'अजमल' कितना सच्चा, कितना झूठा

अरुण कुमार निषाद
अरुण कुमार निषाद

भले ही कोई यह कहे कि अजमल की शायरी में प्रेम नहीं है या स्वयं अजमल का यह कहना कि उनकी कोई महबूबा नहीं है। मुझे कहीं न कहीं झूठ सा लगता है। जरूरी भी नहीं कि लेखक अपने पाठकों को अपने निजी जीवन के हर पहलू से रूबरू कराएँ।

लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और संस्कृत के सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. रामसुमेर यादव कहते हैं कि-“किसी भी रचनाकार को समझने के लिए उसकी जमीनी सतह तक जाना पड़ेगा तभी हम उस रचना का वास्तविक का आनंद उठा पाएँगे।”

प्रो. राहत इंदौरी का भी यही मानना है वह कहते हैं कि- “अगर शायर आशिक मिजाज नहीं है तो वह शायरी नहीं कर सकता।”

अजमल की शायरी इस गीत को समझने के लिए मैं कई बार उनसे मिला और उनसे मिलकर जो मैंने महसूस किया वह उनके पाठ को तक पहुँचाने का प्रयास कर रहा हूँ। जो अजमल नायिका के लवों रूखसार की बात करता हो, जुल्फों की बात करता हो, उसने प्रेम न किया हो असंभव सा लगता है। प्रेम के परिणिति हो पाई या नहीं यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता। पर अजमल की कोई नायिका न हो ऐसा नहीं हो सकता।
तुम्हारी जुल्फ के निकली बात देखा भीग चली थी रात।
लवों रुख़सार का आया जिक्र तो रुख़सत तारों की बारात।
तो मैंने गीत लिखा है।।

अजमल की नायिका ने उन्हें कभी न कभी धोखा दिया होगा, तभी अजमल के हृदय से आवाज आई थी।
इस नगरी की रीत यही है, ये नगरी बेप्यार यहाँ कोई मीत नहीं।
इस नगरी में बसने वाले, सब मतलब के यार, यहाँ कोई मीत नहीं।

अजमल अपनी नायिका से कहते हैं कि ठीक है कि तुम मुझको याद नहीं करोगी लेकिन जब सावन में झूला पड़ेगा और तुम्हारी सखियाँ जब अपने प्रियतम के साथ होगी तो कहीं न कहीं तुमको मेरी याद अवश्य आएगी।
कजरिया तीज का त्योहार मनाएगा सारा संसार।
चढ़ेगी जब झूले की पेंग नीम की लचकेगी  जब डार।।
तो मुझको याद करोगे

अजमल की नायिका ने भी अजमल को कभी न कभी अपनी मजबूरी बताया था कि वह उनसे विवाह नहीं कर सकती।
तुम ग़म में मेरे बरबाद ना हो, अपना संसार बसा लेना
चाहत की कसम देती हूँ तुम्हें, तुम अपना ब्याह रचा लेना है
इतनी अरज सरकार
मगर मैं कैसे तुम्हें समझाऊँ
निर्दोष है अपना प्यार।

जो अजमल अपनी प्रेमिका को गले लगाना चाहत हो, वह बिना प्रेम किये कल्पना से परे है।
और आ जाओ करीब और करीब और करीब
और एक बार मैं  सीने से लगा लूँ तुमको।

जो अजमल किसी की मरमरी बाहों का सहारा चाहता हो वह क्या बिना किसी के प्यार में डूबे संभव है?
फिर मुझे मरमरी बाहों का सहारा दे दो
फिर मेरी नाव भंवर में है कनारा दे दो।

अजमल कहते हैं कि- तुम्हारी याद ने मुझे इतना परेशान कर दिया है कि- अब तो मुझे नींद भी नहीं आती और रह-रहकर मेरा दिल घबराता है।
याद सताए नींद न आए वह भी इतनी रात गए
नींद न आए जी घबराए वह भी इतनी रात गए ॥

गेसुओं की काली रात में अजमल जुगनू तक जगमगा देते हैं।
तेरे गेसुओं की रात में जुगुनुओं के फूल खिल गए
तेरी रहगुजर की धूल से कहकशाँ मुरीद हो गए ॥

एक चाहत या आरजू होती है जो हर इंसान को जिंदा रखे होती है। प्रेम ही एक ऐसी शक्ति है जिसके बल पर आदमी वर्षों जीवित रख सकता है।
मुझे रक्खा है जिंदा तेरी हसरत ने यहाँ वरना
खुदा बेहतर समझता है कि मैं अब तक कहाँ होता।।

जो अजमल जुल्फ के साए में प्रलय (हश्र) में भी सोना चाहता है वह किसी से प्यार किए बिना संभव नहीं है।
साए में उनकी जुल्फ के नींद आ गई मुझे
कह दो कि हश्र तक न जगाए कोई मुझे ॥

अजमल का सामना भी कभी-न-कभी किसी बेवफा से हुआ है। तभी तो वह कहते हैं -
उनके वादों का ऐतबार भी क्या
कब बदल जाएँ क्या ठिकाना है।।

और भी-
जालिम ने नजर फेर लिया मेरी तरफ से
क्या बात है क्यों तीर निशाने से खफा है।।

जो अजमल महबूबा की कातिलाना अदा पर फिदा हो। वह बिना प्रेम किये कैसे संभव है।
हर अदा है जानलेवा उस सरापा नाज की
किस के बारे में कहें 'अजमल' कि कातिल कौन है।।

अजमल कहते हैं कि अगर नायिका अपने 16 श्रृंगार करके सामने पड़ तो बड़े-बड़े सूरमाओं का कद भी उसके सामने बौना हो जाता है।
न टिक सकेगा फलक पर कोई सितारए सुब्ह
वह बन संवर के अगर बाम पर गए होंगे।।

स्त्री और पुरुष एक सिक्के के दो पहलू हैं। एक के बिना दूसरा अधूरा है। अजमल साहब कहते हैं कि – मेरी प्रेयसी ने जब से मेरे घर में कदम रखा है। मेरी दुनिया ही बदल गई।

सितारे मुस्कुराए मेरी दुनिया जगमगा उठी
वह जिस शब चाँद बनकर मेरे जुल्मतखाने में आए।।

और भी-
मैं सारी दुनिया की नजरों से गिर गया होता
मगर तुम्हारी नजर ने मुझे संभाला था।।

अजमल की निगाह में वे दोनों कातिल हैं जो नजर से घायल करते हैं और जो खंजर से घायल करते हैं। स्पष्ट है कि अजमल भी किसी की नजर से कभी-न-कभी घायल हुए रहे होंगे।
वह नजरों से कत्ल करें या खंजर से
कातिल हर सूरत में कातिल होता है।।

निष्कर्ष- इनकी नज्मों, गीत और ग़ज़लों का अध्ययन करने के पश्चात यह बात पूर्ण रुप से स्पष्ट हो जाती है कि अजमल ने किसी से बेइंतहा मोहब्बत की थी। और उन्होंने यदि संयोग के दिन देखें है तो वियोग के दिन भी देखें हैं। उन्होंने वफा भी देखी है बेवफाई भी।

अजमल सुल्तानपुरी का जीवन-परिचय 

जन्म: सन्‌ 1926 ई. के आस-पास हुआ है। चूँकि शिक्षा किसी पाठशाला में नहीं हु़ई, इसलिए इस सम्बन्ध में कहीं कोई लिखित रिकार्ड उपलब्ध नहीं है। (जो अजमल साहब ने डॉ.अरुण कुमार निषाद को बताया था) जन्म स्थान- सुल्तानपुर जिले के कोड़वार (कुड़वार) रियासत के हरखपुर गाँव में हुआ। यह शहर से पश्चिम 12 किमी पर है।

मृत्यु: 29 जनवरी 2020

पिता का नाम: मिर्जा आबिद हुसैन बेग
पुत्र: शायर अशरफ बेग एडवोकेट उर्फ अनवर सुल्तानपुरी
पौत्र: शायर मोहम्मद तारिक अजमली

रचनाएँ:
1.‘सफ़र ही तो है’ 2. झुरमुट, 3. खुर्शीदे अरब, 4. जलव ए हरम, 5. मेहमाने अर्श, 6. दायरे हरम, 7. रुहे कायनात, 8. रुहे तबस्सुम, 9. परचमे नूर, 10. पवन संदेश, 11. नूरे मुजस्सिम, 12. बहारे तैबा, 13. राहे नजात, 14. नगमाते अजमल, 15. जज्बाते अजमल, 16. जन्नत का नगमा आदि।

1 comment :

  1. विचारपूर्ण आलेख . यह तो सच है कि शायरी हो या कविता , कहीं न कहीं उसके पीछे प्रेम तो होता ही है .

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