काव्य: फाल्गुनी रॉय

फाल्गुनी रॉय
तमस

अरण्य, नदी
पर्वत,
पठार,
पथ हो या फिर पथिक,
ऊँघते हु्ए गाँव-कस्बे हों या थके हुए से नगर
क्षितिज हो, कछार
या भव्य विकराल समंदर
सबकुछ निगल जाता है
रात का गहराता हुआ तमस।
***

यह जीवन

किसी सुंदर चलचित्र सा
यह जीवन
तुम हो तो जैसे रंग है,
उमंग है
हर पल हर क्षण
एक उत्सव सा
ये जीवन
गीत गाती
लय में भागती हुई नदी सी
एक गति है।

पर बिना तुम्हारे
समेटे हुए किसी
खण्डहर सा सूनापन
खामोश सिरी-सिरी बहती हुई
किसी सूखी नदी की
जल धारा सी
ये जीवन

न उत्सव है, न गीत
न गति
महज एक औपचारिकता भर सी लगती है ।
***
सरहदें
हमसे बेहतर हैं ये परिन्दे
जो आते हैं,
जाते हैं,
उतरते है कहीं भी बेरोकटोक
कोई नहीं पूछता इन से
कहाँ से आये हो?
किस देश से
और क्या है आने का प्रयोजन?
ये आते हैं,
उतरते हैं,
गाते हैं
और लौट जाते हैं
अपने-अपने देशों में

वो देखो! उस पार
हजारों वोल्ट विद्युत् दौड़ाते इन कँटीले तारों से
महज चंद कदम दूर
लबालब पके हुऐ उस जामुन के पेड़ पर,
अभी-अभी आकर
उतरा है

एक परिंदा और
मैं चाह कर भी नहीं उतर सकता वहाँ।
***

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