पुस्तक विमर्श: ‘आश’ की आस निरास न भई

- विनोद नागर



पुस्तक शीर्षक: पाँच से पचहत्तर तक 
लेखक: हरेराम वाजपेयी ‘आश’
ISBN: 978-81-937762- 2-3  
पृष्ठ संख्या: 198
प्रकाशक: हिन्दी परिवार, इन्दौर  


आमतौर पर अपने दैनंदिन जीवन की यादों को सहेजने के लिए लोग डायरी लिखते है। इस अच्छी आदत का लाभ तब सामने आता है जब पकी उम्र में याददाश्त कमजोर पड़ने से इंसान को अतीत में झाँकने में कठिनाई होने लगती है। फ़्लैश बैक में अपनी ही तस्वीर धुंधली नज़र आने पर दशकों पूर्व लिखे डायरी के पन्ने समय की गर्द साफ़ करने का काम करते हैं। लेकिन डायरी के पन्नों में लिखी विगत को जस का तस छाप देने भर से प्रकाशित पुस्तक आत्मकथा की श्रेणी में नहीं आ जाती। इन्दौर की श्री मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति के साहित्य मंत्री हरेराम वाजपेयी ‘आश’ की सद्य प्रकाशित आत्मकथा ‘पांच से पचहत्तर तक’ को पढ़ते हुए इसी विडम्बना की अनुभूति होती है।

चूँकि वे समिति की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘वीणा’ के प्रबंध संपादक भी हैं। ऐसे में एक वरिष्ठ साहित्यकार की आत्मकथा के पुस्तक रूप में प्रकाशित होने पर जिस सुगढ़ भाषा शैली, लेखकीय प्रवाह और संपादन कौशल की सहज अपेक्षा पाठकों को होती है, उसका यहाँ घोर अभाव है। ख़ास तौर पर जब यह आत्म कथा समूचे मालवांचल की शीर्ष साहित्य संस्था श्री मध्य भारत हिन्दी साहित्य संस्था के पदाधिकारी और जीवन भर हिन्दी के लिए तन, मन धन से समर्पित बिरले हिन्दी सेवी की आत्मकथा के रूप में आपके हाथों में पहुंची हो। पुस्तक पढ़ते समय रोचक प्रसंगों का तारतम्य बार बार टूटता है। बीच बीच में अतिरिक्त पृष्ठों पर दिए गए तीस-चालीस रंगीन छायाचित्र लेखक के शब्द चित्रों का रसभंग कर पुस्तक को आत्मकथा के बजाय  स्मारिका/ अभिनन्दन ग्रन्थ का रूप देते नज़र आते हैं।

करीब दो सौ पृष्ठों की इस राम कहानी में बहुतेरी घटनाएँ ऐसी हैं जो समय सापेक्ष होने से प्रायः उस ज़माने के हर व्यक्ति के जीवन संघर्ष में घटी हैं। वाजपेयीजी की बुलंद आवाज, जुझारू प्रवृत्ति  और दबंग स्वभाव से उनके संपर्क में आने वाला हर व्यक्ति अच्छी तरह परिचित है। इसकी मिसाल उनके बचपन की उस घटना में मिलती है जिसका उल्लेख ‘आत्मकथा’ में हुआ है- “स्कूल के शहरी लड़कों ने जब शहर में उठना बैठना सीख रहे अपने नए गँवई सहपाठी को ‘हरे राम, हरे राम’ कहकर चिढाना शुरू किया तो दबंगई प्रकट होना ही थी। एक दिन इसी बात से खफा हरेराम ने एक नामाकूल की जमीन पर पटक कर वो धुनाई की, कि मजमा ख़त्म होते ही बाकी लड़कों ने उन्हें क्लास का मॉनीटर चुन लिया। पर स्कूल प्रबंधन को दादागिरी की यह हरकत नागवार गुजरी। परिणाम स्वरुप नूतन का विज्ञान संकाय छोड़कर पास ही के महाराजा शिवाजी राव हायर सेकेंडरी स्कूल में भूगोल विषय लेना पड़ा।”

अपनी आत्मकथा में वाजपेयीजी ने रचना, सम्मान, पुरस्कार, यात्रा वृत्तान्त, विदेश यात्राएँ, हवाई यात्राएँ, पर्यटन, तीर्थाटन आदि से लेकर हर उस शख्स का नामोल्लेख किया है जिनसे वे जीवन में एकाधिक बार मिले अथवा जिनका सान्निध्य/ सहयोग उन्हें मिला। यहाँ तक कि जिन दिवंगत लोगों की अंतिम यात्रा में वे व्यथित ह्रदय से सम्मिलित हुए, डायरी में लिखा वह ब्यौरा भी उन्होंने पुस्तक में साझा किया है। आत्मकथा में उन्होंने गाँधी हॉल से अकस्मात स्कूटर चोरी जाने की घटना, तथा बेटे की शादी के रिसेप्शन में आज की मशहूर गायिका और तब की बेबी पलक मुछाल द्वारा गीत गाने तक का जिक्र किया है। पुस्तक में उनके अखिल भारतीय बैंक अधिकारी महासंघ के अध्यक्ष पद तक पहुँचने का रोचक वर्णन है। इसके अलावा यूको बैंक के मंडल कार्यालय में हिन्दी अधिकारी के बतौर हासिल उपलब्धियों का जिक्र भी है और मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति से जुड़कर संस्था में साहित्य मंत्री के पद तक पहुँचने की दास्तान भी।

हिन्दी में पिछले पांच दशकों से गद्य एवं पद्य दोनों विधाओं में निरंतर लेखन कर रहे वाजपेयीजी की रचनाएँ नईदुनिया, दैनिक भास्कर, पत्रिका, स्वदेश, हितवाद के अलावा वीणा, समावर्तन, समीरा, मालविका, गन्धर्व, मरू गुलशन, गोलकुंडा दर्पण, अर्पण समर्पण, मानस संगम, राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना आदि में छपती रही हैं। पिछले बाईस सालों में उनके तीन काव्य संग्रह- ‘बिना किसी फर्क के’ (1998), ‘ताना बाना’ (2012) और ‘कोपल वाणी’ (2014) प्रकाशित हुए हैं। हिन्दी के शलाका पुरुष, शब्द शिरोमणि, देव भारती, जन काव्य भारती, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति सहित मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का जहूरबख्श सम्मान भी उन्हें राज्यपाल के हाथों मिल चुका है। देवआनंद की तरह पचहत्तर साल से ऊपर के इस ‘चिर युवा’ हिन्दी सेवी की फिटनेस का अंदाजा उनसे मिलने वालों को हर मुलाकात में सहज ही हो जाता है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार, समीक्षक और स्तंभकार हैं।
चलभाष: +91 942 543 7902; ईमेल: vinodnagar56@gmail.com

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