिपि की आवश्यकता नहीं। बावजूद इसके दोनों में अंतर भी है। भाषा ध्वनि प्रतीकों की व्यवस्था है जबकि लिपि लिखित चिह्नों की संरचना। भाषा काल तथा स्थान में सीमाबद्ध होती है जबकि लिपि सीमातिक्रमण करती है, कालातीत रहती है। भाषा क्षणिक है तथा वायवीय होती है जबकि लिपि शाश्वत् रहती है। यदि भाषा को मानव माना जाए तो लिपि उसका छायाचित्र है। मुख्यतः भाषा प्रमुख है, असल है जबकि लिपि उस भाषा की नकल है। भाषा के उच्चारण में जिह्वा (जीभ), नाक, तालु आदि से मिलकर वाक् यंत्रों का योगदान रहता है जबकि लिपि के लेखन में लेखनी, चित्रों, वर्णों आदि का योगदान रहता है। भाषा जहाँ हमारी ध्वनियों के माध्यम से भावों एवं विचारों को अभिव्यक्त करती है वहीं लिपि उन्हीं विचारों, भावों को ध्वनि चिह्नों, रेखाओं, चित्रों, वर्णों आदि के माध्यम से व्यक्त करती है।

लिपि का वैश्विक इतिहास
 भाषा का इतिहास बहुत प्राचीन है, तो लिपि का इतिहास भी कम प्राचीन नहीं है। आज हम ध्वनिमूलक या वर्णनात्मक लिपि को अधिक वैज्ञानिक मानते हैं। यह रूप एकदम नहीं आया। अनेक सोपानों से होते हुए आया। लिपि के विकास का क्रमिक सोपान इस प्रकार है - चित्रलिपि, सूत्रलिपि, प्रतीकात्मक लिपि, भावमूलकलिपि, फन्नी लिपि, गूढ़ाक्षरिक लिपि, क्रीटलिपि, हिट्टाइट लिपि, सिंधु घाटी की लिपि, चीनी लिपि, ध्वनिमूलक (ध्वनि मूलक के दो भेद हैं- अक्षरात्मक तथा वर्णनात्मक) लिपि। उक्त वर्गीकरण डॉ. राजमणि शर्मा ने किया। कमोबेश यही वर्गीकरण अन्य भाषाविद् या लिपिविद् करते हैं। लिपि अपने विकासक्रम में चित्रों के माध्यम से सबसे पहले सामने आई। आज भी चीनी और जापानी भाषा की यही लिपि (चित्र लिपि) है। इसकी सबसे बड़ी समस्या चित्रों की अधिकता है। यह संख्या 200 से लेकर 2000 तक चली जाती है। साथ ही भावों को चित्रों के माध्यम से व्यक्त करना बहुत दुष्कर कार्य है। इसी तरह ध्वनिमूलक (अक्षरात्मक, वर्णनात्मक) लिपि को छोड़कर अन्य लिपियों का हश्र हुआ। कालक्रमानुसार वे लिपियाँ भी काल का ग्रास बन गयी। आगे विकास नहीं कर पायी।

भारत में लिपि का इतिहास
 भारत में प्राचीन लिपियों में सिंधु घाटी की लिपि (3500 ईसा पूर्व), खरोष्ठी लिपि (400 ईसा पूर्व से 300 ईसा पूर्व) और ब्राह्मी लिपि (500 ईसा पूर्व से 350 ईसा पूर्व) प्रसिद्ध हैं। सिंधु घाटी की लिपि कुछ चित्राक्षर थी तथा कुछ ध्वनिमूलक थी। हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो से प्राप्त सिक्के, मुहरों से ज्ञात होता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों ने लिपि का आविष्कार कर लिया था। बाद में भारत में दो ही लिपियाँ प्रधानत: स्थान बना पायी। खरोष्ठी तथा ब्राह्मी लिपि। इन दोनों का उल्लेख जैन ग्रंथ पन्नवणासूत्र (18 लिपियों का नाम) तथा बौद्धों की संस्कृत पुस्तक 'ललित विस्तर' (64 लिपियों का नाम) में मिलता है। खरोष्ठी लिपि का प्रचलन लगभग 1000 वर्ष तक पश्चिमोत्तर भारत में रहा। यह दायीं से बायीं ओर चलते हुए लिखी जाती थी। इसके प्राचीन लेख अशोक महान के शिलालेख शहबाजगढ़ी (यूसुफजई, पंजाब) तथा मनसेरा (हजारा जिला, पंजाब) में मिले हैं। इसके अन्य नाम है - इंडोवपैंक्तियन, वैक्ट्रियन, काबुलियन, बैक्ट्रोपाल आदि। इसके कुल 37 चिह्न थे, जिसमें 5 स्वर तथा 32 व्यंजन बताए गए हैं। इसका उद्भव तथा पराभव भारत में ही हुआ। यद्यपि कुछ विद्वानों ने इसे विदेशी लिपि माना है।

खरोष्ठी लिपि के बरक्स भारत की प्राचीन लिपि ब्राह्मी है। जिसका सर्वाधिक विकास भारत में हुआ। भारत से आधुनिक लिपि कमोबेश ब्राह्मी से प्रभावित हुई। इसी से पोषण ग्रहण किया। ब्राह्मी के प्राचीनतम नमूने उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में प्राप्त पिपरवा के स्तूप में तथा राजस्थान के अजमेर जिले के वडली (वर्ली) ग्राम के शिलालेख में मिले हैं।

ब्राह्मी का यह समय 500 ई. पू.से 350 ईसा पूर्व माना गया है। प्राप्त सामग्री एवं प्रमाणों से प्रतीत होता है कि ब्राह्मी प्राचीन काल तक व्यापक क्षेत्र में व्यवहृत होती रही है। डॉ. राजबली पांडेय का मत है कि ब्राह्मी का आविष्कार ब्रह्म या वेद की रक्षा के लिए हुआ था। चीनी विश्वकोश फाबान-शु-लिन (668 ई.) में इसके निर्माता ब्रह्मा माने गये है जिन्हें चीन में fan नाम का आचार्य कहा जाता है। राजमणि शर्मा ने ब्राह्मी को 'वैदिकी' नाम दिया है। उनका मानना है कि वेदों का संपादन, संकलन सारस्वत (ब्राह्म) प्रदेश में ही हुआ था। अतः इस संकलनार्थ जो लिपि प्रयुक्त हुई, वह यह वैदिकी लिपि ही है। विकास की दृष्टि से ब्राह्मी लिपि को तीन युगों में विभाजित करके देखा जा सकता है -
1. प्रागैतिहासिक युग - वैदिक युग से 6 वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक।
2.बौद्ध काल - इस समय ब्राह्मी के अक्षर गोलाकार होने लगे थे।
3.गुप्त काल - इसके बाद ब्राह्मी से अनेक आधुनिक लिपियों का जन्म हुआ।

 ब्राह्मी का पाँचवी शताब्दी ईसा पूर्व से 350 ईसा पूर्व तक एक रूप मिलता है। बाद में यह दो धाराओं, भागों या शैलियों में विभक्त हो गई या बन गई। उत्तरी ब्राह्मी और दक्षिणी ब्राह्मी। दक्षिणी (शैली धारा) से तेलुगु, कन्नड़, तमिळ, मलयालम, सिंहली, बर्मी आदि लिपियों का विकास हुआ। उत्तरी को ही गुप्त नाम मिला (350 से 500 ई.) इसका व्यवहार संपूर्ण गुप्त साम्राज्य में होता था। इसके पश्चात इसके वर्णों,अक्षरों में वक्रता (कुटिलता) आने लगी तो नाम पड़ा 'कुटिल लिपि'। यह समय 500 ई. से 900 ई. का है । यह गुप्त लिपि का ही विकसित रूप था। गुप्त लिपि से दो धाराएँ सामने आयी। शारदा लिपि तथा प्राचीन नागरी । यह समय 900 ई. का है। कश्मीर की अधिष्ठात्री देवी शारदा के नाम पर 'शारदा लिपि' रखा गया। इससे निष्पन्न लिपियाँ हैं - कश्मीरी, टक्करी (टाकरी), गुरुमुखी (सिखों के दूसरे गुरु अंगद देव ने पंजाबी भाषा के लिए बनायी), डोगरी, चमओली (चमोली), कच्छी (कोष्टी), लंडा, जौनसारी, कुल्लई, मुल्तानी, सिरमौरी आदि है।

कुटिल लिपि से ही प्राचीन नागरी लिपि का उत्तर भारत में 9 वीं शती के अंतिम चरण में विकास हुआ। दक्षिण भारत में इसे नंद नागरी (नंदीनागरी) के नाम से पुकारा जाता था। विजय नगर साम्राज्य के राजाओं ने अपने दान पत्रों में इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया। प्राचीन नागरी के पूर्वी रूप बंगला, असमिया, कैथी (मुख्यतः कायस्थों, बिहार की), उड़िया, मणिपुरी आदि का जन्म और विकास हुआ। इसी के पश्चिमी रूप से आधुनिक नागरी या देवनागरी (15-16 वीं शती), महाराष्ट्री , गुजराती, बनियाई (महाजनी, राजस्थान) आदि का विकास हुआ।

देवनागरी लिपि
 उपर्युक्त विवेचन भारत में लिपि के विकास क्रम का था। जिसमें देवनागरी तक का इतिहास बताया गया या कहे कि विकास क्रम था। संक्षेप में विहंगम दृष्टिपात करें तो यह कहा जा सकता है कि ब्राह्मी लिपि के उत्तरी रूप से 350 ई. में गुप्त लिपि तथा गुप्त लिपि से 500-600 ई. में कुटिल लिपि विकसित हुई। इस कुटिल लिपि से ही आठवीं-नवीं शती के लगभग प्राचीन नागरी का विकास हुआ। प्राचीन नागरी के दो रूप - पश्चिमी तथा पूर्वी थे। इसके पश्चिमी रूप से आधुनिक नागरी, गुजराती, महाजनी आदि लिपियों का विकास हुआ। इस प्रकार प्राचीन नागरी से ही पंद्रहवीं-सोलहवीं शती में आधुनिक नागरी या देवनागरी विकसित हुई। देवनागरी का सर्वप्रथम प्रयोग गुजरात के राजा जयभट्ट (7वीं-8वीं शती ई.) के शिलालेख में हुआ है। इसके अतिरिक्त इसका विकास विजयनगर साम्राज्य तथा राष्ट्रकूट नरेशों के शासनकाल में भरपूर हुआ। यह लिपि हिंदी प्रांतों के अतिरिक्त महाराष्ट्र और नेपाल में भी प्रचलित है। संपूर्ण वैदिक और संस्कृत साहित्य, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, अवहट्ट तथा पुरानी हिंदी का साहित्य इस लिपि की अमूल्य धरोहर है।

देवनागरी का नामकरण
 देवनागरी लिपि के नाम के बारे में विद्वानों में मतैक्य नहीं है। गुजरात में सर्वप्रथम प्रचलित होने से वहाँ के पंडित वर्ग अर्थात् नागर ब्राह्मणों के नाम से इसे नागरी कहा गया। प्रमुख रूप से नगरों में प्रचलित होने के कारण इसका नाम नागरी पड़ा। कुछ लोगों के अनुसार बौद्धों के संस्कृत ग्रंथ ललित विस्तार में उल्लिखित 64 लिपियों में एक 'नागलिपि' भी आती है, इस नाग से नागरी नाम हो गया। देवभाषा संस्कृत में इसका प्रयोग होने से इसके साथ 'देव' शब्द जुड़ गया। डॉ. धीरेंद्र वर्मा के अनुसार मध्य काल में स्थापत्य की एक शैली थी 'नागर शैली' जिसमें चतुर्भुजी आकृतियाँ होती थी (नागरी में चतुर्भुजी - अक्षर प, भ, म, ग है) जिससे नामकरण नागरी हुआ। कुछ लोग तांत्रिक चिह्न देवनागर से साम्य के कारण इसे देवनागरी कहा। आर. शाम शास्त्री ने इसकी पुष्टि की है। कुछ विद्वानों का मत है कि देवनगर काशी में सर्वाधिक प्रचलन के कारण है यह नामकरण हुआ। एक मत यह भी है कि पाटलिपुत्र को नगर और चंद्रगुप्त मौर्य को देव कहा जाता था। इन सब मतों से यह तो स्पष्ट है कि संस्कृत भाषा को भारत की परिष्कृत एवं परिमार्जित भाषा कहा जाता है तभी उसे 'देववाणी' भी कहा गया है। उसी संस्कृत वाड्म़य को लिपिबद्ध करने का कार्य देवनागरी लिपि को जाता है। आगे चलकर यही नागरी देवनागरी कहलायी।

देवनागरी का विकास
 सर्वप्रथम गुजरात के राजा जयभट्ट के शिलालेखों में इस लिपि के प्राचीन नमूने सामने आते हैं। इसके बाद आठवीं-नवीं शताब्दी में क्रमशः राष्ट्रकूट नरेशों एवं बड़ौदा के ध्रुवराज ने अपने प्रांत में इसका प्रयोग किया। विजयनगर के राजाओं ने भी इस को अपनाया। इसके बाद यह लिपि भारत के अनेक प्रांतों में अपना विस्तार कर लिया। महाराष्ट्र में इस लिपि को 'बालबोध' के नाम से जाना जाता है। ईसा की आठवीं शताब्दी से अठारहवीं शती तक मेवाड़ के गुहिल वंशी राजा, मारवाड़ के परिहार राजा, मध्यप्रदेश के हैहयवंशी राजा, राठौड़ और कलचुरी नरेशों, कन्नौज के गहड़वाल और गुजरात के सोलंकी राजाओं के राज्य सीमाओं के अंतर्गत पर्याप्त मात्रा में प्रचलित रही। प्रारंभ में इसके वर्णों पर शिरोरेखा नहीं थी परंतु कालक्रमानुसार शिरोरेखा लगाई जाने लगी।

देवनागरी की विशेषताएँ
 देवनागरी लिपि की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएँ हैं, जो उसे अन्य लिपियों से अलग करती है। आदर्श लिपि के लिए आवश्यक है कि एक वर्ण के लिए एक ही ध्वनि संकेत हो। देवनागरी की यह विशेषता है कि इसका प्रत्येक अक्षर उच्चरित होता है। जबकि रोमन आदि में मूकता की प्रवृत्ति है। व्यंजन संयोग होने से लेखन में कम जगह घिरती है। इसकी वर्णमाला का वर्ण क्रम वैज्ञानिक है। हमारी मुखाकृति (वाक् अवयवों) के अनुसार वर्णों का उच्चारण वर्गानुसार होता है- कंठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, दंत्य,ओष्ठ्य आदि। देवनागरी के लेखन और मुद्रण के अक्षरों में एकरूपता है। यह पूर्णतया स्वदेशी लिपि है। देवनागरी का प्रयोग व्यापक क्षेत्र में होता है। यह अनेक भाषाओं की लिपि है - संस्कृत, नेपाली, हिंदी, मराठी, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश आदि। पंजाबी एवं गुजराती की भी लिपि पहले देवनागरी ही थी। न्यूनाधिक कमियों, त्रुटियों के अलावा देवनागरी वैज्ञानिक लिपियों में से एक है।

देवनागरी में सुधार के प्रयासों का इतिहास
 देवनागरी लिपि को पूर्णतया वैज्ञानिक कहना गलत होगा। सुधारों का प्रयास प्रत्येक भाषा, लिपि के लिए निरंतर जारी रहना चाहिए। यही देवनागरी के साथ हुआ। अपने उद्भव काल यानि सातवीं-आठवीं शती से लेकर अब तक विशेषकर स्वाधीनता आंदोलन के समय एवं बाद में इस लिपि की वैज्ञानिकता को सिद्ध करने के अनेक व्यक्तिगत तथा संस्थागत प्रयास किए गए। इन सुधारों का अपना एक इतिहास है। सर्वप्रथम मुंबई के विद्वानों और महादेव गोविंद रानाडे ने लिपि सुधार योजना बनाई। तत्पश्चात महाराष्ट्र साहित्य परिषद्, पुणे ने एक लिपि सुधार समिति का गठन किया। 1904 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने अपने पत्र 'केसरी' के लिए 190 टाइपों का फॉन्ट निर्मित किया जिसे 'तिलक फॉन्ट' कहा गया। महाराष्ट्र के ही सावरकर बंधुओं ने स्वरों के लिए 'अ' की बाराखड़ी तैयार की। इसे गांधीजी ने स्वीकृति दी और अपने पत्र 'द हरिजन सेवक' में बारहखड़ी का प्रयोग किया। डॉ. श्यामसुंदर का मत था कि पंचमाक्षर (ङ्,ञ्) के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग होना चाहिए। डॉ. गोरखप्रसाद (प्रयाग, इलाहाबाद) मात्राओं को व्यंजन के बाद दाहिने हाथ की तरफ अलग रखने के पक्ष में थे। काका कालेलकर और विनोबा भावे राष्ट्रभाषा परिषद्, वर्धा तथा पत्र 'लोकनागरी' के माध्यम से सुधार के लिए जनमत जागृत करने का कार्य किया था। काशी (बनारस) के श्रीनिवास का मत था कि महाप्राण ध्वनियाँ हटा दी जाएँ और उनकी जगह अल्पप्राण के नीचे कोई 'ऽ' जैसे चिह्न लगा दिया जाए। इससे वर्णों की संख्या में कमी होगी। डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी ने तो देवनागरी को अवैज्ञानिक लिपि कहकर इसके स्थान पर रोमन लिपि के प्रयोग के पक्ष में थे। 10 अक्टूबर, 1910 को स्थापित हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग (इलाहाबाद) ने 5 अक्टूबर, 1941 को नागरी लिपि सुधार समिति बनाई और सर्वप्रथम इस समिति में सुव्यवस्थित ढंग से विचार किया गया। डॉ. भोलानाथ तिवारी कहते हैं कि हिंदी प्रदेश में पहला सुव्यवस्थित प्रयास था। 1935 में हिंदी साहित्य सम्मेलन, इंदौर के अधिवेशन में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सभापतित्व 'नागरी लिपि सुधार समिति' बनी। इसके संयोजक काका कालेलकर थे। इस समिति के सुझाव सराहनीय थे। समिति ने शिरोरेखा लगाने तथा भ, ध, में गुजराती घुंडी लगाने आदि सुझाव दिये। 1945 में नागरी प्रचारिणी सभा, काशी; जिसकी स्थापना 10 मार्च, 1893 ई. को हुई थी, ने एक नागरी लिपि समिति बनाई। इस संस्था ने नागरी अंकों, वर्णों के प्रचार का सर्वाधिक प्रयास किया। इस संस्था द्वारा पहले एक त्रैमासिक पत्रिका 'नागरी प्रचारिणी - 1896 में निकली। बाद में यह पत्रिका मासिक रूप में निकली। इस सभा से 1900 ई. में इंडियन प्रेस इलाहाबाद से 'सरस्वती' पत्रिका निकली। जिसके संपादक मंडल में बा. कार्तिक प्रसाद खत्री, पं. किशोरीलाल गोस्वामी, बा. जगन्नाथ दास बी.ए., बाबू श्यामसुंदर दास बी.ए. थे।

 इन्हीं सुधारों की शृंखला में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 1947 में आचार्य नरेंद्रदेव की अध्यक्षता में एक लिपि सुधार समिति बनी, जिसमें 'अ' की बाराखड़ी को भ्रामक बताया तथा पंचमाक्षर व अनुस्वार में से अनुस्वार रूप को स्वीकार्य बताया। 1949 में काका कालेलकर की अध्यक्षता में मुंबई सरकार ने मराठी तथा गुजराती लिपियों में सुधार के लिए एक लिपि सुधार समिति बनाई थी। 1953 में नागरी प्रचारिणी सभा के अनुरोध पर उत्तर प्रदेश सरकार ने एक लिपि सुधार परिषद् बनाई। नवंबर 1953 में डॉ. राधाकृष्णन जो उस उपराष्ट्रपति थे ; की अध्यक्षता में प्रथम बैठक लखनऊ में हुई। परिषद् के सुझाव महत्वपूर्ण थे। स्वाधीनता के पश्चात् केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नई दिल्ली जो केंद्र सरकार द्वारा राजभाषा हिंदी की अनुपालना, प्रचार, प्रसार कार्य के लिए 1960 में स्थापित हुई। निदेशालय ने 1983 में 'देवनागरी लिपि एवं हिंदी वर्तनी का मानकीकरण' पुस्तिका प्रकाशित की। इससे पूर्व शिक्षा मंत्रालय ने इस दिशा में सराहनीय प्रयास किया है। सन् 1966 में 'मानक देवनागरी वर्णमाला' प्रकाशित हुई। देवनागरी का मानक रूप निर्धारित किया गया। इसके बाद 1967 में 'हिंदी वर्तनी का मानकीकरण' नामक पुस्तिका का प्रकाशन हुआ। काफी विस्तार से विद्वानों, शिक्षकों, लेखकों, पत्रकारों, हिंदी सेवी संस्थाओं से विचार-विमर्श के बाद 1983 में निदेशालय (जो अब मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत है) ने उक्त पुस्तिका का प्रकाशन किया गया।

 भारतीय संविधान के अनु. 343 में देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी को संघ की राजभाषा 14 सितंबर, 1949 को बनाया। तब से अब तक राजभाषा हिंदी एवं लिपि देवनागरी के प्रसारार्थ उक्त संस्था का प्रयास सराहनीय रहा। संस्था द्वारा 1961 में त्रैमासिक 'भाषा' पत्रिका (अब द्वैमासिक) निकाली जो निरंतर जारी है। देवनागरी अंकों के स्थान पर अंतरराष्ट्रीय अंकों को मानकता प्रदान की गई है।

 इस प्रकार से देवनागरी लिपि जो आज हमारे सामने हैं अनेक व्यक्तियों एवं संस्थाओं के प्रयासों का प्रतिफल है। देवनागरी लिपि हमारे मानव इतिहास के विकास की साक्षी है। लचीली है। इसके प्रयोगकर्ता सहिष्णु हैं। प्रत्येक भाषा ध्वनियों के प्रचलित रूप को अंगीकार कर लेते हैं । देवनागरी को जहाँ स्वर ध्वनियों में अँग्रेजी मूल का स्वर 'ऑ' मिल गया, वहीं व्यंजन ध्वनियों में फारसी - अरबी मूल की ध्वनियाँ - क़, ख़, ग़, ज़, फ़ ने स्थान पा लिया। यह इस लिपि और इसके प्रयोक्ताओं के लचीलेपन एवं विस्तृत सोच का प्रतिफल है।

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