हिंदू पानी, मुसलमान पानी

जीतेन्द्र भटनागर

- जीतेन्द्र भटनागर

कॉलेज में पहला दिन। प्यास लगने पर अन्य लड़कों के साथ मैं भी पानी पीने के लिए गया। देखा कि चार बड़े-बड़े मटके एक साथ रखे हैं जिन पर प्यासों की भीड़ लगी है। एक मटका अलग रखा था लेकिन उससे पीने वाला कोई नहीं था। मौका अच्छा था। मैं उस ओर बढ़ा पर साथियों ने रोक लिया। उन्होंने बताया कि वह मुस्लिम पानी है।

मैं खुद तो आज़ादी के समय बहुत छोटा था लेकिन बुज़ुर्ग बताते थे कि पहले, अँग्रेज़ों के ज़माने में, स्टेशनों पर आवाज़ें लगती थीं – ‘हिंदू पानी’, ‘मुसलमान पानी’। बहुत हैरानी होती थी मुझे। क्या फ़र्क होता है हिंदू पानी और मुसलमान पानी में? देखने में दोनों एक से ही तो होते हैं। इसे हज़म करना मुश्किल था पर बुज़ुर्ग तो ग़लतबयानी नहीं करेंगे। खुद देखा तो बेहोश होते-होते बचा। देश तेरह साल पहले आज़ाद हो चुका था। फिर भी...

पिछले हफ्ते, आज़ादी की 73वीं साल गिरह से चन्द दिन पहले, पता चला कि एक सज्जन ने अपना खाने का ऑर्डर महज़ इसलिए कैंसेल कर दिया कि रेस्टोरेंट से खाना लाने वाला मुसलमान है। यदि एक मुसलमान का हाथ लगने से खाना प्रदूषित हो जाता है तो खाना पकाने वाले का क्या? क्या इस व्यक्ति को विश्वास था कि जिस रेस्टोरेंट से उसने खाना मंगाया था वहाँ खाना बनाने वाले हिंदू, और केवल हिंदू हैं? और खाना बनाने वाले ही क्यों, सभी कर्मचारी भी तो हिंदू ही होने चाहिए। यदि इस शृंखला को शुरू से देखें तो किसान को बीज बेचने वाला हिंदू था या मुसलमान? क्या किसान स्वयं हिंदू था? फसल काटने वाले हिंदू थे? फसल को बाज़ार तक लाने वाले हिंदू थे? इत्यादि। बहुत लंबी श्रंखला है यह। कहीं न कहीं मुसलमान, ईसाई या किसी अन्य जाति का हाथ अवश्य लगा होगा होगा।

‘हिंदू’ किस धर्म का नाम है? ‘हिंदू’ किसे कहते हैं? जहाँ तक मैं जानता हूँ, हिंदू नाम का न तो कोई धर्म है न जाति। धर्म या तो वैदिक होता है या सनातन। बौद्ध और जैन भी धर्म हैं लेकिन कहलाते वे भी हिंदू ही हैं अपने को हिंदू कहने वाले लोगों में भी अनेक जातियाँ हैं। कुछ जातियाँ उच्च हैं और कुछ निम्न। उच्च जाति का हिंदू एक निम्न जाति के हिंदू के हाथ से भी खाना नहीं खाना चाहता।

मुझे याद आता है वह ज़माना जब हिंदू पानी और मुसलमान पानी अलग-अलग मिलता था। तब भी मेरी सनातनी माँ और उनकी मुसलमान सखियों का एक दूसरे के घर जाना आना रहता था। वह बात और है कि माँ, जो एक ऐसे परिवार से आईं थीं जहाँ प्याज़ तक नहीं खाई जाती थी, अपनी मुसलमान सखियों के यहाँ पानी भी नहीं पीती थीं। और उनकी उन्हीं सखियों के लिए हमारे घर में बर्तन अलग रखे रहते थे। यह उनकी सखियाँ भी जानती थीं और बुरा नहीं मानती थीं। हम बच्चों पर कोई रोक नहीं थी कहीं भी कुछ भी खाने पर। उस उदार ज़माने को छोड़ आज हम इतने संकीर्ण विचारों के कैसे हो गये, यह चिंता का विषय है।

प्राचीन काल में जब पश्चिम से विदेशी, व्यापारी हों या हमलावर, सिंधु नदी पार कर के आए तो उन्होंने सिंधु के पूर्व में रहने वालों को सिंधी कहा। वे ‘स’ का उच्चारण नहीं कर सकते थे। ‘स को’ ‘ह’ कहते थे। अतः उनके लिए सिंधु नदी हिंदू (ग्रीक में इंडस) थी और ‘सिंधी’ थे ‘हिन्दी’ जो कालांतर में ‘हिंदू’ कहलाने लगे। तात्पर्य यह है कि हिंदू न कोई धर्म है न जाति। यह तो केवल राष्ट्रीयता है। अब इस देश के नागरिक को आप भारतीय कहें या हिंदू, बात तो एक ही है।

अपने को राष्ट्रवादी कहने वालों को मालूम होना चाहिए कि राष्ट्रवादी वे होते हैं जो राष्ट्रहित की बात करते हैं। अपने ही देश के एक समुदाय विशेष के खिलाफ होने होने वाले राष्ट्रवादी नहीं जातिवादी होते हैं ।
ठीक ही कहा ज़ोमेटो ने। खाने का कोई धर्म नहीं होता। पानी का भी नहीं।

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