कंगन - एक संस्मरण

शशि पाधा

- शशि पाधा

यह अनुभव केवल मेरा नहीं हो सकता। जानती हूँ विश्व की अधिकतर माताएँ यही करतीं जो उस दिन मेरी माँ ने मेरे लिए किया। तभी तो कहा भी हैं न--- ईश्वर स्वयं पृथिवी पर नहीं आ सकता, इसीलिए उसने माँ बनाई - या ऐसा ही किन्हीं अन्य शब्दों में।

 बात लगभग 50 वर्ष पुरानी है लेकिन मेरे लिए यह जीवन की एक विशेष निधि है। मेरे विवाह की तिथि बस जल्दी में तय हो गई थी। मेरे होने वाले पति फौज में थे और भारत–चीन की सीमायों पर भारत माँ की रक्षा हेतु तैनात थे। बस थोड़ी सी छुट्टी मिली और विवाह तय हो गया। और तो कोई विशेष चिंता नहीं थी क्योंकि समाज में बदलाव लाने की भावना रखने वाले दामाद जी ने साफ शब्दों में कह दिया था - लड़की केवल अपनी किताबें और अपनी सितार ले कर ही आयेगी। आप लोग कृपया और कुछ साथ भेजने की सोचें भी न। यह बात सुखद भी थी और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरक भी थी। अत: मेरे माता पिता को दहेज़ की अनगिनित वस्तुएँ जुटाने की कोई चिंता नहीं थी।

अब बात पहुँची मुझे देने वाले स्वर्ण आभूषणों तक। हर माँ-बाप बच्ची के जन्म लेते ही उसके दहेज़ के विषय में तो अवश्य सोचते होंगे। मुझे यह अहसास नहीं है क्योंकि मुझे प्रभु ने बेटी की माँ होने का सौभाग्य ही नहीं दिया। मेरे मध्यमवर्गीय माता–पिता ने भी अपने बैंक में कुछ धनराशि तो जमा की होगी। किन्तु यहाँ तक मुझे याद है मुझे हर प्रकार की शिक्षा देने में वे सदा उत्साहित रहे। चाहे वाद-विवाद प्रतियोगिता के लिए मुझे बनारस , चंडीगढ़, देहली जाना हो या सितार वादन प्रतियोगिता के लिए किसी अन्य राज्य में। दोनों शिक्षक थे अत: उनका यही उद्देश्य रहा कि हम बच्चों की प्रतिभा का चहुँमुखी विकास हो। इन बातों के लिए कभी भी धन का संकोच नहीं हुआ हमारे घर में।

खैर, अब तो बात शादी की थी, कोई छोटे-मोटे खर्चे की तो नहीं थी। मेरे माता-पिता मुझे आभूषण पसंद करवाने के लिए जम्मू की एक प्रसिद्ध दुकान पर ले गये। मैं अपने पाठकों को यह अवश्य बता दूँ कि आकार की दृष्टि से यह दुकान केवल 10 मीटर चौड़ी और 8 मीटर लम्बी होगी। इसी में एक तरफ़ दुकान का बीच में सामान दिखाने वाला काउंटर और इस तरफ़ ग्राहकों के लिए बेंच। पर इनकी विशेषता यह थी कि उस समय के राज घराने के आभूषण इसी दुकान से बनते थे और सुना है कि राजघराने की लड़कियाँ जब अपने ससुराल नेपाल या उदयपुर से आतीं थी तो जेवर केवल इन्हीं से गढ़वातीं थी। यानी पूरे शहर में यह बात मानी हुई थी कि ज़ेवर बनें तो “हीरू की दुकान से ही बनें।” लोग आभूषण देख कर ही पहचान जाते थे कि यह उसी दुकान के हैं।

मेरे माता पिता तो राज घराने के नहीं थे पर बेटी को तो वो उतना ही प्यार करते थे न। अत: मेरे आभूषण भी ‘हीरू’ की दुकान से ही बनने तय हुए। अब हीरू जी जिन्हें हम आदर से मामा जी पुकारते थे (हमारे यहाँ अपने से बड़े लोगों को किसी न किसी रिश्ते से ही पुकारा जाता था), ने एक से एक बढ़कर सुन्दर, जड़ाऊ सेट दिखाने शुरू किये। मैं तो बस उनकी चकाचौंध ही देखती रही और कुछ निर्णय नहीं ले पाई। 20 -30 सेट देखने के बाद दो सेट हमने चुन लिए थे पर अभी क्या ख़रीदना है, इसका निर्णय बाकी था।

मैं उन दिनों बहुत शर्मीली थी, यह बात हीरू मामा जी जान गये थे। उन्होंने बस शीशा सामने रख दिया, मुझसे कहा कि इसमें देख कर निर्णय ले लो और मेरे मेरे पिता को बातचीत में लगाए रखा। यह शायद उन्होंने मेरी झिझक को देखते हुए ही ऐसा किया होगा। इसी तरह एक सेट का तो निर्णय हो गया। मैं बार बार सब्जों वाला दूसरा सेट भी छू कर देख रही थी। माँ जान गई थी कि मुझे वो दूसरा वाला भी बहुत पसंद था।

माँ ने उनसे पूछा, “यह जो सब्जों वाला सेट है, इसका क्या मूल्य है?”

हीरू मामा ने कहा, “बिटिया को पसंद है तो आप ले जाइए, पैसे का हिसाब बाद में हो जाएगा।”
पिता जी को शादी के और भी बहुत काम थे। उन्होंने कहा, “आप दोनों सेट की कीमत बता दीजिये ताकि हम पैसे देकर ही जाएँ।”

अब हीरू मामा ने सोने का भाव, सेट में जेड नगीनों का भाव जोड़–जाड़ के एक छोटी सी पर्ची पर दोनों सेटों की कीमत लिख दी। मेरी नज़र पड़ी तो मैं घबरा गई। मैंने धीरे से माँ से कहा, “मुझे इतना भी पसंद नहीं है, और फिर मैं तो अभी पढ़ रही हूँ। मैंने कौन से गहने ही पहनने हैं। एक ही ठीक है।”

मेरे धीर पिता ने भी कीमत देखी और सोच में पड़ गये। उन्हें तो और कितने खर्चे निपटाने थे।

धीमी सी आवाज़ में वे बोले, “वाह! सेट तो बहुत सुन्दर है किन्तु मूल्य कुछ ज़्यादा है। अच्छा आप इसे रख दीजिये, थोड़ा सोच कर इसके बारे में निर्णय लेंगे। अभी आप केवल सफ़ेद नगों वाला एक ही सेट दीजिये।

हीरू मामा जी ने एक सेट डिब्बे में बंद कर दिया और हमें दे दिया। उस सेट को अपने थैले में अच्छे से सम्भाल कर मेरे पिता ने अपनी छतरी उठाई और दुकान की सीढियाँ उतरने लगे।

मैं भी अपने पिता के साथ ही दरवाज़े की ओर जाने लगी। तभी मैंने देखा कि मेरी माँ सीढ़ियों से पीछे दुकान की ओर मुड़ रही थीं।

मेरे पिता तब तक दुकान से बाहर जा चुके थे। माँ हीरू मामा के काउंटर तक गईं। उन्होंने अपने बाएँ हाथ का सोने का कंगन खोल कर काउंटर पर रखा और बड़े संयत स्वर में कहा, “भ्राजी, इसे रख लीजिये और बिटिया के लिए दूसरा सेट भी बाँध दीजिए। बाकी का हिसाब–किताब हम शादी के बाद कर लेंगे।”

उन्होंने कब सेट उठाया, वो कब दुकान से उतरीं, मैंने ठीक से नहीं देखा। क्योंकि उस समय तो मैं अपने पिता के साथ दुकान से उतर चुकी थी। हाँ शादी की रात तक मुझे पता नहीं था कि मेरी माँ ने मेरे लिए दोनों सेट बंधवा लिए थे। उन पलों को अब याद करती हूँ तो रोम-रोम में एक सिहरन सी होती है। काउंटर पर रखा हुआ माँ का वह कंगन मेरी स्मृतियों में चिर अंकित है।

सोचती हूँ --- मेरी माँ अध्यापिका थीं, मेरी शादी के बाद भी जब तक वो स्कूल जाती रहीं, एक कलाई में घड़ी और दूसरी कलाई में एक कंगन ही पहनती रही। उनका दूसरा कंगन एक विशेष रूप में मेरे पास जो है और फिर वो मेरी पोती के पास होगा और फिर ------

1 comment :

  1. Since God could not be everywhere He created mother !!

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