पुस्तक समीक्षा: आँख ये धन्य है (काव्य संग्रह)

समीक्षक: ध्रुव तनवानी

संग्रह: आँख ये धन्य है
लेखक: नरेन्द्र मोदी
प्रकाशन वर्ष: 2017, 208 पृष्ठ
मूल्य: ₹ 400 रुपये
प्रकाशक: जी एस पब्लिशर, दिल्ली

'आँख आ धन्य छे' से 'अखि हीअ धन्य आहे' तक - प्रांतीय परिधियों को लांघती श्री नरेन्द्र मोदी की कविताएँ

देवी नागरानी और अंजना संधीर
“आँख आ धन्य छे” गुजराती काव्य संग्रह 2007, मूल लेख़क नरेन्द्र मोदी के डॉ. अंजना संधीर द्वारा किये गये हिन्दी अनुवाद “आँख ये धन्य है” में श्री मोदी की 67 कविताओं का एक काव्य सृजन है, जो उनके विचारों को क्षितिज तक ले जाने का एक भरपूर तानाबाना है। अपनी मातृभूमि व मातृभाषा गुजराती को समर्पित, यह संग्रह उनकी शख्सियत का आईना है, जिसे अंजना जी ने हिन्दी पाठकों तक पहुँचाया है। प्रसिद्ध साहित्यकार देवी नागरानी ने उसी ग्रन्थ को “अखि हीअ धन्य आहे” नाम से हूबहू हिंदी से सिन्धी में अनुवाद कर अपनी मातृभाषा सिन्धी में पाठकों के हाथों पहुँचा कर बड़ा काम किया है। एक खास बात और कि यह अनुवाद सिन्धी अरबी लिपि व सिन्धी देवनागरी लिपि, दोनों में किया गया है, ताकि आज की नव पीढ़ी इस साहित्य से वंचित न रहे। सिन्धी साहित्य के प्रति यह सद्भावना व निष्ठा उनके लिए प्रांतीय भाषा की परीधियाँ समेटने की वह साधना बन गई है, जो वे निरंतर करते आ रही हैं।

डॉ. ध्रुव तनवानी
कवि मन होने के बावजूद मोदी जी ने भूमिका में बड़ी सरलता से स्वीकारा है कि वे कोई कवि या साहित्यकार नहीं है बल्कि एक सरस्वती उपासक मात्र हैं। उसी भूमिका में उनका बालमन कहता है कि कविता विवेचन के समय उनकी पद–प्रतिष्ठा न देखकर यदि निष्पक्ष समीक्षा होगी तो उन्हें संतोष होगा। डॉ. अंजना का लेख़क से पुराना भाईचारा रहा है, इसलिए कवि की अनुभूतियों, भावनाओं व संवेदनाओं को जस का तस रख़ने के लिये, वे हर भारतयात्रा में कवि से मिलती रहीं, इस कारण हिन्दी प्रतिच्छाया आने में 6 वर्ष लग गये। कवि का निसर्ग की एक एक आकृति पर गिद्ध सी आँख गढ़ाना तो किसी सन्त-तपस्वी सा कर्मयोगी का परिश्रम है, जो काव्य के झरोखे से झाँकता है। धूप छाँव, नदी, बरख़ा, पेड़, पहाड़, चट्टान, मिट्टी, लहलहाते ख़ेत, देश प्रेम द्वारा मिट्टी की महक, किसान की पीड़ा, सुनामी, अकाल, बाढ़, कारगिल युद्ध, देश विभाजन की त्रासदी आदि सब पर नज़र रख़ने वाले कवि ने 1947 के विभाजन को मानवता विभाजन के दर्जे से आँका है, जिसमें कोई कहाँ गया तो कोई कहाँ रह गया। ख़ून के रिश्ते धर्म की झूठी आड़ में फँसते, इधर–उधर गिरते ख़ून के कतरे जिनकी गणना वाकई मार्मिक व्यथा है।

67 कविताओं का संग्रह 67 कथाएँ कहता है जिसमें दर्द, ममता, दायित्व, विकास, सपने, आरजुएँ, समर्पण, संवेदना का गूढ़ छिपा है। काव्य-संग्रह की अंतिम कविता “गयारवी दिशा” में सपने साकार होने का रहस्य छिपा हुआ है। प्रकृतिवादी मोदी ने निसर्ग के एक-एक कोने को ऐसे तराशा है मानो सुनार ने गहनों को तराशा हो। जैसे “ख़ुशबू भरा आकाश, पृथ्वी स्नेह से भरी सुगन्ध, परमेश्वर मेरा मीत, न आदि न अन्त...” ऐसे ही समता, एकता, विकास जैसे शब्दों की ख़ूबसूरत माला उनकी 66वीं कविता “हिन्दू-हिन्दू मन्त्र” में देख़ सकते है। “हर कहीं और यहाँ ह्मेशा हिन्दू-हिन्दू एक मन्त्र, सिन्धु सिन्धु एक मन्त्र, जो मोतियों सा है, अंधकार में ज्योति जैसा, हम उजाला फ़ैलायेंगे - समता, एकता, ममता को, हम यत्न से संभालेंगे, हम उजाला फ़ैलायेंगे।” उसी तरह उनकी 63 वीं कविता “मलाल” देश भक्ति से ओतप्रोत एक नूतन सन्देश देने में सफ़ल रही है।” दरियादिली, ज़िन्दादिली, लहरें हैं, हमारी ज़िन्दगी की - कोई आये न आये, ज्वाला है देश भक्ति की, सागर में दहकती आग जैसी”

कविता संग्रह की एक एक कविता पर मन बतियाने को आतुर है पर समीक्षक के नाते शब्दों की सीमा और कलम विराम की बाध्यता मुझे ज़्यादा कलम चलाने से आगाह कर रही है। उसके बावजूद उनकी क्रमांक 6 कविता ‘’आज” सच्चाई का ज़िक्र किये बिना मन मानता नहीं। यह कविता ऐसी राह पर आकर खड़ा करती हैं जहाँ दार्शनिक चिन्तन, अलौकिक जगत में ले जाता है।“ ये था, वो था, ऐसा था वैसा था, ……”आदि आदि ख़ण्डहरों की ढहती शान-शौकत की भूल-भुलैया में खोकर अपने वर्तमान में जीने का भी कोई अर्थ है? बीते कल व आने वाले कल में अपना वर्तमान जो सामने है उसे निखारना है।

अपनी समीक्षा को तब तक अपूर्ण मानूंगी जब तक कविता की शीर्षक काव्य रचना के विषय में कुछ न कहूँ ! “आँख ये धन्य है” में अपनी धरती की पूजा, जो हरियाली द्वारा भूमि के तेज़ को कम करती है, आकाश की छटा और हवा में उसके बिख़रे इन्द्रधनुष के रंगों की भव्यता की अनुभूति से आँखें धन्य हो जाती है, मानो किसी पिछले जन्म का पुण्यार्थ ही आँखों को नसीब हो रहा हो। अपनी मातृभूमि पर सागर की ऊँची लहरों को इठलाते देख़ना, घने मेघों के बीच छिपे रहस्यों को निहारना, इन नयनों को धन्य करता है। कवि के शब्दों, भावों, सवेदनाओं, चिन्ताओं और अभिव्यक्तियों को ज्यों का त्यों हिन्दी में जिस प्रकार अंजना संधीर ने उकेरा है, वैसा का वैसा सिन्धी अनुवाद में विदुषी देवी नागरानी ने संजोया है। इन दोनों विदुषी साहित्य उपासकों को सादर नमन है इस मिशन में अथक परिश्रम द्वारा, साहित्य जगत में अपने अनमोल सृजित ग्रन्थों को सम्मिलित कर समाज को लाभान्वित कर गौरव हासिल किया। जयहिंद

ध्रुव तनवानी, पूर्व विभागाध्यक्ष समाजशास्त्र, रांची महिला महाविद्यालय,
ईमेल: tanvanid@yahoo.co.in

3 comments :

  1. बहुत ही सधी हुई, संतुलित समीक्षा।
    सुश्री अंजना संधीर एवं श्री अनुराग शर्मा जी का हार्दिक आभार। साधुवाद।

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  2. बहुत ही सधी हुई, संतुलित समीक्षा।
    सुश्री अंजना संधीर एवं श्री अनुराग शर्मा जी का हार्दिक आभार। साधुवाद।

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  3. सात समंदर पार से 'सेतु'बांधकर हिंदी की सेवा करने वाले अनुराग शर्मा का संपादकीय कौशल प्रभावित करता है।ये दूर बैठकर न जाने कैसे और कहाँ से चुन-चुन कर इतनी श्रेष्ठ रचनाएं लाते हैं ।
    पत्रिका का वैविध्य और गुणवत्ता दोनों सम्मोहित करते हैं।
    पत्रिका नियमित मिलती है ।उस पर प्रतिक्रिया न दे पाने और रचनाएं न भेज पाने का आलस्य शर्मिंदा करता रहा है।
    टिप्पणी लिखकर आज उस शर्मिंदगी से कुछ उबर पा रहा हूँ।
    शुभकामनाएं!
    -गुणशेखर

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