व्यंग्य: स्पीड डेटिंगः नो नमूने प्लीज़!

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

ऐसा कम होता है कि रात में व्यंग्य लिखने का विषय मिले तो खर्राटे बंद हो जाएँ। खर्राटे भरना लिखने से ज़्यादा ज़रूरी है। पर आज नींद नहीं आ रही थी। पास के कमरे से युवतियों की किलकारियाँ आ रही थीं। युवतियाँ ऐसे ही बातें करती हैं, बातें कम, हँसी ज़्यादा। इस वीकऐंड में न्यूजर्सी का यह होटल और आसपास के होटल भारतीय परिवारों से लदे-पड़े थे। अमेरिकी भारतीयों का सम्मलेन चालू होने वाला था। लोग फीस वसूलने के चक्कर में सामान्य से डबल खा गए थे। वे भारी पेट हो कर गहरी नींद का लुत्फ़ उठा रहे थे, बस मैं ही जाग रहा था।

यहाँ हर उम्र वर्ग के अपने समूह और अपनी मस्तियाँ होती हैं। मैं आयोजकों का हिस्सा था। ऑडियो-वीडियो उपकरण टेस्ट कर लिए थे ताकि वे ऐन वक्त पर फुस्स न हो जाएँ। यहाँ सब सभ्य श्रोता थे, प्याज़-टमाटर नहीं लाते थे। वे मानव बम बन कर विस्फोट नहीं करेंगे ऐसा विश्वास था, तो काम-चलाऊ सिक्युरिटी रखी थी। बस श्रोताओं को भारतीय गालियों के साथ अंग्रेज़ी गालियाँ भी आती थीं, और वे इनके लेन-देन में बड़े उस्ताद थे। अंग्रेज़ों को हिंदी-पंजाबी गालियाँ देने का आनंद आप क्या जानें, अपनी गालियाँ आप समझो और ख़ुद हँसे जाओ! आपको हँसते देख अंग्रेज़ भी हँसने लगेंगे। मामला समझे बिना हँसने में आदमी माहिर है।

पास के कमरे से आती बातों में मीटू जैसा कुछ नहीं था। ये पड़ोसनें 'युवा-मिलन' कार्यक्रम से लौटी थीं। मुझे तो अपने बच्चों ने ही समझाया था कि स्पीड डेटिंग कितनी तेज होती है। अच्छा हुआ हमारे जमाने में स्पीड डेटिंग नहीं थी, वरना हम कुँवारे रह गये होते। अपने जमाने में टिंडर ऐप की जगह पंडित ऐप हुआ करते थे, पंडित जी हमारे पीएम की तरह सदा सद्भावना यात्रा पर रहते थे। वे बहुपक्षीय रिश्ते जोड़ने में जादूगर थे। उन दिनों करोलबाग रिश्तों ही रिश्तों से आबाद रहता था। कुआँरा आदमी करोलबाग में घुसे तो गले में पट्टा बंधवा कर ही आता था। उन दिनों भले स्पीड नहीं थी, डेटिंग नहीं थी पर रिश्ते टिकाऊ थे। अनायास बच्चे हो जाते थे तो संबंध सीमेंट से जुड़ जाते थे। अब स्पीड डेटिंग का जमाना है। स्पीड इतनी फास्ट है कि लोग नाम की बजाय कोड नंबर बोलते हैं। युवतियाँ, नापसंद युवकों को चंपू कहती हैं और पसंद युवकों को बेबी कह रही हैं। युवक बड़े कन्फ्युज़ हैं, वे फालतू बनें या पालतू। 

स्पीड डेटिंग में मार्के की बात सामने आई। पढ़े-लिखे युवक दोस्ती बढ़ाने में ढीले होते हैं, वे अन्य युवकों से भी मेलजोल बढ़ाने में झेंपते हैं। उनको परिचित कराना हो तो आइसब्रेकिंग सेशन करना पड़ता है। बर्फ़ टूटती है फिर पिघलती है तब लड़के हाँ-हूँ करने लगते हैं। जबकि युवतियाँ, अन्य अपरिचित युवतियों से भी ऐसे मिलती हैं जैसे कक्षा पहली से वे एक ही टेबल पर साथ बैठ रही हों। लड़कियाँ युवा-मिलन की समीक्षा करते हुए खिलखिला रही थीं। उनके अनुसार लड़कों का कोई स्टैंडर्ड नहीं था। टिंडर पर एक से एक गधे भरे थे, वे सब यहाँ थे। सब मम्मा बॉय थे। मम्मियाँ यहाँ नहीं थीं तो वे बिना चाभी के खिलौने जैसे खड़े थे।

एक युवती कल की क्रूज़ के लिए रजिस्ट्रेशन करा आई तो सहेली ने पूछा, वाह अकेले-अकेले क्रूज़ पर! क्यों, लहरें गिनने का ठेका मिला है क्या?  सहेली बोली - स्पीड डेटिंग में मज़ा नहीं आ रहा। लगता है, लड़कों में जेनेटिक गड़बड़ है। आज जो चश्मेबद्दुर मिले वो मोबाइल चिपकू मिले। एक तो हाथ मुझसे मिला रहा था पर नज़रें मोबाइल पर टिकी थीं। मैंने उससे वहीं कह दिया, भाई साहब आप आईफ़ोन से ही डेट करो। दूसरी सहेली बोली - मुझे आईफोनिया तो नहीं मिला, पर फेसबुकिया मिला था। मैंने नाम बताया तो उसने वॉइस कमांड से मेरी प्रोफाइल ढूँढ ली और कहने लगा मैं आपको बुकमार्क कर लेता हूँ। मैंने पूछा, आपको बुकमार्क करने के अलावा और क्या आता है? वह बेचारा इस कठिन प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाया।

लड़कियाँ स्पीड डेटिंग से निराश थीं। पहली कहने लगी मैं तो फीडबेक में लिखने वाली हूँ, नो नमूने प्लीज़! फर्स्ट टाइमर्स के लिए कोई एटिकेट कोर्स रखना चाहिए, स्पीड डेटिंग में कुछ तो सेंस हो। लड़के हमसे इस तरह मिल रहे थे जैसे वे फ्री में डाउनलोड होने वाले मोबाइल के ऐप खोज रहे हों। दूसरी सहेली उसे सांत्वना देने लगी - कल फिर से ट्राय करेंगे, दिल छोटा न कर। वे कल की योजनाएँ बना रही थीं और मैं एटिकेट कोर्स लिखने लगा था।   
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