नीतिहीन राजनीति व असभ्य समाज के यथार्थ का सार: 21वीं सदी के उपन्यास

किरण ग्रोवर
बाज़ारवाद व उपभोक्तावाद ने दुनिया भर में जीवन को इतिहास, संस्कृति व विचारधारा से विच्छिन्न कर दिया है। भूमण्डलीकरण का ही परिणाम है कि मनुष्य मात्र उपभोक्ता में तब्दील हो गया है और उसके लिए अनिवार्य है, बाज़ार के अनुरूप चलना। विकसित देशोंकी मन्दी का खामियाज़ा विकासशील देश भुगतने के लिए मजबूर हैं, इससे वैचारिक रिक्तता भी बढ़ी है व अजीब संशय का वातावरण उत्पन्न हो गया है। जो व्यक्ति या समाज अपने को विस्तार देकर विचारधारा का दायरा व्यापक करना चाहता है, वह शून्य में धकेल दिया जाता है। बाज़ार ने मध्यवर्ग को विपथगामी बना दिया है। स्वार्थ के आगे संवेदना का क्षरण हो रहा है। प्रतिरोधों को छिन्न भिन्न करने मे बाज़ारवाद पूरी तरह सफल हो रहा है। आर्थिक विषमता का ऐसा दौर पिछली सदी में दिखाई नहीं दे रहा था। विकसित देश बाज़ार का विस्तार करके, साम्राज्य की सुरक्षा व संरक्षा करके, दूसरे देशों के बीच अपनी ताकत को बनाये रखने में कामयाब हो रहे हैं। ताकतवर देश अपने स्वार्थों की पूर्ति के निमित्त दुनिया पर कब्ज़ा जमाये हुए हैं। विदेशी कम्पनियों के लिए लगातार परिस्थितियाँ निर्मिति की जा रही हैं, अब तो खुदरा निवेश के लिए भी रास्ता साफ़ हो गया है। समाजवादी अर्थव्यवस्थाएं अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी की कर्ज़दार बन रही हैं। अर्थशास्त्री अपना निर्णय विशेष आधार पर सुनाते हैं जो अपवाद के दायरे में शामिल हैं।1 गरीबी व ऐतिहासिक विषमताओं से परिपूर्ण दुनिया में जब मुक्त व्यापार के मानक राज करने लगते हैं तो गरीब देशों को घाटा उठाना पड़ता है। दुनिया के विकसित, विकासशील, गरीब देशों के आर्थिक स्तर में जो भेद की खाई है , वह प्रत्यक्ष दृष्टिगत हो रही है क्योंकि सारे विश्व को आर्थिक रूप से सम्पन्नता के मजबूत धागे में पिरोने का नया नाटक रचा जा रहा है।

आज के दौर में कोई भी देश राजनीतिक दृष्टि से ताकतवर हुए बिना कोई भी व्यक्ति, समाज व राष्ट्र आर्थिक व्यवस्था का विकसित हीं कर सकता। कोई भी व्यवस्था जब तक वर्गविहीन नहीं हो जाती तब तक समाज को न्याय में पारंगत नहीं कर सकती। 21 वीं सदी का राजनीतिक परिदृश्य अपने आप में अन्तर्विरोधी प्रतिबिम्बित होता है। राजनीतिक अवसरवाद का ऐसा भयानक दृश्य पहले कभी नहीं देखा था। असगर वजाहत ने लिखा है कि ‘शब्दों पर राजनीति कहिए या अवसरवादी छद्म राजनीति की काली छाया पड़ने लगे तो लेखक को बड़ी बेचैनी होती है और वह शब्दों को बचाने के लिए बेचैन हो उठता है। वह जानता है कि शब्द ही न रहेंगे यानी अर्थवान शब्द ही न रहेंगे तो मनुष्य ही न रहेगा, समाज ही न रहेगा। इसलिए लेखक लिखता है शब्दों को अर्थ देने या अर्थवान बनाये रखने के लिए।’2 राजनीतिक संगठन राजनीति को अपने निहित स्वार्थ के लिए साम्प्रदायिक बनाता है तभी देश में घटनाएं घटित होती हैं। राजनीतिक वातावरण में परम्पराओं का लोप हो चला है। इस सदी में राजनीति ने जातियों के भीतर के अन्तर्विरोध को उभार दिया है व राजनीति एक उद्योग के रूप में पनपी है। भारत में उदारीकरण से आर्थिक विषमता में वृद्धि हुई है। यह केवल विषमता का मामला नहीं है अपितु साम्राज्यवादी नीति को अमली जामा पहनाने का उपक्रम रचा जा रहा है। प्रजातन्त्र के लम्बे अनुभव के बावजूद स्थितियाँ राजनीतिक विखण्डन को जन्म देने में कारगर भूमिका निभा रही हैं।3 राजनीति में फलता का मूल्य अब महामूल्य में बदल गया है। इस सदी में राजनीतिक मूल्य ही नहीं प्रतीकों के अर्थ भी बदल गये हैं। राजनीति सामाजिक जिम्मेदारी से पूर्णतः मुक्त हो रही है व जनता को नकारात्मक सोच की दलदल में धकेला जा रहा है वास्तविक तथ्य यह है कि मौजूदा नीतिहीन राजनीति का कोई विकल्प नज़र नही आ रहा।

जब जनता सामाजिक चेतना से विच्छिन्न हो जाती है तब धर्म, जाति, क्षेत्रीयता, वंश, भक्ति व उपभोक्तावाद के लिए झुण्डों में परिणित हो जाती हैं, जोकि इस सदी की सबसे बड़ी विडम्बना है। इस सदी में मानव के द्वारा जनकल्याण, क्रान्ति के नाम पर मानवता कलंकित हो रही है। इस सदी में मानव व्यवहार में आया परिवर्तन समाजशास्त्रियों के लिए अबूझ पहेली बना हुआ है। लुकाच ने यथार्थ के चित्रण में ‘समग्रता के प्रश्न की निर्णायक भूमिका’ बताई थी , इसका कारण यह था कि यथार्थवादी रचना के लिए इतिहास का बोध, वर्तमान का अनुभव, भविष्य का सपना आवश्यक है, इन तीनों के मेल से ही रचना का परिप्रेक्ष्य बनता है। इतिहास को मिथ्या घोषित करने की कोशिश नवीनतम रूप धारण कर रही हैं। देश और समाज के मुख्य शत्रु की पहचान कठिन हो चुकी है।4 हम कन्फयूज़न के शिकार हैं इसलिए हमारी बौद्धिकता पर प्रश्न चिह्न लग गया है। मानवीय संवेदनाओं का हृास भी इस सदी का नया लक्षण है। अनिल कुमार श्रीवास्तव जी ने लिखा है कि ‘जाति उन्मूलन व जाति वर्चस्व के प्रयास इस सदी में साथ साथ दिखाई देते है। यह एक समाजशास्त्रीय समस्या है जिसकी निराकरण राजनीतिक स्तर पर करने की कोशिश की जा रही है। जिस जाति को सर्वाधिक दंश सहना पड़ता है वह जातीय स्वाभिमानी रैलियाँ कर रही हैं। ब्राह्मणवाद से लड़ने के नाम पर नया ब्राह्मणवाद उभारा जा रहा है।’5 समाज में विचार का मर जाना, तर्क का लोप होना हमें किस दिशा की ओर संकेतित कर रहा है। तर्कहीनता सामाजिक जवाबदेही को खत्म करती है जिससे अनर्गल तत्त्वों को प्रवेशित हो जाते हैंै। मनुष्य इस दुनिया में चिन्तनशील प्राणी है उसकी चिन्तन की प्रक्रिया विचारों के क्षेत्र में चलती है। यह प्रक्रिया संस्कृति के निर्माण में सहायक होती है। विचार उसी समय विचारधारा का रूप ले लेते हैं जब ऐतिहासिक प्रक्रिया में सामजिक व आर्थिक संरचना से टकराने लगती है। इसलिए वैचारिक प्रतिबद्धता विचारों की नहीं बल्कि विचारधाराओं की होती है।

उपन्यास में समय व समाज की गतिविधियों को अभिव्यक्त करने के अवसर जितने अधिक होते हैं उतने किसी और विधा में नहीं। उपन्यास में प्रयोगधर्मिता की संभावना अधिक होती है। वास्तविकता का प्रतिपादन करने में उपन्यास विधा विस्तृत, गहन व पैनी होती है। उपन्यास यथार्थ को नई दृष्टि से विश्लेषित करता है। उपन्यास मानव समाज की परिवर्तनशील जीवन का जीवन्त चित्र होता है।6 21 वीं सदी के समाज की विभिन्नताओं, विषमताओं, विसंगतियों, समस्याओं व आवष्य आवश्यकताओं की अभिव्यक्ति के लिए उपन्यास प्रभावशाली विधा के रूप में उभरा है। भारतीय समाज की समस्याओं व संकटों से हिन्दी की रचनाशीलता प्रभावित हो रही है। राम स्वरूप चतुर्वेदी ने समकालीन साहित्यिक वातावरण में उपन्यास की महत्ता को सर्वोपरि माना है। यथार्थवादी लेखन के लिए उपन्यास सबसे उपयुक्त विधा है। यथार्थवादी उपन्यासकार भौतिक जगत की सत्ता को स्वीकार करता है उसी के अनुरूप साहित्य की रचना करने लगता है। समाज को समझने का दृष्टिकोण ही यथार्थवाद की पृष्ठभूमि तैयार करता है। मेनेजर पाण्डेय जी ने लिखा है कि ‘किसी रचनाकार की चिन्ता का मुख्य विषय जीवन का यथार्थ है व जीवन का यथार्थ बहुआयामी होता है। रचनाकाल में रचनाकार की चेतना के उपरी स्तर व भीतरी अन्तर्दृष्टि में द्वन्द्व होता है। अन्तर्दृष्टि की विजय में यथार्थवाद की विजय निहित होती है।’7 रचना में जीवन जगत के यथार्थ के प्रति रचनाकार की संवेदनशीलता प्रकट होती है। उपन्यास रचना में यथार्थ की अभिव्यक्ति समष्टिपरक होती है। हिन्दी के उपन्यासकारों के समक्ष एक आदर्श था जिसकी पृष्ठभूमि यथार्थमूलक थी।

इस सदी में राजनीति ने प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में जीवन के कोने व अन्तरे में प्रवेश या है। 21 वीं सदी का राजनीतिक परिदृश्य कि कई अर्थों में अन्तर्विरोधी प्रतीत होता है। सहमति व असहमति का नाटक राजनीति में खूब देखने को मिला है। आज का राजनीतिक वातावरण किसी परम्परा की याद नहीं करवाता अपितु उसमें परम्पराओं का लोप हो गया है। राजनीतिक व्यवस्था की विकृत्तियों का विश्लेषण करने में शमोएल अहमद का उपन्यास ‘महामारी’ सक्षम प्रतीत होता है। इस उपन्यास का पात्र शिरवानी समाज विरोधी ताकतों से लड़ने का निश्चयकरता है व ढानचू की मौत होने पर उसके नाम पर एक संस्था बनाता है। नेता के भाषण का अंश इस प्रकार है-‘आज़ादी की जंग से तीन बातें पैदा हुई, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र व सामाजिक न्याय। गांधी जी की अगुवाई में तीनों बातें उभर का सामने आई। आज की राजनीति ने धर्मनिरपेक्षता पर कड़ा प्रहार किया है। यह हमला अगर जारी रहा तो भाईयों, देश में अराजकता फैल जायेगी------ भीड़ खामोश है। नारे लगाती। बीच बीच में ताली बजा देती है। मसीहा की कड़क आवाज़ माईक पर मुसलसल उभर रही है।’8 लेखक ने गोधरा घटना व सैक्यूलर ताकतों के संघर्ष का उल्लेख करके उपन्यास के कलेवर में अभिव्यक्त घटनाओं को लम्बी दूरी की मार करने वाली बताया है कि राजनीति की महामारी फैल गई है उससे बचने के लिए अलग संघर्ष की आवश्यकता है।

युवा वर्ग पुरानी व्यवस्था के खिलाफ़ संघर्ष करते हुए ऐसे समाज का सपना देखते हैं जिसमें लिंग भेद व जाति भेद न हो। मनोज सिंह ने अपने उपन्यास ‘होस्टल के पन्नों से’ में होस्टल की स्मृतियों के बहाने से सामाजिक विषमता और संरचना से संग्रथित यथार्थ की अभिव्यक्ति की है। दुष्यन्त के जीवन में घटित घटना के माध्यम से सामाजिक सम्बन्धों को परखने और उनसे उत्पन्न प्रश्नों का हल निकालने की कोशिश की है। उपन्यास की भूमिका में लेखक का कहना है कि ‘युवा विद्रोह की उर्जा को क्रान्ति में परिवर्तन करनेे के लिए विचार, नेत्तृत्व व प्रेरणा की आवश्यकता होती है।’9 विद्यालय के हीरो दुष्यन्त को खलनायक बनाने में राजनेता विष्णुदत ने लोगों को भ्रम में डालने की कोशिश की अपितु मीडिया ने भी नकारात्मक भूमिका का निर्वाह किया। दुष्यन्त के सम्बन्ध में पुलिस कमिश्नर ने भी वक्तव्य पढ़ा न मीडिया ने भी इसे रिपोर्ट प्रसारित करके सनसनीखेज़ बनाया-‘ दुष्यन्त नाम का यह शख्स दो किलो हेरोइन के साथ विराट नगर तकनीकी संस्थान के प्रांगण में पकड़ा गया है।’10पुलिस के चरित्र को भी राजनीतिक व सामाजिक व्यवस्था के साथ जोड़कर समझा जा सकता है। इस उपन्यास में दुष्यन्त की बेटी अन्त में अपने पिता का कार्य संभाल लेती है-‘मगर तुम मेरे दोस्तों, रुकना नहीं, उल्टे और तेजी से आगे बढ़ना। परिवर्तन की इस हवा को तूफ़ान हवा देना। उन सभी पेड़ों को उखाड़ फैंकना जो हवा को प्रदूषित कर रहे हैं।’11 इस आह्वान में मनोज सिंह ने जनवादी चेतना को व्याप्ति का आख्यान प्रस्तुत किया है।

वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप प्रतिपल बदलता बाज़ार, बेरोज़गारी में फँसा युवा वर्ग, राजनीतिक मूल्यों का पतन, स्थापित विचारों और मान्यताओं की असरहीनता, घ्वस्त होता व्यवस्था तंत्र ये सब ऐसे कारक हैं जिनसे भारतीय परिदृश्य में उठा पटक का परिचय मिलता हैै। सामाजिक बोध की दृष्टि से प्रमोद कुमार तिवाड़ी का उपन्यास ‘डर हमारी जेबों में’ दस्तावेज़ के रूप में सामने आया है। यह उपन्यास भारतीय जनतंत्र के वास्तविक चेहरे को बेनकाब करता है। भ्रष्टाचार के शास्त्र को प्रभावी रूप में रचते हुए अफसरों को तीन कोटियों यथा घासखोर, भूसखोर व घूसखोर में वर्गीकृत किया है। शक्तिशाली वर्ग समाज में अपराध की संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं। प्रमोद कुमार तिवाड़ी ने विवेच्य कृति में यथार्थ के छोरों का संस्पर्श किया है। इस उपन्यास में राजनीति और अपराध का सामंजस्य, जातिवाद, गरीबी, अभाव, भ्रष्टाचार, कामचोरी, चापलूसी खेलासराय की विशिष्ट पहचान हैं। इस उपन्यास में व्यक्ति व समाज की कुण्ठाओं का यथार्थ चित्रण किया गया है। विषाल की भूमिका उपन्यास में महत्वपूर्ण बन पड़ी हेै , वह समय के नरक को एक वेदना की तरह जीता है-‘मूलतः अंधा था कई हज़ार आंखों वाला यह शहर। न तो उसे अपने कुव्यवस्थित स्कूल दिखाई देते थे, न अपने बच्चों का असुरक्षित बचपन। अपने नायकों व खलनायकों की पहचान नहीं थी उस शहर को।’12 प्रमोद कुमार ने अपनी रौ में भागते हुए समाज के उस रूप को दर्शाया है जिसमें विसंगतिपूर्ण चरित्र उभरते हैं।

गाँव की राजनीति ग्रामीण लोकतंत्र की अवधारणा को झुठला रही है। भगवान दास मोरवाल ने ‘बाबल तेरा देस में’ शकीला जतूनी के माध्यम से औपन्यासिक घटना को विन्यस्त किया हैं। शकीला ने नारी अस्मिता की लड़ाई को राजनीतिक मंच प्रदान किया। शकीला गाँव की मानसिकता को समझ कर सामाजिक सरोकारों के रूप में महिलाओं में जागृति लाने का प्रयास कर रही थी। शकीला पंचायती व्यवस्था की तिकड़मों को न समझ पाई व पुरुषों की घृणित मानसिकता का ईलाज कर पाई। गाँव वाले अगले चुनाव में काट के लिए पद्मा को खड़ा कर देते हैं ‘शकीला इस बार चुनाव हार गई, वह भी भारी मतों के अन्तर से, जो प्रत्याशी इस चुनाव में भारी मतों से विजयी घोषित किया गया, वह और कोई नहीं बकौल उसी पुरुष प्रत्याशी, उस झगड़े में शामिल दोनों बिल्लियों में से दूसरी बिल्ली यानी पद्मा थी।’13 वास्तव में पंचायती व्यवस्था का यही सच है, सरकार तो महिलाओं की बराबर भागीदारी सुनिश्चित करना चाहती है पर गाँवों में पुरुषवादी मानसिकता ही व्यवस्था में कार्यरत रहती है। यही राजनीतिक विसंगति का यथार्थ है।

भारतीय लोकतंत्र की विसंगतियों के बहाने समाज में व्याप्त विडम्बनाओं को मिथिलेश्वर ने ‘सुरंग में सुबह’ उपन्यास में संकेतित किया है। इस उपन्यास का नायक पराजय स्वीकार न करके समाज व्यवस्था के लिए निरन्तर संघर्ष करता है। इस उपन्यास का सारांश विजय के कथन में निहित है-‘कौन हमारा विरोध कर रहा है और कौन समर्थन, इससे अधिक महत्त्व हमारे लिए अपने मार्ग का विकास और विस्तार है।’14 चुनाव प्रक्रिया के दौरान लोकतन्त्र का स्वरूप समझ में आ जाता है कि लोकतन्त्र में विकृतियों, अराजकताओं व पतनशीलता को खुल कर खुलने का अवसर मिलता है। तिरबेनी अपने पुत्र की नौकरी के लिए राव मानवेन्द्र बाबू के पास जाता है तब नौकरी की हां होने पर पिता पुत्र को सुखद अनुभूति होती है- ‘जनार्दन के पिता ने सोच रखा था कि राव मानवेन्द्र बाबू को सारी बात याद करवानी पड़ेगी। पर बेटे के साथ उसे आते देखकर उन्हें सब कुछ स्मरण आ गया।’15 जब वही नेता की हत्या हो जाने के बाद जनार्दन शून्य हो जाता है। जनार्दन का मूल मंत्र था कि लोकतंत्र को अपनी भूमिका में ईमानदार होना ही होता है। मिथिलेश्वर ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि नयी पीढ़ी समाज को नया रूप देने के लिए आगे बढ़ रही है।

संघर्ष सामाजिक व्यवस्था की अनिवार्यता है सामाजिक प्रक्रिया की समग्रता को समझने वाला लेखक द्वन्द्व व संघर्ष से किनारा नहीं कर सकता। अलका सरावगी यथार्थ के नये-नये क्षितिज अन्वेषित करने के लिए अपने उपन्यासों में नवीन उद्भावनाएं करती हैं। अलका सरावगी के ‘शे ष कादम्बरी’ में अभिव्यक्त सामाजिक यथार्थ जितना पीड़ादायक है, वह पाठकों की चिन्तन प्रक्रिया के लिए चुनौती है। मां बाप की मानसिकता होती है कि लड़की पराया धन है-‘ सविता अपने पति से प्रेम , अधिकार प्राप्त नहीं कर पाती , वह अपना दर्द रुबी को सुनाती है-कभी-कभी सुबह चार बजे मैं क्या नहीं जानती थी कि इतनी रात गए क्या मीटिंग होती है। एक दिन एक रूसी लड़की की अधनंगी तस्वीर उसके पास मिली। मैने पूछा तो कह दिया, मेरी ‘क्लाइंट’ है- रूबी दी सविता की आँखो में पानी की हलकी परत देखती उसकी बातें सुनती रहीं।’16 रुबी गुप्ता व सविता का रिश्ता इस उपन्यास में कष्ट के नाते ही है परन्तु रिश्ता इतना सघन है कि उसके समानान्तर दूसरा रिश्ता नहीं हो सकता। इस उपन्यास में कादम्बरी एक पत्रकार है जो दिल्ली के सोशल एक्टिविस्ट के साथ बिना विवाह किये हुए रहती है। यद्यपि रूबी गुप्ता को इससे एतराज है परन्तु कुछ न कह पाने की विवशता इस रिश्ते को मौन स्वीकृति प्रदान करती है। अलका सरावगी नारी की पीड़ा, उसके दर्द, उसकी बौद्धिक क्षमता, उसके गुणों आदि को अपने लेखन के लिए प्रयोग करती हैं। हर नारी एक द्वन्द्व में जीती है-‘वे न कभी पति से कोई असुविधाजनक प्रश्न पूछ पाई और न ही अपनी बेटियों से जिन्होंने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण निर्णय में उन्हें शामिल तक नहीं किया।‘‘17 औरत के लिए सिद्धान्त और व्यवहार का जीवन अलग-अलग होता है। सिद्धान्त में वह प्र्रजातन्त्र की स्वतन्त्र नागरिक तथा व्यावहारिक जीवन में औरत का सबसे बड़ा आभूषण उसका मौन रहना। इस उपन्यास में रुबी की वसीयत महत्वपूर्ण बिन्दु है- ‘मैं सविता से प्रार्थना करती हूं कि वह जरुरत होने पर इन रूपयों को अपना अधिकार समझ कर ले। यह अधिकार उसे इस बात से है कि उसमें मैंने अपने को देखा है, उसी तरह जैसे हम बच्चों में अपने को देखकर उनके कष्ट से स्वयं गुज़रते हैं।’18 यह औपन्यासिक कृति उपभोक्तावादी मूल्यों के बरक्स उदारवादी मूल्यों की स्थापना करती है। आधुनिक जीवन के पेचोखम का रूपायण उपन्यास को अविस्मरणीय बनाता है। वस्तुतः विवेच्य उपन्यास दो पीढ़ियों के अन्तराल और नवयुवकों व नवयुवतियों में उभरती जनचेतना को रेखांकित करता है।

जिस वर्ग के पास रोटी कपड़ा मकान तो है परन्तु सम्बन्धों के दर्पण में उनकी मनोवैज्ञानिक विक्षिप्तता है जिसके माध्यम से रमेष चन्द्रशाह ने उपन्यास ‘विनायक’ में उच्च मध्य वर्गीय समाज के सम्बन्धों के दायरे में मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं का विश्लेषण किया है। पुरुषवादी समाज व्यवस्था साम्राज्यवाद के प्रभाव से कम नहीं हुई अपितु सुदृढ़ हुई है। वैश्वीकरण के प्रभाव के कारण जीवन मूल्य बदलने लगे हैं। इस उपन्यास में विनायक की विदेश यात्रा व मार्गरेट के साथ सम्बन्धों की दरार को कभी भरा नहीं पा सकता-‘अरे मुझ से क्या दुनिया की किसी भी औरत से, जो दो-दो बच्चों की मां हो, महज घर की गाड़ी चलाने की खातिर जिसने वर्षों बियाबान में गुज़ारें हों , उससे क्या उम्र की ढलान पर ऐसा पागलपन झेला जा सकता है।’19 उपन्यासकार ने दर्शाया है कि मालती और विनायक के बीच यह जो खाई हम देख रहे हैं वह वह कोई एक दिन में तो पैदा नहीं हो गई। मार्गरेट की चिट्ठी तो निमित मात्र है। यह वैश्वीकरण का ही प्रभाव है।

मुशर्रफ आलम जौकी ने अपने उपन्यास ‘सुनामी में विजेता’ के अन्तर्गत समाज में घट रही परिघटनाओं को विशेष अन्दाज़ में व्यक्त किया है। इस उपन्यास में गरीबी का अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र तो वर्णित है परन्तु धार्मिक व आर्थिक संघर्ष का भी विस्तारण किया गया है। सम्प्रदायवादी कभी मानवता के पक्ष में योगदान नहीं दे सकता। भ्रष्ट व्यवस्था जनता के सामाजिक व आर्थिक स्तर को उंचा नहीं उठा सकती। विवेच्य उपन्यास में सुदीप सानियाल व चारु सानियाल के बीच बहस सामाजिक यथार्थ का स्वरूप स्पष्ट होता है-‘जहां तुम्हारा आन्दोलन दुर्बल पड़ता है गल्त रंग ले लेता है। समाज का बुर्जआ वर्ग उसे अपने अपने शराब व स्काॅच के गिलासों में भर लेता है। अपने आदर्शवाद के नाम पर व तुम्हारी विचारधाराओ के नाम पर वो अपनी नंगी किट्टी पार्टियों में इतनी उल्टियाँ करता है कि बदबू आने लगती है।’20 उपन्यासकार ने यह दिखाया है कि संकल्प दृढ़ हो तो सामाजिक परिस्थितियों का सामना किया जा सकता है।

यथार्थ का औपन्यासिक रूपान्तरण एक संश्लिष्ट प्रक्रिया है। यथार्थ तात्कालिक व संचित अनुभव से आकार ग्रहण करता है। यथार्थवादी साहित्य का रास्ता सामाजिक व राजनीतिक विचारधारा से होकर गुज़रता है। 21 वीं सदी के रचनाकार सामाजिक विकास के नियमों को द्वन्द्वात्मकता को पहचान कर समाज के गुणात्मक विकास के प्रति स्वस्थ दृष्टि प्रदान करते हैं। उपन्यास समाज के अन्तर्मन में झांकने का साहित्यिक औजार है। 21 वीं सदी के उपन्यासकारों ने प्रतिगामी शक्तियों, नीतिहीन राजनीति व असभ्य समाज के यथार्थ का सार तत्व प्रस्तुत किया गया है। मनोज सिंह ने सामाजिक विषमता, अलका सरावगी ने पीढ़ियों के अन्तराल में उभरती जनचेतना, मुशर्रफ आलम जौकी ने सामाजिक यथार्थ को स्वरूपित किया है। प्रमोद कुमार तिवाड़ी, मिथिलेश्वर, भगवान दास मोरवाल, शमोएल अहमद ने लोकतन्त्र में विकृतियों, अराजकताओं व पतनशीलता को बेनकाब करते हुए राजनीतिक वैचारिकता का यथार्थ में विश्लेषण किया है। रमेष चन्द्र शाह ने समाज के सम्बन्धों के दायरे में मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं का विवेचन किया है। यथार्थ की रचना प्रक्रिया अपने पूर्वाग्रहों से टकराती हुई इतिहास का बोध, वर्तमान का अनुभव, भविष्य का सपना संजोती है इसीलिए चयन के प्रति सावधान भी करती है।


सन्दर्भ ग्रन्थः-
1 त्रिभुवन सिंह, हिन्दी उपन्यास और यथार्थवाद, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, 1965, पृष्ठ 99।
2 देवेन्द्र चैहान, हिन्दी के सामाजिक उपन्यास, अनन्त प्रकाशन, मेरठ, 2003, पृष्ठ 167।
3 विवेक कुमार, इक्कीसवीं सदी के हिन्दी उपन्यासों में राजनीतिक चेतना, विविधा प्रकाशन, मिर्जापुर, 2009, पृष्ठ 176
4 राम विनय शर्मा, यथार्थ की कथा दृष्टि, नई किताब, रोहिणी, 2011, पृष्ठ 125।
5 अनिल कुमार श्रीवास्तव, इक्कीसवीं सदी के राजनीतिक आयाम, आधार प्रकाशन गाजीपुर, 2005, पृष्ठ 154।
6 राम विनय शर्मा, यथार्थ की कथा दृष्टि, नई किताब, रोहिणी, 2011, पृष्ठ 123।
7 मैनेजर पाण्डेय, साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका, हरियाणा साहित्य अकादमी, चण्डीगढ़, 1989 पृष्ठ 134।
8 शमोएल अहमद, ‘महामारी’ शैवाल प्रकाशन, गोरखपुर, 2006, पृष्ठ 106।
9 मनोज सिंह, ‘हॉस्टल के पन्नों से’, राजकमल पेपर बैक्स, नई दिल्ली, 2011, पृष्ठ 75।
10 वही पृष्ठ 56।
11 वही पृष्ठ 77।
12 प्रमोद कुमार तिवाड़ी, ‘डर हमारी जेबों में’, सामयिक प्रकाशन, आई॰एस॰बी॰एन 817138059, 2008, पृष्ठ 45।
13 भगवान दास मोरवाल, ‘बाबल तेरा देस में’, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृष्ठ 156।
14 मिथिलेश्वर, ‘सुरंग में सुबह’, भारतीय ज्ञानपीठ, 2003, पृष्ठ 35।
15 वही पृष्ठ 15।
16 अलका सरावगी, शेष कादम्बरी’, राजकमल पेपर बैक्स, नई दिल्ली, 2008, पृष्ठ 70।
17 वही पृष्ठ 9।
18 वही पृष्ठ 199।
19 रमेश चन्द्र शाह, ‘विनायक’, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, आई॰एस॰बी॰एन रू 9788126719921, 2016, पृष्ठ 80।
20 मुशर्रफ आलम जौकी, ‘सुनामी में विजेता, सामयिक बुक्स, नई दिल्ली, 2009, पृष्ठ 79।

अन्तरताना सामग्रीः-
 1 http://jantakapaksh.blogspot.com/2013/07/blog-post_24.html
 2 https://mimirbook.com/hi/04845ceff51
 3 http://www.manojsingh.com/
 4 https://www.goodreads.com/book/show/40500861-shesh-kadambar
 5 https://www.pustak.org/index.php/books/.../Pramod%20Kumar%20Tiwari
 6 https://www.pustak.org/index.php/books/bookdetails/9516
 7 http://books.rediff.com/book/babal-tera-desh-me-/9788126708864?sc_cid=author
 8 https://www.amarujala.com/columns/opinion/novel-of-the-land

डॉ. किरण ग्रोवर
एसोशियेट प्रोफ़ेसर, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, डीएवी कालेज, अबोहर। चलभाष: +91 947 832 0028
ईमेल: groverkirank@gmail.com

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