एकांकी: कोरोना से एक आत्मीय बातचीत

पूर्णिमा पांडेय

पूर्णिमा पांडेय


रात के कहूँ या सुबह के पर चार बज रहे हैं। नींद उचट गई है। मुझे तुम्हारी याद आ रही है। रह-रह कर दिल बेचैन हो रहा है। तुम्हारी बातें मेरे मन- मस्तिष्क पर हावी होती जा रहीं हैं। तुम सिर्फ तुम ही हो मेरे आसपास।
तुम कहोगे, “मुझे तो दुनिया में कोई याद नहीं करना चाहता और आप मुझे याद कर रही हो।”
क्या करूँ, नींद नहीं आ रही है तो सोचा तुमसे ही कुछ बातें कर लूँ। थोड़ा जी हलका कर लूँ। तुम चाहो तो मेरे चैनल पर भी आ सकते हो भाई। आजकल सोशल डिसटैन्सिग का भी पालन करना है।

कोरोना: (कोरोना कूदते-कूदते स्क्रीन पर उभर आया।) “तुमने पुकारा और हम चले आए...” कहो क्या कहना है?

मैं: आइए जनाब! आपका बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने अपने व्यस्ततम कार्यक्रम से मेरे लिए समय निकाला।

कोरोना: अब आपके निमंत्रण को भी ठुकरा देता तो कहाँ जाता?

मैं: (थोड़ी-सी मुस्कान चहरे पर) अच्छा! मैं इतनी विशेष हूँ कि तुम मेरे निमंत्रण को अस्वीकार न कर सके।

कोरोना: हा-हा-हा... अरे आप मुंबई महाराष्ट्र से हो। आजकल यहीं पर अधिक व्यस्त हूँ।

मैं: (चिंतित होकर) क्या कहना चाहते हो तुम?

कोरोना: घबराइए मत। मैं तो बस इसलिए आ गया कि आप एक शिक्षक है और शिक्षक तो पीढ़ियों का निर्माता होता है।

मैं: तो तुम मुझे जानते हो? इसे अपनी खुशकिस्मती समझूँ या बदकिस्मती?

कोरोना: मैं इतना भी बुरा नहीं हूँ।

मैं: अच्छा तुम मिस्टर हो या मिस?

कोरोना: मुझे नहीं पता मैं कौन हूँ? मैं तो इस मानव सृष्टि की रचना हूँ।

मैं: फिर भी मेल, फीमेल, थर्ड जेंडर कुछ तो होगे ही।

कोरोना: काश! कि मैं इनमें से कुछ होता।

मैं: खैर छोड़ो! ये बताओ तुम कब जाओगे इस दुनिया को छोड़कर?

कोरोना: (मुसकराहट चेहरे पर)

मैं: हाँ! समाज जानना चाहता है। देश जानना चाहता है। पूरा विश्व जानना चाहता है। अतिथि तुम कब जाओगे?

कोरोना: मैं अतिथि हूँ?

मैं: हाँ, जो बिना निमंत्रण, बिना दिन-तिथि विचारे आ जाता है वो अतिथि ही तो होता है।

कोरोना: तो मैं भगवान हूँ? अतिथि देवो भव!

मैं: क्या बात है! तुम हमारी भारतीय संस्कृति से बड़ी अच्छी तरह से परिचित हो।

कोरोना: भारतीय संस्कृति है ही इतनी अच्छी। मैं क्या मेरे सारे रिश्तेदार सॉर्स, इबोला, बर्ड फ्लू आदि सभी जानते हैं। (कोरोना उछालते हुए) मैं तो अतिथि हूँ यानी भगवान हूँ ...

मैं: सच कह रहे हो। लग तो भगवान ही रहे हो। यमराज का पाश हो, उनका आक्रोश हो, क्रोध हो या कुछ और ...वैसे भी तुम्हारी मृत्यु हो नहीं सकती अर्थात अमर तो हो ही।

कोरोना: मैडम आप मुझे थोड़ा-थोड़ा समझ पा रही हो।

मैं: भला मैं तुम्हे क्या समझ पाऊँगी?

कोरोना: आप ही ने तो कहा मैं आक्रोश हूँ, क्रोध हूँ।

मैं: वो तो बस ऐसे ही ...

कोरोना: लेकिन मैं ऐसे ही ऐसा नहीं हूँ। मैं मानव की ईर्ष्या और असंयम की उपज हूँ।

मैं: अच्छा तुम वुहान में पैदा हुए तो फिर वहीं रहते। वहीं अपना बचपन बिताते, जवानी बिताते। मेरे देश में क्यूँ आ गए?

कोरोना: मैं वुहान से पहले मानव की ईर्ष्या में पैदा हुआ। उसकी असीमित महत्वाकांक्षा में पैदा हुआ। लालसा, लिप्सा, लालच, असंयमित खान-पान सभी तो मेरे जन्म के कारण हैं।

मैं: कुछ लोग तो कहते हैं कि तुम एक प्रयोगशाला में पैदा हुए हो।

कोरोना: हाँ, कुछ लोग तो यह भी कहते हैं मैं चमगादड़ से आया हूँ। कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना ...

मैं: ठीक है। मैं तुम्हें कोविड 19 कहूँगी। यही तुम्हारा ऑफिशियल नाम भी तो है।

कोरोना: मैं राही अनजान राहों का, है यारों मेरा नाम अनजाना, ना ... ना...ना... है यारों मेरा नाम कोरोना .

मैं: तुम गाना गा रहे हो? यहाँ हम सबकी बोलती बंद है। आखिर दुनिया ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है जो तुमने लाखों लोगों से उनकी साँसें ही छीन लीं?

कोरोना: मैडम मेरा किसी ने कुछ नहीं बिगाड़ा है। मैं जानबूझकर ऐसा नहीं कर रहा हूँ। अब मेरा डीएनए ही ऐसा है तो मैं क्या करूँ?

मैं: चाहे जो हो पर अब तुम वापस लौट जाओ। दूर कहीं ऐसी जगह चले जाओ जहाँ से किसी को नुकसान न पहुँचा सको। हमारी इस सुंदर दुनिया को सुंदर ही बना रहने दो।

कोरोना: हाँ ये आपने बिलकुल ठीक कहा मैडम। ये दुनिया सचमुच बहुत सुंदर है। ऊँचे-ऊँचे बर्फ के पहाड़, लहराती इठलाती नदियाँ, अपनी मस्ती में झूमते झरने, किसी दार्शनिक के समान धीर-गंभीर सागर-महासागर, नीले आसमान में बलखाते रंग-बिरंगे पंछी, हरे-भरे मैदान, हाथी जैसे विशालकाय प्राणी से लेकर खरगोश, चूहे जैसे नन्हे प्राणी, प्यारे-प्यारे मासूम बच्चे ... आहा ...हा। कितना सुंदर कितना मनोरम दृश्य है। मेरा तो इन सब पर दिल आ गया है। (गुनगुनाते हुए) गलियाँ, तेरी गलियाँ –गलियाँ मुझको भावे गलियाँ तेरी गलियाँ

मैं: पर कुछ तो करना होगा कोरोना, वरना इस दुनिया में सिर्फ आँसू, भूख, दर्द और लोगों की चीखें ही रह जाएँगी। जाओ कोरोना, जाओ, लौट जाओ।

कोरोना: ऐसा मत कहो मैडम। आज मेरे ही कारण ये धरती अपनी खोई हुई सुंदरता फिर से पाने में सफल हो रही है।

मैं: (विस्मय से) सुंदरता और तुमसे?

कोरोना: क्यों, क्या ये सच नहीं है? आपके देश की नदियाँ फिर से साँस लेने लगी हैं। उनकी लहरें मुस्कुराने लगी हैं। गंगा को देखिए कितनी निर्मल हो गई है और यमुना गटर हो गई थी गटर। अब देखिए पहचान ही नहीं पाएँगे आप सब।

मैं: हूम्मम्म...

कोरोना: और तो और मनुष्य ने अदृश्य हवा को भी नहीं छोड़ा। लोगों का साँस लेना भी दूभर हो गया था। अब नासा ने रिपोर्ट दी है कि भारत में वायु की गुणवत्ता में काफी सुधार हुआ है। अब जालंधर से ही पर्वतराज हिमालय के दर्शन हो रहे हैं। नेपाल की सीमा से लगभग 250-270 किमी दूर बिहार के गाँवों से भी हिमराज की झलक दिखलाई पड़ रही है।

मैं: (लंबी साँस लेते हुए) हाँ! ये तो तुम सच कह रहे हो।

कोरोना: मैं वो हूँ जो किसी किताब पर हाथ रखे बिना भी सच ही कहता है। सच बोलने के लिए मुझे किसी किताब के सहारे की आवश्यकता नहीं पड़ती।

मैं: फिर भी तुम्हारे ही कारण आज सारा संसार दुःखी है। मेरा देश चिंतित है। फैक्ट्री, कारखाने, ऑफिस बंद हो चुके हैं। बाजार खामोश है। स्कूल अनिश्चित काल के लिए बंद हो गया है। छोटे-छोटे बच्चे चाहे-अनचाहे नीरस ऑन लाइन पढ़ाई करने पर मजबूर कर दिए गए हैं। क्या-क्या बताऊँ?

कोरोना: मैडम सुनिए जरा...

मैं: (सुना-अनसुना करते हुए) इस लॉकडाउन ने हमारी खुशियों, भावनाओं, संवेदनाओं को लॉक कर दिया है। लोग अपना घर-संसार सिर पर लिए पैदल ही अपने गाँवों की तरफ चल पड़े हैं। दया करो कोरोना। दया करो...

कोरोना: अरे मैडम! आप तो ऐसे कह रही हैं जैसे मैंने यह सब जानबूझकर किया है और सिर्फ मेरे ही कारण यह सब हो रहा है।

मैं: तो और कौन है इन सबका जिम्मेदार?

कोरोना: एक बार फिर सच उगलने जा रहा हूँ। सुनने की हिम्मत बटोर लो।

मैं: मैं भी एक शिक्षक हूँ। मेरा तो काम ही सच कहना, सच सुनना और सच्चाईपूर्वक काम करना ही है।

कोरोना: ये हुई न बात! तो सुनिए... आज यदि गाँव आत्मनिर्भर रहे होते, व्यवस्था ने गाँवों के विकास पर ध्यान दिया होता तो क्यों लाखों लोग अपनी मिट्टी, अपना घर अपनी जमीन, अपनी छाँव छोड़कर शहरों की तरफ आए होते?क्यों हरे-भरे जंगलों को छोड़कर सीमेंट के जंगलों में जहरीली हवा अपनी साँसों में भरने को मजबूर होते। (मैं अवाक् होकर सिर्फ सुनती रही।)

कोरोना: व्यवस्था में यदि भ्रष्टाचार न होता, योग्य व्यक्तियों को उचित अवसर मिला होता, भाई-भतीजावाद की राजनीति न होती, सत्ता का लोभ न होता, धर्म के नाम पर असंख्य लड़ाइयाँ न हुई होती ... क्या-क्या गिनाऊँ मैडम अब तो मैं भी थक गया हूँ मनुष्य की गलतियाँ गिनते-गिनाते।

मैं: अब चुप करो कोरोना। तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे यदि यह सब हुआ होता तो तुम्हारा संक्रमण न हुआ होता, तुम्हारा नकारात्मक प्रभाव न पड़ा होता, हजारों-लाखों मनुष्यों की मृत्यु न हुई होती।

कोरोना: अब मैं हूँ तो एक वायरस ही। मेरा प्रभाव भी पड़ेगा, पर इस कदर दहशत तो नहीं होती। इतना बड़ा विनाश न हुआ होता। जीवन इस कदर थमता तो नहीं। संवेदनाओं की मृत्यु तो न होती। मासूम बचपन घरों में बंद रहने को मजबूर न होता। मैं तो कभी न कभी चला ही जाऊँगा। पर जब तक मानव अपनी दुष्प्रवृत्तियों का त्याग नहीं करेगा, शक्ति और सत्ता की लोलुपता की जकड़ से बाहर नहीं आएगा तब तक कोई कोरोना, कोई इबोला, कोई बर्ड फ्लू, कोई सॉर्स किसी न किसी रूप में आता रहेगा।

(मैं निःशब्द थी। जब तक कुछ शब्द खोज पाती कुछ कहने को तत्पर हो पाती कोरोना जा चुका था किसी नए शिकार की तलाश में। मैं बहुत कुछ सोचने को मजबूर अपने कमरे में अकेली रह गई थी।)

33 comments :

  1. 100 % सत्य , बहुत सुंदर रचना मेडम , बधाई

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  2. कोरोना के साथ जबरदस्त ,सच्चा वार्तालाप , बधाई

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  3. कोरोना के साथ जबरदस्त वार्तालाप, बधाई।

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  4. वाह वाह बहुत खूब...

    आओ मिलकर करें शिकायत
    ढूँढे जग का सरपंच... !
    पूछें कयूँ सूना कर दिया
    कयूँ खाली पड़ा रंगमंच... !!

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    1. 😊 क्या बात है! खाली पड़ा रंगमंच

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  5. Bahut hi achha hai madam... Sachhayi par aadharit hai... Corona se logo ne bhale hi kuchh kum sikha ho lekin apki ekanki se log jarur sochenge prakriti ka mahattav, bharat desh ki sanskriti, purvajon ke vachan.,swachhta aur parivaarik mahattav bhi.... Ati sunder rachna hai. 🙏🙏🙏
    Kuchh galat likha ho maine to maaf kar dijiyega 🙏🙏

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    1. पाठक का दृष्टिकोण बहुत मायने रखता है। उसमें सही-गलत कुछ नहीं होता बस नजरिया होता है। आपने समय निकालकर पढ़ा, लिखा आभारी हूँ।

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  6. *सादर नमस्कार जी 🙏🌹*
    *पूर्णिणा पांडेय जी आपको शत् शत् नमन*
    वाह क्या सुंदर आत्मियता से लिखी जिंदगी की अनमोल समझ दर्शाती मार्मिक एवं प्रेरणात्मक एकांकी सृजन🌹
    आपने प्रकृति की छटा, सामाजिक दुर्गुण, लोभ, मोह, क्षोभ, अहंकार और ईर्ष्या से बड़ा ये कोरोना वायरस नहीं है। सिध्द कर दिया है।
    आप साहित्य, आध्यात्म, गीत, संगीत, लेख, उत्तम शिक्षा और मानवता हर विधा में माहिर हैं।
    शिक्षिका पूर्णिमा जी आपकी समदृष्टि को नमन है।🙏🌹💐

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  7. *सादर नमस्कार जी ����*
    *पूर्णिणा पांडेय जी आपको शत् शत् नमन*
    वाह क्या सुंदर आत्मियता से लिखी जिंदगी की अनमोल समझ दर्शाती मार्मिक एवं प्रेरणात्मक एकांकी सृजन��
    आपने प्रकृति की छटा, सामाजिक दुर्गुण, लोभ, मोह, क्षोभ, अहंकार और ईर्ष्या से बड़ा ये कोरोना वायरस नहीं है। सिध्द कर दिया है।
    आप साहित्य, आध्यात्म, गीत, संगीत, लेख, उत्तम शिक्षा और मानवता हर विधा में माहिर हैं।
    शिक्षिका पूर्णिमा जी आपकी समदृष्टि को नमन है।������

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  8. *सादर नमस्कार जी 🙏🌹*
    *पूर्णिणा पांडेय जी आपको शत् शत् नमन*
    वाह क्या सुंदर आत्मियता से लिखी जिंदगी की अनमोल समझ दर्शाती मार्मिक एवं प्रेरणात्मक एकांकी सृजन🌹
    आपने प्रकृति की छटा, सामाजिक दुर्गुण, लोभ, मोह, क्षोभ, अहंकार और ईर्ष्या से बड़ा ये कोरोना वायरस नहीं है। सिध्द कर दिया है।
    आप साहित्य, आध्यात्म, गीत, संगीत, लेख, उत्तम शिक्षा और मानवता हर विधा में माहिर हैं।
    शिक्षिका पूर्णिमा जी आपकी समदृष्टि को नमन है।🙏🌹💐

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    1. सुंदर,विस्तृत प्रतिक्रिया हेतु कृतज्ञ हूँ।

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  9. समसामयिक विषय पर बहुत अच्छी रचना। अभिनंदन पूर्णिमा जी

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  10. बहुत महत्त्वपूर्ण संवाद, आंखें खोल दियी।

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  11. बहूत सुंदर , बधाई हो ।

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  12. कोरोना के वास्तविकता को दर्शाती हुई बातचीत
    वाह!बहुत बढ़िया
    आप को बहुत-बहुत अभिनंदन

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  13. श्रेष्ठ, कोरोना के बहाने सच को सामने रख दिया पूर्णिमा जी, गाँवो का समुचित विकास आवश्यक है। अनेक साधुवाद

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  14. आदरणीय सादर अभिवादन,
    उत्साहवर्धन हेतु समस्त सुधी विद्वान पाठकों की प्रतिक्रिया हेतु कृतज्ञ हूँ।

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  15. आप व कोराना के बीच जो काल्पनिक बात हुईं हें वो व्यंग्यात्मक रूप में वार्तालाप हुईं जो मानव समाज को सीधा संदेश देतीं हैं।अब भी सुधर जाए।
    अभी भी लोगों में लोभ लालच भरा हुआ है ।
    व्यंगात्मक रूप में शानदार लेख् हें ।

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  16. आप व कोराना के बीच जो काल्पनिक बात हुईं हें वो व्यंग्यात्मक रूप में वार्तालाप हुईं जो मानव समाज को सीधा संदेश देतीं हैं।अब भी सुधर जाए।
    अभी भी लोगों में लोभ लालच भरा हुआ है ।
    व्यंगात्मक रूप में शानदार लेख् हें ।

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  17. Bahut badia,aaj ke halaat par sahi vyang he

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  18. Bahut badia,aaj ke halaat par sahi vyang he

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  19. Bahut badia,aaj ke halaat par sahi vyang he

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  20. Corona ka naam aate hi dil dimag me ek tasveer ghumti h samne jise hum sapne me bhi nuidekhna chahte

    BhutB hi umda parstuti or aapke hardaytal se uthe hue bhav

    Bahut bahut shubhkamnaye

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