वर्तमान परिदृश्य में संत साहित्य की प्रासंगिकता

विद्यासागर डॉ उर्मिला पोरवाल

हिन्दी विभागाध्यक्ष, एस.डी.सी बैंगलोर केन्द्रीय विश्वविद्यालय बैंगलोर


साहित्य शब्द अंग्रेजी के Literature का पर्याय है। जिसकी उत्पत्ति लैटिन शब्द Letter से हुई है। साहित्य शब्द का विग्रह किया जाए तो दो रूप परिलक्षित होते हैं। पहला - स+हित+य के योग से बना है साहित्य जिसका अर्थ है सहभाव, अर्थात हित का साथ होना ही साहित्य है।

संतो के बारे में विचार करें तो गीता में श्रीकृष्ण ने संतों की चर्चा करते हुए कहा है कि -
समदुःख सुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्य निन्दात्म संस्तुतिः।।

अर्थात जो सुख एवं दुःख दोनों को ही समान भाव से देखता है, जिसे अपने मान-अपमान, स्तुति एवं निन्दा की चिंता नहीं रहती, जो धैर्य से काम लेता है, वही संत है। पाणिनीय ने भी अष्टाध्यायी 'के इस सूत्रों के माध्यम से बताया है कि 'शम्' शब्द 'त' प्रत्यय से संयुक्त होकर 'शान्त' बनता है। इसी का अपभ्रंश 'संत' शब्द है। कबीरदास जी ने भी संत की व्याख्या करते हुए कहा है कि
निरवैरी निहकामता, साईं सेती नेह।
विषया सून्यारा रहै, संतन के अंग एह।।

अर्थात जिसका कोई शत्रु नहीं है, जो निष्काम है, प्रभु से प्रेम करता है और विषयों से असम्पृक्त रहता है, वही संत है।
स्पष्ट है किसी भाषा या विषय विशेष के वाचिक और लिखित (शास्त्रसमूह) रूप को साहित्य कहते हैं। इसलिए संत साहित्य देश की राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक परिस्थितियों के फलस्वरूप विरचित भावनात्मक एवं अनुभूतिपूर्ण जनसाहित्य है।

मूलरूप से संत साहित्य को विषय-वस्तु की दृष्टि से तीन वर्गों में विभाजित कर सकते हैं
(1) जिसमें अपने विचारों का प्रतिपादन किया गया है।
 (2) जिसमें विभिन्न धर्मों व सम्प्रदायों की रूढ़ियों का खण्डन किया गया है।
(3) जिसमें कवि ने वाद-विवाद और खण्डन-मंडन से ऊपर अपनी मौलिक अनुभूतियों का प्रकाशन भाव-पूर्ण शब्दों में किया है।

संत साहित्यकारों के कवित्व का सर्वोत्त्कृष्ट रूप तीसरे वर्ग के काव्य में है जिसमें उन्होंने अपने अलौकिक प्रियतम के प्रेम की अभिव्यंजना की है।

हिन्दी साहित्य में संत साहित्य का सूत्रपात उस समय हुआ जब हिन्दी स्वयं ही बाल्यावस्था में थी। अर्थात जब हिन्दी अपभ्रंश के गर्भ में अव्यक्त रूप से विद्यमान थी। जिस प्रकार हिंदी साहित्य के प्रत्येक विधा में मतभेद दृष्टिगत होते हैं वैसे ही संत परंपरा के लिए भी विद्वानों में मतभेद रहे। मुख्य रूप से पंडित परशुराम चतुर्वेदी और आचार्य रामचंद्र शुक्ल।

पं० परशुराम चतुर्वेदी ने संत साहित्य के सूत्रपात के संबंध में लिखा है, वह संत परंपरा के इतिहास को समझने के लिए सटीक है। "संत परंपरा का प्रथम युग वस्तुतः जयदेव से आरंभ होता है और उनके पीछे दो सौ वर्षों तक के संत अधिकतर पथ-प्रदर्शकों के ही रूप में आते हुए दीख पड़ते हैं। विक्रम की पंद्रहवीं शताब्दी में कबीर साहब का आविर्भाव हुआ, जिन्होंने सर्वप्रथम संतमत के निश्चित सिद्धांतों का प्रचार विस्तार के साथ एवं स्पष्ट शब्दों में आरंभ किया।"

जहाँ परशुराम चतुर्वेदी ने जयदेव से ही संत काव्य परंपरा का आरम्भ माना है वहाँ दूसरी ओर आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने संत नामदेव से। शुक्ल जी ने लिखा है, "महाराष्ट्र देश के प्रसिद्ध भक्त नामदेव ने हिन्दू-मुसलमान दोनों के लिए सामान्य भक्ति मार्ग का भी आभास दिया। उसके पीछे कबीरदास ने विशेष तत्परता के साथ एक व्यवस्थित रूप में यह मार्ग 'निर्गुणपंथ' के नाम से चलाया।

 दोनों विचारों के अनुशीलन से निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि संत साहित्य का आरंभ गीतगोविन्द के रचयिता जयदेव से हुआ है। किन्तु प्रारंभ में उसकी रेखा क्षीण, धूमिल और अव्यवस्थित थी। वस्तुतः संतधारा की यह क्षीण और अव्यवस्थित रेखा संत नामदेव के द्वारा व्यवस्थित, प्रांजल और प्रशस्त बनायी गई।

 नामदेव जी ने 80 वर्ष के दीर्घ जीवन-काल में अनेक लम्बी यात्राएँ करके उत्तर-भारत का भ्रमण किया और अपने सिद्धान्तों का प्रचार किया, जिसके स्मारक अब भी राजस्थान और पंजाब के अनेक स्थानों पर उपलब्ध हैं। कबीर, रैदास, रज्जद, दादू आदि संतो ने भी नामदेव का नाम का बड़ी श्रद्धा से लेते हुए उनकी गणना उच्च कोटि के संतों के रूप में की है। नामदेव की हिन्दी में रचित पदावली बड़ी संख्या में मिलती है। इन सभी तथ्यों से स्पष्ट है हिन्दी सन्त-काव्य परम्परा के प्रवर्तन का श्रेय कबीर की अपेक्षा नामदेव को अधिक है।

पन्द्रहवीं शताब्दी में महात्मा कबीर का आविर्भाव हुआ, जिन्होंने अपनी प्रखर प्रतिभा, सुदृढ़ व्यक्तित्व और प्रौढ़ चिन्तन एवं कवि-सुलभ सुहृदयता एवं मार्मिक व्यंजना-शैली के बल पर संत-मत और संत-काव्य का प्रचार शीघ्र ही सारे उत्तरी भारत में कर दिया।

माना कि नामदेवजी ने संत परंपरा और साहित्य के लिए अथक प्रयास किये लेकिन उन के व्यक्तित्त्व में कोमलता अधिक होने के कारण वे अपने विरोधियों से संघर्ष और वाक युद्ध में प्रवृत्त नहीं हुए, किन्तु कबीर ने काशी के पंडितों और दूसरे विद्वानों को शास्त्रार्थ के लिए ललकारा और अपनी युक्तियों से उनका मुँह सदा के लिए बन्द कर दिया। इस तरह संतमत के मार्ग से बीच के कंकड़-पत्थरों, झाड़ियों एवं काँटों को दूर करके उसे साफसुथरा व प्रशस्त बनाने का कार्य कबीर के द्वारा हुआ। उनके पश्चात् तो संत-मत नये नये पंथ का रूप धारण करके निर्बाध रूप से आगे बढ़ता रहा। इसलिए इन पंथों में कबीर-पंथ अतिरिक्त उल्लेखनीय हैं।

 उन्नीसवीं शती तक आते-आते अनेक संतों द्वारा अनेक नये-नये पंथ स्थापित किये गये, किन्तु सिद्धान्त व विचारधारा की दृष्टि से इनमें विशेष मौलिकता नहीं मिलती - मूल स्वरूप इस सबका एक ही है। इतना अवश्य है कि धीरे-धीरे ये पंथ भी अपने मूल उदेश्य से दूर हटकर रूढ़ियों-विधि-विधानों, पाखण्ड प्रवर्तन एवं माया-ज्ञान की बुराइयों से ग्रस्त हो गये। किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि संत-काव्य की परम्परा हिन्दी में 14-15 वीं शती से प्रारम्भ होकर बीसवीं शती तक अखण्ड रूप से चलती रही।

स्पष्ट है कि भारतीय संत-परम्परा का इतिहास काफी प्राचीन है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने नामदेव एवं कबीर द्वारा प्रवर्तित भक्ति धारा को 'निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा' की संज्ञा से अभिहित किया है। डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसे 'निर्गुण भक्ति साहित्य' तथा डॉ रामकुमार वर्मा ने इसे 'संत काव्य परंपरा' का नाम दिया है। संत साहित्य भक्ति-काल की मात्र काव्य-धारा नहीं बल्कि निर्गुणमार्गी संत-काव्य भक्तिकालीन हिन्दी साहित्य का आरंभिक अंश है। सामान्यतः इस परम्परा के प्रवर्तन-का श्रेय कबीर को दिया जाता है, किन्तु उनसे पूर्व भी अनेक संत हो चुके थे, जिन्होंने हिन्दी में रचना की। लेकिन निर्विवाद रूप में संत कवियों में सबसे अधिक प्रभावशाली व्यक्तित्व महात्मा कबीर का ही था।

संत-परम्परा में महत्त्वपूर्ण कवियों में  दादू दयाल, सुन्दरदास, रज्जबदास, यारी साहब, पलटू साहब, मलूकदास, प्राणनाथ, आदि तथा प्रसिद्ध कवयित्रियों में दयाबाई व सहजोबाई ने उत्कृष्ट कोटि की काव्य रचना की इनके काव्य में भी ईश्वर की व्यापकता, हिन्दू-मुस्लिम एकता, संसार की अनित्यात्मकता, अलौकिक प्रियतम में प्रेम और विरह का चित्रण हुआ है। इन सभी संतों का साहित्य इस परंपरा में अपना अप्रतिम स्थान रखता है। कालान्तर में नानकदेव ने 'नानकपंथ', दादूदयाल ने 'दादूपंथ', हरिदास ने 'निरंजनी सम्रदाय' तथा मलूकदास ने 'मलूक पंथ' की स्थापना की। कबीरदास के नाम पर भी 'कबीर पंथ' की स्थापना हुई।

जैसा कि सर्वविदित है कि संत काव्य परंपरा के सशक्त दावेदार कबीर दास जी माने जाते हैं। और कबीर दास जी की साखी सबद रमैनी ही इस परंपरा के सिद्धांत है। हम सभी पढ़ते आ रहे हैं कबीरदास जी ने जीवन के प्रत्येक पक्ष को लिखा उन्होंने जो लिखा वह सार्वजनिक लिखा। मेरा मानना है कि कबीर दास जी का साहित्य अनुभव जनित है।निर्विवाद रूप से समस्त विद्वानों ने भी यह स्वीकार किया है कि कबीर कालातीत है। उनको समय की सीमाएँ नहीं बांध सकती उनके सिद्धांत हजारों वर्ष पहले जितने प्रासंगिक थे उतने ही आज है।
संत साहित्य के युग की परिस्थितियों पर विचार करें तो उस समय चारों ओर सामाजिक भेदभाव और वैमनस्यता का बोलबाला था। सामाजिक कट्टरता समाज की जड़ों को खोखला कर राष्ट्रीय एकता को हानि पहुँचा रही थी। रूढ़ियाँ और अंधविश्वास मानवता का हनन कर रही थीं। मेरा मानना है कि रूढ़ियाँ और अंधविश्वास ऐसी मानवीय ग्रंथियाँ हैं जिनसे मानव-विकास की प्रगति अवरुद्ध हो जाती है और विवेक शून्यता का जन्म होता है। ऐसे समय में कबीरदास जी के -साहित्य में समानता के भाव,. जातिवाद साम्प्रदायिकता जैसी अमानवीय समाज व्यवस्था का विरोध, सामाजिक व धार्मिक रूढ़ियों के प्रति विद्रोह व्यक्त हुआ है। कुल मिलाकर संत परम्परा कल्याणकारिणी थी। संत कवि अपने युगीन परिवेश में फैली असंगतियों के विरूद्ध अपनी आवाज बुलन्द करते रहे। चाहे सामाजिक विसंगतियों हों, चाहे धार्मिक कुरीतियाँ हों, चाहे नैतिक विडम्बनाएँ हों - इन सब जटिलताओं को केन्द्र में रखकर जो विचार उन्होंने प्रसारित किए वे सटीक प्रतीत होते हैं।

निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि सन्त काव्य के प्रतिनिधि कवि कबीर ने धर्म के नाम पर जनता का शोषण करने वाले सिद्धान्तों का तार्किक रूप से खंडन करते हुए समाज की आखें खोलने की पुरजोर कोशिश की है और यह समझाने का प्रयास किया है कि जातिगत भेदभाव एवं छूआछूत के संकुचित दायरे से बाहर निकल कर ही मानव और समाज का विकास सम्भव है।

आज के संदर्भ में यदि संत साहित्य का अवलोकन किया जाए, तो निश्चित तौर पर वर्तमान स्थितियाँ भी मध्य युग जैसी ही हैं। आज के इस प्रगतिशील युग में भी जातिवाद, साम्प्रदायिकता व अंधविश्वास की जड़ें भारतीय समाज में उतनी ही गहरी हैं जितनी मध्य युग में थी। इसलिए निश्चित तौर पर सामाजिक शोषण, अनाचार व अन्याय के विरुद्ध संघर्ष में आज भी संत कवियों का काव्य तीखा अस्त्र है।

 सन्त काव्य का गहराई से अवलोकन करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि सन्त कवियों ने सामाजिक-धार्मिक क्षेत्र में व्याप्त परम्परागत मान्यताओं व रूढिवादी विचारधाराओं का कड़ा विरोध किया है।समानता के भाव व्यजित करने का प्रयास किया। उन्होंने एक ऐसे समाज की कल्पना की, जो ऊँच-नीच की भावना से सर्वथा शून्य हो, जो ब्राह्मण-शूद्र, हिन्दू-मुस्लिम के भेदभाव से ऊपर हो। उनकी वाणी आज के इस वैश्वीकरण के दौर में भी मानव मात्र को यह संदेश देती प्रतीत होती है कि हमें हर प्रकार के भेदभाव से ऊपर एक स्वस्थ समाज के निर्माण हेतु प्रयासरत रहना चाहिए। ऐसे ही उदात्त विचारों के कारण संत साहित्य आज भी प्रासंगिक है।
स्पष्ट है कि संतों ने अपने विचारों के माध्यम से समाज मे जनमानस में जागृति लाने का प्रयास किया। सन्तों की वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी तत्कालीन युग में थी।

संदर्भ/आधार ग्रन्थ सूची
1. आचार्य परशुराम चतुर्वेदी, उत्तरी भारत की सन्त परम्परा।
2. श्याम सुन्दरदास (स), कबीर ग्रंथावली (नागरी प्रचारिणी सभा, काशी)
3. डॉ. सुषमा दुबे, डॉ. राज कुमार- प्राचीन एवं मध्यकालीन काव्य। वाणी प्रकाशन नई दिल्ली।
4. हरि, संत सुधा सार।
5. हिन्दी साहित्य का इतिहास आ. रामचन्द्र शुक्ल।
6. डॉ0 हरमोहन सूद, हजारी प्रसाद द्विवेदी का सृजनात्मक साहित्य एवं सांस्कृतिक।
7. डॉ0 प्रणव शर्मा, प्राचीन एवं मध्यकालीन काव्य।
8. शोध आलेख, डॉ. पूनम काजल हरियाणा।
9. हिन्दी चेतन भारती पत्रिका।
10. कबीर ग्रंथावली।

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