कहानी: तर्पयामि

अमित कुमार मल्ल
अमित कुमार मल्ल

* 1 *

आज रघुनाथ का मन उदास था। वह कुछ बोल न बोलकर चुपचाप आँख बंद कर लेट गया। उसके ज़ेहन में उसके बेटों की बातें घूम रही थीं। दीपावली की छुट्टी में दोनों बेटे परिवार सहित आये थे। बड़ा बेटा शेखर हरिद्वार के भेल कंपनी में काम करता है। उसके बच्चे वहीं पढ़ते हैं। छोटा बेटा प्रकाश अयोध्या में अपने घर मे रहकर अपने बच्चों को पढ़ा रहा है और स्वयं ठेकेदारी का काम कर रहा है।

दीपावली के अगले दिन परेवा को रघुनाथ को दोनों बेटों से बात करने का अवसर मिला।
- कब तक छुट्टी है शेखर?
- छुट्टी तो दो दिन की थी ... एक सी एल ले ली थी, कल सुबह की ट्रेन से वापस जाना है।
- फिर कब आना है?
- होली में प्रयास करूंगा, यदि बच्चों के एग्जाम पड़ गये तब जून में ही आना हो पायेगा।
- इतने दिन बाद?
- मैं तो हर साल आ जाता हूँ पापा, मेरे कॉलीग तो दो दो साल बाद गाँव जाते हैं।
शेखर की आवाज़ में हल्की झुंझलाहट थी।

रघुनाथ दूसरे बेटे से पूछा,
- तुम्हारा क्या प्रोग्राम है प्रकाश?
- मैं भी कल सुबह निकल जाऊंगा। परसो से बच्चों के स्कूल भी खुल जाएंगे।
- तुम तो एकाध दिन और रुक सकते हो।
- नहीं पापा जी। स्कूल में बहुत सख्ती है। बच्चे के अनुपस्थित रहने पर नोटिस आ जाता है... फिर ठेके के काम में भी लगना है।
- बेटा, मैंने तो कितनी बार कहा है ... इतनी जमीन है, खेती बारी करो। ठेकेदारी से अधिक कमा लोगे।
- पापाजी .... बेटे को गाँव में रखकर गँवार तो नहीं बना सकते न!
- मैं यह नहीं कह रहा हूँ, बहू तो बच्चे को अयोध्या में रहकर पढ़ा ही रही हैं, तुम गाँव और अयोध्या दोनों जगहें सम्हाल सकते हो।
- आप दोनों यहाँ सम्हाल ही रहे हैं।
- बेटा, यह तो मजबूरी में चल रहा है
- ...
- अब हम दोनों की भी उम्र हो गयी है। किसी न किसी कारण से किसी न किसी की तबीयत खराब हो ही जाती है। कस्बे का डॉक्टर दवा देता है... कभी फायदा होता है... कभी नहीं।
व्यथापूर्ण स्वर में रघुनाथ बोला।
शेखर ने सहानुभूति जताई,
- हरिद्वार तो बहुत दूर है। वहाँ रखकर आप लोगों का इलाज नहीं कर पाऊंगा, अगर पास रहता तो अपने साथ रखकर आप दोनों का इलाज करवाता।
प्रकाश समझ गया कि भैया ने गेम कर दिया। उसने बात का सिरा पकड़ा,
- अयोध्या में छोटा सा फ्लैट है, कोई नौकर भी नहीं है। रीमा .(प्रकाश की पत्नी) घर बच्चों का काम करके परेशान हो जाती है।
- ...
- एक नौकर रख लीजिए, जो आप लोगों की देखभाल कर सके।
- बेटा! विश्वासी नौकर भी नहीं मिल रहे हैं।
रघुनाथ बोले।

शेखर फिर सक्रिय हुआ,
- नौकर मिल भी जाय तो क्या वह घर के आदमी की तरह, पापाजी माँ की सेवा करेगा?

चिढ़ते हुए प्रकाश बोला,
- सही कह रहे हो भइया। तुम पापा माँ को हरिद्वार ले जाकर रखो। वहाँ फ़्लैट भी बड़ा है और नौकर भी है।
- दूर न होता तो तुम्हें कहने की जरूरत नहीं पड़ती। मैं अगर अयोध्या में रहता तो पापाजी और माँ को साथ ही रखता।
- मेरे पास नौकर होता, बच्चे बड़े होते .... फिक्स्ड इनकम होती तो मैं भी पापाजी और माँ को साथ रखता।
- तुम बिना तर्क के बात कर रहे हो।
- तुम तो तर्क पर खड़े होकर बातें कर रहे हो।
रघुनाथ ने हस्तक्षेप किया,
- तुम दोनों को परेशान होने की जरूरत नहीं है। हम लोग यही ठीक हैं।
दोनों पुत्र आंतरिक प्रसन्नता छुपाते हुए बोले,
- जैसी आपकी मर्जी।
- वैसे भी हम लोगों की उम्र हो चली हैं, अब यह सब तो लगा ही रहेगा।
- ऐसी बात क्यों सोचते हैं?
दोनों एक साथ बोले।
थोड़े दुःख के साथ, थोड़े विषाद के साथ रघुनाथ बोले,
- होनी को कौन रोक सकता है।
- ...
दोनों चुप रहे।
- अब तो बस यह इच्छा है कि हम लोगों के मरने के बाद अच्छे से क्रिया कर्म हो।
- ...
दोनों चुप रहे। रघुनाथ ने फिर दोनों की ओर देखा।

- अभी आप ऐसा क्यों सोचते हैं?
- बेटा, यह तो होना ही है। तुम लोग यहाँ रहते नहीं हो। कब क्या हो जाये, कौन जानता है? पेट के लिये, तुम लोगों के लिये कितने साल रंगून जाकर गुलामी की... धरम मरजाद नष्ट किया... जलालत सही। अब लगता है कि बस ... मरने पर किरिया करम ठीक-ठाक हो जाये ताकि परलोक सुधर जाये।
- पापा जी, चिंता मत करिए, पंडित जी जो विधि-विधान बताएंगे, हम वैसा ही करेंगे।
शेखर बोला।

प्रकाश बोला,
- भइया जैसी सैलरी तो नहीं है, फिर भी हर संभव आपकी इच्छा का मान करूंगा।
- जहाँ सैलरी दिख रही है, वहाँ खर्चे भी हैं। मुझे तो गेहूँ, चावल, दाल भी खरीदने पड़ते हैं, तुम तो यह सब गाँव से ले जाते हो।
- मेरी कोई फिक्स इनकम नहीं है, जुगाड़ से गृहस्थी चलती है।
- तुम दोनों वाद विवाद मत करो।
रघुनाथ तेज आवाज में बोला।

तब तक शेखर व और प्रकाश के बच्चे मकान के बरामदे से चिल्लाये,
- पापाजी .... मम्मी जी बुला रही हैं।
दोनों तत्काल उठकर घर में चले गए। थोड़ी देर बाद दोनों परिवार सहित बाहर आये। प्रकाश रघुनाथ से बोला,
- सभी बच्चे बोर हो रहे थे तो हमने सोचा कि पास के कस्बे और नदी के पुल तक घूम आयें।
- तुम लोग जल्दी आना .... कल तो तुम लोग चले ही जाओगे... बच्चों से भी बातें नहीं हुई।
रघुनाथ बोले।
प्रकाश की पत्नी रीमा बोली,
- टैक्सी नहीं आई।
शेखर की बीबी कृष्णा, प्रकाश की ओर देखते हुए बोली,
- जल्दी निकलिए शेखर बाबू। घूंघट में दम घुटा जा रहा है।
तब तक गाँव की टैक्सी आ गयी। सभी बैठकर चले गए।और रघुनाथ आँखें बंद कर सोचने लगा।
अभी तो दोनों भाई बहस कर रहे थे, क्षण भर में दोनों व उनके परिवार एक साथ घूमने चल दिये। यही जनरेशन गैप है शायद।
घर फिर सायं सायं करने लगा। इतना बड़ा घर, इतने कमरे, इतना बड़ा बरामदा, दुआर... इतनी खेती... और रहने वाला कौन? वही एकमात्र अकेला।


* 2 *

क्या इसी के लिये उसने परदेश की खाक छानी, अंग्रेजो की गुलामी सही, उनसे जलील हुआ?
मन और पीछे चल गया।

रघुनाथ के पिता के पास थोड़ी जमीन थी, घर भी था भले ही खपरैल का हो। लेकिन दिक्कतें बहुत थी, अधिकतर जमीन रेहन थी। पिताजी शराब बहुत पीते थे। वे काम नहीं करते थे। काम न होने के कारण पिता जी शराब पीते थे या शराब की लत होने के कारण काम नहीं करते थे - यह कहना मुश्किल था।

रघुनाथ ने जब से होश सम्हाला, यही देखा कि जो थोड़ी जमीन रेहन से बच गयी थी उस मे, उसकी माँ थोड़ा अनाज पैदा कराती थी, जिस से बहुत मुश्किल से सबक पेट भर पता था। इतनी मुश्किल परिस्थितियों में रघुनाथ अपना जीवन गुजर कर रहा था। फिर रघुनाथ की बहन थी, बीबी थी - सबका पेट भरना था, सबको कपड़ा चाहिए था। जब खाने के लाले पड़ गए तो रघुनाथ ने आसपास नौकरी ढूंढने के बहुत प्रयास किया लेकिन नौकरी नहीं मिली। गाँव का एक आदमी रंगून में काम करता था। वह हर दो-तीन साल बाद गाँव आता था।
संयोग से वह उस समय गाँव आया हुआ था। रघुनाथ ने उससे निवेदन किया,
- चाचा। बहुत बुरा समय चल रहा है। पेट भर खाना भी नहीं मिल पा रहा है।
- हूँ।
- आपको तो पता ही होगा कि लगभग सारी जमीन रेहन है। घर मे 5 लोग खाने वाले हैं, पिताजी पिये पड़े रहते हैं।
- हूँ ... मैं क्या मदद कर सकता हूँ?
- मुझे भी रंगून में कोई काम दिला दो।
- जानते हो, मैं रंगून में क्या काम करता हूँ?
- नहीं।
- मैं खाना बनाता हूँ, मैं तुम्हें कौन सी नौकरी दिला पाऊंगा?
- मैं कुछ भी कर लूंगा, बस मुझे नौकरी चाहिए, कैसी भी।
- बर्तन मांजने के काम में तुम्हें लगवा सकता हूँ।
- वही कर लूंगा।
- लेकिन वहाँ जाने का किराया भाड़ा लगेगा। होटल के मैनेजर को भी कुछ देना पड़ेगा तब वह तुम्हें बर्तन मांजने का काम देगा।
- कितना खर्च लगेगा?
- लगभग 500 रुपये।
- मेरे पास तो 50 रुपये भी नहीं हैं, 500 कहाँ से मिलेंगे?
- इसमें मैं कोई मदद नहीं कर पाऊंगा?
- वहाँ कितना मिलेगा?
- रहने खाने के बाद कुछ पैसे बच जाएंगे। दो तीन साल का बचाओगे तब घर की मदद करने लायक पैसा लेकर गाँव आ पाओगे।
- इतने दिन मेरे परिवार वाले कैसे खाएंगे?
- यह भी व्यवस्था करके ही वहाँ चलो। वहाँ जाने के बाद कब आना होगा, यह तुम्हारे वश में नहीं रहेगा। मैं ही इस बार तीन साल बाद आया हूँ... 45 दिन रहूँगा। कुछ समझ आये तो बताना।
- कोई तरीका बताएँ?
- मैंने सारी बात बता दी। बाकी तुम्हारी व्यवस्था के ऊपर है।
- देखता हूँ चाचा।

उदास स्वर में रघुनाथ बोला। रघुनाथ ने घर आकर अपनी माँ को बताया। उसकी माँ ने कहा,
- बेटा इतना रुपया कहाँ से आएगा? फिर तुम तीन साल आ भी नहीं पाओगे।
- जी, यही तो कुछ सूझ नहीं रहा है।
रघुनाथ बोला।
- जिन लोगों के पास खेत रेहन है उनसे कुछ कर्ज़ा मांग लो।
- देखता हूँ।
अगले दिन रघुनाथ ने माँ को बताया,
- वे लोग और कर्ज़ा देने से मना कर रहे हैं।
- तब तो कुछ हो नहीं सकता।
ऐसे ही तीन सप्ताह बीत गए। रघुनाथ को लग रहा था कि उसके परिवार की स्थिति कभी नहीं बदल पाएगी।
एकाएक, रघुनाथ के ननिहाल के पंडित जी आये, रघुनाथ की माँ व रघुनाथ एकसाथ बोले,
- प्रणाम पंडित जी।
-आशीष।
- इधर कैसे?
- अपना हाल चाल बताइये।
- क्या बताएँ?
- आपने बेटी के लिये लड़के बताने को कहा था।
- कहा तो था... लेकिन।
- लेकिन क्या?
- आपको सब पता है बेटी शादी करने लायक है, बेटे के पास काम नहीं है। उसे रंगून में काम मिल सकता है, लेकिन वहाँ जाने के लिये पैसा चाहिये... जमीन रेहन है
.... लड़का जानकर क्या करेंगे?
- देखिए, बुरा न माने तो एक बात कहूँ।
- कहिये।
- देखिए, आपके परिवार में कोई कमाई नहीं हो रही है। ऐसे में रेहन के पैसे नहीं दे पाएंगे। जब पैसे नहीं रहेंगे तो बेटी का विवाह भी नहीं होगा, बेटा भी कमाने रंगून नहीं जा पायेगा।
- इसीलिए तो पण्डित जी.... चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा है।
रघुनाथ हताश स्वर में बोला।

- रास्ता तो है लेकिन ....
- क्या रास्ता है?
- आप जानते हैं कि मैं रिश्ते बताता हूँ। लोग मुझसे अपनी लड़कियों की शादी के लिये लड़का ढूंढने को कहते हैं, वैसे ही कुछ लोग अपने लड़कों की शादी के लिये लड़की ढूंढने को भी कहते हैं।
- ...
- ऐसा ही एक लड़का... लड़का तो नहीं आदमी है। उम्र होगी चौवालिस। उसकी पहली बीबी मर गयी है। एक दस साल का लड़का है। वह अब शादी करना चाह रहा है।
- तो?
रघुनाथ बोला।
- वह शादी का खर्च भी खुद करेगा और आप लोगों के परिवार के लिए कुछ रुपया भी दे देगा।
- हमें क्यों बता रहे हैं पंडित जी?
- यदि इस लड़के से आपकी बहन का विवाह हो जाय तो.... सारी समस्या का हल निकल आएगा।
- आप क्या कह रहे हैं पंडित जी? मेरी बहन 19 की होगी जबकि वह 44 का है। दुगुने से अधिक उम्र का है। 25 साल बड़ा है। दुहाजू है.... यह तो लड़की बेचने जैसा है।
- सोच लीजिये।आज रात पास के गाँव में रुकूँगा.. कल आपके यहाँ से होता हुआ जाऊंगा। मुझे लगता है कि बेटी को थोड़ी तकलीफ होगी, लेकिन आप लोगों की समस्या दूर हो जाएगी।
रघुनाथ के मन मे बहुत द्वंद चल रहा था। एक ओर उसे अपनी बहन दिख रही थी दूसरे ओर नारकीय जीवन से निकलने का रास्ता दिख रहा था। फिर उसे यह भी लग रहा था कि गाँव वाले इस शादी में मानेंगे कि हमने लड़की बेच दी, लेकिन ईश्वर जानता है कि ऐसा नहीं है। बहुत सोच विचार कर इस निष्कर्ष पर पहुंच कि पंडित जी का प्रस्ताव ठीक है। यह जरूर है कि लड़का दुहाजू है उम्र भी अधिक है। लेकिन इसी बहाने कम से कम बहन की शादी की शादी हो जयेगी। वैसे तो इसकी शादी ही नहीं होगी। और उसका परिवार गरीबी और जलालत से बाहर निकल पायेगा।

रघुनाथ ने अपनी माँ को सब बाते बताकर उसे मनाया। पिताजी को तो घर से कोई मतलब ही नहीं था। बहन बहुत रोइ लेकिन शादी हो गयी। और लड़के से मिले 500 रुपये से रघुनाथ, गाँव वाले चाचा के साथ रंगून जा पहुँचा।


* 3 *

बहुत ही नारकीय जीवन था। गाँव का चाचा जिस होटल में सब्जी का काम करता था, वही पर उसे बर्तन धोने के काम मे लगा दिया गया। रघुनाथ ने गाँव में कभी जूठे बर्तन नहीं धोये थे, यह रोज सैकड़ों जूठे बर्तन,खाना बनाने के काम आने हांडा, कड़ाही, कलछुल आदि माँजने पड़ता था। बर्तन दो टाइम धोने पड़ते थे। रात को डेढ़ बजे खाना हलक में उतार कर जब सोता, तो नींद की जगह आँसू आ जाते। वह रोज रोता। लेकिन माँ का चेहरा याद कर, बीबी का चेहरा, बहन की शादी याद करके सारी तकलीफ़ें भूल जाता।

गाँव वाला चाचा बोलता,
- मुझे पता है कि तुमने जूठे बर्तन नहीं धोये हैं, इतना काम नहीं किया है। लेकिन तुम्हे यहाँ ले आने के पहले मैंने बताया था न?
- हाँ, जान कर ही आया हूँ।
- तुम्हारे घर की हालत तो तुम्हें पता है न?
- हूँ!
- यहाँ कष्ट है, लेकिन यहाँ काम है और पैसा भी है।
- ...
रघुनाथ चुप रहा।
- जब काम करना है तो प्रसन्न मन से करो, तुम्हारे घर की हालत सुधरेगी।
ऐसे ही तीन साल चलता रहा।
अगले साल अंग्रेज रंगून छोड़कर जाने लगे।
जाते जाते वे अपने होटल, घर, अन्य दुकानें आदि औने पौने दाम पर बेचने लगे।
गाँव वाले चाचा ने कहा,
- एक होटल बिक रहा है, 90 % तो मैं दे दूंगा। मैं चाहता हूँ 10 % देकर तुम मेरे पार्टनर बन जाओ
- मेरे पास पैसा कहाँ हैं?
- तुम्हारे पिछले साल भर की तनख्वाह तो मेरे पास ही पड़ी है।
- घर क्या भेजूंगा?
- जैसे इतने दिन तकलीफ सही, कुछ दिन और तकलीफ सह लो। यह होटल जब हम लोग जमा लेंगे तब तुम्हारी व तुम्हारे घर वालों के सारे कष्ट दूर हो जाएंगे।
- आप जानते हैं कि रेहन वाली जमीन पर ही और अधिक कर्ज़ा लेकर, आपके साथ आया हूँ। मालूम नहीं कैसे माँ, अपने आप को, मेरी पत्नी को, मेरे पिताजी को खिलाती होगी।
- तीन साल हो गये तुमने कितने पैसे भेजे?
- दो साल की बचत भेजी है।
- वे लोग पहले से अच्छा खा-पी रहे हैं न?
- यह भी कोई जीना है?
- तो फिर जैसा तुम चाहो। ऐसे अवसर बार बार नहीं मिलते हैं। यह अवसर जिंदगी बदलने वाला है। हम लोगों की सात पुश्तें, कभी होटल की मालिक बन पाएंगी?
- ठीक है...।
बेबसी में रघुनाथ बोला।

दोनों होटल के मालिक बन गए और होटल चल निकला। इस बार रघुनाथ जब रंगून से घर लौटा तो अपनी सारी रेहन की जमीन छुड़ा कर बटाई पर दे दी। बटाईदार की पत्नी घर के बर्तन, दोनों समय मांजने लगी।

हर साल दो साल पर रघुनाथ घर आता और जब आता तो काफी पैसे लाता, उनसे खेत ख़रीदता। उसने जेवर खरीदे, ट्रैक्टर खरीदा, जीप खरीदी, एन एस सी खरीदे, एकाउंट में पैसे जमा किये, शहर में जमीन खरीदी ... और अंततः लोगों को कर्जा भी दिया। वह साहूकार बन गया। धार्मिक-सामाजिक कार्यों में धन खर्च करता। उसने अपने बच्चों को महंगे और नामी स्कूलों में पढ़ाया। बाद में पत्नी आने के लिये कहने लगी। बाद में उसने और जोर पकड़ लिया।

पत्नी कहती,
- क्यो हड्डियाँ गला रहे हो? तुमने बहुत कमाया। जमीन खरीदी, जेवर खरीदे, एफ डी कराई, बच्चे भी काबिल हैं। शेखर परिवार सहित हरिद्वार में रह रहा है। प्रकाश की बीबी भी अयोध्या जाने के लिये बार बार कह रही है। अब घर आ जाओ।
- होटल में अपने हिस्से का क्या करूँ?
- अपना हिस्सा बेच दो, अब बुढ़ापा आ गया है। अब तो हमें एक दूसरे का ध्यान रखना चाहिए।
- इस बार अपना हिस्सा बेचकर आ जाऊंगा।
यह बात हर बार कहता लेकिन होटल का हिस्सा न बेचता, न रंगून से आता।


* 4 *

रघुनाथ लगभग 50 वर्ष रंगून में काम करके, 70 वर्ष की उम्र में होटल का अपना हिस्सा बेचकर, एक बहुत बड़ी रकम लेकर, गाँव के घर शिफ्ट हुआ कि अपनी बीबी के साथ, गाँव में आराम से रह सके। रघुनाथ ने गाँव पहुँचकर उस रकम की एफ डी कराई।

तब तक छोटा बेटा प्रकाश अपने बच्चों सहित अयोध्या शिफ्ट हो चुका था पति पत्नी और एक नौकर, तीन लोग ही गाँव में रहते।
उसने गाँव के डाकखाने से एन एस सी खरीदे। घर के दोनों बेटों, बहुओं को पता चल गया कि कितना रुपया लेकर रघुनाथ गाँव आये हैं। उसके बाद दोनों बेटे जब भी जब गाँव आते, किसी न किसी कमी का रोना शुरू कर देते। हर सदस्य यही प्रयास करता कि कुछ न कुछ रुपया खींच ले। कभी स्कूल के खर्चे के नाम पर, कभी बीमारी के नाम पर, कभी बढ़िया कपड़े न होने पर आदि। कभी रघुनाथ पिघल जाता तो कभी उसकी बीबी। फलतः एफ डी टूटने लगीं।

रघुनाथ और उसकी बीबी के खाने, दवा, नेवता हकारी आदि मे भी खर्च होता था। पहले रघुनाथ को लगता था कि उसने जीवन में बहुत कुछ हासिल किया जो क्षेत्र में बहुत कम लोगों ने पाया है लेकिन अब रघुनाथ को लगने लगा कि अब वह नहीं हो रहा है जिसके लिये उसने जीवन खपा दिया।

दोनों बेटे जब परिवार सहित घर आते तो सभी को कुछ न कुछ चाहिए था। यदि कोई अन्य रिश्तेदार आता तो वह भी अप्रत्यक्ष रूपसे कुछ मांगता ही। गाँव में जिससे प्रेम से बात करो, वह कुछ न कुछ मांग लेता। धार्मिक सामाजिक संस्थाओं में जुड़ो तो उन्हें भी पैसा चाहिए था। कभी कभी रघुनाथ को लगता कि उसकी कोई पूछ नहीं नहीं है। पूछ है तो रंगून में कमाए पैसे की।


* 5 *

उसे लगा कि कोई पुकार रहा है। आँखें खोलकर देखा तो पाया कि घर का नौकर था,
- चलिए, खाना खा लीजिये।
- मन नहीं है।
बुझे मन से रघुनाथ बोले।

- मालकिन ने बुलाया हैं।
उठकर घर के भीतर गया। उसकी पत्नी बोली,
- समय से खाना खा लिया करिए। बीमारी का शरीर है।
- आँख झपक गयी थी।
- तुम भी खा लो।
- आप खा लीजिये। बच्चे न जाने कब लौटें। उनके लिये खाना ढककर रखकर, खाना खा लूँगी।
अनमने ढंग से रघुनाथ ने खाना खाया और हाथ धोकर चुपचाप अपने कमरे में आ गया। थोड़ी देर में रघुनाथ की पत्नी कमरे मे घुसी तो देखा कि रघुनाथ चुपचाप छत की ओर देख रहे थे। पूछा,
- कोई बात है क्या?
- नहीं।
- कुछ तो है। आपने खाना भी बड़े अनमने ढंग से, चुपचाप खाया, और अब चुपचाप छत देख रहे हैं?
- आदमी क्या सोचता है.... क्या होता है।
- क्या हुआ?
- देखो दोनों बेटों को, जब हम लोगों को रखने की बात थी तो दोनों झगड़ा कर रहे थे। जब घूमने की बात हुई तो दोनों मिल गए।
- बीबी बच्चों ने कहा होगा?
- बेटे न जाते तो वे अपने मन से चले जाते।
- ...
- दोनों बेटो को एहसास नहीं है कि दो दिन की छुट्टी में आये हैं तो माँ बाप के पास रहे, बाते करे।
- बहुओं का गाँव में मन लगता नहीं।
- किसको धोखा दे रही हो? अपने आप को, या मुझे?. जब बेटे ही ऐसे हैं तो बहुओं को क्यो दोष दें?
रघुनाथ की बीबी चुप रही है।
- जो बच्चे अभी भी लगातार कुछ न कुछ ले रहे हैं, कोई आर्थिक मदद नहीं कर रहे हैं, दो दिन साथ नहीं रख सकते, उनसे क्या उम्मीद?
- ...
- इनके लिये सब किया दिया व्यर्थ है
- ...
- मैंने कहा कि न तुम लोग इलाज करा सकते हो, न साथ रख सकते हो, न साथ रह सकते हो.... तो कम से कम मरने पर ढंग से किरिया करम कर देना ...
-आप ऐसी बात क्यो सोचते हैं?
अपनी पत्नी की बात को अनसुना करते हुए अनासक्त भाव से रघुनाथ बोलते रहे,
- ... तो, दोनों लड़ने लगे।
यह कहकर रघुनाथ कमरे से बाहर निकल कर दुआर पर चले गए।
अगले दिन सुबह दोनों बेटे परिवार सहित जाने लगे तो रघुनाथ ने दोनों बेटों को बुलाकर कहा,
- कल की बात से स्पष्ट कि तुम दोनों के पास खर्चा बहुत है। इसलिये तुम लोगों को... हम लोगों का ढ़ंग से किरिया करम करने में दिक्कत होगी। इसलिये मैंने एन एस सी पर बिना डेट के हस्ताक्षर कर दिया है ... तुम लोग अधिकृत प्रतिनिधि के रूप में हस्ताक्षर कर दो। उसको मैं सत्यापित कर दूंगा और वह यहीं रखा रहेगा। तुम लोग... इसे भुनाकर किरिया करम कर देना।

1 comment :

  1. जीवन के कड़वे सच बहुत कुछ सिखा देते हैं .

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