बासन्ती होली (गीत)

दुर्गेश कुमार चौधरी


ढोल मजीरा झाल औ' झांझर
मिलकर चलो बजायें हम,
फिर आया फागुन का महीना 
मिलकर फाग मनायें हम।

जंगल देखो लहक रहा है
अपनी तपिश मिटाने को,
रंग-बिरंगे कुसुम झूमते
हिलमिल गले लगाने को;
सिखिकुल जैसे पंख खोलकर
आओ नाचें-गायें हम।

फिर आया फागुन का महीना 
मिलकर फाग मनायें हम।

खेतों में गेहूँ की बाली
बागों में अमराई हो,
धरती ने पीताम्बर ओढ़ी
छाई है तरुणाई हो;
किरणों से है भरा सरोवर
चलकर चलो नहायें हम।

फिर आया फागुन का महीना 
मिलकर फाग मनायें हम।

धूम मचायें गलियों में 
हाथों में रंग-गुलाल हो,
भेद मिटायें धरती से 
मन में न कोई मलाल हो;
इंद्रधनुष-सी छटा सभी के 
मुख पर चलो खिलायें हम।

फिर आया फागुन का महीना 
मिलकर फाग मनायें हम।

दुश्मन के भी घर जाकर
हम उसको गले लगायें हो,
राम-कृष्ण की इस धरती से
समरसता सिखलायें हो;
धरती के संग रंग उड़ायें
बासन्ती हो जायें हम।

फिर आया फागुन का महीना 
मिलकर फाग मनायें हम।

सेतु, फ़रवरी 2020

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