नैतिक-मूल्यों के सवाल

- वसीम अनवर



नैतिक मूल्य वे सामाजिक सदाचार हैं जो संस्कृतियों के विकास में साथ-साथ विकसित होते हैं और नैतिकता मानवीय मूल्यों की वह व्यवस्था है जो जीवन को सुख में बढ़ाने वाले व्यवहार को जन्म देती है। नैतिकता के मानदंड बताते हैं कि किस प्रकार का व्यवहार सुखमय जीवन की ओर ले जाएगा और किस व्यवहार से समस्याएँ पैदा होंगी। मनुष्य सामाजिक प्राणी है इसलिए आजीवन हमें समाज की जरूरत होती है। और इसी समाज में प्रेमपूर्ण मित्रता और भावनात्मक सहयोग से जीवन परिपूर्ण होता है। निःसंदेह नैतिकता की गहरी समझ हमें मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने में सहायक होती है।

नैतिक मूल्यों का स्रोत संस्कृति है। संस्कृति दरअसल अपने आप में एक समूची जीवन प्रणाली होती है, जो साहित्य, कला, दर्शन के प्रति सोचने-समझने व जीवन व्यवहार और नैतिकता विषय में हमारा मार्गदर्शन करती है। संस्कृतियां बनती हैं, विकास करती हैं, उत्कर्ष पर पहुँचती हैं और पतनशील हो कर मिट भी जाती हैं। इस प्रकार नई संस्कृति के लिए जमीन तैयार होती है।

संसार में कोई भी वस्तु पूर्ण और शाश्वत नहीं होती है। हमारे नैतिक मूल्य भी शाश्वत नहीं है। सामाजिक विकास प्रक्रिया में धर्म की भी भूमिका रही है। धर्म अपना योगदान दे चुका है। लेकिन धर्म और धर्म आधारित मानवीय नैतिक मूल्य सामंती दौर की यादगार के रूप में आज भी मौजूद हैं। तेजी से बढ़ते हुए सामाजिक नीति-निर्धारकों ने आध्यात्मिकता और धार्मिकता की ओर पीछे लौटने को ही नैतिकता बताना शुरू कर दिया है। जो समाज की प्रगति के लिए बेहद हानिकारक है।

नवजागरण के बाद धर्मरहित मूल्यबोध का जो ढाँचा इंसानियत के आधार पर तैयार हुआ था उसमें विज्ञान के आधार पर तार्किक मानसिकता के नए मूल्यबोध पैदा हुए। कालान्तर में धार्मिक प्रभाव से मुक्त जनवादी मानवतावादी मूल्यों का समाज में आगमन हुआ। व्यक्ति स्वतंत्रता, नारी स्वतंत्रता, तर्क आधारित सच्चाई को महत्व देना, प्रकृति, समाज, आर्थिक-नीति ज्ञान-विज्ञान की समझदारी हासिल करने से नव समाज निर्माण में सहायता मिली। भारत में नवजागरण धर्म और परंपरावाद के साथ समझौता करके आगे बढ़ा लेकिन कुछ समय बाद ऐसे साहित्यकार और दार्शनिक पैदा हुए जिन्होंने धर्म और परंपरा से ऊपर उठकर नवजीवन, मूल्य, जनवाद एवं मानवतावाद के आधार पर पेश किए।

नैतिक मूल्य मानव एवं सामाजिक संघर्ष से उत्पन्न होते हैं। असमानता, शोषण, दमन व उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष की प्रेरणा प्रदान करने वाले नए नैतिक आचार से नैतिकता और मूल्यबोध अस्तित्व में आए। किस प्रकार राष्ट्रीय आंदोलन में विदेशी दासता, सामंतवादी प्रथाओं के खिलाफ संघर्ष, नए धर्म रहित मानवतावादी नैतिक मूल्य उत्पन्न हुए और इन मूल्यों ने अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाई, यह पड़ताल का विषय है।

मनुष्य या मानव समाज, न्याय व कानून एवं व्यवस्था के प्रचलित बोध का अनुसरण करने के लिए नहीं, बल्कि न्याय-नीति व कानून-व्यवस्था की अवधारणाएँ मानव समाज की प्रगति व उन्नति की जरूरतों को पूरा करने के लिए ही विकसित हुई हैं। नीति-नैतिकता व मूल्यबोध सामाजिक उन्नति व विकास की जरूरतों को पूरा करने के लिए विकसित हुए थे लेकिन समाज प्रगति के स्वार्थ में पुरानी नीति-नैतिकता एवं मूल्यबोध जब अवरोध पैदा करने लगे तो रूढ़ियों स्वरूप उन्हें ढोना न्याय संगत नहीं था। इसलिए हमारी सोच समझ में भी अंतर हमें देखने को मिलते हैं.

नैतिक मूल्यों के यथार्थ को समझने के लिए कुछ नैतिक आचार का अवलोकन करते हैं जो मानव की अपनी चेतना से उद्भूत हुए, इसे हम यहाँ पर कुछ विलोम भावों के साथ भी यहाँ अभिव्यक्त कर रहे हैं क्योंकि जब किसी शब्द के साथ नैतिकता का बोध हमें कराया जाता है तो वहीँ उसके उलट एक शब्द आता है जो उसके विपरीत सोच का भी हमें बोध कराता है-

सदाचार / व्यभिचार:
संस्कृत में एक श्लोक है-
वृत्तं यत्नेन संरक्षेत्वित्तमायाति याति च ।
अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः ॥

चरित्र का रक्षण करना चाहिए। धन तो आता है और जाता है। वित्त से क्षीण होनेवाला क्षीण नहीं है, पर शील से क्षीण होनेवाला नष्ट होता है।

श्रेष्ठ पुरुषों का आचार सदाचार कहलाता है। श्रेष्ठ पुरुषों से मतलब है- राजा, राजऋषि, गुरु, मुनि, पीर, पैगंबर आदि आदर्श पुरुष। अब यह विरोधाभासी आदर्श हमारे सामने हैं। कोई कुछ कहता है कोई कुछ। कहीं एक पत्नी व्रत है तो सोलह हजार स्त्रियों जैसे अपवाद भी हैं। कुरआन में भी बहुपत्नियों की बातें हैं। बहुपति विवाह और बहुपत्नी विवाह दोनों के उचित अनुचित का निर्णय एक समान है। वर्तमान जीवित धर्मों में कोई भी धर्म ऐसा नहीं है जो एक पति और एक पत्नी विवाह को अनुचित ठहराता हो। किंतु यह यौन सदाचार केवल बाहरी है, भीतर के हालात बहुत वीभत्स मालूम होते हैं। पुराने जमाने से आज तक अनेक धनी और शक्तिशाली पुरुष कई दासियाँ और सहधर्मिणी रखते रहे हैं।

सत्य / असत्य:  
सत्य की भारत के तमाम ग्रंथों में अनेक तरह की मीमांसा की गई है. आज सत्य बोलने की ओर धर्म और समाज जोर दे रहा है किंतु समाज में चारों ओर असत्य का बोलबाला है। समाज के बनावटीपन ने सच बोलने वाले के लिए स्थान ही नहीं छोड़ा है। आधुनिक राजनैतिक संस्थाएँ असत्य प्रचार के सबसे बड़े अड्डे हैं। समाज व्यक्ति को झूठ बोलने पर मजबूर करता है। झूठ बोलने वाले अक्सर बच जाते हैं और सच बोलने वाला पकड़ा जाता है। आजकल की बड़ी-बड़ी संपत्तियाँ बड़े-बड़े पद मान-सम्मान झूठ बोलने की निपुणता के इनाम हैं। परिवार समाज में झूठ बोलने की निपुणता आपको दुनियादार बनाती है। सत्यभाषी यानी सच बोलने वाला हर प्रकार की सजा पाता है। यही हमारे समाज का व्यवहार है।

चोरी / रिश्वत: 
कभी चोरी करने वालों के हाथ काट लिए जाते थे, अब सजाएँ कुछ हल्की हो गई हैं फिर भी चोरी करना भारी अनैतिक समझा जाता है। चोरी रोकने के लिए सख्त कानून और बड़े-बड़े जेलखाने बने हुए हैं लेकिन चोर चोरी करके, रिश्वत देकर बच जाते हैं। अपराधियों के सुधारगृह कहे जाने वाले जेलखाने छोटे अपराधियों के ट्रेनिंग सेंटर की भूमिका निभाते हैं। जब कोई छोटा-मोटा अपराधी जेल जाता है तो वहां अपने बड़े भाइयों से मिलकर और पक्का होकर लौटता है। समस्त सरकारी कार्यालय नगर निगम से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक का कोई ना कोई रिश्वत प्रकरण समाचार पत्रों में रोज दिखाई देता है। छोटी-मोटी चोरी करने वाला जेल की यातनाएँ सहता है और हजारों करोड़ का घोटाला करने वाले सम्मान पाते हैं।

संयम/विमुक्ति 
इस्लाम सहित संसार के कई धर्म मद्यपान निषेध करते हैं। लेकिन प्राचीनकाल से वर्तमान तक तमाम जाति-भेद धर्म-भेद मिटाकर हर जाति-धर्म के लोग शराब के शौकीन हो रहे हैं। शराब की दुकानों और बीयर-बार आदि में तमाम भेदभाव मिटाकर सभी धर्म जाति के लोग शराब पीते हुए मिल जाएंगे। आज सरकारी तौर पर उन छोटे-छोटे गाँवों में भी जहाँ चाय की दुकान भी न हो, पर सरकारी शराब की दुकान जरूर मिल जाती है।

इस प्रकार हम अनेक उदाहरण देख सकते हैं कि नैतिक मूल्य कोई जड़वस्तु नहीं है, समय स्थान और माहौल इनका निर्धारण करते हैं। मूल्य पैदा होते हैं, विकसित होते हैं, रुग्ण होते हैं और मर जाते हैं। नैतिक मूल्य समाज विकास के लिए हैं समाज नैतिकमूल्यों के लिए नहीं है। नैतिकमूल्य एक सामाजिक प्रक्रिया की उपज हैं जो व्यक्ति और समाज के बीच संबंधों को नियमबद्ध करते हैं जिनमें वस्तु-स्थिति तथा आर्थिक संबंध प्रतिबिंबित होते हैं। समाज में हमेशा उन्हीं नैतिक मूल्यों का बोलबाला और प्रभुत्व होता है जो प्रभुत्वशाली वर्ग के हितों की अभिव्यक्ति करते हैं।

इस पूरी अवधारणा को और भली प्रकार समझा जा सकता है। दुनिया में तमाम विमर्शों के बीच हमारा जीवन आगे बढ़ रहा है। आज हम इक्कीसवीं शताब्दी में पहुँच चुके हैं। इस युग में धर्म एवं संस्कृति अपनी उपयोगिता और महत्व खो चुके हैं ऐसा हम नहीं कह सकते लेकिन मूल्यों के मानदंड से हमारी सभ्यता दूर हो चुकी है ऐसा कह सकते हैं। यह विज्ञान का युग है वैज्ञानिक चिंतन, चेतना और दृष्टिकोण के विकास के बाद हमारा व्यवहार तर्कसंगत और पारदर्शी हो, तो नैतिक मूल्यों जैसी प्राचीन नीति की आवश्यकता केवल इन अर्थों में हो सकती है जिसके आलोक में हम अपने भावी जीवन को सुधार सकें। रूढ़िवादिता को अलग रखकर हम अपने लिए किन मूल्यबोध के साथ जियें यह नई पीढ़ी को सोचने की आवश्यकता है, नहीं तो हमारे दिमाग को जिस प्रकार कई स्तरों पर गलतफहमी में रखा जा रहा है उससे हमारा आज भविष्य सुरक्षित नहीं है।

उप आचार्य, उर्दू व पारसी विभाग, डॉ, एच एस गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर 470003
ईमेल: wsmnwr@gmail.com चलभाष: +91 930 131 6075

1 comment :

  1. धर्म नहीं, मत या पंथ लिखें। मजहब भी लिख सकते हैं। हिन्दी व संस्कृत में : चिह्न व शब्द के मध्य एक रिक्त स्थान देना होता है जिससे कि विसर्ग का भ्रम न हो। लेखक नीति व संस्कृति को ले कर भ्रमित है। मजहबी उसूलों का सनातन मूल्यों से सामञ्जस्य दर्शाने के चक्कर में ऐसा हो जाता है, तब और जब हृदय से स्वीकार हो ही न! सामन्तवाद को भी परिभाषित करना था। मात्र नारे लेख नहीं हो जाते!

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।