पुस्तक समीक्षा: समीक्षा के स्वर (डा. कुंदन लाल उप्रेती)

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 941 272 7361; ईमेल: drdinesh57@gmail.com

पुस्तक: समीक्षा के स्वर (समीक्षात्मक निबन्धों का संग्रह) 
रचनाकार: डा. कुंदन लाल उप्रेती
पृष्ठ: 152, पेपरबैक 
मूल्य: ₹ 250.00 रुपये
प्रकाशक: भारत प्रकाशन मंदिर, सुभाषरोड, अलीगढ़-202001 (उ.प्र.)
--------------------------------------------------------------------------


हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं में साधिकार लेखनी चलाने वाले विद्वान, साहित्यकार डा.कुंदन लाल उप्रेती की पुस्तक “समीक्षा के स्वर” एक ऐसी  पुस्तक है जिसके सभी आलेखों की रचना पूर्ण उर्जस्वित अविकल भाव से ,गहन चिंतन,मनन के साथ की गई है। डा.कुंदन लाल उप्रेती ,ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने साहित्य लेखन में बहुत से नये प्रयोग किए हैं और यही कारण है कि उनकी प्रत्येक पुस्तक एक विशिष्ट पहचान बनाती है।
‘समीक्षा के स्वर’ पुस्तक में कुल पन्द्रह आलेख समाहित किए गये हैं। प्रत्येक आलेख सारगर्भित है। संग्रह का प्रथम आलेख है-”तूती-ए-हिन्द : अमीर खुसरो” इस आलेख में विद्वान लेखक डा.कुंदनलाल उप्रेती जी ने भारत के महान देशभक्त कवि अमीर खुसरो के जीवन के समस्त तथ्यों का गहन अध्ययन करने के बाद ही उनके जीवन पर लेखनी चलाई है। एतिहासिक तथ्यों की नीरसता को भी किस तरह रुचिकर रूप में लिखा जा सकता है, ये बात विद्वान लेखक उप्रेती जी के इस आलेख को पढ़कर समझी जा सकती है।
लेखक ने इस आलेख को तैयार करने से पहले हिन्दी एवं अ्रग्रेजी के सोलह ग्रन्थों का गहन अध्ययन किया है। जिला एटा के गाँव पटियाली में सन् 1253 ई.में जन्मे कवि अमीर खुसरो के पूर्वज तेरहवीं शताब्दी से पूर्व भारत आ गये थे। पिता लाचीन तुर्क थे जो चंगेज खाँ के मध्य एशिया पर आक्रमण के पश्चात शरणार्थी के रूप में भारत आये थे।
बीस वर्ष की आयु में खुसरो,अलाउद्दीन किश्लू खाँ के दरबार में चले गये। वहाँ से दो वर्ष बाद बुगरा खाँ के दरबार में रहे। इसके पश्चात वे मुल्तान के राजकुमार मुहम्मद के पास चले गये फिर वे अवध के शासक ख्वाजा एहसान के साथ दो वर्ष रहे।
अमीर खुसरो का अधिकांश लेखन अलाउद्दीन काल में हुआ। उनकी पुस्तक ‘गुर्र: तुल कमाल’ के साथ-साथ ‘नूर सिपहर’ पुस्तक की रचना 1320 ई. में ही हुई जिस पर सुल्तान ने प्रसन्न होकर अमीर खुसरो को हाथी के वजन के बराबर सिक्के तौलकर भेंट किए थे।
अमीर खुसरो के जन्म से मृत्यु तक के प्रमाणों सहित उनके लेखन के विभिन्न पक्षों को लेखक ने जिस सरसता से लिखा है वह दृष्टव्य है। अमीर खुसरो ने अपने लिखे ग्रन्थों में अनेक उदाहरणों से सिद्ध किया है कि भारत की धरती ही स्वर्ग के समान है।” ‘नूह सिपहर’ में हिन्दुस्तान की स्तुति में ऐसे चार-पाँच सौ शेर हैं जिनसे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अमीर खुसरो को भारत के प्रति कितना लगाव था।”(पृष्ठ-9)
अमीर खुसरो के लेखन, उनकी पुस्तकों और उनकी भाषा के विषय में भी  विद्वान लेखक उप्रेती जी ने इस आलेख में विस्तृत उल्लेख किया है जो लेखक द्वारा किए गये अत्यन्त श्रम का द्योतक है।
        पुस्तक की दूसरी रचना शाह बरकतुल्ला‘पेमी’ विरचित ‘पेम प्रकाश’ है जिसमें पेमी जी द्वारा रचित सातों पुस्तकों के विषय में तो जानकारी दी ही गई है शाह बरकतुल्ला‘पेमी’के जीवन के कुछ अनछुए पक्षों पर भी प्रकाश डाला है। साथ ही उनकी पुस्तक-‘पेम प्रकाश’ की विस्तृत विवेचना भी लेखक द्वारा की गई है।
पुस्तक की तीसरी रचना का शीर्षक है-”भ्रमरगीत और शाह बरकतुल्ला ‘पेमी’ का पेम प्रकाश”। विद्वान लेखक डॉ. उप्रेती जी ने पेमी जी के ‘पेम प्रकाश और भ्रमरगीत का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करते हुए श्रीमदभागवत के दसम स्कुद के सैतालीसवे अध्याय का विस्तृत उल्लेख किया है ताकि पाठक के समक्ष कहीं भी कोई भ्रम की स्थिति न हो।
भागवताकार ने उद्धव के लिए ‘साधो’शब्द का प्रयोग किया है उसी प्रकार पेम प्रकाश में भी उद्धव के लिए ‘ऊधो’ और मधुकर के लिए ‘साधो’ शब्द का प्रयोग किया है। जिस प्रकार सूर के भ्रमरगीत में मात्र विरह काव्य नहीं है उसमें सामूहिक चीत्कार सुनाई देती है उसी प्रकार शाह बरकतुल्ला‘पेमी’ के भ्रमरगीत की गोपियाँ पहले से ही जानती थीं कि कृष्ण मथुरा जाकर बदल गये हैं-
“मधुकर हम तबही तें जानीं
सुनैं कौन, कासों अब कहिये, सुनि री सखी सयानी।
ऊधो से हितकारी पेमी,कुब्जा सी ठकुरानी।(पेम प्रकाश सं.-डॉ. कुंदनलाल उप्रेती पृष्ठ-18 पद सं.-2)(पृष्ठ-41)


दिनेश पाठक ‘शशि’
इस बाल कविता संग्रह में कई बाल कविता ऐसी भी हैं जिनमें अनुज अनुभव के परिपक्व विचारों की झलक मिलती है। ‘घडे़ पाप के फूट रहे हैं’ संग्रह की ऐसी ही कविता है-     
                       अनेक उदाहरणों के माध्यम से डॉ. कुंदनलाल उप्रेती जी ने इस लेख में पेमी जी के पेम प्रकाश को अन्य भ्रमर गीतों की तरह ही श्रेष्ठ कोटि में रखा है।

पुस्तक में आलेख संख्या चार और पाँच प्रख्यात साहित्यकार रांगेय राघव के जीवन पर आधारित हैं।आलेख-"फिर आऊंगा नया रूप धरकर’ में सुप्रसिद्ध साहित्यकार रांगेय राघव के जीवन की छोटी-बड़ी घटनाओं को क्रमवार बहुत ही रोचक ढंग से प्रस्तुत करता ये रेखाचित्र कुंदनलाल उप्रेती जी की लेखनी की सफलता को उद्घाटित करता है। रांगेय राघव की आदतें,गरीबों के प्रति उनका दयाभाव, ऊंच-नीच के भेदभाव से दूर विचारधारा और लेखन प्रक्रिया आदि की बारीक से बारीक बात से उप्रेती जी ने बड़े ही सहज रूप से अवगत कराया है इस रेखाचित्र में। चाय के प्याले से उठते धूंए से प्रारम्भ करके, रेखाचित्र का समापन भी चाय के प्याले से उठते धूंए पर जिस तरह समापन किया गया है वह अद्भुत है।

               “रांगेय राघव अपने ही आइने में" आलेख में डा.कुंदनलाल उप्रेती जी ने रांगेय राघव के जीवन की किताब के एक-एक पन्ने को खोलकर पाठकों के सामने रख दिया है।वे घमण्डी थे। सनकी थे। जिद्दी थे। परदुःख कातर थे।क्या-क्या थे और कैसे लिखते थे। कब लिखते थे । जीवन के अन्तिम पड़ाव में क्या-क्या झेला आदि सारी घटनायें चलचित्र की भाँति पाठक के समक्ष खुलती चली जाती हैं। विद्वान लेखक डा. कुंदनलाल उप्रेती जी की लेखनी से ही ऐसा कसावटपूर्ण आलेख लिखा जाना सम्भव है।

            मृत्यु शाश्वत सत्य है यह बात सभी जानते हैं किन्तु मृत्यु से पूर्व के आभासों के बारे में सोचना तथा प्रेमचंद के उपन्यासों में से उस अनुभव के क्षणें को खोजने के बारे में डा.कुंदनलाल उप्रेती जी जैसे लेखक ही कर सकते हैं जिनका कार्य ही समुद्र में गोता लगाकर मोती खोज लाने जैसा है। साहित्य की बारीकियों को सोचना,खोजना और फिर जन हितार्थ पाठकों के सामने प्रस्तुत कर देना,यही ध्येय परिलक्षित होता है डॉ. उप्रेती जी का इस पुस्तक में संग्रहीत आलेख-"प्रेमचंद के उपन्यासों में मृति के क्षण" को लिखने में।
इस आलेख में उन्होंने प्रेमचंद के उपन्यास कर्मभूमि,गबन,गोदान,निर्मला,रंगभूमि आदि के ‘मरण’ के विभिन्न दृश्यों का जिसमें मृत्यु पूर्व नायक या नायिका क्या अनुभव करते हैं, लेखक ने उल्लेख किया है। इतना ही नहीं विद्वान लेखक ने चन्द्रधरशर्मा गुलेरी की कहानी -"उसने कहा था" एवं अज्ञेय जी का -"शेखर: एक जीवनी" आदि के कुछ उद्धरणों का भी यहाँ उल्लेख किया है। लेखक के ही शब्दों में-
“इस प्रकार प्रेमचंद ने मरण को एक शाश्वत सत्य स्वीकार किया है। उनकी दृष्टि में ‘मरण’ एक विश्राम मात्र है। मोह के बन्धन और जीवन के द्वन्द्वों से मुक्त करने वाला है।कभी वह सत्य का उद्गार भी है।........अतः प्रेमचंद का मरण-दर्शन गीता का ज्ञान भी है और इससे अलग उनका अपना संज्ञान भी।"(पृष्ठ-69)
आलेख-"प्रेमचंद और हमारा समय" में प्रेमचंद की वर्तमान युग में क्या सार्थकता एवं क्या प्रासंगिकता है, इसी विषय पर बहुत सारे तथ्यों के माध्यम से विद्वान लेखक ने अपनी बात प्रस्तुत की है तो आलेख-"शैलीकार डॉ. रामविलास शर्मा" में डा.कुदनलाल उप्रेती जी की लेखनी से सृजित एक उत्कृष्ट लेख है जो डॉ. रामविलासशर्मा के शैलीकार रूप की विस्तृत व्याख्या करता है।
         नवें दशक में लिखे गये अनेक गीत-संग्रहों के अध्ययन से जो निष्कर्ष निकलता है उसे लेखक ने बड़े ही सलीके से आलेख-"नवें दशक का गीत-साहित्य में कलमबद्ध किया है। बकलम लेखक-" जन-जीवनानुभव,गा्रम-परिवेश,जन-सांस्कृतिक तत्व और लोक गीतात्मक संरचना के साथ भाषा की आंचलिकता का जो विकास हुआ वह जन-मनःस्थिति पर आश्रित जनबोध के साथ इन गीतों में विन्यास का पृष्ठाधार हुआ।"(पृष्ठ-91)
“सत्यं,शिवं,सुन्दरम्’ नाम है पुस्तक में समाहित एक और आलेख का जिसमें विद्वान लेखक ने “सत्यं,शिवं,सुन्दरम्"की उत्पत्ति से प्रारम्भ करके उसके प्रयोग तक इस विश्लेषणात्मक आलेख को बहुत ही रोचक तथ्यों सहित प्रस्तुत किया है। लेख के आरम्भ में ही यह रहस्योदृघाटन-"नई पीढ़ी सहसा इस बात पर विश्वास नहीं कर पाती कि यह हिन्दी या संस्कृत का अपना साहित्य-सूत्र न होकर आयातित है,विदेशी है। परन्तु बात कुछ ऐसी ही है।"-सचमुच चैकाने वाली है। डॉ. उप्रेती जी ने इस आलेख के माध्यम से मुझ जैसे अनेक साहित्यकारों पर उपकार ही किया है।
डा.कुंदनलाल उप्रेती जी द्वारा लिखित “समीक्षा के स्वर’ के प्रत्येक आलेख का स्वरूप लीक से हटकर मौलिकता के साथ कुछ न कुछ संदेश प्रदता अपने में समाहित किए हुए है।
पुस्तक मे समाहित अन्य महत्वपूर्ण आलेखों के शीर्षक हैं-"लोक कला और लोक मानस’, ब्रज लोक गीतों में लांगुरिया, ध्वनिवाद के आधार पर लोक गीतों का अध्ययन,कुमाउनी देवी-देवताओं से सम्बन्धित लोक गाथाएँ: जागर, पाश्चात्य उपन्यास की चेतना-प्रवाह पद्धति आदि। पुस्तक का हिन्दी साहित्य जगत में स्वागत होगा ऐसी आशा है।

2 comments :

  1. वाह! सुंदर ग्रंथ की सुंदर समीक्षा। विद्वान लेखक डॉ कुन्दन लाल उप्रैती जी एवं महान समीक्षक श्रद्धेय डॉ दिनेश पाठक 'शशि' जी को हार्दिक बधाई। सेतुमग को अनंत शुभकामनाएं।
    आचार्य नीरज शास्त्री
    अध्यक्ष
    तुलसी साहित्य संस्कृति अकादमी
    मथुरा

    ReplyDelete
  2. वाह! सुंदर ग्रंथ की सुंदर समीक्षा। विद्वान लेखक डॉ कुन्दन लाल उप्रैती जी एवं महान समीक्षक श्रद्धेय डॉ दिनेश पाठक 'शशि' जी को हार्दिक बधाई। सेतुमग को अनंत शुभकामनाएं।
    आचार्य नीरज शास्त्री
    अध्यक्ष
    तुलसी साहित्य संस्कृति अकादमी
    मथुरा

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।