मैं साँस नहीं ले पा रहा हूँ

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

मरघट की आग़ पर राख डाल दी गई है, धीरे-धीरे वह शांत हो जाएगी या भीतर ही भीतर धधकती रहेगी यह तो समय ही बताएगा। पर, मैं साफ-साफ सुन पा रहा हूँ, घना अंधेरा है, शोर थमा है, शहर सोये हैं और जॉर्ज फ्लॉयड जैसे लोगों की आत्माएँ चीत्कार रही हैं। मैं साँस नहीं ले पा रहा हूँ। जॉर्ज की गर्दन पर चढ़कर सत्ता निरंकुश हो गई थी। सत्ता ने उसे सुना था और अनसुना कर दिया। सत्ता ने उसे देखा था और अनदेखा कर दिया। शायद इसलिए कि अपने आवेश में सत्ता अंधी और बहरी होती जा रही है और शायद ऐसी होती रहेगी। दुनिया के महानतम प्रजातंत्रीय देश में उसके शासक अपने नागरिकों के लिए ऐसी निकृष्ट सोच रखें उसके पहले उन्हें समझना चाहिए कि कोई भी सत्ता ताकतवर हो कर अपनी जनता की नहीं हो सकती।

मैंने अपनी साँस जोर से खींची और महसूस किया कि यह साँस तो है पर इसमें आज़ादी नहीं है। यह जीवन तो देती है पर इसमें प्राण नहीं है। यह ज़िंदा समाज तो दिखाती है पर वह असहाय छटपटा रहा है। मुझे लगा मेरे आसपास की सत्ता एक घुटना भर है, जिसकी मुझे दबाने या मुझे खत्म करने में इतनी रुचि नहीं है जितनी मेरी आवाज़ को दबाने में है। आवाज़ नहीं दबाई गई तो वह गूंजती रह सकती है, दूसरी आवाज़ों को अनुनादित कर सकती है। सत्ताशाह अपने विरोध में उठती आवाज़ को इस तरह दबाते हैं कि कोई आवाज़ उनके खिलाफ़ नहीं निकल सके। जनता की आवाज़ दबाने को अपनी सफलता मानते हुए सत्ता जश्न मनाती रहेगी तो ताकत के घुटनों तले कई लोग रौंदे जाते रहेंगे। कोई घुटना गर्दन दबाये उसके पहले समवेत बोलना होगा - मैं साँस नहीं ले पा रहा हूँ।

मिनियापोलिस का यह अपराध केवल किसी अश्वेत के प्रति नहीं था। ऐसा होता तो दुनिया में सिर्फ अश्वेत ही इसके खिलाफ़ खड़े होते। रंग, धर्म और भाषा के भेदभाव भुला कर दुनिया में हर किसी को लगा कि मिनियापोलिस में की गई यह क्रूरता आवाज़ को दबाने के लिए हुई। नस्ल का बहाना एक छल था। वहाँ पुलिस अपनी वर्दी की सत्ता स्थापित करना चाहती थी। हिंसक पुलिस के तीन साथी अपनी सत्ता के समर्थन में वहाँ खड़े थे। साँस लेने की आज़ादी का ख्याल किसी के मन में उस क्षण नहीं था। क्या वे पुलिस की सत्ता में नहीं होते तो ऐसा कर सकते थे? यह सिर्फ पुलिस उत्पीड़न की बात नहीं है। दुनिया में कई देश हैं जहाँ धर्म पर आधारित खोखली श्रेष्ठता है, और भी देश हैं जहाँ जाति की श्रेष्ठता पर आधारित जंगली और खूंखार शासन व्यवस्था है। ऐसे भी देश हैं जहाँ राष्ट्रवाद के नाम पर अपना आधिपत्य स्थापित करने की कुटिल शासन व्यवस्था है। ऐसे पूर्वाग्रह ही नफ़रत के कारक हैं और ये सारे देश इन पूर्वाग्रहों को खत्म करने की बजाय उनके खिलाफ़ उठती आवाज़ों को दबाने में लगे हैं। परस्पर श्रेष्ठता के ये मानक हमारी पूर्व पीढ़ियों ने घड़े और हमें विरासत में दिये। ये विरासत हमारी साँसों को घोंट रही है।

तुम्हारा नारा सही है दोस्त, ‘न्याय नहीं तो शांति नही’। जॉर्ज फ्लॉयड के बलिदान से उपजे इस जनआंदोलन के कारण अमेरिका के अलावा ब्रसल्स, ऑक्सफोर्ड, इंग्लैंड आदि शहरों में साम्राज्यवादी प्रतिमाएं तोड़कर इतिहास सुधारने की पहल हो रही है। दलित और दास प्रथाओं का महिमामंडन करने वालों की सार्वजनिक प्रतिमाओं की जरूरत अब क्यों होनी चाहिए? यातना देने वालों की स्मृतियाँ इक्कीसवीं सदी में चौराहों पर टिकी रहीं तो गुफाकाल से यहाँ तक की हज़ारों सालों की मनुष्यता की यात्रा निरर्थक हो जाएगी। ऐसे काले इतिहास से हमें सीखना होगा ताकि फिर किसी को नहीं कहना पड़े - मैं साँस नहीं ले पा रहा हूँ।

टोरंटो, फ्लोरिडा और अन्य शहरों की पुलिस को मेरा सलाम, जिन्होंने प्रदर्शनकारियों के सामने घुटने टेक कर सिर झुकाया, अपनी नजरें झुकाईं। उन घुटनों के नीचे कोई कराहती आवाज़ नहीं थी, मानवीय आज़ादी के प्रति उनका यह समर्थन था। ये घुटने समानता पर आधारित समाज के प्रति सम्मान थे। अपने अधिसंख्य गोरे होने की अभिशप्त कुंठा में अमेरिका जी रहा है, वहाँ के राष्ट्रपति जी रहे हैं। क्या समानता पर आधारित संसार का यह सर्वश्रेष्ठ समाज कभी समवेत कह पाएगा - हम साँस नहीं ले पा रहे हैं।
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