कामकाजी महिलाएँ: दोहरा शोषण

- उर्मिला कुमारी


  वर्तमान में नारी जागरण के कारण स्त्री जीवन और जगत में कई परिवर्तन आए हैं। प्रकृति प्रदत्त स्त्री-पुरुष में जो विषमता है उसे पुरुष ने विषमतम बना दिया है। आज नारी जीवन एक साथ कई भूमिकाओं को वहन करने के कारण अत्यंत तनाव ग्रस्त और सूची दे हो गया है जिससे उनके अस्तित्व पर ही संकट गहराने लगा है।

      बदलते वक्त में स्त्रियों में शिक्षा और रोजगार की संभावनाओं में बढोतरी हुई है। जिससे उन्हें आर्थिक, शैक्षिक एवं सामाजिक रूप से सशक्त बनाकर उनकी स्थिति सम्मानजनक बनाया है। किंतु इन सबकी बड़ी भारी कीमत स्त्रियों को चुकानी पड़ रही है। इन सबके बावजूद उनकी घरेलू दायित्व में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। उन्हें घरेलू कामकाज के अलावा अपने बाहरी दायित्व का भी निर्वहन करना पड़ रहा है। उन्हें घर और कार्यक्षेत्र के मध्य सामंजस्य बिठाने में अतिरिक्त श्रम करना पड़ता है। उनकी स्थिति दो नावों पर सवार व्यक्ति सरीखे हो गया है। आठ घंटे की नौकरी एवं आने-जाने में कम से कम 2-3 घंटे के बाद उनकी थकान का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

       "रोजगार के हर क्षेत्र में महिलाएँ पुरुषों का वर्चस्व तोड़ रही हैं। खासकर व्यवसायिक शिक्षा प्राप्त महिलाओं के काम का दायरा बहुत बढ़ा है। लेकिन कामयाबी के बावजूद परिवार से जो सहयोग उन्हें मिलना चाहिये वह नहीं मिल रहा।" 1

कामकाजी स्त्रियों और कामकाजी पुरुषों के जीवन में गहरा अंतर दिखाई पड़ता है। घर में पुरुष सुबह उठकर तैयार होकर आफिस पहुंचता है तथा आफिस के बाद शाम को घर आता है। सुबह के नाश्ते से लेकर रात के खाना तक में उसकी कोई भूमिका नहीं होती। वहीं दूसरी तरफ एक महिला सुबह बच्चों को तैयार कर स्कूल भेजने से लेकर रात के खाने व रसोई व घर की सफाई तक की जिम्मेदारी निभाती है। यह तो उसका मूल कर्तव्य समझा जाता है। आफिस का काम और उससे संबंधित परेशानियों एवं थकान के बारे में किसी का ध्यान नहीं जाता। एक प्रकार से देखा जाय तो एक कामकाजी महिला की छवि की कल्पना बिल्कुल एक ऐसी स्त्री की उभरती है जिसके कई हाथ हैं और प्रत्येक हाथ से वह कई प्रकार के काम-कपड़े धोती, बर्तन साफ करती, खाना बनाती, बच्चों की देखभाल करती, बाजार के काम निपटाती तो कहीं नौकरी से जुड़े अन्य कार्य करती दिखाई पड़ता है। ये तस्वीर क्या सचमुच स्त्री-सशक्तीकरण की वास्तविक तस्वीर है या स्त्री-जीवन की कड़वी सच्चाई की तस्वीर? कामकाजी महिलाओं पर काम का दोहरा बोझ उनके जीवन को जटिल बना रहा है।

       हमारे समाज में ऐसी रूढ़ीवादी मान्यता है कि भले घर की महिलाएँ काम पर नहीं जाती हैं। किंतु आज परिवर्तित मूल्य एवं आर्थिक पहलू को देखते हुए बहुत सी महिलाएँ नौकरी करने लगी हैं। नौकरी पेशा स्त्रियों के चरित्र को लेकर परिवार व समाज जब -तब सवाल उठाते रहते हैं। उनकी कमाई पर स्वयं उनको अपनी मर्जी से खर्च करने का भी अधिकार नहीं होता। दूसरी तरफ यह भी कहा जाएगा कि औरतों की कमाई से घर थोड़े ही चलता है। उनके द्वारा किये गए घरेलू कामों का भी महत्व नहीं आंका जाता है। परिवार वालों को यह लगता है कि उनके द्वारा किये गए घरेलू कामों का कोई आर्थिक योगदान नहीं है। सामाजिक तौर पर घरेलू कार्य करना उनका मुख्य दायित्व है।

       "भारत विकास रिपोर्ट-2017 में विश्व बैंक ने सुझाव दिया है कि अर्थव्यवस्था में अधिक महिलाओं की भागीदारी से देश में दोहरे अंक की वृद्धि सुनिश्चित की जा सकती है। विश्व बैंक के रिपोर्ट के अनुसार हम महिलाओं की सुरक्षा और उनके सशक्तीकरण की बातें क्यों न करें, मगर सच्चाई यह है कि 21वीं शती के भारत में महिलाओं की स्थिति में खास परिवर्तन नहीं आया है। भारत में उन महिलाओं को ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ता है, जो घर से बाहर निकलकर नौकरी करती हैं। सार्वजनिक स्थानों में यौन-उत्पीड़न का सामना करना पड़ताहै। वे हिंसा की भी शिकार होती हैं।" 2

        बदलते समय में जहाँ एक ओर स्त्रियाँ नौकरी कर बड़े-बड़े पदों को संभाल रही हैं , दूसरी ओर घर को भी सुचारू रूप से संभालने की जिम्मेदारी अकेले उन्हीं के कंधों पर होती है। घर और कार्यस्थल में सामंजस्य स्थापित करने के क्रम में असफल होने पर ये तनाव ग्रस्त रहने लगतीं हैं। घर का पुरुष अगर काम से आता है तो उसके लिए चाय और पानी तुरंत हाजिर होता है किन्तु वहीं घर की महिला नौकरी से वापस घर आ आए तो उसके प्रति यह भाव नहीं रहता। उसे जो चाहिए स्वयं बना कर लेना पड़ता है। हम चाहे कितना भी आधुनिकता का दंभ भर लें, ये दोतरफा व्यवहार बदल नहीं पा रहा।

     साठोत्तरी या आधुनिक हिन्दी कथा-साहित्य मे लेखिकाओं ने कामकाजी महिलाओं की व्यथा को उकेरा है। जिसमें साठोत्तरी लेखिका मन्नू भंडारी ने नौकरी शुदा स्त्रियों की दोहरी जिंदगी को अपने कथा-साहित्य- 'नई नौकरी', 'आपका बंटी',' स्त्री- सुबोधिनी', 'आकाश के आईने में', आते-जाते यायावर' आदि रचनाओं में कामकाजी स्त्री की मनोदशा और त्रासदी का यथार्थ चित्रण किया है।

कामकाजी महिलाओं के मामले में घर के साथ-साथ कार्यस्थलों पर भी भेदभाव होता है। "ऑनलाईन करियर एण्ड रिक्रूटमेंट सलूशन प्रोवाइडर मॉनस्टर इंडिया के अनुसार पुरुषोंकी तुलना में महिलाओंका वेतन 27 प्रतिशत कम है। जहाँ पुरुषों की औसत वेतन 288.85 प्रतिशत रूपये प्रतिशत रूपये प्रतिघंटा है।"

आज प्रत्येक क्षेत्र में महिला व पुरुष कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। चाहे वह शहर की बड़ी कंपनियाँ हो या गाँव की मजदूर महिलाएँ। सभी जगह महिलाओं से मेहनताने पर काम लिया जाता है। यही नहीं उन्हें काम भी जल्दी नहीं मिलता। देश में सर्वे करने वाली संस्था, नेशनल सैंपल सर्वे आफिस (एन.एस.एस.ओ.) की रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुषों को महिलाओं की अपेक्षा 56 प्रतिशत ज्यादा दिहाड़ी मिलती है, जबकि 1961 के पारिश्रमिक अधिनियम के अनुसार महिला और दोनों को समान वेतन का नियम है।

कई बार महिलाओं को करियर एवं घरेलू जिम्मेदारी में संतुलन न बिठा सकने के कारण उन्हें नौकरी छोड़नी पडती है जिससे वो तनाव में रहने लगतीं हैं। उच्च शिक्षित या हुनरमंद होने के बावजूद परिवार में सहयोग की कमी से वे कुंठाग्रस्त रहने लगती हैं। पुरुषों की मानसिकता में आज भी कोई परिवर्तन नहीं आया है। उन्हें लगता है कि पैसा कमाना उनका काम है, घर के काम में सहयोग करना नहीं। अगर महिला अतिव्यस्तता की शिकायत करे तो उसे यह सुनना पड़ता है कि उसने काम अपने शौक से शुरू किया था किसी के कहने पर नहीं। पुरुष को शायद यह नहीं पता कि स्त्री शौक के लिए काम न कर अपनी पहचान और प्रतिभा को सम्मान दिलाने के लिए काम करती है। जिस प्रकार आज महिलाएँ पुरुषों की भाँति सभी क्षेत्रों और विभिन्न सामाजिक गतिविधियों में भागीदारी निभाती नजर आ रही है उसी प्रकार पुरुषों को भी उनके गृहकार्य में हाथ बटाना चाहिए। अतः यह आवश्यक है कि माताएँ अपने बेटों को घरेलू कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करें। जिससे बड़े होकर उन्हें यह काम करने में कोई झिझक न हो।

"सदियों से सामाजिक व्यवस्था पुरुषोन्मुख रही है। परिवर्तित स्थितियों में संस्कारग्रस्त कामकाजी महिला पुरुष की प्रधानता नकार नहीं पाती। जहाँ कहीं भी नारी ने संस्कारों से मुक्ति पाने का प्रयास किया है, नवीन मूल्यों को स्वीकार किया है, वहाँ उनका जीवन अपेक्षाकृत संक्रांत और दूभर हुआ है। पत्नी के रूप मे कथित दायित्व को न निभा पाने के कारण कामकाजी महिला को पति से उपेक्षा और प्रताड़ना, तिरस्कार और अवमानना सहनीय पडती है। ... घर में उसे सेवा, त्याग, करूणा एवं सहनशीलता, पत्नी और माता की भूमिका निभाने होती है तो कामकाज में प्रतियोगी और सहयोगी पुरुषों की अखंडता, असभ्यता और शारीरिक शोषण के अस्तित्वग्रस्त संकट से लड़ना होता है।" - 4

कामकाजी महिलाएँ परिवार और समाज की असंवेदनशीलता से पीड़ित हैं। वे दिनरात अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने में लगी हुई हैं। आज स्त्रियाँ प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों के वर्चस्व को तोड़कर स्वयं को स्थापित कर रही हैं। वे शिक्षा, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, कानून, व्यवसाय, खेलकूद, कला, सेना, अंतरिक्ष आदि क्षेत्रों में अपना उल्लेखनीय योगदान दे रही हैं। किन्तु इन सारी उपलब्धियों के बावजूद उन्हें परिवार से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पा रहा है। घर से आफिस और वहाँ से घर पहुँचने के क्रम में आए दिन उन्हें नाना प्रकार के समस्याओं का सामना करना पड़ता है। सार्वजनिक स्थलों एवं कार्यस्थलों पर होने वाले यौन-उत्पीड़न से हम वाकिफ हैं। हाल ही में दिसंबर 2019 में हैदराबाद में कार्यस्थल से लौट रही एक पशु चिकित्सक प्रियंका रेड्डी के साथ बलात्कार कर क्रूरतापूर्वक जलाकर मार डालने की घटना से पूरे देश की जनता आंदोलित हो उठी थी।

स्वास्थ्य समस्या:
"कारोबारी संगठन एसोचैम (Assocham) द्वारा किए गए सर्वे से पता चलता है कि मां बनने के बाद अधिकतर महिलाएँ नौकरी छोड़ देती हैं। ... स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार आफिस और घर संभालने की दोहरी जिम्मेदारी के कारण तनाव बढ़ता है और बीमारियाँ पैदा होती हैं। अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने के चक्कर में महिलाएँ अक्सर अपनी सेहत को नजरअंदाज करती हैं। आँकड़ों की मानें तो 78 फीसदी कामकाजी महिलाओं में दिल की बीमारी का जोखिम तेजी से बढ़ रहा है।" -5

प्रोफेसर अर्चना सिंह का मानना है कि कामकाजी महिलाओं की स्थिति 'दो नावों में सवार' व्यक्ति सरीखी होती है क्योंकि एक तरफ उन्हें 'आक्युपेशनल स्ट्रेस' झेलने पड़ता है तो दूसरी तरफ उन्हें घरेलू मोर्चे पर परिवार को खुश रखने की दायित्व भी निभाना पडता है। ऐसे में वे स्वयं के स्वास्थ्य को नजरअंदाज कर जाती हैं। डा.दिशा शुक्ला के अनुसार देश में महिलाओं में 'पाॅलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम' यानि पीसीओडी की शिकायतें बढ रही हैं जो ज्यादातर कामकाजी महिलाओं में पायी जा रही है। इससे महिलाओं में इनफर्टिलिटी की समस्या उत्पन्न होती है। घर और नौकरी में तालमेल बिठाते-बिठाते वे तनाव का शिकार हो रही हैं। यही कारण है कि बड़े शहरों में कामकाजी महिलाएँ घर व काम के मध्य माँ बनने में झिझक रही हैं या फिर दूसरे बच्चे को जन्म नहीं देना चाहतीं। आज पढी लिखी स्त्रियों की संख्या में वृद्धि हुई है किन्तु नौकरी करनेवाली की संख्या कम है। नौकरी पर जाने के कारण महिला मातृत्व धर्म को पूरी तरह नहीं निभा सकने की स्थिति में स्वयं को दोषी मान अपराध बोध से ग्रसित होती है।

आज नारी "आर्थिक दृष्टि से यद्यपि आत्मनिर्भर हुई है। फिर भी परिवार से वह पुरी तरफ बंधी हुई है। कामकाज की शुरुआत वह समय बीतने अथवा अपनी शिक्षागत योग्यता के सामाजिक उपयोग के उद्देश्य से करती है किन्तु धीरे-धीरे उसकी नौकरी परिवार की आवश्यकता बन जाती है। ऐसी स्थिति में जो लड़कियाँ विवाह नहीं कर पाती मानसिक घुटन, कुंठा और आक्रामक, असुरक्षा, विद्रोह आदि भावनाओं का शिकार हो जाती हैं। कार्यक्षेत्र में प्रतियोगी, सहयोगी जैसे पुरुषों के व्यंग्य, उपहास एवं बदनाम व्यवहार की चुनौतियों का सामना करती हैं।" -6

यौन-उत्पीड़न की शिकार: 
समस्त विश्व में कामकाजी महिला यौन उत्पीड़न का शिकार हो रही हैं। हॉलीवुड में फिल्म निर्माता हार्वी वाइनस्टीन को लेकर बहुत से कलाकारों ने आवाज उठायी थी। जिसके बाद भारत में भी कई अभिनेत्रियों ने यौन उत्पीड़न की बात कही। इस घटना के बाद पूरी दुनिया में महिलाओं ने मीटू (#Me Too) के माध्यम से अपनी आपबीती बताकर यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठायी। साधारणतया कामकाजी स्त्रियों को सेक्स के बदले फायदा देने का वादा कर उनका शोषण किया जाता है। कई बात पीड़ित की शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जाता है। उत्पीड़न महिला के काम पर असर डालता है। वह प्रायः अवसाद और सदमे की शिकार हो जाती है। शिकायत करने पर धमकी, अपमान, कभी-कभी उन्हें नौकरी से भी हाथ धोना पड़ता है। "यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम दफ्तर का का माहौल काम करने लायक बनाएँ। जिससे लोग सम्मान के साथ काम करे सकें। उनके मानवाधिकारों का हनन न हो। कर्मचारियों को इसके लिए वक्त- वक्त पर ट्रेनिंग दी जानी चाहिये।" -7 भारत सरकार ने महिलाओं का कार्यस्थल में होनेवाले यौन हिंसा से जुड़े मामले में दोगुनी वृद्धि दर्ज की गई है।

दुर्भाग्यवश कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न कामकाजी महिलाओं के लिए एक आम समस्या है। कार्यस्थल पर कामकाजी महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न के सबसे ज्यादा मामले बिहार में होते हैं। दूसरे स्थान पर दिल्ली और तीसरे पर महाराष्ट्र है। चौथे और पाँचवे स्थान पर तेलांगाना और कर्नाटक है। यौन-उत्पीड़न के अंतर्गत किसी प्रकार का अस्वीकार्य शारीरिक संपर्क, माँग का अनुरोध, अनुग्रह अथवा झुकाव के रूप में यौन प्रवृत्त व्यवहार, यौन रंजित टिप्पणी, दिल्लगी, अश्लील साहित्य दिखाना, यौन प्रवृत्ति का कोई अन्य अस्वीकार्य शारीरिक, मौखिक अथवा गैर मौखिक आचरण शामिल है।

"आज जिस ढंग से मीडिया आम आदमी की चेतना की चेतना की छवि लगातार एक ' सेक्सी वस्तु ' के रूप में प्रक्षेपित करता जा रहा है, इसका कहीं न कहीं घर या दफ्तर में पुरुषों के व्यवहार में असर तो होगा ही। व्यावसायिक हितों के कारण एक ओर हम इसे रोक नहीं, तो दूसरी ओर हम चाहते हैं कि हमारे घर में पारंपरिक मूल्य मर्यादा बरकरार रहें - यह कैसे संभव है?"- 8 स्त्रियों का यौन उत्पीड़न एक कानूनी मामला न होकर सामाजिक मामला है।

आधुनिक कार्यशील महिला दोहरा दायित्व निभा रही है। परंतु पुरुष कार्यशील स्त्री के साथ सहयोग नहीं कर पा रहा। फलतः ऐसी स्त्रियों को शारीरिक व मानसिक प्रताड़नाएँ सहन करना पड़ रही हैं। परिवर्तन के इस चुनौतीपूर्ण दौर में आधुनिक कार्यशील महिला संघर्षरत है। अपने कार्यक्षेत्र और घर के बीच सामंजस्य बिठाने हेतु उसे निरंतर अथक परिश्रम करना पड़ रहा है। पति-पत्नी जीवन रूपी गाड़ी के दो पहिये स्वरूप हैं। दोनों को संतुलन व समानता के साथ आगे बढ़ना है। अगर पति व परिवार के अन्य सदस्य भी घर की जिम्मेदारी आपस में बाँट लें तो स्त्रियों का दोहरा बोझ कुछ कम हो सकता है। जिससे एक सुखमय जीवन का निर्माण हो सकता है। देश की अर्थव्यवस्था में स्त्रियों की भागीदारी तभी सुनिश्चित किया जा सकता है। तभी हम आर्थिक रूप से महिला सशक्तीकरण का सही स्वरूप निर्मित कर पाएँगे।


संदर्भ संकेत:
1- www.dw.com, लेखक - विश्वरूप श्रीवास्तव, 8 मार्च 2016, दोहरा बोझ झेलते रही हैं कामकाजी महिलाएँ।
2- inbreakthrough.org, 22 दिसम्बर 2017, महिला सशक्तीकरण या महिलाओं पर काम का दोहरा बोझ।
3- goaconnection.com, दोहरे बोझ तले दबती... महिलाएँ तनाव का हो रही हैं शिकार, शृंखला पाण्डेय, 21 दिसम्बर 2017
4- नारी एक सफर, दिनेशनंदिनी डालमिया / संतोष गोयल, पृ°- 126.
5- inbreakthrough.org, महिला सशक्तीकरण या महिलाओं पर काम का दोहरा बोझ, 27 दिसम्बर 2017.
6- नारी एक सफर, दिनेश नंदिनी डालमिया/संतोष गोयल, पृ॰- 127.
7- www.bbc.com,दफ्तरों में यौन उत्पीड़न से कैसे लड़ें महिलाएँ, अफरोदिति पिना, केंट विश्वविद्यालय, 16 नवम्बर 2017.
8- fowardpress.in, कामकाजी महिलाओं का यौन उत्पीड़न, अरविंद जैन, 22 जुलाई 2019.


उर्मिला कुमारी, चलभाष -+91 809 246 9033
सहायक प्राध्यापक, अन्नदा कॉलेज, हजारीबाग - झारखंड; पिन - 825301, पी - एच.डी. (जारी), नेट - उत्तीर्ण, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सेमिनारों में आलेख प्रस्तुति, आकाशवाणी से समय-समय पर वार्ता प्रसारित।

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