कोशी के बाढ़ से प्रभावित जनजीवन और रेणु के रिपोर्ताज

लल्टू कुमार

शोधार्थी, हिंदी एवं भारतीय भाषा विभाग, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़
चलभाष: +91 9868330823, ईमेल: laltoo.prakash@gmail.com


हिमालय की बर्फीली चोटियों से निकलने वाली अधिकांश नदियाँ बरसात के दिनों में ख़तरे के निशान से ऊपर बहने लगती हैं। जिसके चलते इन नदियों के आसपास के इलाकों में अत्यधिक पानी भर जाता है और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। नेपाल स्थित हिमालय में सप्तकौशिकी के गोसाईं स्थान से निकलने वाली कोशी नदी इस मामले में सर्वाधिक भयानक और प्रलयकारी है। बरसात के दिनों में इसके विकराल रूप और विनाशकारी लीला को देखकर सभी प्राणी भयाकुल रहते हैं। बढ़ते जल-स्तर के साथ ही यह अपने किनारों को तेजी से काटना शुरू कर देती है जिसके चलते तटबंध बनने के पहले तक इसने कई बार अपना मार्ग बदला है। इस तरह मार्ग बदलने की वजह से हर साल लाखों हेक्टेयर उपजाऊ जमीन, लहलहाते फसल, गाँव, शहर, जंगल इत्यादि इसकी तेज धारा में कटकर बह जाती थी। कोशी के इसी विनाशकारी लीला को ध्यान में रखकर, इसे ‘बिहार का शोक’ कहा जाता है। इससे प्रभावित होने वाले प्रमुख जिलों में – सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, पूर्णिया और अररिया शामिल है। बिहार सरकार के सन् 1994 की रिपोर्ट के अनुसार इससे प्रभावित होने वाले कुल क्षेत्र 68.80 लाख हेक्टेयर है।

मनुष्य से लेकर तमाम तरह के जीव-जन्तु प्रकृति की इस महाविनाश लीला के चलते प्रत्येक वर्ष अपने प्राणों की रक्षा के लिए काफी संघर्ष करता है। वर्षा ऋतु के आगमन पर जहाँ एक तरफ भीषण गर्मी से राहत मिलती है वही दूसरी तरफ इस क्षेत्र में निवास करने वाले प्राणी अपने अस्तित्व को लेकर चिंतित हो उठते हैं क्योंकि, इस प्रलयकारी बाढ़ में जो जीव खुद को बचाने में सफल हो जाता है उसे बाद में भयंकर महामारी का भी सामना करना पड़ता है। फणीश्वरनाथ रेणु की रचनाओं में ऐसे कई प्रसंगों का उल्लेख मिलता है जहाँ बाढ़ के बाद फैले महामारी के चलते पूरा का पूरा गाँव काल के गाल में समा जाता है। ‘पहलवान की ढोलक’ कहानी इसी तरह की समस्या पर केंद्रित है।

रेणु द्वारा बाढ़ को लेकर लिखे गए रिपोर्ताजों में ‘पटना-जलप्रलय’ जो ऋणजल-धनजल रिपोर्ताज संग्रह में संकलित है, काफी चर्चित रहा है। परन्तु कोशी के बाढ़ से उसका सीधा संबंध नहीं है। हालाँकि प्रसंगवश लेखक ने कोशी की प्रलयकारी बाढ़ का यथा स्थान उल्लेख करने का काम किया है। कोशी की विनाश लीला पर लिखित रेणु के तीन प्रमुख रिपोर्ताज डायन कोशी, हड्डियों का पुल और पुरानी कहानी नया पाठ उपलब्ध है। हालाँकि हड्डियों का पुल अकाल केंद्रित रिपोर्ताज है लेकिन, वहाँ भी कोशी के बाढ़ के प्रकोप को दिखाया गया है। इस रिपोर्ताज में वर्णित अकाल की भयावहता का मूल कारण लगातार दो फसल के बर्बाद होने के बाद आये प्रलयकारी बाढ़ ही था। जिसके चलते इलाके भर की हर तरह के खाने योग्य वनस्पति पानी में डूबकर बर्बाद हो गई थी। इन रिपोर्ताजों के जरिये रेणु कोशी क्षेत्र में रहने वाले लोगों की समस्याओं को उजागर करने के साथ-साथ जीवन के प्रति उसके गहरे लगाव और जिजीविषा को प्रकट करते हैं। बाढ़ के समय सरकार की ओर से दी जाने वाली राहत सामग्री की लूट में शामिल लोगों को बेनकाब करते हुए सत्ताधारी दल के लोगों की मनमानी और गुंडागर्दी पर से भी पर्दा हटाते हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों से जूझते हुए जिन्दा रहने वाले लोगों से केंद्र और राज्य की सरकारें हर साल चुनाव से ठीक पहले अपने-अपने स्तर पर बड़े-बड़े खोखले वादें करती हैं, परन्तु इस समस्या के समूल नाश के लिए मिलकर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया जाता है।

‘डायन कोसी’ रिपोर्ताज में रेणु बाढ़ आने के कारणों की जानकारी देते हुए उससे होने वाली हानि, सरकार की ओर से दी जा रही रिलीफ और कोशी से जुड़ी लोक-कथाओं के साथ-साथ उस इलाके के पर्व-त्योहारों के बारे में गंभीरता से वर्णन करते हैं। रिपोर्ताज का आरंभ बाढ़ आने के कारणों से होता है जिसमें लेखक लिखता है कि-“हिमालय की किसी चोटी की बर्फ पिघली या तराई में घनघोर वर्षा हुई और कोसी की निर्मल धारा में गंदले पानी की हल्की रेखा छा गई। ‘कोसी मैया’ का मन मैला हो गया।”[1] धरती के बढ़ते तापक्रम के बीच अत्यधिक गर्मी के चलते जब ग्रीष्म ऋतु में हिमालय की चोटियों पर जमे बर्फ अत्यधिक मात्रा में पिघलने शुरू हो जाते हैं तो धीरे-धीरे नदियों का जल-स्तर भी बढ़ना प्रारम्भ हो जाता है। इसी बढ़ते जलस्तर के बीच जब बरसात ऋतु में अत्यधिक वर्षा होने लगती है तो इन नदियों का जलस्तर ख़तरे के निशान से इतना ऊपर चला जाता है कि पानी तटबंध से बाहर निकल कर आसपास के इलाकों में फैलने लगती है और जिसके फलस्वरूप पूरे इलाके में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऐसे वक्त में वहाँ निवास करने वाले जीव-जन्तुओं और मनुष्यों का जीवन काफी कष्टकर हो जाता है। इस प्रलयकारी बाढ़ की चपेट में आकर हर साल मनुष्य सहित लाखों जीव-जंतु एक ही झटके में मौत के मुँह में चले जाते हैं।

‘पुरानी कहानी: नया पाठ’ में लेखक बाढ़ आने की स्थिति और परिस्थिति का वर्णन करते हुए लिखता है कि- ‘भारी वर्षा और मदमस्त हवा के झोंकों के बीच अचानक दूर से एक आवाज आती है ‘गों-ओं-ओ-ओ!’ और जल्द ही वह आवाज भयातुर प्राणियों के चीखों में बदल जाता है। कुछ असहाय लोग घबराकर झाँझ-मृदंग बजाकर कोसी मैया की  वंदना गीत शुरू कर देता है तो कुछ जवान लोग बाँस की बल्लियों और लकड़ियों को काटकर मचान बनाना शुरू कर देते हैं।’[2] चारों ओर मची इस कोहराम और मौत के मंडराते सायों के बीच एक युवक नागार्जुन की कविता “ता-ता थैया, ता-ता-थैया, नाचो-नाचो कोसी मैया ...!”[3] को बार-बार दुहरा रहा था। “और सचमुच इसी ताल पर नाचती हुई कोसी मैया आई और देखते-ही-देखते खेत-खलिहान-गाँव-घर-पेड़ सभी इसी ताल पर नाचने लगे – ता-ता-थैया ता-ता-थैया ... धिन तक-धिन्ना, छम्मक कट-छम!”[4] बाढ़ आने का यह दृश्य कितना भयानक था इसका अंदाजा इस उद्धरण से लगा सकते हैं। लेखक लिखता है कि-“मुँह बाए, विशाल मगरमच्छ की पीठ पर सवार दस-भुजा कोसी नाचती, किलकती, अट्टहास करती आगे बढ़ रही है। अब मृदंग-झाँझ नहीं, गीत नहीं-सिर्फ हाहाकार!”[5]

बाढ़ में फँसे लोगों की जिंदगी को बचाने के लिए सरकार की ओर से जो राहत और बचाव के प्रयास किये जाते हैं उसको लेकर रेणु ‘पुरानी कहानी: नया पाठ’ में विस्तार से वर्णन करते हुए लिखते हैं कि किस तरह राहत सामग्री के बँटवारे में धाँधली करके तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी के लोग उसे अपने पार्टी हित में इस्तेमाल करते हैं। बाढ़ आने के बाद उससे प्रभावित जनता को छोड़कर शेष सभी में एक नई ऊर्जा का संचार हो जाता है। वे लोग जनता के सामने खुद को इस तरह से पेश करना चाहते हैं ताकि जनता को यह भरोसा हो जाए की उसका सबसे बड़ा हितैषी वही है। पिछली बार के हारे हुए उम्मीदवार जन-सेवकजी इस बार जनसेवा का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते हैं। इस संदर्भ में रेणु लिखते हैं कि-“इस क्षेत्र के पराजित उम्मीदवार, पुराने जन-सेवकजी का सपना सच हुआ। कोसका मैया ने उन्हें फिर जनसेवा का ‘औसर’ दिया है।...जै हो, जै हो! इस बार भगवान ने चाहा तो वे विरोधी को पछाड़कर दम लेंगे।”[6] इसलिए वे कस्बा रामनगर से ही टेलीफोन के जरिये जिला मजिस्ट्रेट और राज्य के मंत्रियों से सम्पर्क साधने में लगे हुए थे। वे चाहते थे कि मंत्री जी इलाके के DM को थोड़ा समझा दें ताकि, उसे जनसेवा के कार्य को अंजाम देने में किसी तरह की कोई परेशानी का सामना न करना पड़े। जनसेवक जी को जब यह पता चला कि जीते हुए एम.एल.ए. ने उससे पहले ही ‘फर्स्ट प्रेस ऑफ इंडिया’ को सीधे टेलीफोन से सारी जानकारी दे दी है तो उसका चेहरा उतर गया था। अचानक जन-सेवकजी को चीनी आक्रमण के समय की कुछ बातें याद आ जाती है जिसमें वह भाषण देने और फंड वसूलने में पीछे रह गए थे।

बाढ़ को लेकर रामपुर क़स्बे के व्यापारियों और बड़े महाजनों के विचार मनुष्यता को तार-तार करने वाले हैं। उन सभी का मानना है कि -“सुभ-लाभ का ऐसा अवसर बार-बार नहीं आता।... दरवाजे के पास तक आई गंगा में कौन नहीं हाथ धोएगा भला!”[7] ऐसे बुरे वक्त में इन लोगों ने जो संवेदनहीनता दिखाई थी उसको लेकर रेणु लिखते हैं कि-“उनके गोदाम खाली हो गए, रातों-रात बही-खाते दुरुस्त! अकाल-पीड़ितों के लिए फंड में पैसे देने की सरकारी-गैर-सरकारी अपील पर, उन्होंने दिल खोलकर पैसे दिए। अनाज? अनाज कहाँ?”[8]

धीरे-धीरे जब बाढ़ का पानी कम हो जाता है तो पानी में डूबे धरती की दशा को लेकर ‘डायन कोसी’ में रेणु लिखते हैं कि-“एक बार जो धरती कोसी की बाढ़ में डूबी, वह मर जाती है। सुजला-सुफला धरती वन्ध्या हो जाती है। सोना उपजाने वाली मिट्टी बालू का ढेर बनकर रह जाती है।”[9]

तीस-बत्तीस दिन रिलीफ कैम्पों में गुजारने के बाद अपने गाँवों को लौटते लोगों के चहरे के भाव और उनके बढ़ते कदम को देखकर लेखक लिखता है कि-“सर्वहारा लोगों की टोली, सिर झुकाए बचे-खुचे पशुओं को हाँकते, बाल-बच्चों, मुर्गे-मुर्गियों, बकरे-बकरियों को गाड़ियों, बहंगियों और पीठ पर लादकर अपने-अपने गाँव की ओर जा रही हैं, जहाँ न उनकी मड़ैया साबित है और न खेतों में एक चुटकी फसल। किंतु उनके पैर तेजी से बढ़ रहे हैं।”[10]

बाढ़ की विभीषिका का सामना करने के बाद जीवित प्राणियों के जीवन में फिर से मौत का एक नया खेल शुरू होता है। विभिन्न तरह के जीवों के लाशों से पटी धरती की लाश पर विचरने वाले जीवों खास करके मनुष्यों में कई तरह के संक्रामक रोगों का प्रसार शुरू हो जाता है। जिसमें मलेरिया, कालाजार, हैजा, चेचक, निमोनिया, टायफॉयड से लेकर कई प्रकार के नए रोग शामिल है जिसे कभी-कभी कोई डॉक्टर भी नहीं समझ पाता है। इस संदर्भ में लेखक लिखता है कि-“जमीन सूखने नहीं पाती कि बीमारियों की बाढ़ मौत की नई-नई सूरतें लेकर आ जाती है। मलेरिया, काला आजार, हैजा, चेचक, निमोनिया, टायफॉयड और कोई नई बीमारी जिसे कोई डॉक्टर समझ नहीं पाते। चीख, कराह, छटपटाते और दम तोड़ते हुए अधर में इंसान। पुराने पीपल की डालियों में घंटियाँ बांधने की जगह नहीं मिलती।”[11] यहाँ एक बात विचारणीय है कि कोशी के द्वारा इतना बड़ा प्रलयकारी तांडव मचाने के बाद भी इस इलाके के लोगों के दिलों में कोशी मैया के प्रति आस्था में कोई कमी नहीं आई है। बाढ़ का पानी सूखने के बाद कोशी की प्रबल धारा के बीच बचे पीपल के पेड़ में घंटी बांधने की जगह न मिलना और पौष-पूर्णिमा के दिन कोशी की सैकड़ों धाराओं के किनारे कोशी नहान के अवसर पर लगने वाला मेला कोशी नदी के प्रति उनकी मजबूत आस्था का ही परिचायक है।

विनाशकारी बाढ़ से जो ईश्वर इन ग्रामीणों की रक्षा नहीं कर सके थे, पुनः गाँव लौटते ही सरकारी रिलीफ, कर्ज और सहायता के बोझ से दबी हुई आत्माओं में आकर बसने लगे थे। चारों ओर फिर से हरियाली छाने लगी थी। पूजा के ढोल बजने लगे थे। कारी-कोशी की निर्मल धारा में फिर से अष्टमी का चांद हँस रहा था। और, शरणार्थी बंगाली मल्लाहों की टोली कोई गीत गा रहा था,-“ ओ रे भा-य-य-य! तोमारि लागिया-बधुआ-आ-आ-काँदे हाय हाय-उगो पिरित करिया बधुआ मने पस्ताय...!”[12]

इसके अलावा रेणु ने जो वर्णन की विशेष शैली को अपनाया है उसे भी इन रिपोर्ताजों में आसानी से देखा जा सकता है। रामपुर क़स्बा में हो रहे हलचल और वहाँ की एक-एक आवाज को साफ़गोई के साथ शब्दों में बांधने की जो कोशिश है वह इस विशेष और नयी शैली का नमूना है। जिसे पढ़ने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि हम किसी शहर के बीच खड़े होकर ध्यानपूर्वक वहाँ की हर आवाज को सुनने का प्रयास कर रहे हैं। उदाहरण के लिए यह उद्धरण देखिये,-“...मैं का करूँ राम मुझे बुड्ढा मिल गया! / ... छप गया – छप गया। इस इलाके का ताजा समाचार। दो सौ गाँव डूब गए। /... आ गया! आ गया! सस्ता बंबैया चादर! / ... आ गई। आ गई। रिलीफ की गाड़ी आ गई। /... आ गई। आ रही हैं। तीन दर्जन नावें। /... सिंचाई मंत्रीजी आ रहे हैं। / ... भिक्षा दो भाई भिक्षा दो – चावल-कपड़ा पैसा दो। / इंकलाब जिंदाबाद!”[13]

बाढ़ के भय से परेशान लोगों के कोलाहल और उतराही गाँव के ‘पढुआ-पागल’ के द्वारा जनकवि नागार्जुन की कविता का पाठ तथा कोशी की वंदना कर रहे लोगों द्वारा बजाये जा रहे झाँझ-मृदंग के सम्मिलित स्वर को रेणु ने जो शब्दों में बांधने की कोशिश की हैं वह बिरले ही कहीं और देखने को मिलेगा। उदाहरण के लिए यह उद्धरण देखिये,-“माय गे-ए-ए-ए- बाबा हो-ओ-ओ-दुहा-ई-ई-सँभल के-ले ले गिरा-गिरा-छप्पर पर चढ़ जा-ए सुगनी-रे... रमललवा-आ-आ दीदी ई-ई-हाय-हाय-माय गे-बाबा हो-हो-हे इस्सर महादेव-ले ले गया-गया-डूबा-डूबा-आँगन में छाती-भर पानी-यह छप्पर कमजोर है, यहाँ नहीं-यहाँ जगह नहीं- हे हे ले ले गिरा-भैंस का बच्चा बहा रे-ए-ए-ए-डोमन ए डोमन-साँप-साँप-जै गौरा पारबती- रस्सी कहाँ है-हँसिया दे-बाप रे बाप- ता-ता थैया, ता-ता थैया, नाचो-नाचो कोसी मैया-छम्मक-कट-छम ...!”[14]

‘डायन कोसी’ रिपोर्ताज के संदर्भ में भारत यायावर केसरी कुमार के विचार को उद्धृत करते हैं जिसमें वे लिखते हैं कि- “डायन कोसी रिपोर्ताज में रेणु  ने विषय की विशद अभिव्यक्ति की है। उनकी कलम में अद्भुत शक्ति है। जन जीवन की तह की बातें उनकी आँखें देख लेती है। इंसान के भाव-स्थल की पकड़ उनमें है। ‘डायन कोसी’ में उन्होंने हमारा परिचय इतने तरह के पात्रों से कराया है कि हम एक दूसरी ही यथार्थ दुनिया में पहुँच जाते हैं। इस रिपोर्ताज में जितना कल्पना का अंश है वह विषय को और भी स्पष्ट करता है। रेणु की शैली मानो रिपोर्ताज लिखने के लिए ही है। आप अब तक ‘जै गंगा’, ‘नया सवेरा’(नये सवेरे की आशा), ‘हड्डियों का पुल’ आदि कई सफल रिपोर्ताज लिख चुके हैं। ‘डायन कोसी’ उनकी सर्वोत्कृष्ट रचना है और साथ ही हिंदी के श्रेष्ठ रिपोर्ताजों में से एक। यथार्थ के साथ एक दृष्टि का योग है इसमें।”[15]

‘हड्डियों का पुल’ रिपोर्ताज कोशी घाटी में आये भयंकर बाढ़ और उसके बाद पड़ने वाले अकाल और महामारी को लेकर लिखा गया है। उस वर्ष बाढ़ का पानी ज्यादे दिन तक ठहर जाने के कारण बाढ़ प्रभावित इलाकों की सारी हरियाली ख़त्म हो गई थी। खेतों में लगी फसलें और खाने योग्य अन्य सारी चीजें बर्बाद हो गई थी। ऐसे में गाँव के गरीब लोग जिसके पास जमा पूंजी के नाम पर सिर्फ शरीर और हुनर है। किस तरह दाने-दाने को मोहताज़ है, इस रिपोर्ताज में लेखक ने वर्णित किया है। गाँव के इन गरीब लोगों के पास खाने के लिए घर में सप्ताह भर का भी अनाज नहीं रहता है। वे लोग सालों भर मेहनत मजदूरी करके अपना पेट भरते हैं। इलाके भर में बाढ़ का पानी भर जाने के बाद इन लोगों को काम मिलना बंद हो जाता है क्योंकि काम के बदले मजदूरी में देने के लिए लोगों के पास अनाज कम पड़ रहा था। लेखक गाँव के नायक चमरू दुसाध के हवाले से लिखता है कि-“इलाके में अब न अन्न है और न काम।... गाय, बाछा, बैल, बकरी सब बिक गए। जिनके पास अनाज है, वे मजदूरी देकर काम नहीं कराना चाहते। ... दो-दो फसलों का नुकसान, छोटे हल-बैलवालों और जमीनवालों की हालत खुद ख़राब है।”[16]

गाँव में जब किसी के पास मजदूरी में देने के लिए अनाज नहीं है तो फिर ऐसी दशा में इन गरीबों के पास गाँव छोड़कर काम की तालाश में दूसरे इलाके में जाने के आलावा कोई दूसरा रास्ता शेष नहीं रह जाता है। अंततः ये लोग योजना बद्ध तरीके से गाँव छोड़ कर काम की तलाश में दूसरे इलाके की ओर निकल पड़ते हैं। परन्तु दूसरे इलाके में भी किसी के पास काम के बदले देने के लिए अनाज नहीं था। इसके लिए लेखक इलाके के मशहूर काश्तकार का उदाहरण देते हुए लिखता है कि –“ किसुनपुर कोठी! ... पूर्णिया के सबसे बड़े काश्तकार ... बिहार के सबसे बड़े काश्तकार ... किसुनपुर के गम्भीर बाबू की हवेली यही है। ... सुफेद मकान ...राजदरबार ... अनाज के बखारों की कतार ... लक्ष्मी यहीं बिराजती है ... अन्न मिलेगा ... क्या? ...? ...अन्न नहीं ... काम नहीं ...।”[17]

गम्भीर बाबू की हालात देखकर काम की तलाश में तेजी से आगे बढ़ रहे लोगों के कदम अचानक से रूक जाते हैं। उसके हिम्मत और हौसले दोनों कम पड़ने लगते हैं और वहाँ से आगे बढ़ने की बजाय वे वापिस अपने गाँव लौट जाने की योजना बनाने लगते हैं।  जो लोग वापिस गाँव लौटने के पक्ष में थे वे अपना तर्क दे रहे थे। उसका कहना था कि-“घर में भूखे बच्चे हैं, बूढ़े बाप हैं, माँ हैं ...बीवी ... साथ मरेंगे।”[18] जो लोग वापिस गाँव लौटना नहीं चाहते थे उसका अपना तर्क था। वे कहते थे कि –“वापस लौटकर क्या करना है? यहाँ भी मौत ... वहाँ भी।”[19] यहाँ लेखक इससे संबंधित कुछ पंक्तियाँ उद्धृत करता है –

                                “मरना भलो विदेश में
                                  जहाँ न अपना कोय
                                  काया खाए कूकरा ...”[20]

 गाँव लौटने वाले थके-हारे, भूखे, बेजान लोगों को खाली हाथ देखकर अन्न के इंतजार में बारह दिनों से ‘पटुआ’ और ‘करमी’ खाकर जी रहे लोगों की जीने की आखिरी उम्मीद भी टूट जाती है। उसके सामने सिर्फ एक सवाल शेष रह जाता है कि -जब अन्न नहीं तो जिंदा कैसे रहा जाए? इस स्थिति को देखकर लेखक लिखता है कि-“सारे गाँव पर मौत की काली छाया घनीभूत होकर छा रही है ... जिन्दा लाशों का गाँव!”[21]

भूख से छटपटाते लोगों की भूख की ज्वाला और तेज हो जाती है जब रहिकपुर के बाबू लोग झोली में मकई का लावा लेकर मुसहर टोली में आते हैं। इन बाबू लोगों के बारे में लेखक लिखता है कि-“कम उम्र के लड़के, जिनकी मसें भी अभी नहीं भीगीं ... चार-पाँच दिनों से मुसहर टोली में चक्कर काट रहे हैं ... झोली में मकई के दाने लिए रहते हैं,... कहते हैं –जिन्हें मकई लेना है, लो! सेर-दो सेर नहीं-  चार मुठ्ठी। कर्ज! ...लेकिन सूद पहले ही चाहिए ... उनकी नई जवानी बूढ़ी और जवान या बच्ची में कोई फर्क नहीं समझती।”[22]

भूख के चलते लोगों की ये दशा हो जाती है कि वे मर्यादा की सारी हदें तोड़कर अन्न के लिए कुछ भी करने को तैयार है। भगिया बाजरे की एक रोटी के लिए अपने निढाल शरीर को मोहन चौधरी के बेटे के सामने सूखे घास पर डाल देती है। राघोपुर संथाल टोली के बिरसा माँझी एक सेर चावल के लिए एक लड़के को भाला से मार देता है। धीरे-धीरे गाँव के सारे लोग मौत के मुँह में समा जाते हैं। लेखक यहाँ एक तरफ अन्न के आभाव में भूख से मरते लोगों का वर्णन करते हैं तो दूसरी तरफ जशपति हजारिया चावल मिल से चावल के अंतिम स्टॉक की बुकिंग का भी वर्णन करते हैं।[23]

लगातार दो-दो फसलों के बर्बाद होने से पूरे इलाके के लोग अन्न की कमी से जूझते हुए जी रहे थे कि अचानक पूरे इलाके में बाढ़ का पानी भर गया और खाकर भूख मिटाने वाली धरती पर मौजूद हर वनस्पति को उनसे छीन लिया। बाढ़ के पानी में डूबे धरती के उस हिस्से और अन्न की तलाश में जा रहे लोगों के बारे में लेखक लिखता है,-“सामने जहाँ तक निगाहें पहुँचती हैं –पानी...पानी...शून्य...। मटमैली धरती ... मटमैला आसमान। ...झरबेर...बबूल और दूसरे किस्म के छोटी जाति के दरख्तों के ठूँठ ... कहीं-कहीं नजर आते हैं। आसमान के मटमैले रंग में थोड़ी-सी लाली घोलकर सूरज उग आता है। हवा के झोंके में कीचड़ों, जंगलों, फसलों और घों-घों की सड़ांध मिली हुई है।... अन्न की ख़ोज में – कोखजली धरती के लाल बढ़े जा रहे हैं।”[24]

बिरौली बाजार में सेठ कुंदनमल के पास अनाज है लेकिन, वहाँ आये लोगों के पास उसे खरीदने के लिए कुछ भी नहीं है सिवाय भूखे शरीर के। यहाँ उपस्थित भीड़ के आपसी वार्तलाप को लेखक कुछ इस तरह लिखता है कि –“ अन्न है, तुम्हारे पास कोई जेवर है? ... नहीं। तुम्हारे पास जमीन है? ... नहीं। तुम्हारे पास क्या है?... कुछ नहीं। ... सिर्फ देह में ... रोज क्रमशः घटती हुई ...ताकत!... ताकत ? ... हिस्स! ताकत!...”[25]

रिपोर्ताज के अंत में इस अकाल को लेकर राजेन जो की स्वयं रेणु हैं अपने मित्र शशांक के नाम एक ख़त लिखता है। इस ख़त में राजेन अपने मित्र से आग्रह करता है कि –“कला के सुंदर चेहरे पर कालिख पुत रही है। मैं कहता हूँ – कलाकारों को यहाँ भेजो।”[26] राजेन को विश्वास था कि शशांक के नृत्य विशेषज्ञों ने कभी मृत्यु का नंगा नाच नहीं देखा होगा, कवियों ने कभी भूख से दम तोड़ते हुए इंसान के बेजान और पुरदर्द नगमे को नहीं सुना होगा, चित्रकारों ने मुरझाए हुए चेहरों पर बुझती हुई आँखे को नहीं आँका होगा और जहाँ तक कोरस की बात है तो मृत्यु-संगीत के ‘कोरस’ को भी नहीं सुना होगा। अकाल के वीभत्स रूप का वर्णन करते हुए राजेन लिखता है कि-“सारे जिले की धरती पर हड्डियाँ बिखर रही हैं। असमान में गिद्धों का दल चक्कर मार रहा है, चील झपट्टे मार रहे हैं, कुत्ते, गीदड़ों और दम तोड़ते इंसानों में छीना-झपटी हो रही है। हवा में लाशों की सड़ांध फ़ैल रही है।”[27]

सरकार ने जिस बेरहमी और बेशर्मी से अकाल न होने की ख़बर को चारों ओर प्रचारित करवा था। ऐसे में रेणु की ओर से ‘हड्डियों का पुल’ बनाने का सुझाव, सत्ता के नशे में चूर इन नेताओं और मंत्रियों की सोयी हुई मनुष्यता को जगाने का एक प्रयास है। वे लिखते हैं कि -“इन बिखरी हुई हड्डियों को बटोरकर कोशी डैम ... नहीं ... कम –से-कम कोशी पर एक विशाल पुल तैयार किया जा सकता है।... हमारी सरकार के पुनर्निर्माण विभाग का, पूँजीवादी समाज के ‘इंजीनियरिंग विभाग’ का नया नमूना ... ताजमहल की तरह अद्वितीय और दर्शनीय होगा वह पुल।”[28]

इसमें रेणु बाढ़, अकाल, भूख से बिलबिलाकर मरते लोग, विपक्ष की भूमिका, प्रशासन का भ्रष्ट चरित्र, पत्रकारों का चारित्रिक पतन, साहित्यकारों के मरते ज़मीर और सरकार के अमानुषिक रवैये को रेखांकित करते हैं। इसे पढ़ते वक्त लगता है कि हम बंगाल के अकाल के बारे पढ़ रहे हैं। हालाँकि रेणु के लेखन का अंदाज और भाषा रांगेय राघव से बेहतर है। बंगाल के अकाल में जहाँ ब्रिटिश हुकूमत के साथ भारतीय पूँजीपति की मिली भगत थी वहीं, बिहार के कोशी क्षेत्र को तबाह करने वाले इस अकाल में बिहार सरकार और भारत सरकार की लापरवाही के अलावा कोशी का कहर भी शामिल है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे आश्चर्य की बात यह है कि सरकार के पास अकाल आने की पूर्व सूचना होने के बाद भी उस पर यकीन न करते हुए हजारों लोगों को मौत के मुँह में जाने के लिए छोड़ देना। और उससे भी आश्चर्य की बात है खाद्यमंत्री के द्वारा बाढ़ पीड़ित इलाकों का दौरा करने के बाद उसके द्वारा पेश किया गया रिपोर्ट, जिसका सार था कि-“अकाल नहीं है! मौतें नहीं हुईं, ... अन्न काफी है।”[29]


संदर्भ सूची:

[1] . रेणु का है अन्दाजे बयां और, भारत यायावर, राजकमल प्रकाशन; नई दिल्ली-110002, पहला संस्करण : 2014, पृ. सं. – 193 
[2] . रेणु रचनावली, सं.-भारत यायावर, राजकमल प्रकाशन; नई दिल्ली – 110002, तीसरा संस्करण : 2007, पृ. सं. – 129
[3] . वही, पृ. सं. – 129
[4] . वही, पृ. सं. – 129
[5] . वही, पृ. सं. – 129
[6] . वही, पृ. सं. – 130
[7] . वही, पृ. सं. – 131
[8] . वही, पृ. सं. – 131
[9] . रेणु का है अन्दाजे बयां और, भारत यायावर, राजकमल प्रकाशन; नई दिल्ली-110002, पहला संस्करण : 2014, पृ. सं. – 195
[10] . रेणु रचनावली, सं.-भारत यायावर, राजकमल प्रकाशन; नई दिल्ली – 110002, तीसरा संस्करण : 2007, पृ. सं. – 135
[11] . रेणु का है अन्दाजे बयां और, भारत यायावर, राजकमल प्रकाशन; नई दिल्ली-110002, पहला संस्करण : 2014, पृ. सं. – 195
[12] . रेणु रचनावली, सं.-भारत यायावर, राजकमल प्रकाशन; नई दिल्ली – 110002, तीसरा संस्करण : 2007, पृ. सं. – 136
[13] . वही, पृ. सं. – 132
[14] . वही, पृ. सं. – 129
[15] . रेणु का है अन्दाजे बयां और, भारत यायावर, राजकमल प्रकाशन; नई दिल्ली-110002, पहला संस्करण : 2014, पृ. सं. – 143
[16] . रेणु रचनावली, सं.-भारत यायावर, राजकमल प्रकाशन; नई दिल्ली – 110002, तीसरा संस्करण : 2007, पृ. सं. – 51
[17] . वही, पृ. सं. – 53
[18] . वही, पृ. सं. – 53
[19] . वही, पृ. सं. – 53
[20] . वही, पृ. सं. – 53
[21] . वही, पृ. सं. – 57
[22] . वही, पृ. सं. – 58
[23] . वही, पृ. सं. – 60
[24] . वही, पृ. सं. – 52
[25] . वही, पृ. सं. – 52
[26] . वही, पृ. सं. – 66
[27] . वही, पृ. सं. – 66
[28] . वही, पृ. सं. – 66
[29] . वही, पृ. सं. – 65

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