आदिवासी जलियांवालाबाग हत्याकाण्ड : धूणी तपे तीर

- मनीष कुमार गुप्ता

शोधार्थी (हिन्दी विभाग), अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय
चलभाष: +91 838 201 8200; ईमेल: manishg808@gmail.com



सामाजिक सरोकारों से जुड़कर जनजीवन की विसंगतियों तथा विद्रूपताओं को कलात्मक ढंग से अपनी रचनाओं में सार्थकता के साथ उभरनेवाले ख्यातनाम रचनाकार हरिराम मीणा अपने विविध पक्षीय लेखन से हिंदी जगत में अपना महत्वपूर्ण स्थान एवं मुकाम हासिल किया है। इन्होंने आदिवासी संस्कृति, सभ्यता के साथ-साथ दीन-दुखियों, शोषित, पीड़ितजनों की जनजीवन को अध्येता के रूप में गहराई से निरूपित करने के पश्चात 2001 से निरंतर ऐतिहासिक ग्रंथों सरकारी कार्यालयों एवं आस-पास के एकत्रित प्रमाणों के आधार पर 2008 में ‘धूणी तपे तीर’ नाम से एक उपन्यास प्रकाशित कराया, जो जलियाँवाला बाग हत्याकांड 13 अप्रैल 1919 से 6 वर्ष पूर्व 17 नवंबर 1913 में अंग्रेजों एवं सामंती शासकों के अत्याचार एवं निरंकुशता के विरुद्ध मानगढ़ की पहाड़ी पर लड़ी गई थी। यहाँ जलियांवाला बाग हत्याकांड से भी भीषण नरसंहार हुआ था। ऐतिहासिक पुस्तकों, अधिकारिक प्रमाण, अभिलेखागार, पुस्तकालयों, महाराणा मेवाड़ के पोथीखाना एवं उस नरसंहार में मारे गए परिवार के परिजनों से पूछताछ के बाद एकत्रित आंकड़ों एवं साक्ष्यों से मिले निष्कर्ष में यह संख्या लगभग ढाई हजार बैठती है, जिसमें निहत्थे आदिवासी बुजुर्ग, बच्चों एवं महिलाओं की हत्या की गयी थी। परन्तु इसे महज एक घटना बताकर दबा दिया गया। जब उपन्यासकार उस घटना के बारे में अध्ययन किया तो चौंकाने वाली बातें सामने आती गई जिसको आधार बनाकर एक यथार्थता से लबरेज ऐतिहासिक उपन्यास की रचना की। ऐसी दर्दनाक, भयावह, क्रूरतम, वीभत्स नरसंहार की ओर ना ही किसी इतिहासकार की दृष्टि गई और ना ही किसी समाज सुधारक ने इसे उजागर किया तथा ना ही किसी साहित्यकार ने इसे साहित्य में जगह दिया। यह नरसंहार केवल एक घटना बन कर रह गई थी जिसे उपन्यासकार ने अपनी पूरी आस्था, लग्न एवं परिश्रम से इस घटना को मुख्य उद्देश्य बनाकर उजागिर करने का सार्थक प्रयास किया। इस नरसंहार को सबके सामने लाकर सोचने पर मजबूर कर दिया। इस क्रूरतम एवं वीभत्स नरसंहार के बारे में शंभूनाथ तिवारी लिखते हैं- ‘‘आदिवासी अंचल की जिस ऐतिहासिक-वास्तविक घटना को इस उपन्यास में आधार बनाया गया है, उस घटना को अंतिम परिणति (मानगढ़ पर सामूहिक बलिदान) तक ले जाने के लिए उपन्यासकार ने बहुत श्रम किया है।”1
इस उपन्यास के नायक गोविंद गुरु हैं, जिनका जन्म सन् 1858 में एक बंजारा परिवार में बेसर एवं लटकी के पुत्र के रूप में हुआ था। वे शुरू से ही दबे-कुचले लोगों के साथ आदिवासियों के अच्छाई, उद्धार और संगठित करने के लिए अपना सब कुछ त्याग कर एवं निस्वार्थ भाव से समर्पित होकर उन्हें जागरूक करने का निरंतर प्रयास करते रहें। गोविंदा से गोविंद और फिर गोविंद गुरु की यात्रा वे अपने बुद्धि, विवेक एवं सेवा भाव से हासिल की। आदिवासी दलित एवं दबे-कुचले लोग उन्हें अपना गुरु मानते थे तथा उनके बताए मार्ग पर चलने का प्रयास करते थे। वे शराब से दूर रहने की नसीहत के साथ ही पढ़ाई-लिखाई के लिए प्रेरित करते थे। वे आदिवासियों को बुरे कार्यों से दूर रहने, साफ-सफाई रखने, पुलिस-थाना-कचहरी से दूर रहकर पंचायत की बात मानने, आपसी सहयोग एवं सद्भाव, स्वतंत्रता, शोषण, विपन्नता, बेगारी, महाजनी, सूद-खोरी, जंगल से बेदखली के साथ जंगल, जानवरों, पेड़-पौधों की सुरक्षा आदि पर जोर देते रहते थे।
इस उपन्यास में दसवीं शताब्दी से लेकर ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन फिर अंग्रेजों का 1818 में हुए कुपदार्पण एवं 1857 की क्रांति के साथ 1913 में हुए मानगढ़ हत्याकांड तक का वर्णन ऐतिहासिक एवं साहित्यिक मिश्रण के साथ किया गया है। इसमें एक-एक घटनाओं को बड़े सूक्ष्म एवं रोचक तरीके से सामने लाया गया है। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासियों का योगदान, इनका रेजिमेंट के साथ उसमें भाग लेने का कारण आदि का वर्णन मिलता है। इसके अलावा इस उपन्यास में रियासती सत्ता द्वारा किए जाने वाला अत्याचार, शोषण, बेगार, दमन, भुखमरी, महामारी, अंधविश्वास आदि का यथार्थ वर्णन मिलता है।
आदिवासीजन गोविंद गुरु से इतना प्रेम करने लगे थे कि जब उन्हें पता चला कि गोविंद गुरु को डूंगरपुर के महारावल विजयसिंह ने बंदी बनवा लिया है तो हजारों की संख्या में आदिवासी डूंगरपुर की ओर अपने परंपरागत हथियारों के साथ कुछ कर दिए। उन्हें यह भी नहीं पता था कि आगे क्या होगा उन्हें तो बस अपने गुरूजी दिखाई दे रहें थे। ‘‘यूं कर डेढ़-दो हजार आदिवासी हाथों में लाठी, भाले, सेल, गड़ासे, कुल्हाड़े और धनुबाण लिए हुए अपने प्रिय गुरू गोविन्द को छुड़ाने बढ़े चले जा रहे थे। भूखे पेट, अधनंगे व दुर्बल शरीर वाले इन लोगों के पास और कुछ नहीं था, मगर बुलंद हौसला था, मंजिल तक पहुंच सकने का पक्का इरादा था, आँखों में बेहतरीन दिनों कि उम्मीद की चमक थी। अपनी जी-जान उस गुरु पर न्यौछावर करने वाला रेला था।”2
गुरु गोविंद ने आदिवासियों के तरक्की जागरूकता के लिए सम्प सभा की स्थापना की, जिसके प्रयासों से लोगों में चेतना आयी, एकजुटता की भावना पैदा हुई एवं वे अपने सुख-दुख और तकलीफों के कारणों को समझने लगे थे। जिससे वे अंधविश्वासों के साथ शराब पीने की लत को भी छोड़ दिए थे। ‘‘अब गोविंद गुरु की शिक्षाओं से उनमें चेतना पैदा हो रही है और विरोध के पक्ष में एक प्रकार का आत्मविश्वास भी पैदा होने लगा है। गोविंद गुरु के द्वारा चलाये जा रहे सामाजिक एवं धार्मिक सुधार-आंदोलन की वजह से शराब की बिक्री में एकदम घटोतरी गई है।”3
इस सम्प सभा में गुरु गोविंद ने अनेक भक्तों को लगाया था जो गाँव-गाँव जाकर उन्हें गुरु का उपदेश दे रहे थे तथा उनके साथ खड़े होने का भरोसा देकर उनके दुख दर्द को बाँटने का प्रयास कर रहे थे। इन भक्तों में कुरिया, पूजा, धीरा, थावरा, धरजी, सुरजी, हालिया, गज्जा, कोदर, खुमा, रामला, बेबरिया, वाला, कलिया, मेहा, परताबिया, जाला, भूरा, चमना, बिज्जिया, कानजी, रणजी, तरसिया, सुम्भा आदि थे। इनके अलावा सैकड़ों कार्यकर्ता एवं हथियारबंद युवकों एवं प्रौढ़ों की उत्साहित फौज थी जो हमेशा गुरु गोविंद की सेवा के लिए तत्पर रहते थे। यही कारण है कि गोविंद गुरु के नाम से अंग्रेज, महारावल, जमीदार डरने लगे थे और आदिवासियों पर करने वाले अत्याचार कम कर दिए थे।
पहले आदिवासियों को एक आम नागरिक के बराबर नहीं माना जाता था। उनसे हर दिन पशुओं की तरह बेगारी कराया जाता था। तबीयत खराब होने या अन्य जरूरी कार्य होने से बेगारी न करने पर पीटा जाता था। उन्हें समाज में इज्जत नहीं दिया जाता था। उन्हें सुर-असुर से जोड़कर देखा जाता था, परंतु जब गोविंद गुरु ने आदिवासियों को जागरूक करना शुरू किया तो वे अपने अधिकारों के बारे में जानने, समझने लगे। अब वे जागरूक हो गए तथा अपने भाग्यवादी विचारधारा को त्यागने लगे। यही कारण है कि अब गोविंद गुरु की सीख भाग्यवादी जड़ सूत्रों को काटने लग गयी। गोविंद गुरु उन्हें सिखाया करते थे कि ‘‘हमारी दुर्दशा के लिए एक सीमा तक हम स्वयं जिम्मेदार हैं। अगर हम एकजुट होकर अत्याचारों, शोषण व दमन का विरोध करें तो हालात हमारे पक्ष में बनते चले जायेंगे। गुरु की बातों का गहरा असर आदिवासी-जन पर हुआ। अब वे मानने लग गए थे कि वे भी इंसान हैं। अन्य लोगों जैसे इज्जतदार इंसान।”4
अब आदिवासी बेकारी करने से मना कर देते थे। वे अपनी मजदूरी माँगने से कतराते नहीं थे। ये सब होने के कारण गोविंद गुरु सबके आँखों में किरकिरी बनकर धँस गए थे। जिससे बार-बार उनसे छुटकारा पाने के लिए प्रयास किया जाता रहा तथा अंत में जब वे उनके अधिकार के लिए मानगढ़ पर्वत पर आंदोलन की रणनीति बनाने के लिए हजारों आदिवासियों के साथ एकत्रित हुए, तब यह देख बांसवाड़ा, डूंगरपुर, संथ, ईडर के शासक और उनके अधीनस्थ जागीरदारों ने अंग्रेजों के साथ मिलकर उनके आंदोलन को दबाने का प्रयास किया। जिसमें कमांडर मेजर बेली ने 17 नवंबर 1913 को मेवाड़ भील कोर, 104 वेलसले रायफल्स, नवी राजपूत, जाट रेजिमेंट एवं राजवाड़ा के सैनिकों के साथ मानगढ़ की पहाड़ी पर हमला कर दिया जिसमें निहत्थे बुजुर्गों, औरत, बच्चों पर गोलियां बरसाना शुरू कर दिया। जिसके जवाब में सम्प सभा के नौजवान भी पत्थर, तीर-धनुष, भाला व बंदूक से जवाब देना शुरू किया। महिलाएँ भी सबका साथ देने के लिए वीरांगना बनकर सामने आ गई और डटकर उनका सामना किया। ‘‘कमली की सहेली मंगली अब स्त्रियों में नये प्राण फूंक कर उनके दल का मोर्चा संभाले हुए थी। अपनी प्रिय सहेली कमली व पानो की मौत के बाद वह कुछ पलों के लिए ही सदमें में रही थी।●●● गोफन और कुल्हाड़ियां उसके हथियार थे। कुछ के पास धनुष-बाण भी। अनेक रणचंडी भावनियों की तरह वे अपने हिस्से की लड़ाई लड़ रही थी।”5
जय भोलेनाथ! जय भैरव बाबा! जय गुरु महाराज के साथ रक्षा दल के युवक शिवजी की गणों के समान अंग्रेजों के मशीनगन के सामने भी खड़े होकर फिरंगी फौज के दाँत खट्टे कर रहे थे जिससे कैप्टन स्टॉकले और मेजर बेली का शरीर पीपल पत्ते के समान काँप रहा था। हरिया ने अपने मंगेतर दल्ली के बलात्कारी अपराधी सूबेदार लियाकत अली का कुल्हाड़ी के एक ही वार से गर्दन काट दिया। यह देख अंग्रेज सैनिक हतप्रभ रह गये। इस घटना के बाद अंग्रेज सैनिकों ने पर्वत को घेरकर अंधाधुन गोलियाँ बरसायी और लगभग ढाई हजार बुजुर्ग, बच्चे, औरतों की हत्या कर दी गयी। यह वीभत्स, दर्दनाक, नरसंहार, हृदयविदारक त्रासद को देखकर सभी काँप गये। गोविंद गुरु हताहतों के बीच दौड़ते हुए चिल्लाए- ‘‘नरभक्षी भेड़ियों, तुमने बहुत सारे भोले-भाले आदिवासियों की हत्या कर दी। निहत्थों, बुजुर्गों, औरतों व नादान बच्चियों पर भी रहम नहीं किया।”6 इस क्रूरतम एवं वीभत्स नरसंहार के बारे में शंभूनाथ तिवारी लिखते हैं- ‘‘विद्रोह को दबाने के प्रयास में अँगरेजों की दमनकारी नीति के परिणामस्वरूप स्वतंत्रता के इतिहास की ऐसी क्रूरतम घटना घटित हो जाती है, जो ‘जलियाँवाला कांड‘ से भी वीभत्स और भयावह कही जा सकती है।”7
इस उपन्यास में गोविन्द गुरु से पहले आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ने वाले एवं उनकी आर्थिक मदद करने वाले ‘इंडियन रॉबिन हुड’ के नाम से प्रसिद्ध टंट्या भील उर्फ टंट्या मामा के बारे में भी वर्णन मिलता है। इनका जन्म मध्य प्रांत के खंडवा जिला की पंधाना तहसील के बड़दा गाँव में 1842 में भाऊ जी के घर हुआ था। वे शरीर से स्वस्थ, ताकतवर, फुर्तीले थे। उनके बारे में उपन्यासकार ने लिखा है कि ‘‘टंट्या का कद लंबा, कसा हुआ बदन, उभरा हुआ सीना, ताकतवर लंबी भुजाएँ, आँखों में पैनापन, चेहरे पर खिंचाव, अनूठे किस्म की आभा की अनुभूति कराने वाला चौड़ा ललाट और कुछ घुंघराले से लंबे काले बाल। दाढ़ी व मूँछों के बाल मिले हुए थे।ऽऽऽ टंट्या के बायें कंधे पर चमड़े की तणी के सहारे पीछे की ओर लटकती बंदूक, दाहिने कंधे से बायीं बगल तक तिरछा बंधा हुआ कारतूस का बंडोलिया। इसी कंधे पर लटका धनुष, उसी की बगल में पीठ का आसरा लिए भूरे रंग का तेल और कमर में ठूंसी हुई एक कटार।”8
मजबूत शरीर वाले टंट्या मामा पन्द्रह-बीस सहयोगियों के साथ गरीब, असहाय, सताए हुए आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ते थे। उनके निशाने पर अत्याचार करने वाले जमीदार, जागीरदार, लगान वसूलने वाले, सूदखोर, साहूकार, कारिंदे होते थे। वे आबदला लेने को तत्पर रहते थे। यही कारण है कि वहाँ के लोग उन्हें अलौकिक पुरुष मानने लगे थे और बीमारी एवं पीड़ा होने पर इनके नाम का गंडा-ताबीज बाँधते थे। टंट्या मामा को गणपत राजपूत ने धोखे से 11 अगस्त 1889 को बनेट गाँव में गिरफ्तार करवा दिया। फिर अंग्रेजों द्वारा झूठा मुकदमा चलाकर उनको फाँसी की सजा सुनायी गई। अंत में 4 दिसंबर 1889 को जबलपुर सेंट्रल जेल में उन्हें फाँसी दे दी गई।
इन सब घटनाओं के साथ एक छोटी सी प्रेम कहानी भी चलती है, नंदू और कमली की प्रेम कहानी। नंदू रक्षा दल का एक युवा रक्षक है जो सेवा भाव से धूणी के लिए पूर्णरूपेण समर्पित है तथा कमली भगत पूंजा धीरा की पुत्री तथा स्त्री रक्षा दल की समर्पित सिपाही है। वे दोनों एक दूसरे से बहुत प्रेम करते थे तथा दोनो एक साथ जीने मरने का स्वप्न देखते रहते थे। जब भी समय मिलता एक दूसरे के आस-पास रहने की कोशिश करते रहते थे। अफसोस साथ जीने का स्वप्न पूरा ना हो सका लेकिन दोनों एक ही साथ मानगढ़ पहाड़ी पर अपने हक़ की लड़ाई लड़ते हुए शहीद हो गये। इन पंक्तियों से पता चलता है कि वे दोनों एक-दूसरे से कितना प्रेम करते थे- ‘‘कमली की चीख सुनकर नन्दू उसकी तरफ दौड़ा वह भी गोलियों की बौछार में फंस गया। उसकी कनपटी में गोली लगी। वह कमली तक पहुँचने से पूर्व ही गिर गया। लहूलुहान नन्दू ने कुछ देर में ही प्राण त्याग दिये। कमली बेहोश पड़ी थी। खून की धार पेट से बह रही थी। अंतिम क्षणों में उसे तनिक होश आया तब वह टूटे-फूटे शब्दों में बड़बड़ाई- ‘नं-दू!’ ”9
इस उपन्यास में आदिवासीजनों की शारीरिक संरचना के साथ इनको परिभाषित भी किया गया है। इसमें उनके सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों का सूक्ष्म एवं यथार्थ वर्णन किया गया है। इसकी यथार्थता इसी से प्रमाणित हो जाता है कि प्रत्येक घटना के पीछे तिथि, समय आदि के साथ वर्णित किया गया है। यह उपन्यास आदिवासीजनों के इतिहास के बारे में जानकारी देता है जिससे यह प्रमाणित होता है कि यह उपन्यास एक ऐतिहासिक उपन्यास है।

संदर्भ सूची
1- मनीष कुमार गुप्ता, आदिवासी समाज और हिंदी उपन्यास, अनुसंधान पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, कानपुर, 2017, पृ. 70
2- हरिराम मीणा, धूणी तपे तीर, साहित्य उपक्रम, द्वितीय सं. 2010, पृ. 140-141
3- वही, पृ. 211
4- वही, पृ. 141
5- वही, पृ. 371
6- वही, पृ. 369
7- मनीष कुमार गुप्ता, आदिवासी समाज और हिंदी उपन्यास, पृ. 70
8- हरिराम मीणा, धूणी तपे तीर, पृ. 137
9- वही, पृ. 369

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