श्राद्ध-कर्म सिद्धांत के विकास में स्वामी परांकुशाचार्य का अवदान

सुबोध कुमार शांडिल्य

सुबोध कुमार शांडिल्य

          मगध के पावन धरती पर समुद्भूत स्वामी परांकुशाचार्य एक शीर्षस्थ संत, लोकख्यात साहित्यकार एवं कर्मनिष्ठ कर्मकाण्डी थे। उनका जन्म 10 मार्च 1865 ई० को पटना जिलान्तर्गत विक्रम थाना क्षेत्र के महमतपुर नामक गाँव में एक गृहस्थ परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम पारस था तथा गुरु स्वामी राजेन्द्र सूरी परमहंस द्वारा प्रदत नाम परांकुशाचार्य था। वे इसी नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्हें लोग ‘सरौती के स्वामी जी’, ‘बुढ़वा स्वामी जी’, ‘अधिकारी स्वामी’ तथा ‘परमाचार्य जी’ के नाम से भी जानते थे। वे 115 वर्ष की दीर्घ जीवनकाल में सदैव धर्म-अध्यात्म के उन्नति के लिए प्रयत्नशील व संघर्षशील रहे। वेद, पुराण, स्मृति, संहिता आदि का गूढ़ अन्वेषण कर वे श्राद्ध-कर्म सिद्धांत को व्यावहारिक रूप प्रदान किये ताकि लोक में सरल व सुगम तरीके से कर्मकाण्डों का संपादन हो सके। इनके द्वारा प्रणीत ‘ब्रह्ममेध संस्कार और नारायण बलि श्राद्ध पद्धति कर्मकाण्ड के क्षेत्र में एक मिल का पत्थर है जो मुख्यतः बृह्द हारीत संहिता पर अवलंबित है। आज भी तरेत, सरौती, हुलासगंज, कतरासिन तथा इनसे जुड़े हुए  अन्य संस्थानों में स्वामी जी द्वारा प्रणीत श्राद्ध पद्धति से ही कर्मकाण्ड सम्पादित किये जाते हैं।

          श्राद्ध का संबंध आत्मा से जुड़ा हुआ है। भारतीय शास्त्रों का अभिमत है कि आत्मा अजर व अमर है। जब जीवात्मा अपने स्थूल पांचभौतिक शरीर का त्याग करता है तो जीवात्मा का स्थूल शरीर तो छुट जाता है, लेकिन सूक्ष्म भौतिक शरीर के साथ आत्मा का अस्तित्व बना रहता है। इसी आत्मा की शांति के लिए शास्त्रों में श्राद्ध का विधान किया गया है। पितृ-तर्पण श्राद्ध एवं नारायण बलि श्राद्ध करने से न सिर्फ आत्मा को शांति मिलती है, बल्कि उन्हें मोक्ष की प्राप्ति भी हो जाती है। मोक्ष की प्राप्ति का तात्पर्य है कि आत्मा के सूक्ष्म भौतिक शरीर का भी त्याग हो जाता है तथा वह प्रभुपाद में स्थान प्राप्त कर जन्म-मरण के चक्कर से मुक्ति प्राप्त कर लेता है। श्राद्ध शब्द की उत्पत्ति श्रद्धा से हुई है। प्रेत तथा पितरों के कल्याण के उद्देश्य से अपनी अत्यंत प्रिय वस्तु जिसमें श्रद्धापूर्वक दी जाती है, उस क्रिया को श्राद्ध कहा जाता है। मार्कंडेय पुराण की मान्यता है कि श्राद्ध में श्रद्धापूर्वक जो कुछ भी दिया जाता है, वह पितरों द्वारा प्रयुक्त होनेवाले उस भोजन में प्रयुक्त हो जाता है, जिसे वे कर्म-सिद्धांत या पुनर्जन्म-सिद्धांत के अनुसार नए शरीर के रूप में प्राप्त करते हैं। वायु पुराण का वचन है कि यदि कोई श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है तो वह ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, ऋषियों, पितरों, मानवों, पशुओं, पक्षियों एवं समस्त भूतवर्ग को प्रसन्न करता है। वस्तुतः श्राद्ध एक महान धर्म है। स्मृतिचन्द्रिका में कहा गया है कि श्राद्ध से बढकर श्रेयस्कर कुछ भी नहीं है। हरिवंश पुराण में कहा गया है कि श्राद्ध से यह लोक प्रतिष्ठित है और इससे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यथा-
‘श्राद्धे प्रतिष्ठितो लोकः श्राद्धे योगः प्रवर्त्तते।‘

सामान्यतः श्राद्ध के तीन भेद किये गये है। वे हैं- नित्य, नैमित्तिक और काम्य। संध्योपासनादि की तरह प्रतिदिन किये जाने वाले देव, ऋषि एवं पितृ तर्पण तथा बलिवैश्वादि को नित्य श्राद्ध कहा जाता है। अंत्येष्टि कालिक दशगात्र, एकोद्दिष्ट, मासिक, वार्षिकादि विशेष निमित से होनेवाले श्राद्ध को नैमितिक श्राद्ध कहा जाता है। विवाह, यज्ञोपवित तथा यज्ञादि के अवसर पर विशेष कामना से किये जाने वाले श्राद्ध को काम्य श्राद्ध कहा जाता है। इस प्रकार देखा जाए तो नारायणबलि श्राद्ध विशेष निमित्त या कामना के उपस्थित होने पर किया जाता है। अतः यह नैमितिक और काम्य दोनों के अंतर्गत आता है। स्वामी परांकुशाचार्य ने नारायणबलि श्राद्ध के महत्ता का विशिष्ट वर्णन किया है तथा उसके शास्त्रीय विधि का भी उल्लेख किया है जो ब्रह्ममेध संस्कार एवं नारायणबलि श्राद्ध पद्धति पुस्तक में द्रष्टव्य है।

          स्वामी परांकुशाचार्य के अनुसार नारायणबलि श्राद्ध न सिर्फ प्रेत अथवा पितरों के कल्याण करने में सक्षम है, बल्कि कोई भी व्यक्ति प्रेत-बाधा. निःसंतानता आदि से प्रभावित है, नारायणबलि श्राद्ध कर उससे मुक्ति अथवा लाभ प्राप्त कर सकता है। स्वामी जी ने वृह्द हारीत संहिता के माध्यम से कहा है कि शेष श्राद्ध सामान्य धर्म है और नारायणबलि विशिष्ट एवं परमधर्म है। अतः शेष श्राद्धों को समाप्त कर मुक्ति आदि की कामना से नारायणबलि श्राद्ध अवश्य करनी चाहिए। वृह्द हारीत में यह भी कहा गया है –
‘श्रद्धानामलाभै तु एकं नारायणबलिम्।
कुर्वीत परया भक्त्या वैकुण्ठपदमाप्नुयात्।।‘
निर्णयसिन्धु में भी नारायणबलि का उल्लेख मिलता है। निर्णयसिन्धुकार का मत है कि-
‘गर्भघाते गर्भोत्पत्यभावे मृतापत्यवा तदा।
प्रतिवंधकं प्रेतोपद्रव शान्त्यर्थं नारायणबलि कार्यः।।‘

अर्थात् गर्भघात होने पर, गर्भोत्पति के आभाव में, संतान पैदा होने पर कालकवलित हो जाने पर तथा प्रेतादि के उपद्रव होने पर नारायणबलि श्राद्ध करनी चाहिए। नारायणबलि श्राद्ध से संबंधित सभी कार्य सव्य पुर्वाभिमुख और दाहिना घुटना भूमि पर टेककर किये जाने का विधान है। हाथ में अक्षत, तिल, जल, कुश, सुपारी आदि लेकर संकल्प किया जाता है। तत्पश्चात वैकुण्ठतर्पण शालग्राम-पूजन आदि कृत्यों का सम्पादन किया जाता है। कालक्रम में यह श्राद्ध लुप्तप्राय सा हो गया था। स्वामी परांकुशाचार्य ने शास्त्रों का मंथन कर महर्षि हारीत के कथनानुसार नारायणबलि श्राद्ध पद्धति लिखकर जनकल्यानार्थ उसे मुद्रित करवाकर उसका प्रचार-प्रसार किया, जिसका परिणाम हुआ कि आज भी इस ग्रंथ का अनुसरण कर नारायणबलि श्राद्ध सम्पन्न किये जा रहे हैं। यही श्राद्ध पद्धति स्वामी जी की महत्ती देन है। नारायणबलि श्राद्ध सब विधियों से कल्याणकारी व मंगलकारी है। यह मोक्षमार्ग को सुलभ बनाने वाला है। द्रष्टव्य है कि यदि किन्हीं कारणों से नारायणबलि श्राद्ध नहीं हो सका तो  गया श्राद्ध कर पितरों को पिण्डदान व तर्पण कर मोक्ष एवं शान्ति  के लिए कामना की जा सकती है। पितृपक्ष में पिण्डदान की विशेष महता है।


          सारांशतः कहा जा सकता है कि  श्राद्ध से अपनी प्रिय एवं सन्निकट सम्बन्धियों के प्रति स्नेह एवं श्रद्धा की भावनाओं का रूपायन होता है, उनके प्रति सच्ची कृतज्ञता का ज्ञापन होता है। यह कर्म एवं पुनर्जन्म के सिद्धांत को भी परिपुष्ट करता है। वास्तव में स्वामी परांकुशाचार्य ने ब्रह्ममेध संस्कार और नारायणबलि श्राद्ध पद्धति का प्रणयन कर श्राद्ध-पद्धति को सुगम और प्रभावी बनाने का प्रयत्न किया है। उन्होंने विभिन्न ग्रंथों का आश्रय लेकर सरल नारायणबलि श्राद्ध पद्धति का मार्ग सुलभ कराया है जो मानव को मुक्ति प्रदान करने में सक्षम है। अस्तु कहा जा  सकता है कि स्वामी जी ने श्राद्धकर्म सिद्धांत के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया है। 

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