भूमंडलीकरण की ठोस ज़मीन पर लिखी कहानियों का आकलन: प्रवासी हिन्दी कहानी कोश

पुस्तक: प्रवासी हिन्दी कहानी कोश
लेखिका: डॉ. मधु संधु
प्रकाशक: नमन प्रकाशन, नई दिल्ली
पृष्ठ: 278
मूल्य: ₹ 650.00
संस्करण: 2019

समीक्षक: दीप्ति



कोश विधा उतनी ही प्राचीन है जितना साहित्य। 'निघंटु' भारतीय कोश का प्राचीनतम रूप है। हिंदी कोश-रचना के प्रारंभिक कोशों में 'खालिकबारी' और 'नाममाला' ने हमारा मार्गदर्शन किया तो आधुनिक कोशों में 'भारतीय संस्कृति कोश' और 'समांतर कोश' हमारा दिग्दर्शन कर रहे हैं। विभिन्न विधाओं में कहानी कोश की बात करें तो हिंदी कहानी कोश लिखने का बीड़ा मानो डॉ. मधु संधु ने ही उठाया है। भले ही उपन्यास कोश और नाटक कोश मिल जाते हैं लेकिन कहानी जैसी बहुप्रचलित विधा को कोश की सीमा रेखा में बांधने का प्रयास आज तक कोई साहित्यकार नहीं कर पाया। आधुनिक हिंदी साहित्य की सशक्त हस्ताक्षर डॉ. मधु संधु की नवीन रचना 'प्रवासी हिन्दी कहानी कोश' सन् 2019 में नमन प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुई है। 21वीं शती की श्रेष्ठ हिंदी साहित्यकार डॉ. मधु संधु के दो कहानी संग्रह, दो गद्य संकलन, एक काव्य संग्रह, सात आलोचनात्मक पुस्तकों के साथ-साथ चार कहानी कोश रूपी बहुमूल्य रत्न हिंदी साहित्य कोष को प्राप्त हुए हैं। उनका प्रथम 'कहानी कोश' (1951 से 1960), द्वितीय 'हिंदी कहानी कोश' (1991 से 2000) की अवधि की कहानियों को समेटे हुए हैं। उनका तीसरा सहलेखिका के रूप में ‘हिंदी लेखक कोश’ भी उपलब्ध है।
डॉ. दीप्ति

प्रस्तुत 'प्रवासी हिन्दी कहानी कोश' सर्वप्रथम ग्रंथ है जो भूमंडलीकरण की यथार्थ भूमि पर खड़ी लगभग 50 प्रवासी महिला कहानीकारों की लगभग साढे चार सौ कहानियों को आत्मसात किए हैं। लेखिका ने प्रस्तुत कोश की कहानियों हेतु कहानी संग्रहों, संकलनों के अतिरिक्त मुद्रित एवं नेट पत्रिकाओं से कहानियों का अध्ययन किया। अभिव्यक्ति, अणिमा, अनहद कृति, आधारशिला, ई-कल्पना, कथादेश, साहित्य कुंज, संचेतना, कथा बिंब, कहानी, कहानीकार, गद्य कोश, गर्भनाल, जनकृति, जय विजय, धर्मयुग, नई कहानियां, नई धारा, पाखी, पुरवाई, प्रतिलिपि, प्रवासी दुनिया, प्रवासी संसार, वसुधा, वागर्थ, विभोम स्वर, शोध दिशा, साहित्य शिल्पी, हरिगंधा, हंस, हिंदी चेतना इत्यादि से कहानियों का संकलन कर पठन, मनन व चिंतन करते हुए नवीन 'प्रवासी हिन्दी कहानी कोश' द्वारा हिंदी कहानी जगत में एक नवीन अध्याय का सूत्रपात किया।

मधु संधु
प्रस्तुत कोश में आई प्रवासी भारतीय की अस्तित्व चेतना है, जीवन संघर्ष के अनेक पहलू हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, डेनमार्क, स्कॉटलैंड, यूएई, ऑस्ट्रेलिया, कुवैत, फ़्रांस, मारिशस, अफ्रीका, मलेशिया, कनाडा, मेक्सिको, युगांडा, सूरीनाम- यानी विभिन्न देशों में प्रवास कर रही लेखिकाओं ने उन देशों के कानून और नियम, संस्कृति और वातावरण, जीवन संघर्ष और जीवट, उपलब्धियां और दुश्वारियाँ को इन कहानियों में जिस प्रकार अंकित किया है, डॉ. मधु संधु ने मानो उनकी रचना प्रक्रिया में गहरे पैठ कर इस कोश ग्रंथ में उन्हीं स्थितियों की पुनर्रचना की है।

यहाँ सशक्त और आत्मचेता स्त्री है। शोषण और दोयम दर्जे की तो बड़ी दूर की बात है (उषा राजे सक्सेना की आन्टोप्रोन्योर, रुखसाना तथा एलोरा)। इन कहानियों से पता चलता है कि प्रवासी स्त्री ने पाश्चात्य संस्कृति की प्रगतिशील सोच से भी अपने को जोड़ा है। अनेक कहानियाँ बताती हैं कि सुदूर देशों में बसने के बावजूद भी भारतीय अपनी संकीर्ण रूढ़िवादी अर्थलोलुप मानसिकता से मुक्त नहीं हो पा रहे (नीरजा द्विवेदी की पटाक्षेप:, दिव्या माथुर की आत्महत्या से पहले)। प्रस्तुत कहानियों में परंपरागत मान्यताओं के विरुद्ध संघर्ष करती नारी भी चिन्हित हुई है जो विवाह की परंपरागत संस्था को नकारती स्वतंत्र रूप से लिव इन रिलेशनशिप में रहने में कंफर्ट अनुभव करती है (सुषम बेदी की रणभूमि, नीरा त्यागी की कैन आई ऐश्योर यू आई शैल नेवर नीड देम, अचला वर्मा की दिल में एक कसबा है)। कोश में ऐसी भी कहानियां मिलती हैं जहां प्रवासी अपने घर के कामकाज तथा बच्चों के पालन पोषण हेतु माता-पिता को बुलाते हैं और अपना स्वार्थ सिद्ध होने के पश्चात उन्हें निराश्रित भटकने के लिए असहाय छोड़ देते हैं (सुषम बेदी की अवशेष, नीना पॉल की घर बेघर, इला प्रसाद की उस स्त्री का नाम,सुधा ओम ढींगरा की कमरा नं.103, सुदर्शन प्रियदर्शिनी की सुबह)। अनेक कहानियों में पाश्चात्य संस्कृति के अनुकरण पर वृद्ध स्त्री पर पुनर्विवाह के लिए पारिवारिक दबाव भी परिलक्षित है (सुषम बेदी की गुनाहगार)।

प्रवास के प्रति युवा वर्ग का आकर्षण भी इन कहानियों में प्रस्तुत है (अर्चना पेन्यूली की एन. आर. आई.), भले ही एक डॉक्टर को वहां जाकर टैक्सी ड्राइवर बनना पड़े या मजदूरी करनी पड़े (इला प्रसाद की लौटते हुए)। एक नई स्थिति यह भी है कि प्रवासी भारतीय के संबंधी उसे पैसों की खान समझते हुए उसका निरंतर शोषण करते रहते हैं (सुधा ओम ढींगरा की कौन सी जमीन अपनी)। प्रवासी व्यक्ति की मिस फिटनेस भी इन कहानियों में चित्रित है (अर्चना पेन्यूली की एक सुबह आप्रवासन कार्यालय में)। भूमंडलीकरण के उदात्त परिप्रेक्ष्य के बावजूद गंदमी रंग के भारतीय आज भी रंगभेद, नस्लवाद की मानसिकता के शिकार हो रहे हैं (उषा राजे सक्सेना की प्रवास में, कादंबरी मेहरा की समझौता, सुषम बेदी की सरस्वती की धार)। महानगरीय जीवन, दांपत्य संबंधों में प्रेम की अपेक्षा टूटन, बिखराव, स्वार्थपरता तथा वस्तुवाद को प्राथमिकता देता है (लक्ष्मी शुक्ल की अनहिता, दिव्या माथुर की आशियाना)। आधुनिक वैश्विक परिप्रेक्ष्य में महानगरीय जीवन में लिव इन रिलेशनशिप तो सामान्य बात है। इसके अतिरिक्त बायोसेक्सुअलिटी और होमोसेक्सुअलिटी भी इन प्रवासी कहानीकारों की कहानियों में परिलक्षित है (सुधा ओम ढींगरा की आग में गर्मी कम क्यों है, अनिल प्रभा कुमार की कतार से कटा घर)। पश्चिम के भौतिकवादी संसार की महानगरीय संतान अपने अभिभावक की ममता की छाया की अपेक्षा विरासत में मिलने वाली धन-दौलत के प्रति अधिक मोह रखती है (सुषम बेदी की चिड़िया और चील)। विदेशी संस्कृति ने बच्चों को भले ही आत्मनिर्भर बनाया हो पर उनके बचपन को अनाथ कर दिया है। अभिभावकीय छत्रछाया से मरहूम सुरक्षा, भटकन तथा अकेलापन उनके बचपन की त्रासदी बन गई है (कादंबरी मेहरा का सिसकता ब्लोसम, उषादेवी कोल्हटकर की मेहमान)।

कोशकार ने भूमिका में लेखन संदर्भ में मिलने वाले कुछ रोचक तथ्यों की भी बात की है जैसे-
 “एक ही शीर्षक की एकाधिक कहानियाँ मिल जाती हैं जैसे वंदना मुकेश और अनिल प्रभा कुमार की ‘घर’, इला प्रसाद, उषा वर्मा, उषाराजे सक्सेना और पुष्पा सक्सेना की ‘रिश्ते’, उषा प्रियम्वदा, शैल अग्रवाल, और रेखा मैत्र की ‘वापसी’, दिव्या माथुर और पुष्पा सक्सेना की ‘फैसला’, स्नेह ठाकुर की ‘प्यार का रंग’ और पुष्पा सक्सेना की ‘प्यार के रंग’ आदि।- - - कई कहानियों के दो दो नाम है। जैसे सुषम बेदी की ‘विभक्त’ कहानी ‘काला लिबास’ शीर्षक से भी प्रकाशित है। ‘कितने कितने अतीत’ कहानी ‘कौशल्या शर्मा की शिकायतें’ शीर्षक से भी मिलती है। ‘अजेलिया के फूल’ एक जगह ‘अजेलिया के रंगीन फूल’ नाम लिए है। उषा राजे सक्सेना की ‘मि॰ कमिटमेंट’ ही ‘बीयर केन का छल्ला’ है। ‘चुन्नौती’ ही ‘ युवा का जीवन लक्ष्य’ है।

कोशकार ने इस ग्रंथ में एक विशेष पैटर्न में सभी कहानियों का परिचय देते विश्लेषण किया है- कहानी, कहानीकार, पुस्तक/ पत्रिका, संपर्क, कथासार, पात्र, कथ्य। प्रस्तुत 'प्रवासी हिन्दी कहानी कोश' साहित्य प्रेमियों की बौद्धिक क्षुधा को तृप्त करने में सक्षम है, शोधार्थियों के लिए शोध की नई दिशाओं का प्रवेश द्वार है, संग्रहणीय ग्रंथ है, ऐतिहासिक प्रयास है।

सहायक प्रोफेसर, हिन्दू कॉलेज, अमृतसर (पंजाब); ईमेल: deeptisahni81@gmail.com

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