आओ हिंदी सीखें - भाग 5

डॉ. सत्यवीर सिंह

सत्यवीर सिंह

सहायक आचार्य (हिंदी)
ला. ब. शा. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कोटपूतली (जयपुर) 303108, राजस्थान, भारत
चलभाष: +91 979 996 4305; ईमेल: drsatyavirsingh@gmail.com

हिंदी की संवैधानिक स्थिति और प्रगति


हिंदी भाषा के अनेक रूप प्रचलित हैं। ये रूप प्रमुखतः हैं - बोलचाल की सामान्य हिंदी, रचनाधर्मी हिंदी, जिसे साहित्यिक हिंदी भी कह सकते है। राष्ट्रभाषा और राजभाषा हिंदी जिसे कार्यालयीन हिंदी भी कहा जाता है; साथ ही जो राष्ट्र (देश) की पहचान के रूप में स्थान प्राप्त किए है। संचार माध्यमों की भाषा हिंदी। आज जनसंचार माध्यम जिसमें समाचार पत्र, पत्रिकाएँ, रेडियो, टीवी, इंटरनेट, फिल्म आदि रूपों में प्रयुक्त भाषा हिंदी। इनके अतिरिक्त अंतिम रूप, जिसे अद्यतन रूप कहा जा सकता है, वह है - प्रयोजनमूलक हिंदी। किसी प्रयोजन अर्थात् उद्देश्य (लक्ष्य) को सामने रखकर उस भाषा का अध्ययन किया जाए। इससे उसे लक्ष्य (प्रयोजन) की प्राप्ति हो सके।

 हिंदी भाषा के उपर्युक्त प्रचलित रूप हैं। इन रूपों में संविधान में किस रूप को मान्यता प्राप्त है। अर्थात हिंदी की संवैधानिक स्थिति क्या है? इस प्रश्न का उत्तर है कि संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है। 15 अगस्त, 1947 में भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई। डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में यह निर्णय सन् 1946 को लिया गया था कि सभा के कामकाज की भाषा हिंदुस्तानी या अंग्रेजी होगी पर कोई भी सदस्य अध्यक्ष की अनुमति से सदन में अपनी मातृभाषा में भाषण दे सकेगा। 14 जुलाई, 1947 में संशोधन प्रस्तुत किया गया कि हिंदुस्तानी के स्थान पर हिंदी शब्द रखा जाए। प्रारंभ में संविधान का जो प्रारूप प्रस्तुत किया गया था, उसमें राजभाषा विषयक कोई धारा नहीं थी। अनेक बहसों और बैठकों के बाद 14 सितंबर, 1949 को राजभाषा के रूप में हिंदी समादृत हुई। इसी दिन प्रतिवर्ष हिंदी दिवस मनाया जाता है। 12 सितंबर, 1949 को कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी एवं श्री एन. गोपाल आयंगर ने एक सूत्र प्रस्तुत किया जो 'मुंशी आयंगर' फार्मूला के नाम से प्रसिद्ध है। इसके बाद हिंदी को राजभाषा बनाने के संबंध में हिंदीतर राज्यों की नाराजगी दूर हुई। फार्मूला में कहा गया था कि संविधान प्रारंभ होने की तिथि से 15 वर्षों तक अंग्रेजी का प्रयोग उन सब कार्यों के लिए होता रहे जिसके लिए इसका प्रयोग इस समय तक होता आ रहा है। राज्यों की भाषा के संबंध में यह प्रस्ताव रखा गया कि जहाँ तक संभव हो राज्यों में बोली जाने वाली भाषाओं को उन राज्यों के सरकारी कामकाज की भाषा स्वीकार कर लिया जाए। राज्यों एवं केंद्र सरकार के बीच तथा दो राज्यों के बीच होने वाले पत्राचार, राज्य के विधान मंडलों, संसद, उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय का काम किस भाषा में हो, सरकारी कामकाज में प्रयुक्त होने वाले अंकों का स्वरूप क्या हो तथा राजभाषा हिंदी के विकास की रूपरेखा क्या हो, आदि के लिए उन्होंने एक विस्तृत कार्ययोजना प्रस्तुत की। पर्याप्त बहस एवं विचार मंथन के पश्चात् 14 सितंबर, 1949 को एक मत से भाषा संबंधी विवाद को हल करते हुए संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठापित किया। 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अंतिम रूप दिया। 26 जनवरी, 1950 से यह संविधान में लागू हुआ और इतिहास में पहली बार हिंदी को राष्ट्रीय धरातल पर राजभाषा के रूप में सांविधानिक मान्यता प्राप्त हुई।

राजभाषा: अर्थ एवं परिभाषा तथा स्वरूप

राजभाषा शब्द का शाब्दिक अर्थ है - सरकारी कार्य संचालन की भाषा, कामकाज की भाषा, राजकाज की भाषा, कार्यालयीन भाषा। सरकार के कार्यालयों में आपसी पत्राचार के लिए प्रयुक्त एक मान्य भाषा ही राजभाषा कहलाती है। किसी भी राष्ट्र की एक राजभाषा होती है; जैसे- फ्रांस की फ्रेंच, रूस की रूसी, इंग्लैंड की अंग्रेजी, चीन की चीनी आदि। प्राचीन भारत की राजभाषा संस्कृत, मध्यकाल में मुसलमानों के समय भारत की राजभाषा फारसी थी। आधुनिक काल में भारत की राजभाषा अंग्रेजी रही। कमोबेश रूप में आज तक अंग्रेजी भारत की राजभाषा के समीप है, सहचरी है, सखी है। भारत के संविधान में राजभाषा के पद से हिंदी को सुशोभित किया गया है।

भारतीय संविधान और हिंदी

भारतीय संविधान ने भाग 2, 6 और 17 इन तीन भागों में राजभाषा संबंधी प्रावधान है तथा अष्टम अनुसूची में राष्ट्रीय भाषा संबंधी प्रावधान है। संविधान के भाग 2 के अनुच्छेद 120 में संसद के भाषायी कार्य हिंदी और अंग्रेजी में किए जाए, यह स्पष्ट है। साथ ही लोकसभा अध्यक्ष तथा राज्यसभा के सभापति चाहे तो संसद सदस्य को यह छूट दे सकते हैं कि वह अपनी मातृभाषा में बोल सकें। यह तब हो जब वह सदस्य हिंदी अंग्रेजी में न बोल पाए। इसी तरह संविधान के भाग 6 के अनुच्छेद 210 में राज्य विधान सभाओं के संबंध में है। विधानसभा के अध्यक्ष को जब यह लगे कि सदस्य हिंदी या अंग्रेजी में बोल नहीं पा रहे, तो वह मातृभाषा में बोलने की अनुमति दे सकते हैं।
 भारतीय संविधान के भाग 17 के चार अध्यायों में राजभाषा संबंधी उपबंध प्रस्तुत किए गए हैं। इनमें प्रथम अध्याय (भाग ) में संघ की भाषा के संबंध में अनुच्छेद 343 तथा 344 हैं। द्वितीय अध्याय में अनुच्छेद 345, 346 तथा 347 में राजभाषा के रूप में प्रांतीय भाषाओं के प्रयोग के संबंध में निर्देश दिए गए हैं । तृतीय अध्याय में अनुच्छेद 348 और 349 में उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय की भाषा के संबंध में निर्देश है तथा चौथे एवं अंतिम अध्याय में अनुच्छेद 350 और 351 में क्रमशः व्यथा के निवारण के लिए अभिवेदन में प्रयुक्त भाषा और हिंदी भाषा के विकास के संबंध में विशेष निर्देश दिये गए हैं। इस तरह से संविधान के भाग 17 के अंतर्गत 4 अध्यायों का नामकरण इस प्रकार किया गया है - प्रथम अध्याय: संघ की भाषा, द्वितीय अध्याय: प्रादेशिक भाषाएँ, तृतीय अध्याय: उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों की भाषा, चतुर्थ अध्याय: विशेष निर्देश।

प्रथम अध्याय: संघ की भाषा

इस अध्याय के अनुच्छेद 343 ( 1 ) मे उल्लिखित है कि संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप होगा। इसी अनुच्छेद के (2) खंड (1) में लिखित है कि किसी बात के होते हुए भी संविधान के प्रारंभ से 15 वर्ष की कालावधि के लिए संघ के उन सब सरकारी प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा।
 अनुच्छेद 344 इसके तहत राजभाषा के लिए आयोग और संसद की समिति के गठन का प्रावधान है। राष्ट्रपति संविधान के प्रारंभ में 5 वर्ष की समाप्ति पर तथा तत्पश्चात् ऐसे प्रारंभ से 10 वर्ष की समाप्ति पर आदेश द्वारा एक आयोग गठित करेगा, जो एक सभापति और अष्टम् अनुसूची में उल्लिखित भिन्न भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगा। आयोग का कार्य होगा कि राष्ट्रपति को जानकारी देवें की हिंदी का अधिकाधिक प्रयोग हो, राज्यों के बीच पत्राचार राजभाषा के माध्यम से ही हो। आयोग औद्योगिक, सांस्कृतिक तथा वैज्ञानिक उन्नति और लोक सेवाओं के बारे में हिंदी भाषा - भाषी राज्यों, क्षेत्रों के लोगों के न्यायपूर्ण दावों तथा हितों का सम्यक ध्यान रखेगा। इसी अनुच्छेद के उपबंध 4 के तहत निर्दिष्ट है कि एक समिति गठित की जाएगी जिसमें कुल 30 सदस्य रहेंगे। 20 लोकसभा के सदस्य तथा 10 राज्यसभा के सदस्य होंगे।

द्वितीय अध्याय: प्रादेशिक भाषाएँ

इस अध्याय में कुल तीन अनुच्छेद - 345, 346 तथा 347 है।

 अनुच्छेद 345 के अंतर्गत राजभाषा या राज्य भाषाओं का उल्लेख है। राज्य चाहे तो राज्य की किसी भाषा या भाषाओं को राजभाषा का दर्जा दे सकता है। अन्यथा संघ की राजभाषा नीति की अनुपालना में अंग्रेजी और हिंदी में से एक को अंगीकार करना होगा।

 अनुच्छेद 346 के अंतर्गत स्पष्ट है - एक राज्य और दूसरे राज्यों के बीच में अथवा राज्य और संघ के बीच में संचार के लिए राजभाषा नीति पालना करनी होगी।

 अनुच्छेद 347 के अंतर्गत किसी राज्य के जन समुदाय के किसी भाषा के संबंध में विशेष उपबंध हैं। इसके तहत उस समुदाय द्वारा बोली जाने वाली भाषा को राष्ट्रपति महोदय जनसमुदाय के पर्याप्त अनुपात की इच्छा को ध्यान में रखकर उसे राजकीय मान्यता प्रदान कर सकते हैं।

तृतीय अध्याय: उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों की भाषा

उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय में तथा अधिनियम और विधेयकों आदि में प्रयोग की जाने वाली भाषा संबंधी अनुच्छेद 348 एवं अनुच्छेद 349 का प्रावधान है। सभी न्यायालयों में प्रयुक्ति की भाषा अंग्रेजी होगी। राज्यों के न्यायालयों के लिए यदि राज्यपाल तथा राष्ट्रपति की सम्मति हो तो उस राज्य की राज्य भाषा में कार्रवाइयाँ हो सकती हैं। उक्त दोनों अनुच्छेद इसी बात पर बल देते हैं।

चतुर्थ अध्याय: विशेष निर्देश 

राजभाषा हिंदी के विकास, प्रचार - प्रसार के लिए विशेष निर्देश दिए गए हैं। अनुच्छेद 350 तथा अनुच्छेद 351 में अनुच्छेद 350 के अंतर्गत किसी व्यथा के निवारण के लिए संघ या राज्य के किसी पदाधिकारी या प्राधिकारी को यथास्थिति संघ में या राज्य में प्रयोग होने वाली किसी भाषा में अभिवेदन देने का प्रत्येक व्यक्ति को हक होगा।
अनुच्छेद 351 के अंतर्गत हिंदी भाषा का प्रचार, प्रसार, वृद्धि एवं उसका विकास के प्रावधान हैं। हिंदी का विकास करना ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सब तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम हो सके। उसकी आत्मीयता में हस्तक्षेप किए बिना हिंदी और अष्टम अनुसूची में उल्लिखित अन्य भारतीय भाषाओं के रूप, शैली और पदावली को आत्मसात करते हुए तथा जहाँ आवश्यक या वांछनीय हो वहाँ उसके शब्द भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से तथा गौणत: वैसी उल्लिखित भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करना संघ का कर्तव्य होगा।

राजभाषा आयोग (1955)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 344 के अनुसार संविधान लागू होने के 5 वर्ष पश्चात् राष्ट्रपति को एक राजभाषा आयोग नियुक्त करने का अधिकार दिया गया था। तदनुसार 7 जून, 1955 को राजभाषा आयोग की नियुक्ति की गई। मुंबई राज्य के भूतपूर्व मंत्री स्वर्गीय श्री बाल गंगाधर खरे इस आयोग के प्रथम अध्यक्ष नियुक्त किए गए तथा विभिन्न राज्यों के 20 प्रतिनिधियों को इसमें शामिल किया गया। इसकी पहली बैठक 15 जुलाई, 1955 को हुई। इस आयोग ने अनेक सरकारी, गैर सरकारी व्यक्तियों, प्रतिनिधियों तथा संस्थाओं से मुलाकात की। आयोग ने अपना एक विस्तृत प्रतिवेदन 31 जुलाई, 1956 में राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया। इस प्रतिवेदन में यह उल्लेख किया गया कि यदि संघ सरकार ठीक तरह से ध्यान दें, तो आगामी 10 वर्षों अंग्रेजी राजभाषा पद से हट सकती है। प्रतिवेदन के प्रकाशन के पश्चात् हिंदीतर राज्यों के लोगों को नेताओं ने भड़काया और विरोध हो गया तथा मसला ठंडे बस्ते में चला गया।

संसदीय राजभाषा समिति (1957)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 344 के खंड 4 और 5 में की गई व्यवस्था के अनुसार राजभाषा आयोग के प्रतिवेदन पर विचार विमर्श करने के लिए एक संसदीय समिति का गठन किया गया। इसमें लोकसभा के 20 तथा राज्यसभा के 10 सदस्य थे। समिति की पहली बैठक समिति के अध्यक्ष तत्कालीन गृह मंत्री श्री गोविंद बल्लभ पंत की अध्यक्षता में 16 नवंबर, 1957 को हुई। समिति की कुल 26 बैठकें हुई। समिति ने 8 फरवरी, 1959 को अपना प्रतिवेदन राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया। अप्रैल 1959 में संसद में चर्चा के लिए प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया।

प्रमुख राजभाषा अधिनियम:
राजभाषा हिंदी के संबंध में अधिनियम - 1963 एवं इसी का संशोधित रूप- 1967, राजभाषा संकल्प - 1968 तथा राजभाषा नियम - 1976 महत्वपूर्ण है। राजभाषा अधिनियम - 1963 नाम से प्रसिद्ध यह अधिनियम 10 मई, 1963 को पारित होकर सामने आया। यह अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 343 के खंड 3 में विहित उपबंधों के आधार पर बनाया गया। एतद् संबंधी विधेयक लोकसभा में 13 अप्रैल, 1963 को तथा राज्यसभा में 3 मई, 1963 को पेश किया गया और क्रमशः 25 अप्रैल तथा 7 मई को पारित हुआ तथा 10 मई को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद सामने आया। इस अधिनियम की खास बात यह है कि इसमें हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी के प्रयोग की अनुमति प्रदान की गयी।

1963 अधिनियम के जारी होने के पश्चात् इसका विरोध होने लगा तो संशोधित रूप में राजभाषा अधिनियम 1967 पारित किया गया। इन दोनों अधिनियम ने राजभाषा के प्रश्न को सुलझाने की बजाय उलझाने का कार्य किया। इनके पश्चात भारत में द्वैभाषिक स्थिति पैदा हो गयी। भाषायी विवाद उभरकर सामने आया। फलस्वरूप संसद द्वारा 18 जनवरी, 1968 को राजभाषा संकल्प - 1968 पारित किया गया। इससे भी स्थिति में कोई सुधार नहीं आया। उक्त सभी अधिनियमों के प्रावधानों और राजभाषा नीति के परिपालन में राजभाषा नियम-1976 जारी किया गया।

 राजभाषा अधिनियम - 1963 में किए गए प्रावधानों के अनुसार नियम बनाए गए उनकों राजभाषा नियम -1976 नाम देकर 28 जून, 1976 को जारी किया गया।

राजभाषा नियम - 1976 के प्रमुख प्रावधान इस प्रकार है -
1. ये नियम केंद्र सरकार के सभी कार्यालयों पर लागू होते हैं।
2. केंद्र सरकार के कार्यालयों के पत्र व्यवहार के लिए राज्यों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया -

 'क' क्षेत्र के राज्य:
 इसमें हिंदी भाषी राज्य आते हैं। जैसे - उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, झारखंड तथा संघ राज्य दिल्ली इसमें शामिल है। इन राज्यों के कार्यालयों में केंद्र सरकार के कार्यालयों से पत्र हिंदी में भेजे जाएंगे। असाधारण दशाओं में कोई पत्र अंग्रेजी में भेजा जाता है, तो उनका हिंदी अनुवाद भी साथ भेजा जाएगा।

 'ख' क्षेत्र के राज्य: 
 इसमें गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब तथा संघ राज्य चंडीगढ़ और अंडमान निकोबार दीप समूह को शामिल किया गया है। इस क्षेत्र में स्थित कार्यालयों को केंद्र सरकार के कार्यालय से पत्र हिंदी तथा अंग्रेजी दोनों में से किसी भाषा में भेजे जा सकते हैं।

 'ग' क्षेत्र के राज्य: 
 उपर्युक्त राज्यों को छोड़कर राज्य एवं संघ शासित क्षेत्र इसमें शामिल हैं। इसमें अंग्रेजी में ही पत्र भेजे जाएंगे।
3. केंद्र सरकार के कर्मचारी को हिंदी में कार्य साधक ज्ञान होना चाहिए।
4. केंद्र सरकार के कार्यालयों में सभी मैनुअल, संहिताएँ, रजिस्टरों में शीर्ष नामपट्ट, सूचना पट्ट तथा स्टेशनरी आदि में शीर्षक हिंदी और अंग्रेजी में ही होगा।

राजभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार में सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान राजभाषा नियम - 1976 का है। इस नियम से राजभाषा की जटिल स्थिति को सरल करके प्रस्तुत किया है। व्यवहारिक रूप प्रदान किया गया। आपसी टकराहट से बचा गया।

संविधान स्वीकृत (मान्य) प्रादेशिक भाषाएँ: 

भारतीय संविधान की अष्टम् अनुसूची में कुल स्वीकृत राष्ट्रीय भाषाओं की संख्या 22 है। संविधान लागू होने के समय यह संख्या 14 थी। 10अप्रैल,1967 को 15 वीं राष्ट्रीय भाषा के रूप में सिंधी को शामिल किया गया। इसके पश्चात् 1993 को तीन अन्य भाषाएँ नेपाली, मणिपुरी और कोंकणी को सम्मिलित किया गया। अब संख्या 18 हो गई । 23 दिसंबर, 2003 को 92 वें संविधान संशोधन अधिनियम के अंतर्गत चार अन्य भारतीय भाषाओं; जिनमें बोड़ो, डोगरी, मैथिली और संथाली को इस अष्टम् अनुसूची में सम्मिलित कर लिया गया। इस प्रकार कुल 22 भाषाएँ निम्नलिखित हैं - असमिया, उड़िया, बंगला, उर्दू, कश्मीरी, गुजराती, मराठी, पंजाबी, कन्नड़, तेलुगु, तमिल, मलयालम, संस्कृत, हिंदी, सिंधी, कोंकणी, नेपाली, मणिपुरी, बोड़ो, संथाली, डोगरी और मैथिली।

हिंदी की प्रगति:

संविधान निर्माण से पूर्व एवं पश्चात में हिंदी के प्रचार, प्रसार, वृद्धि तथा विकास के लिए अनेक स्वेच्छिक संस्थानों तथा सरकारी संस्थाओं द्वारा प्रयास किया गया।। भारत सरकार के शिक्षा, विधि, गृह और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालयों को इसकी अभिवृद्धि तथा समृद्धि का दायित्व सौंपा गया। 1951 में शिक्षा मंत्रालय में एक हिंदी यूनिट की स्थापना हुई, बाद में यह प्रभाग ही बन गया। राजभाषा आयोग, 1955 तथा संसदीय राजभाषा समिति की सिफारिशों के फलस्वरूप मार्च 1960 को शिक्षा मंत्रालय के अधीनस्थ कार्यालयों के रूप में केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नयी दिल्ली की स्थापना हुई। निदेशालय ने अनेक द्विभाषी कोशों का निर्माण करवाया। अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों का अनुवाद करवाया तथा प्रशासनिक शब्दावली का निर्माण किया। 1961 से 'भाषा' नामक त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ। यह पत्रिका अनवरत प्रकाशित हो रही है। भारतीय भाषाओं के रचनाकार इसमें अभिव्यक्ति, स्थान पाते हैं।

केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने 27 अप्रैल, 1960 को राष्ट्रपति के आदेश की अनुपालना में अक्टूबर, 1960 को तकनीकी शब्दावली आयोग की स्थापना की। इसके बाद सभी विषयों की पारिभाषिक शब्दावलियाँ तैयार की जा चुकी हैं। केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के कर्मचारियों को हिंदी सिखाने के लिए संपूर्ण देश में हिंदी प्रशिक्षण कक्षाएँ चलाई। प्रबोध, प्रवीण और प्राज्ञ नाम से कक्षाएँ अनवरत संचालित हैं। 1 मार्च, 1971 से केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो की स्थापना की गई। यह अनुवाद ब्यूरो महत्वपूर्ण आदेशों, मैन्युअलों आदि का अनुवाद करता है। 26 जून, 1975 को भारत सरकार ने एक स्वतंत्र राजभाषा विभाग की स्थापना की। इसी प्रकार से विधि मंत्रालय के अधीन 27 अप्रैल, 1960 को जारी किए गए राष्ट्रपति के आदेश के अनुसार स्थापित राजभाषा आयोग ने प्रमुख कानूनों का हिंदी पाठ तैयार किया है। सरकार की अधिसूचनाएँ, विधेयक, करार, बंधपत्र, संविदा आदि का अनुवाद भी यह आयोग करता है।

हिंदी की अभिवृद्धि में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इस मंत्रालय ने सर्वप्रथम हिंदी सलाहकार समिति का गठन 1950-51 में कर दिया था। यह मंत्रालय हिंदी की दो महत्वपूर्ण पत्रिकाओं - आजकल तथा बाल भारती का प्रकाशन अनवरत कर रहा है। साथ ही हिंदी की अनेक मौलिक पुस्तकों का प्रकाशन किया है।

रेल मंत्रालय भी हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए कटिबद्ध है। रेलवे बोर्ड, सूचना, संहिताओं, नियमावलियों आदि के लिए रेल मंत्रालय का रेलवे बोर्ड तथा राजभाषा निदेशालय और हिंदी सलाहकार समिति हिंदी के व्यापक प्रयोग की ओर प्रयत्नशील है। कंप्यूटर में देवनागरी लिपि तथा भारतीय भाषाओं के प्रयोग की सुविधाओं के लिए इलेक्ट्रॉनिक विभाग इस तरह के अनेक सॉफ्टवेयर बनाने के लिए दिशा निर्देश देता रहा है।

गृह मंत्रालय का राजभाषा विभाग हिंदी की प्रगति के लिए बहुत उत्साहित है। सन् 1976 के राजभाषा नियम के अंतर्गत राजभाषा के व्यवहार एवं प्रयोग की दृष्टि से समस्त राज्यों को तीन वर्गों 'क', 'ख', 'ग' में विभाजित किया गया था। इसमें 'क' क्षेत्र में 70% 'ख' क्षेत्र में 40% तथा 'ग' क्षेत्र में 10% कार्य राजभाषा हिंदी में संपन्न किया जाना चाहिए।

उपर्युक्त विहंगावलोकन से यह स्पष्ट है कि भारतीय संविधान निर्मात्री समिति तथा आज केंद्र सरकार हिंदी के उन्नयन, प्रचार, प्रसार तथा विकास के लिए तत्पर है। भारत बहुभाषी, बहुधर्मी तथा अनेक संस्कृतियों का संगम है। इस तरह की स्थिति में हम एक भाषा की बात मजबूती से नहीं कर सकते चूँकि अन्य राज्यों की भावनाओं को रौंदकर हम आगे बढ़कर उन्नति के शिखर नहीं छू सकते। संविधान प्रदत हिंदी अब केवल 10 राज्यों (उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, झारखंड बिहार, उत्तराखंड, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली) की भाषा न होकर समस्त भारत की संपर्क भाषा बन गई है। मुंबई और बेंगलुरु में जाने से यह मालूम नहीं पड़ता कि हम क्रमशः महाराष्ट्र, कर्नाटक में है या दिल्ली में है। अब हिंदी के अरण्यरोदन का समय नहीं मंगल गान का समय है। अब हिंदी ने विश्व भाषा का रूप ले लिया है। अब इसे किसी की भीख नहीं चाहिए। अब तो हिंदी दान के रूप में अनेक कंपनियों को आश्रय दे रही है। यह दीगर बात है कि हिंदी का संविधान प्रदत्त रूप काफी जटिल एवं उलझन भरा है। इसके बावजूद हिंदी फिल्मों, धारावाहिकों, विज्ञापनों तथा मीडिया और बाजार ने हिंदी की एक नयी दिशा दी है।

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