युगीन सत्य की व्यंग्य रचनाएँ: जाँच अभी जारी है (पुस्तक समीक्षा)

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 941 272 7361; ईमेल: drdinesh57@gmail.com

पुस्तक: जाँच अभी जारी है (व्यंग्य संग्रह)
ISBN 978-93-81507-49-0
रचनाकार: डॉ. सुरेन्द्र गुप्त
प्रकाशक: अंकुर प्रकाशन, दिल्ली-110009
पृष्ठ: 128, मूल्य: ₹ 300.00 रुपये

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लघुकथा और कहानी के बाद हिन्दी साहित्य की व्यंग्य विधा में साधिकार लेखनी चलाने वाले रचनाकार डॉ. सुरेन्द्र गुप्त के व्यंग्य-संग्रह -” जाँच अभी जारी है” में कुल पन्द्रह व्यंग्य रचनाएँ समाहित की गई हैं।

संग्रह के प्रथम व्यंग्य का शीर्षक है-‘मेरी पत्नी मायके गई हुई है’। अक्सर नारी जाति को पुरुष वर्ग के द्वारा शोषित और प्रताणित माना जाता रहा है किन्तु वास्तविकता ऐसी नहीं है। नारियों के द्वारा भी पुरुष वर्ग का भरपूर शोषण होता रहा है और आज भी हो रहा है। प्रेयषी से पत्नी के रूप में आते ही कुछ नारियाँ जिस तरह अपना रुप परिवर्तन करती हैं वह कोई भुक्तभोगी ही जानता है। -‘मेरी पत्नी मायके गई हुई है’ व्यंग्य में लेखक ने बहुत ही सहज रूप से एक पत्नी के द्वारा एक पति के किए जा रहे शोषण का खाका खींचा है।

‘रिटायरमेंट के बाद’ संग्रह की दूसरी रचना है। रिटायरमेट के बाद मनुष्य घर-परिवार एवं समाज के लिए अनुपयोगी सा लगने लगता है यहाँ तक कि पर्याप्त आय का साधन समाप्त होते ही परिवारीजनों का दृष्टिकोण भी बदलने लगता है। प्रस्तुत व्यंग्य रचना में व्यंग्यकार ने अपने-अपने अनुभवों के आधार पर मुफ्त की सलाह देने वालों के विचारों को बहुत ही तारतम्य से रखा है।

व्यंग्य ‘बर्तन’ में टी.टी.ई. और सिपाही के द्वारा किए गये दुव्र्यवहार के माध्यम से देश में व्याप्त भ्रष्टाचार का अच्छा खाका खींचा गया है। रचना में व्यंग्य एवं हास्य दोनों का पुट समाहित है। घर के पुराने पीतल के बर्तनों को दादाजी द्वारा शहर में जाकर बेचने के लिए कहे जाने पर जब वह शहर कें बाजार में पहुँचता है तो एक सिपाही उससे बर्तनों को चोरी का बताकर थाने में बन्द कर देने की धमकी ही नहीं देता रिश्वत न देने पर उसे थाने में बन्द भी कर देता है। सिपाही का जोरदार डंडा पीठ पर खाने के बाद वह अपने बुद्धिकौशल से कैसे छुटकारा पाता है यह घटना रचना में हास्य की उत्पत्ति भी करती है किन्तु बहुत ही चुटीले और मर्मस्पर्शी रूप में।

हमारे देश में बिना मांगे ही सुझाव देने वालों की बहुतायत है। आपको जरा सी कोई परेशानी हुई नहीं कि सुझावों के भण्डार के साथ शुभचिंतकों की भीड़ लगना शुरू हो जाती है। ‘बाज आये साइटिका के दर्द से’ व्यंग्य रचना के बहाने बहुत ही मनोरंजक ढंग से ऐसे शुभचिंतकों का वर्णन किया गया है।

‘चस्का खालिस दूध का’ में दूध बेचने वालों के विभिन्न हथकंडों और नखरों की सटीक व्याख्या की गई है तो ‘जी हाँ, हम भी लेखक हैं’ रचना में एक लेखक के अन्तर्मन की पीड़ा को अभिव्यक्त किया गया है।

दिनेश पाठक ‘शशि’
“जाँच अभी जारी है” व्यंग्य पर ही पुस्तक का शीर्षक भी रखा गया है जिसमें भ्रष्टाचार की जमकर पोल खोली गई है तो ‘चला मुरारी मंत्री बनने’ में भी सपने के बहाने राजनैतिक भ्रष्टाचार का कच्चा चिट्ठा पाठक के सामने प्रस्तुत किया गया है। चौथी पास फेरी लगाने वाले को राज्य का गृहमंत्री बना देना लोकतांत्रिक प्रणाली पर व्यंग्य नही ंतो और क्या है, “.....आगे अपनी बात जारी रखते हुए बोले-‘अभी कल ही मेरे मुर्दाबाद के नारे लगे, मेरा पुतला जलाया गया, मुझसे विपक्ष वालों ने त्यागपत्र मांगा कि नेत्रहीनों पर लाठी चार्ज किया गया, सरकार जबाव दे। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि नेत्रहीनों पर लाठीचार्ज अत्यन्तशांतिमय औी अनुशासनवद्ध तरीके से किया गया था। मुझ पर आरोप लगाये जाते हैं कि कल तक मैं फेरी वाला था, आज मेरी इतनी मिलें हैं, इतनी जमीन है। यह सब इतनी जल्दी कैसे बना? कुछ लोग मेरा रिष्ता स्मगलरो से बताते हुए कहते हैं कि मंत्री महोदय की पत्नी ने जो हीरे की अंगूठी डाल रखी है, वह स्मगलर द्वारा दी हुई है। मैं स्मगलिंग करने में उनकी सहायता करता हूँ और वे मुझे शेयर देते हैं। यही नहीं सरकार की ओर से बड़े बड़े भवनो, पुलों के निर्माण में जितने बड़े-बड़े ठेके दिए जाते हैं, उन सबमें मेरी पत्ती रहती है।

यह सब बेबुनियाद बातें हैं। आप सोचिए, हम लोग कई लाख लगाकर चुनाव जीतते हैं तो क्यों? ये सब पैसे बसूलना तो हमारा अधिकार है। मेरी लाटरी निकली, चुनाव लड़ा और फिर अपने आप को बेचकर दलबदल करके मंत्री बना।”  (पृष्ठ-76)

‘इलाज नहीं है वहम का’ में वहम करने वालों की आदत के सम्बन्ध में विभिन्न कोणों से प्रकाष डाला गया है। वहीं ‘अभिनन्दनीय हैं-आत्मसमर्पणकत्र्ता’ व्यंग्य रचना में मंत्री, पुलिस और डाकू तीनों के आत्म-प्रषंसा की ललक तथा प्रजातांत्रिक राजनैतिक व्यवस्था का दिग्दर्शन दृष्टव्य है -
“हम आज तक नहीं समझ पाये हैं कि यह आत्मसमर्पण इस देश के नेता या अभिनेता ही क्यों करते हैं?भ्रष्टाचार, हत्या, अपहरण तथा डकैती के मामले में तो अनेक अपराधी होते हैं पर सामान्य अपराधी को तो कभी भी आत्म समर्पण करते हुए नहीं देखा गया, क्योंकि वे न तो नेता होते हैं, न ही अभिनेता और न ही बाहुबली। इसका कारण एक तो षायद समझ में आता है कि यह नेता लोग पूरे हिन्दुस्तान की जनता को यह संदेश देना चाहते हों कि एक सांसद अथवा मंत्री होने के नाते उनके पास पूरे अधिकार हैं कि कोई भी प्रशासनिक अथवा पुलिस अधिकारी उन पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं कर सकता, क्योंकि वे जनता के नुमाइंदे हैं।” (पृष्ठ-85)

‘मुकद्दमा एक कुत्ते पर’ में एक व्यक्ति की जगह मुकद्दमा एक कुत्ते पर कराके लेखक ने हास्य और व्यंग्य की उत्पत्ति की है।

आज के युग में शिक्षा का जो अवमूल्यन हुआ है वह अभूतपूर्व है। अपने तुच्छ स्वार्थ सिद्धि के लिए विश्वविद्यालय के कुलपति आदि डाॅक्टरेट और डी.लिट्. की उपाधियाँ खूब धड़ल्ले से बाँटते देखे जा सकते हैं और उन उपाधियों को प्राप्त करने वाले अपने आप को गौरवान्वित होते देखे जा सकते हैं। लेखक ने इसी प्रकरण को ध्यान में रखते हुए व्यंग्य-”डिग्री डाक्टरेट की” में अच्छा खाका खींचा है-

‘ऐसा कुछ अब मेरे देश में भी होने लगा है। अब आपको विश्वविद्यालय या गाइड सर के इर्द-गिर्द घूमकर अपनी ऊर्जा, पैसा तथा समय नष्ट करने की जरूरत नहीं है। बस एक काम आपको करना है। सोचिए मत किसी भी तरह राजनीति में कूद कर कोई भी शीर्षस्थ पद हथिया लीजिए। किसी भी राज्य का महामहिम राज्यपाल अथवा मुख्यमंत्री बन जाइये। समझिये आप का काम बन गया। कोई न कोई विश्वविद्याालय आपको ऑनरेरी डिग्री प्रदान करने के लिए आपके नाम की सिफारिश कर ही देगा।’ (पृष्ठ-99)

‘बुरे फँसे जाम में’ एक नये विषय पर लिखा गया व्यंग्य है। इस व्यंग्य में कई प्रकार के जाम का वर्णन लेखक ने किया है जैसे यदि कोई दुर्घटना में या पुलिस के द्वारा मारा गया तो शव को सड़क पर रखकर बन्धु-बान्धवों द्वारा लगया गया जाम, नेता जी की कहीं सभा या लोकार्पण का कोई कार्यक्रम हुआ तो सुरक्षा कर्मियों द्वारा जाम, धर्मगुरुओं के खिलाफ सरकार ने जाँच के आदेष दिए तो शिष्यों द्वारा सड़क पर जाम। भिन्न-भिन्न प्रकार के जाम-
‘अब जब उस छोटी-सी सड़क पर, सभी गाड़ियों में एक-दूसरे से पहले मोड़ने के लिए आपस में धक्का-मुक्की चल रही थी, बस जाम महोदय ने वहाँ भी अंगद के पाँव की तरह अपने पाँव जमा लिए थे।’ (पृष्ठ-106)

घर के नजदीक का मोह किसे नहीं होता लेकिन घर के नजदीक अपना ट्रान्सफर कराने के लिए किस-किस की चिरौरी नहीं करनी पड़ती, किस-किस को चढ़ावा नहीं चढ़ाना पड़ता, इन्हीं सब बातों को तारतम्य से परोसा गया है व्यंग्य-‘चक्कर ट्रान्सफर का’ में।

‘यात्रा एक नॉन-स्टाप एक्सप्रेस बस की’ व्यंग्य में लेखक ने एक ऐसी बस का वर्णन किया है जो नॉन स्टाप होते हुए भी हर स्टॉप पर रुकती है और ड्राइवर-कण्डक्टर सवारियों को उनके भाग्य पर छोड़कर ढाबे में मिलने वाले मुफ्त के भोजन का आनन्द लेते हुए यात्रियों के समय के कई घण्टे खराब कर देते हैं।

कुल मिलाकर लेखक द्वारा लिखित व्यंग्य संग्रह ‘जाँच अभी जारी है अपनी सहज सम्प्रेषणीयता, भाषा की प्रवाह और रोचकता के कारण हिन्दी साहित्य जगत में अपनी पहचान बनाने में समर्थ व्यंग्य-संग्रह है।

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