बाल साहित्य का सरोकार उम्र से नहीं, समझ और दृष्टि से है (दिविक रमेश)

दिविक रमेश
सुप्रसिद्ध बाल-साहित्यकार दिविक रमेश से प्रदीप त्रिपाठी एवं कविता शर्मा की वार्ता

कविता शर्मा: बच्चों पर केंद्रित साहित्य के प्रति आपकी रुझान क्यों और कैसे हुई?

दिविक रमेश: पहले यह बता दूँ कि जब मैं किशोर हुआ, लगभग 13-14 साल का तो मैंने लिखना शुरू कर दिया था। अपने गाँव से मुझे शहर में अपने नाना-नानी के पास आगे की पढ़ाई करने के लिए भेज दिया गया था। छठी कक्षा रही। तब अपने भाई-बहनों, माता-पिता, अपनी गाय आदि से अलग होने का दुख सताता था। नाना जी साहित्यिक अभिरुचि के थे। अखबारों में बाल-साहित्य भी छपता था। रेडियो पर भी बच्चों का कार्यक्रम आता था। इन्हीं सब के प्रभाव में शायद लिखना प्रारम्भ हुआ था। कुछ जन्मजात संस्कार भी मिले होंगे। मेरे पिता हरियाणवी के अच्छे गायक थे। लेकिन उस समय के मुझ बालक के द्वारा लिखे को मैं बाल-साहित्य नहीं कहना चाहूंगा। वह बालक का लिखा हुआ साहित्य था जिसमें हर दृष्टि से बहुत कच्चापन था। बड़ा होने पर मैं बड़ों के लिए लिखने लगा था। मेरी रचनाएँ प्रकाशित भी हो रही थीं। प्रसिद्धि भी मिल रही थी। देश की सभी पत्र-पत्रिकाओं में छपने के कारण मेरा नाम काफी परिचित हो चुका था। शुरुआत वास्तविक नाम रमेश शर्मा के नाम से हुई थी लेकिन बाद में उपनाम दिविक रमेश चर्चा में आ गया था। धर्मयुग ने मुझे चर्चित करने में खासी भूमिका निभायी थी। बड़ों के लिए, 1977 में प्रकाशित मेरा पहला कविता संग्रह ‘रास्ते के बीच’ अत्यधिक चर्चित हो चुका था। उन्हीं दिनों की बात है जब संयोग से एक स्थान पर उस समय की चर्चित और लोकप्रिय बाल पत्रिका’ नंदन’ में कार्यरत शायद उप या सहायक संपादक और बाल साहित्यकार श्री देवेंद्र कुमार मुझे मिले। उन्होंने मुझे नंदन के लिए बाल-रचना लिखने के लिए जोर देकर कहा। मुझे याद है कि उन्होंने यह भी कहा था कि जितनी प्रसिद्धि आपको धर्मयुग से मिल रही है उससे कहीं ज्यादा नंदन से मिलेगी। मैंने उनका अनुरोध मान लिया। सोचा बाल रचना ही तो लिखनी है कौन मुश्किल बात है।

तब मेरे दो बच्चे थे – सौरभ और दिशा। सुनने-पढ़ने लायक। जब लिखने बैठा तो स्वीकार करता हूँ कि नानी याद आ गयी। समझ गया कि बाल-साहित्य लिखना बच्चों का खेल नहीं है। कुछ कविताएँ लिखी गईं लेकिन मेरे बच्चों ने उन्हें सहर्ष अस्वीकार कर दिया। करते कराते लगभग 6 महीने बीत गए। तब जाकर कुछ कविताएँ बच्चों नें पसंद कीं। उन्हें मैंने धर्मयुग और नंदन को भेज दिया। साप्ताहिक होने के कारण रचना पहले प्रकाशित हो गई। रचना थी –मुन्ना बन बैठा दादा जब। अंक था 12 फरवरी, 1978 का। संयोग देखिए कि, बड़े अपवाद की तरह, यही पहली कविता पंजाब शिक्षा बोर्ड ने पाठ्यक्रम में भी ले ली। नंदन में ‘पैरों के राजदुलारे’ कविता 1978 में जाकर छपी। लेकिन इस तरह मैंने बाल-साहित्य के क्षेत्र में कदम रखा। नंदन के उस समय संपादक श्री जयप्रकाश भारती थे। बहुत ही सज्जन पुरुष। बालक और बाल-साहित्य के प्रति सिर से पाँव तक समर्पित। बाल-लेखन के क्षेत्र में आने के लिए कितनों ही के सच्चे प्रेरक। उन्होंने मुझ पर प्रेरणा और प्रोत्साहन का ऐसा मंत्र फूँका कि मैं स्वयं बाल-साहित्य लेखन के प्रति पूरे मन से समर्पित हो गया। हाँ, यह भी बता दूँ कि बच्चों का साथ मुझे हमेशा से भाया है। आज तक। बच्चे सबसे पहले मेरे दोस्त बनते हैं।

प्रदीप त्रिपाठी: बच्चों पर केन्द्रित साहित्य-लेखन के पीछे आपका क्या ध्येय रहा है?

दिविक रमेश: इस बारे में मेरी स्पष्ट धारणा रही है। मैंने कभी नहीं चाहा कि हिंदी बाल साहित्य की परंपरा के उत्कृष्ट में मेरा लिखा खप कर रह जाए। मैंने चाहा है कि कुछ ऐसा लिखा जाए जो नए ढंग का भी हो और उत्कृष्ट परम्परा को थोड़ा ही सही पर आगे बढ़ाने वाला भी हो। भले ही इसके लिए मुझे प्रयोगधर्मी ही क्यों न बनना पड़े। मैंने कभी भी बच्चों के लिए नहीं बल्कि बच्चों का लिखना चाहा है। अर्थात बच्चों को अपने से अलग मानते हुए या उनको कमतर मानते हुए उनको उपदेश देने के लिए नहीं बल्कि उन्हें दोस्त समझते हुए अपनी समझ को साझा करने की शैली में लिखना चाहता हूँ जिसे वे अपना समझें। बड़ों के लेखन की तरह मैंने बाल-साहित्य लेखन में भी प्रगतिशील और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अनिवार्य माना है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात कर रहा हूँ, वैज्ञानिक खोजों और उपकारणों पर पाठ्यक्रमोंधर्मी सृजनात्मक या तथ्यपरक कविता, कहानी आदि के रूप में लिखे साहित्य की बात नहीं कर रहा। वह सृजनात्मक साहित्य होता भी नहीं। मैंने बाल-साहित्य में भी विषय पर लिखने के स्थान पर विषय के अनुभव की कलात्मक अभिव्यक्ति पर जोर दिया है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण होने के कारण, अंधविश्वास, दकियानूसी, विभाजनकारी प्रतिकूल सोच, सामंती दृष्टि आदि से बचने का प्रयत्न किया है। कल्पना को भी बेबुनियादी रूप में नहीं अपनाया है। मैंने बच्चों के बीच में रहकर लिखने की ही भरपूर कोशिश की है। मेरी रचनाओं में बच्चे भी एक ही वर्ग, भूगोल, लिंग या वर्ण आदि के नहीं आते बल्कि अलग-अलग वर्ग आदि के आते हैं। मेरा वश चले तो मैं दूर-दराज के आदिवासी और अन्य स्थानों पर रहने वाले बहुत से मामलों में वंचित बच्चों का भी साहित्य लिखना चाहता हूँ। संक्षेप में तो यही ध्येय रहा है।

प्रदीप त्रिपाठी: अस्सी के बाद जिस प्रकार से नव-आंदोलन एवं हाशिये के समाज को मुख्य धारा से जोड़ने की कोशिश शुरू हुई, ऐसे में बच्चों के जीवन पर केन्द्रित साहित्य को विमर्श के रूप में उतनी तरजीह नहीं मिली जितनी मिलनी चाहिए थी, आपका इस तथ्य पर क्या मंतव्य है?

दिविक रमेश: मैंने अपने चिंतनपरक लेखों में हमेशा बालक विमर्श का मुद्दा उठाया है। बच्चे की तुलना साँस से की है। साँस जैसे मनुष्य के लिए सर्वाधिक अनिवार्य होती है लेकिन सामान्य स्थितियों में उसकी ओर ध्यान नहीं जाता उसी प्रकार मनुष्यता की साँस बच्चे की भी है। साँस रुकने लगती है तो साँस का महत्त्व एकदम सर्वोपरि हो जाता है। बच्चे और उसकी जरूरतों, जिसमें उसका बाल साहित्य भी है, की ओर समुचित ध्यान दिए बिना मनुष्यता का न भला हो सकता है और न विकास ही। लेकिन यह सक है कि हमारे समाज में बच्चे की भी प्राय: अनदेखी हुई है और बाल साहित्य की भी। मैंने तो कहा है कि स्त्री विमर्श की शुरुआत बालिका विमर्श से होनी चाहिए। गनीमत है कि इधर पुरानी सोच बदल रही है। आज बाल साहित्य में भी बच्चे के सशक्तिकरण की बात आ रही है। उसके अधिकार और उसकी अभिव्यक्ति के अधिकार को समझा जा रहा है। उसके सहज मन को समझ कर लिखने का प्रयत्न हो रहा हऐ। गुंजाइश यूँ बहुत है अभी।

कविता शर्मा: बाल-साहित्य में बालिकाओं से जुड़ी, खास करके भ्रूणहत्या जैसे तमाम त्रासद चित्र देखने को मिलते हैं, क्या आपको लगता है कि इस तरह के साहित्य को स्त्री-विमर्श से इतर अलग से बालिका-विमर्श का नया रूप दिया जाना चाहिए?

दिविक रमेश: भ्रूणहत्या के विरुद्ध स्वर बाल साहित्य की अपेक्षा बड़ों के साहित्य में अधिक है। हाँ. लड़की के होने, उसकी अस्मिता को अब लड़कों के समक्ष रख कर जरूर लिखा जा रहा है। जो सोच लड़की को लड़के की अपेक्षा कमतर, कमजोर इत्यादि समझने की रही है उसे छोड़ा जा रहा है। दोनों को समान महत्त्व देने की बात पिरोयी जा रही है। लड़की को उसके देह सहित तमाम शोषण के प्रति सचेत और समझदार बनाने वाली रचनाएँ लिखी जा रही हैं। अब छोटा भाई उसकी रक्षा के लिए तत्पर बड़ी बहन को राखी बांध कर रक्षा बंधन बनाने की मानसिकता में आ रहा है और उसकी ऐसी मानसिकता बनाने वाली रचनाएँ लिखी जा चुकी हैं। मानता हूँ कि आज इस क्षेत्र में भी अधिक से अधिक रचनाएँ लिखी जाने की आवश्यकता बनी हुई है।

यह विडम्बना ही है कि समाज में बालक के अधिकारों की बात तक कही जाती है लेकिन वह अभी तक कागजी सच अधिक लगती है , जमीनी सच कम। आज साहित्य में दलित, स्त्री और आदिवासी विमर्श की तरह ‘बालक - जिसमें बालिका भी है - विमर्श’ की भी जरूरत हो चली है। हमारा अधिकांश बाल लेखन महानगर/नगर केन्द्रित है और प्राय वहीं के बच्चे को केन्द्र में रखकर अधिकतर चिन्तन-मनन किया जाता है तथा निष्कर्ष निकाले जाते हैं। लेकिन मैं जोर देकर कहना चाहूंगा कि आज ज़रूरत बड़े-छोटे शहरों और कस्बों के साथ-साथ गाँवों और जगलों मे रह रहे बच्चों तक भी पहुँचने की है। और उन तक कैसे किस रूप में पहुँचा जाए, यह भी कम बड़ी चुनौती नहीं है।

प्रदीप त्रिपाठी: समकालीन परिदृश्य में बच्चों पर केंद्रित साहित्य (बाल-साहित्य) आपके नजरिये से कितना संतोषजनक है?

दिविक रमेश: नि:संदेह आज का हिन्दी बाल साहित्य बहुत समृद्ध है-मात्रा और गुणवत्ता दोनों दृष्टियों से। वर्षों पहले बालक और बाल साहित्य के अनन्य हितैषी एवं पुरोधा जयप्रकाश भारती ने उचित ही 21वीं सदी को बाल साहित्य का स्वर्ण युग घोषित किया था। बाल साहित्य के प्रति विद्वानों की जो दृष्टि उपेक्षा से भरी या उसे दोयम दर्जे का समझने की रही है उसे आघात पहुँचा है भले ही कम। हाँ सच यह भी है कि आज भी बहुत ढर्रेदार और उबाऊ बाल-साहित्य भी बहुतायत में लिखा जा रहा है और छप भी रहा है।

आज का बाल साहित्यकार यह भी जान गया है कि आज के बच्चे के मन में चढ़ने लायक लिखने के लिए उसे बच्चों के बीच से ही अपना कच्चा माल जुटाना पड़ेगा। बच्चे का विश्वास जीतना होगा। समझना होगा कि बच्चा कोई खाली पात्र नहीं है जिसमें आप मनमाना भरते चले जाएं। बहुत पहले बच्चों के महा पिता समझे जाने वाले कोरियाई साहित्यकार सो पा बांग जुंग ह्वान ने बच्चे को टोमगू अर्थात साथी समझने का पक्ष लेते हुए उसके अधिकारों को रेखांकित किया था। बच्चा केवल सुनने के लिए नहीं होता, उसके पास जिज्ञासा के साथ कुछ कहने की ललक होती है। दोहराना चाहूंगा कि आज का बाल साहित्य बालक विमर्श की भूमिका में भी दिखाई देता है जो बच्चे का सशक्तिकरण करने में समर्थ है। आज का बाल साहित्य बच्चे को निर्भीकता के साथ अपनी बात रखने की छूट और समझ देता है। बड़ों की गलत हरकतों में हस्तक्षेप करने का अधिकार देता है। वह बच्चे के मन को समझते हुए खुद का होना सिद्ध करता है। आज ऐसी कविताएं लिखी जा चुकी हैं जिनमें बच्चा गुस्सा कर रही माँ को गुस्सा न करने की समझ देते हुए देखा जा सकता है इत्यादि।

यहाँ मैं यह भी कहना चाहूंगा कि बाल-साहित्य केवल बच्चे के लिए नहीं बल्कि सब अर्थात हर उम्र के व्यक्ति के लिए होता है। बड़ों का साहित्य भले ही मात्र बड़ों के लिए होता है। पुरानी शैली में कहना यह चाहता हूँ कि बाल साहित्य जितना बालक को सुसंस्कृत करने का काम करता है उतना ही बड़ों को सुसंस्कृत करने का करता है।

कहना चाहूंगा कि बड़ों के लेखन की अपेक्षा बच्चों के लिए लिखना अधिक प्रतिबद्धता, जिम्मेदारी, निश्छलता, मासूमियत जैसी खुबियों की मांग करता है। इसे लेखक, प्रकाशक अथवा किसी संस्था को बाजारवाद की तरह प्राथमिक रूप से मुनाफे का काम समझ कर नहीं करना चाहिए। बाल साहित्यकार के सामने बाजारवाद के दबाव वाले आज के विपरीत माहौल में न केवल बच्चे के बचपन को बचाए रखने की चुनौती है बल्कि अपने भीतर के शिशु को भी बचाए रखने की बड़ी चुनौती है। कोई भी अपने भीतर के शिशु को तभी बचा सकता है जब वह निरंतर बच्चों के बीच रहकर नए से नए अनुभव को खुले मन से आत्मसात करे। अकेले होते बच्चे को उसके अकेलेपन से बचाना होगा। लेकिन यह बच्चों के बीच रहना ’बड़ा’ बनकर नहीं।

मूल समस्या लिखे जा रहे बाल-साहित्य की सही पहचान और उसके समुचित मूल्यांकन की बनी हुई है। उसे समुचित महत्त्व मिलना अभी बाकी है। आज भी बाल-साहित्य की आलोचना का मैदान लगभग खाली पड़ा है। बड़ों और बाल साहित्य की पुरस्कार राशियों तक में भेद है जबकि दोनों ही रचना हैं।

कविता शर्मा: बाल-साहित्य किस विधा में अधिक लिखा जा रहा है, उसकी खास वजह क्या है?

दिविक रमेश: यूँ तो हिंदी का बाल-साहित्य कहानी, कविता, उपन्यास, नाटक, एकांकी, संस्मरण, जीवनी आदि अनेक विधाओं में उपलब्ध है लेकिन मेरी निगाह में सबसे ज्यादा कविता और उसके बाद कहानी के रूप में सर्वाधिक उपलब्ध है और इन्हीं रूपों में सर्वाधिक उत्कृष्ट भी। इसकी खास वजह क्या है इसके बारे में तो विशेष रूप से नहीं सोचा है लेकिन शायद प्रकाशन की सुविधा और लेखकीय रुझान भी इसके कारण हो सकते हैं।

प्रदीप त्रिपाठी
प्रदीप त्रिपाठी: रचनाशीलता के संदर्भ में देखें तो आपका गद्य और पद्य दोनों में समान हस्तक्षेप है, दोनों में एक साथ आप कैसे सामञ्जस्य बिठाते हैं?

दिविक रमेश: मैं स्वयं को मूलत: कवि ही मानता हूँ और जहाँ तक सृजनशीलता का प्रश्न है मैंने कविता-विधा में ही सर्वाधिक लिखा है। बाल-साहित्य के अंतर्गत भी कविता-विधा में ही। सच यह भी है कि मैंने बाल-कहानियां, बाल-नाटक, बाल-संस्मरण आदि भी लिखे हैं और वे चर्चित तथा प्रतिष्ठित भी हुए हैं। एक मजेदार बात बताना चाहूंगा। मैंने बताया था कि मैंने लगभग 13-14 साल की आयु में लिखना शुरू किया था। मेरी पहली कृति कहानी थी। जबकि ज्यादातर रचनाकार अपनी लेखन कविता से शुरू करते हैं। हाँ आज भी मेरा लेखन, कम से कम बाल-साहित्य की दृष्टि से गद्य-पद्य दोनों में लिखा जा रहा है। इसके लिए मुझे अतिरिक्त चेष्टा नहीं करनी पड़ती। जब जिस विधा में सहज भाव से लिखा जाता है, लिख लेता हूँ। यूँ समझिए कि बस सध जाता है।

परिचय:
प्रदीप त्रिपाठी - सहायक प्रोफेसर, हिंदी विभाग, सिक्किम विश्वविद्यालय, गंगटोक
कविता शर्मा - छात्रा, एम. ए. हिंदी विभाग, सिक्किम विश्वविद्यालय, गंगटोक

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