काव्य: राखी राठौर

राखी राठौर
भूख

फर्क होता है,
भूखे होने और रहने में।
आप भूखे होते हैं-
अपनी मर्जी से
पक्के घरों में बैठे,
सामने टीवी चला कर,
पसंदीदा धारावाहिक या फिर देख कर।
आप भूखे होते हैं-
केवल फल खाकर,
शरीर पर आकर्षक कपड़ों और गहनों के साथ।
वे भूखे रहते हैं-
तब भी,
जब पानी पेट में चुभने लगता है
शरीर शिथिल होते हुए भी
कोसों दूर की यात्रा करनी पड़ती है।
वे भूखे रहते हैं-
चिथडों में, सड़कों पर, झुग्गियों में,
जब फावड़ा उठाना हो, पत्थर तोड़ना हो,
और शरीर आपका साथ ना दे।
वे तब भी भूखे होते हैं-
जब बच्चा बार-बार
माँ का दूध निचोड़ लेता है।
पाँव के छाले,
हाथों की ठेठ,
आँखों के गड्ढे, और
एक-एक हड्डी को गिना जा सकने वाला ढांचा,
दिखाता है भूख की त्रासदी।
भूख एक जैसी नहीं होती,
बहुत फर्क होता है
भूखे होने और रहने में।
अक्सर गरीब भूख फुटपाथ पर,
और
अमीर भूख को पक्के मकानों में देखा जाता है।।
***


टोटका

मेरी माँ
जिसे नहीं समझ आता विज्ञान।
उसकी बातें, उसके तर्क
जो समझती है, केवल
ईश्वर का प्रकोप, पूजा और टोटका।
उसके अनुसार कई लाइलाज बीमारियों
ना निजात पाई जा सकने वाली मुसीबतों,
का एक ही हल
टोटका।
जब कभी होती हूँ बीमार
तो सर्वप्रथम वह लगाती है, धूप की राख
फिर करती है नजर का टोटका
और तब हार कर
खिलाती है दवा,
जब कभी होती होती है भयंकर बारिश
तो वह समझती है ईश्वरीय प्रकोप
डालती है आंगन में उल्टा तवा
और करती है इंतजार।
बरसात थमने पर
करती है हमारे तर्क खारिज,
हँसती है हमारे भोलेपन पर
(शायद स्वयं पर)।
सुनाती है कई किस्से
जिनमें शामिल होते हैं, कई टोटके
कैंसर, चेचक आदि बीमारियों के।
महामारी के दौर में
ताली बजाने, दिया जलाने
को मानती है नया टोटका
करती है पूरे जतन से।
पर अब निराश है
क्योंकि,
वह देख रही है, सुन रही है
प्रतिदिन व्यक्तियों के मरने की खबर।
निराश है,
अपने टोटके की असफलता से।।
***

एम ए (हिन्दी), जे आर एफ, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली.

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