रवीन्द्र प्रताप सिंह की पाँच कविताएँ

प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर हैं। वे अंग्रेजी और हिंदी लेखन में समान रूप से सक्रिय हैं। फ़्ली मार्किट एंड अदर प्लेज़ (2014), इकोलॉग (2014), व्हेन ब्रांचो फ्लाईज़ (2014), शेक्सपियर की सात रातें (2015), अंतर्द्वंद (2016), चौदह फरवरी (2019), चैन कहाँ अब नैन हमारे (2018) उनके प्रसिद्ध नाटक हैं, बंजारन द म्यूज (2008), क्लाउड मून एंड अ लिटल गर्ल (2017),पथिक और प्रवाह (2016), नीली आँखों वाली लड़की (2017), एडवेंचर्स ऑफ़ फनी एंड बना (2018), द वर्ल्ड ऑव मावी(2020), टू वायलेट फ्लावर्स (2020) उनके काव्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके लेखन एवं शिक्षण हेतु उन्हें स्वामी विवेकानंद यूथ अवार्ड लाइफ टाइम अचीवमेंट, शिक्षक श्री सम्मान, मोहन राकेश पुरस्कार, भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार एस एम सिन्हा स्मृति अवार्ड जैसे बारह पुरस्कार प्राप्त हैं। वे देश विदेश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं के लिए नियमित लेखन करते हैं।


1. समय का विग्रह

समय का विग्रह कहीं होता,
बताओ बंधु,
यह अनवरत चल रहा
किंचित कहीं भटकाव?
सिर्फ कर्मठ ही बताये
इसकी गति का मान,
एक शाश्वत धीरता
नहीं विस्मय बोध,
न कहीं अल्पविराम!
समय का क्या बंध,
बंध तो अपनी ही रचना
चल रहे हों या गिरे हों,
संत्रास क्यों, सप्रेम सब।
जटिलता उत्पन्न होती
संश्लेषण के बिना
वर्ना कहाँ इसको पड़ी …
क्षण पथिक-संवेग कितने।
***

2. संत्रास

जीने लगे हैं,
कह रहे थे
उबर कर संत्रास से।
मालूम है,
सदियाँ गुजारी
मोह में, निर्वेद में।
तुम भी मगर
कितने कुटिल,
दस शीश काटे
राह में अर्पित किया,
पर तुम्हारा,
क्या कहें भी धैर्य!
विचलन नहीं,
फिसलन नहीं।
***

3. उद्दिग्नता बढ़ती रही

उद्विग्नता बढ़ती रही
रजनी तिमिर घटता रहा
किन्तु मन स्थिर कहाँ
देह का भी चक्र कुछ
प्रकृति के वश में नहीं।
श्वान गण का करुण क्रंदन,
असहज बोली पक्षियों की,
रात आधी- कोयलें हैं चीखती।
भोर होने के समय
श्वान गण का करुण रुदन।
संपूर्ण सृष्टि अनमनी सी
अज्ञात की शंका लपेटे
इधर बहके, उधर लटके
तर्क झांके, सब समेटे।
शत्रु अब तक है अपरिचित,
बींधता है, सामने आता नहीं।
छल कपट माया प्रबल
यही है बस शत्रु बल
कोरोना का रूप धर
दानव छली निज यूथ संग,
कपट छलना युक्ति से
उत्सवों पार छा रहा,
व्याधकीय व्यक्तित्व है
कलुषित बड़ी है भावना।
नहीं चाहे व्यक्तियों का
संग विचरते देखना
दुराशय है, मानवजाति प्रति
इसका कोई प्रतिशोध बाक़ी!

प्रकृति अपने रूप से
सचेतक है बन रही
निन्यानवे के फेर को
रख छोड़ थोड़ी देर तक
देखते हैं क्यों नहीं
उन्नीस-कोविड घूमता!
***

4. सूक्ष्मता का भय

प्रश्न कुछ उत्तर रहित
भाव बिंध उपबंध से
तर्क कितने लिए ओढ़े
अपशब्द भी उपसर्ग ले।
सूक्ष्म का भय, महाभय सा
मृत्यु सा विचरण करे
ये विश्व वैरी बन विषाणु
राक्षस बना विचरण करे।
संपूर्ण मानवता चकित है
श्रोत क्या इस सूक्ष्म का,
विज्ञानं भी जूझा पड़ा है
कर्त्तव्य की निज आन ले।
यह महामारी का समय …
विश्व के सम्मुख खड़े
प्रश्न कितने, भाव कितने
भाव, पर आशय रहित…।
***

5. आकांक्षा

आकांक्षाओं के वलय
कुछ टूट जाते तो सही
अकड़न यही, ला दे रहे
कितना करे इनको सही।
बरसात –भीगी- खाट सा
हर तरफ से द्रोह है।
एक का उपशमन करिये
फिर नया संवेग है।

व्यूह रचना, कूट रचना
मंदता, फिर मूढ़ता
हर तरफ हाहाकार है
हर तरफ हाहाकार है।


9 comments :

  1. संपादक महोदय ,
    मेरी कवितायेँ प्रकशित करने हेतु सादर आभार !
    रवीन्द्र प्रताप सिंह !

    ReplyDelete
  2. Great Sir ji! Wow, kya khub wording h reality par. Congrats!!! Lage raho...

    ReplyDelete
  3. शानदार रचनायें

    ReplyDelete
  4. Excellent Singh Sb.!Especially 'Aakanksha'.

    ReplyDelete
  5. वाह! बेहतरीन! लाजवाब! 🙏

    ReplyDelete
  6. Beautiful poems Sir!... wonderful choices of words. Nice expression.....

    ReplyDelete
  7. The poems reflect the mystery of time, questions of the people, expectations of the patient watchers, actions of the nature and reactions of man.

    ReplyDelete
  8. Excellent poems by a genius who has journeyed from plinth to paramount.

    ReplyDelete
  9. व्यूहरचना, कूटरचना... Seems to be a despised way in life by many in varied fields ! The poem reflects sensibility and receptivity of a heart('n soul) which knows & follows a gentleman's path ! 'आकांक्षा' : चिंतनीय पंक्तियां ॎ

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।