काव्य: देवकरण गंडास 'अरविन्द'

देवकरण गंडास 'अरविन्द'
नारी

जिसकी कोई थाह नहीं, जिसका व्यक्तित्व अपार है,
सागर से भी गहरी है वो, उसका अनंत ही विस्तार है,
तीनों लोक समेट ले जो अपने ममता भरे आँचल में
वो ईश्वर की नायाब कृति, उसको प्रणाम बारम्बार है।

है वो सहनशीलता की प्रतिमूर्त, वो प्रेम का आगार है,
है उसके बिना सृष्टि अधूरी और जगत भी निराधार है,
अपना सब कुछ न्यौछावर कर दे बिना किसी चाह के
ख़ुदा भी उसको नतमस्तक है, नतमस्तक ये संसार है।

दया, धर्म, शील, त्याग और स्नेह जिसके हथियार है,
वसुंधरा के जैसे उर्वर है वो, उसमें गुणों की भरमार है,
जिसकी गोद में खेलती हैं प्रलय और सृजन की शक्ति
कुछ लिख पाया अरविन्द उसको, शारदे का उपहार है।
***

गर रिश्तों का संसार न होता

किसके संग हँसते, किसके संग रोते
यहाँ हँसना और रोना दुश्वार ही होता
यह मनमोहक धरती सूनी सी लगती
गर यहाँ पर रिश्तों का संसार न होता।

हम किसे पुकारते माँ और बाबूजी
फिर जग में कोई तारणहार न होता
और दादा-दादी, चाचा-चाची के बिन
बचपन में खेल-कूद उपहार न होता।

नहीं होता भाई बहन का प्यारा बंधन
कोई तीज त्योहार खुशगवार न होता
नहीं होती फिर कोई प्रियतमा तुम्हारी
और दिल में तुम्हारे कोई प्यार न होता।

कहाँ मिलते दोस्त भाई से प्यारे तुम्हें
फिर जीवन में कोई दिलदार न होता
अभी जिसके नाम से धड़के है दिल
फिर उस महबूबा से इकरार न होता।

बन जाता फिर मानव भी पशु समान
रहता भटकता, कोई घर बार न होता
यह मनमोहक धरती सूनी सी लगती
गर यहाँ पर रिश्तों का संसार न होता।

प्राध्यापक इतिहास, राजस्थान शिक्षा विभाग
चलभाष: +91 963 685 2604

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